18/07/2026
कुछ मुलाकातें नियोजित नहीं होतीं—वे घटित होती हैं।
आज प्रातः कबीरचौरामठ, वाराणसी, जो मेरी साधनास्थली भी है, वहाँ एक अत्यंत सुखद संयोग बना। आदरणीय प्रह्लाद सिंह टीपाणिया जी, उनके पुत्र अजय जी, उनके सुपुत्र तथा उनके साथ आए सभी कलाकारों का स्नेहिल आगमन हुआ। वर्षों से ये सभी अपनी स्वर-साधना के माध्यम से कबीर साहब और अन्य संतों की वाणी को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं।
इस आत्मीय मिलन की विशेषता यह भी रही कि कबीरचौरा मठ के आचार्य पूज्य विवेकदास जी भी इस चर्चा में सम्मिलित रहे। उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने इस संवाद को और भी सार्थक और आत्मीय बना दिया।
प्रह्लाद जी से मिलना हर बार एक नई ताजगी दे जाता है। उनका सरल और विनम्र स्वभाव, कबीर की वाणी के प्रति उनकी गहरी साधना, और उसे जीने का सहज भाव—सब कुछ यह अनुभव कराता है कि आप किसी कलाकार से नहीं, बल्कि एक सच्चे साधक से संवाद कर रहे हैं।
कबीर, साधना, जीवन और अनुभवों पर हुई यह आत्मीय चर्चा लंबे समय तक स्मृति में बनी रहेगी। उन्होंने स्नेहपूर्वक मुझे लोनिया खेड़ी आने का निमंत्रण भी दिया, जिसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ।
जीवन की सबसे सुंदर घटनाएँ अक्सर बिना किसी पूर्व योजना के घटित होती हैं। शायद यही अस्तित्व की अपनी शैली है—जहाँ मिलने वाले लोग, संवाद और क्षण, सब अपने समय पर स्वयं घटित हो जाते हैं।
ऐसी आकस्मिक मुलाकातें केवल स्मृतियाँ नहीं बनातीं, वे साधना की यात्रा को और भी समृद्ध कर जाती हैं। 🙏