Mahakaal Mahakaali Temple

Mahakaal Mahakaali Temple The master of universe…
(210)

श्रीललिता प्रातः स्तोत्रपञ्चकम् प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं बिम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्ड...
02/05/2026

श्रीललिता प्रातः स्तोत्रपञ्चकम्
प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं
बिम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं
मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ॥१॥

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं
रत्नाङ्गुळीयलसदङ्गुलिपल्लवाढ्याम् ।
माणिक्यहेमवलयाङ्गदशोभमानां
पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीःदधानाम् ॥ २॥

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं
भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं
पद्माङ्कुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्यम् ॥ ३॥

प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं
त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां
विश्वेश्वरीं निगमवाङ्-मनसातिदूराम् ॥ ४॥

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम
कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।
श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ॥ ५॥

यः श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकायाः
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ॥ ६॥
॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ ललिता पञ्चकम् सम्पूर्णम् ॥

02/05/2026

🌺🌺 कालीशतनामस्तोत्रं 🌺🌺
ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।
क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥
कपोला च कराला च काशी कात्यायनी कुहूः ।
कङ्काली कालदमनी करुणा कमलार्चिता ॥
कादम्बरी कालहरा कौतुकी कारणप्रिया ।
कृष्णा कृष्णाप्रिया कृष्णपूजिता कृष्णवल्लभा ॥
कृष्णाऽपराजिता कृष्णप्रिया च क्रुष्णरूपिणी ।
कालिका कालरात्रिश्च कुलजा कुलपण्डिता ॥
कुलधर्मप्रिया कामा काम्यकर्म विभूषिता ।
कुलप्रिया कुलरता कुलीन परिपूजिता ॥
कुलज्ञा कमला पूज्या कैलाश नगभूषिता ।
कुटजा केशिनी कामा कामदा कामपण्डिता ॥
करालास्या च कन्दर्पकामिनी कामशोभिता ।
केलिप्रिया केलिरता केलिनी केलिभूषिता ॥
केशवस्य प्रिया केशा काश्मीरा केशवार्चिता ।
कमेश्वरी कामरूपा कामदान विभूषिता ॥
कामहंत्री कूर्ममांसप्रिया कूर्मादि पूजिता ।
केलिनी करकी कारा करकूर्म निषेविनी ॥
कटकेशर मध्यस्था कटकी कटकार्चिता ।
कटप्रिया कटरता कटकूर्म्म निषेविनी ॥
कुमारी पूजनरता कुमारी जनसेविता ।
कुलाचार प्रिया कौलप्रिया कुलनिषेविनी ॥
कुलीना कुलधर्मज्ञा कुलभीति विमर्दिनी ।
कामधर्मप्रिया कामा नित्याकाम स्वरूपिणी ॥
कामरूपा कामहरा काममन्दिर पूजिता ।
कामागारस्वरूपा च कामाख्या कामभूषिता ॥
क्रियाभक्तिरता कामा काञ्चिनी चैव कामदा ।
कोलपुष्पाम्बरा कोला निष्कोला कलहान्तिका ॥
कौशिकी केतिकी कुम्भी कुन्तिला दिविभूषिता ।
इत्येवं श्रृणु चार्व्वाङ्गि रहस्यं सर्व मङ्गलम् ॥
यः पठेत् परमा भक्त्या स शिवी नाऽत्र संशयः ।
शतनाम प्रसादेन किं न सिध्यन्ति भूतले ॥
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च वासवाद्या दिवौकराः ।
सहस्त्रपठनाद्देवि सर्वे च विगतज्वराः ॥
नास्ति नास्ति महामाये तंत्रमध्ये कथञ्चन ।
कपया च विना देवि विना भक्त्या महेश्वरी ॥
प्रसन्ना स्यात् करालास्या स्तवपाठाद्दिगम्बरा ।
सत्यं वच्मि महेशानि अतः परतरं न हि ॥
न गोलोके न वैकुण्ठे न च कैलाश मन्दिरे ।
अतः परतरा विद्या स्तोत्रं कवचमेव च ॥
त्रिलोकेषु जगद्धात्री नास्ति नास्ति कदाचन ।
रात्रावपि दिवाभागे सन्ध्यायां वा सुरेश्वरी ॥
प्रजपेत् भक्तिभावेन रहस्यं स्तवमुत्तमम् ।
शतनाम प्रसादेन मंत्रसिद्धिः प्रजायते ॥
कुजवारे चतुर्दश्यां निशाभागे पठेत्तु यः ।
स कृती सर्वशास्त्रज्ञः स कुलीनः सदा शुचिः ॥
सकुलज्ञः सकालज्ञःस धर्मज्ञो महीतले ।
प्राप्नोति देवदेवेशि सत्यं परम सुन्दरी ॥
स्तवपाठाद् वरारोहे किं न सिध्यन्ति भूतले ।
आणिमाद्यष्टसिद्धिश्च भवत्येव न संशयः ॥
रात्रौ बिल्वतलेऽश्वत्थमूले ऽपराजितातले ।
प्रपठेत् कालिकास्तोत्रं यथाभक्त्या महेश्वरी ॥
शतवार प्रपण्नान्मंत्रसिद्धिं भवेद् ध्रुवम् ॥

🌺🌺कालीशतनामस्तोत्रं🌺🌺ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥कपोला च कराला च काशी कात्...
24/04/2026

🌺🌺कालीशतनामस्तोत्रं🌺🌺

ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।
क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥
कपोला च कराला च काशी कात्यायनी कुहूः ।
कङ्काली कालदमनी करुणा कमलार्चिता ॥
कादम्बरी कालहरा कौतुकी कारणप्रिया ।
कृष्णा कृष्णाप्रिया कृष्णपूजिता कृष्णवल्लभा ॥
कृष्णाऽपराजिता कृष्णप्रिया च क्रुष्णरूपिणी ।
कालिका कालरात्रिश्च कुलजा कुलपण्डिता ॥
कुलधर्मप्रिया कामा काम्यकर्म विभूषिता ।
कुलप्रिया कुलरता कुलीन परिपूजिता ॥
कुलज्ञा कमला पूज्या कैलाश नगभूषिता ।
कुटजा केशिनी कामा कामदा कामपण्डिता ॥
करालास्या च कन्दर्पकामिनी कामशोभिता ।
केलिप्रिया केलिरता केलिनी केलिभूषिता ॥
केशवस्य प्रिया केशा काश्मीरा केशवार्चिता ।
कमेश्वरी कामरूपा कामदान विभूषिता ॥
कामहंत्री कूर्ममांसप्रिया कूर्मादि पूजिता ।
केलिनी करकी कारा करकूर्म निषेविनी ॥
कटकेशर मध्यस्था कटकी कटकार्चिता ।
कटप्रिया कटरता कटकूर्म्म निषेविनी ॥
कुमारी पूजनरता कुमारी जनसेविता ।
कुलाचार प्रिया कौलप्रिया कुलनिषेविनी ॥
कुलीना कुलधर्मज्ञा कुलभीति विमर्दिनी ।
कामधर्मप्रिया कामा नित्याकाम स्वरूपिणी ॥
कामरूपा कामहरा काममन्दिर पूजिता ।
कामागारस्वरूपा च कामाख्या कामभूषिता ॥
क्रियाभक्तिरता कामा काञ्चिनी चैव कामदा ।
कोलपुष्पाम्बरा कोला निष्कोला कलहान्तिका ॥
कौशिकी केतिकी कुम्भी कुन्तिला दिविभूषिता ।
इत्येवं श्रृणु चार्व्वाङ्गि रहस्यं सर्व मङ्गलम् ॥
यः पठेत् परमा भक्त्या स शिवी नाऽत्र संशयः ।
शतनाम प्रसादेन किं न सिध्यन्ति भूतले ॥
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च वासवाद्या दिवौकराः ।
सहस्त्रपठनाद्देवि सर्वे च विगतज्वराः ॥
नास्ति नास्ति महामाये तंत्रमध्ये कथञ्चन ।
कपया च विना देवि विना भक्त्या महेश्वरी ॥
प्रसन्ना स्यात् करालास्या स्तवपाठाद्दिगम्बरा ।
सत्यं वच्मि महेशानि अतः परतरं न हि ॥
न गोलोके न वैकुण्ठे न च कैलाश मन्दिरे ।
अतः परतरा विद्या स्तोत्रं कवचमेव च ॥
त्रिलोकेषु जगद्धात्री नास्ति नास्ति कदाचन ।
रात्रावपि दिवाभागे सन्ध्यायां वा सुरेश्वरी ॥
प्रजपेत् भक्तिभावेन रहस्यं स्तवमुत्तमम् ।
शतनाम प्रसादेन मंत्रसिद्धिः प्रजायते ॥
कुजवारे चतुर्दश्यां निशाभागे पठेत्तु यः ।
स कृती सर्वशास्त्रज्ञः स कुलीनः सदा शुचिः ॥
सकुलज्ञः सकालज्ञःस धर्मज्ञो महीतले ।
प्राप्नोति देवदेवेशि सत्यं परम सुन्दरी ॥
स्तवपाठाद् वरारोहे किं न सिध्यन्ति भूतले ।
आणिमाद्यष्टसिद्धिश्च भवत्येव न संशयः ॥
रात्रौ बिल्वतलेऽश्वत्थमूले ऽपराजितातले ।
प्रपठेत् कालिकास्तोत्रं यथाभक्त्या महेश्वरी ॥
शतवार प्रपण्नान्मंत्रसिद्धिं भवेद् ध्रुवम् ॥

🚩🚩🚩 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

24/04/2026

"शनि का गुरु : शिवजी का रूप काल भैरव"
---------
"काल भैरव" और शनि देव का संबंध हिंदू धर्म, तंत्र शास्त्र और ज्योतिष में काफी गहरा और महत्वपूर्ण माना जाता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:-

1. काल भैरव को शनि का गुरु माना जाता है
बहुत से ज्योतिषीय और तांत्रिक ग्रंथों/परंपराओं में भगवान काल भैरव को शनिदेव का गुरु बताया गया है।

शनि न्याय, कर्मफल, अनुशासन और कठोर सत्य के प्रतीक हैं, जबकि काल भैरव भी काल (समय) के स्वामी हैं और अहंकार, भय, नकारात्मकता का नाश करने वाले हैं। दोनों में समानता इसलिए है क्योंकि दोनों ही व्यक्ति को उसके कर्मों का फल अनुभव कराते हैं और अनुशासन सिखाते हैं।

2. शनि के कुप्रभाव को शांत करने के लिए काल भैरव की पूजा:-

जब शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, या अशुभ दशा चल रही हो, तो काल भैरव की उपासना सबसे प्रभावी उपाय मानी जाती है।

मान्यता है कि काल भैरव की कृपा से शनिदेव प्रसन्न/शांत हो जाते हैं और उनके कठोर फल कम हो जाते हैं या परिवर्तित होकर शुभ बन जाते हैं।

खासकर रविवार (शनि का दिन) और मंगलवार (भैरव का दिन) को काल भैरव की पूजा से शनि के दोष बहुत जल्दी कम होते हैं।

3. बटुक भैरव vs काल भैरव का भेद।

कुछ परंपराओं में कहा जाता है कि:-

बटुक भैरव - शनि के शुभ प्रभाव का प्रतीक।
काल भैरव - शनि के अशुभ/प्रकोप रूप का नियंत्रक।

इसलिए शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या में मुख्य रूप से काल भैरव की आराधना की सलाह दी जाती है।

4. व्यावहारिक उपाय (लोकप्रिय मान्यताएँ)
काल भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष या अन्य मास की कृष्ण अष्टमी) पर विशेष पूजा।

शनिवार या रविवार को काल भैरव मंदिर में तेल, सरसों का तेल, काले तिल, कंबल, लोहा चढ़ाना।

काल भैरवाष्टक या काल भैरव मंत्र ("ॐ भ्रं कालभैरवाय नमः" आदि) का जाप।

कई लोग मानते हैं कि जहां काल भैरव की पूजा नियमित होती है, वहां शनि का प्रकोप बहुत कम हो जाता है।

संक्षेप में:-
काल भैरव शनि के "गुरु" और "नियंत्रक" दोनों हैं। शनि जब कठोर परीक्षा लेते हैं, तो काल भैरव की कृपा से वह परीक्षा सहने की शक्ति और अंत में मुक्ति मिलती है

20/04/2026

🌺वन के शांत, पवित्र वातावरण में अग्नि की मंद लपटें जल रही थीं। उस दिव्य दृश्य में स्वयं महादेव और माता अन्नपूर्णा मानव जीवन के एक अत्यंत सरल, अपितु गहन रहस्य को प्रकट कर रहे थे।🌺

कथा कहती है कि एक बार भगवान शिव ने जगत को यह उपदेश दिया कि यह संसार मात्र माया है, यहाँ तक कि अन्न भी माया है। जब यह बात माता पार्वती ने सुनी, तो उन्होंने सोचा—यदि अन्न ही माया है, तो जीवों का पालन कैसे होगा? तब माता ने अन्न की शक्ति को जगत से अदृश्य कर दिया। परिणाम यह हुआ कि समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया, कोई अन्न नहीं रहा, भूख ने देवताओं और मनुष्यों को व्याकुल कर दिया।

तब स्वयं महादेव को अपनी बात का वास्तविक अर्थ समझ में आया। वे काशी नगरी में भिक्षुक बनकर पहुँचे, जहाँ माता पार्वती अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं। उस दिन माता ने स्वयं अपने हाथों से भगवान शिव को अन्न परोसा। यह वही क्षण था जब शिव ने स्वीकार किया कि अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं, अपितु यह साक्षात् देवी शक्ति का प्रसाद है।

यह चित्र उसी दिव्य लीला का प्रतीक है—जहाँ शिव, जो स्वयं विश्व के संहारक हैं, अन्न के महत्व को समझते हुए विनम्र भाव से उपस्थित हैं, और माता अन्नपूर्णा सृष्टि के पोषण की अधिष्ठात्री बनकर प्रेमपूर्वक भोजन बना रही हैं। अग्नि पर चढ़े पात्र, साधारण वन का परिवेश, और देवी-देवताओं का यह सहज रूप हमें यह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी साधना भी अंततः अन्न और करुणा से ही पूर्ण होती है।

अन्न केवल भोजन नहीं, अपितु जीवन का आधार है। जिस घर में अन्न का सम्मान होता है, वहाँ लक्ष्मी और शांति का निवास होता है। और जहाँ अन्न का तिरस्कार होता है, वहाँ अभाव अपने आप आ जाता है।

॥ स्तोत्र ॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥

माता अन्नपूर्णा हमें केवल अन्न ही नहीं देतीं, अपितु ज्ञान, संतोष और समृद्धि का आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। इस दिव्य कथा का स्मरण हमें यह सिखाता है कि हर अन्न का कण ईश्वर का प्रसाद है—उसे श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम से ग्रहण करना ही सच्ची भक्ति है।🚩🚩🚩

🌺महाकाली का विराट उग्र रूप – कथा 🌺बहुत समय पहले,रक्तबीज, चंड-मुंड और शुम्भ-निशुम्भ जैसे भयानक असुरों ने तीनों लोकों में ...
15/04/2026

🌺महाकाली का विराट उग्र रूप – कथा 🌺
बहुत समय पहले,

रक्तबीज, चंड-मुंड और शुम्भ-निशुम्भ जैसे भयानक असुरों ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था।
देवता हार गए।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित सभी देवता माँ आदिशक्ति के पास गए और प्रार्थना की —
“हे जगदंबा, केवल आप ही हमें बचा सकती हैं।”
तभी माँ दुर्गा के शरीर से एक भयंकर काला प्रकाश निकला…

रक्तबीज की शक्ति थी — 👉 उसकी हर बूंद से नया असुर पैदा हो जाता था।
जब माँ ने उसे घायल किया, तो हजारों असुर पैदा हो गए।
तब महाकाली ने अपना विराट रूप धारण किया —
हर बूंद को जमीन पर गिरने से पहले पी लिया
सब असुरों का संहार कर दिया
पूरा युद्धक्षेत्र रक्त और अग्नि से भर गया

महाकाली का उग्र रूप डरावना नहीं, बल्कि प्रतीक है:
बुराई का नाश
अहंकार का विनाश
धर्म की रक्षा
शक्ति और साहस
जब अन्याय बढ़ता है, तब माँ यही रूप धारण करती हैं।



🌺🌺श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में वर्णित हैं कि🌺🌺💐तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकंटका!यावन्न परशु: प्राप्तो देवीभागवताभिध...
12/04/2026

🌺🌺श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में वर्णित हैं कि🌺🌺

💐तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकंटका!
यावन्न परशु: प्राप्तो देवीभागवताभिध:!!💐
अर्थात..... मनुष्यों के लिए पाप रूपी अरण्य तभी तक दुःख प्रद एवम कंटकमय रहता हैं, जब तक श्रीमद्देवीभागवत रूपी परशु (कुठार) उपलब्ध नहीं हो जाता......!!

मनुष्यों के लिए उपसर्ग (ग्रहण) रूपी घोर अन्धकार तभी तक कष्ट पहुंचाता हैं, जब तक श्रीमद्देवीभागवत रूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो जाता हैं......!!

सभी अठारह पुराणों में यह श्रीमद्देवीभागवत पुराण सर्वश्रेष्ठ हैं और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्रदान करने वाला हैं......!!

पूरे दिन, दिन के आधे समय तक, चौथाई समय तक, मुहूर्त भर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्ति पूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती हैं........!!

अमृत के पान से तो केवल एक ही मनुष्य अजर - अमर होता हैं, किंतु भगवती का कथारूप अमृत संपूर्ण कुल को ही अजर - अमर बना देता हैं......!!

जो कलुषित हृदय वाले पापी, मूर्ख, मित्रद्रोही, वेदों की निंदा करने वाले, हिंसा में रत और नास्तिक मार्ग का अनुसरण करने वाले मनुष्य हैं, वे भी कलियुग में इस नवाहयज्ञ के अनुष्ठान से पवित्र हो जाते हैं......!!

अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में सूर्य के कन्या राशि में पहुंचने पर महाष्टमी तिथि को स्वर्ण सिंहासन पर स्थित देवी के प्रीति प्रद श्रीमद्देवीभागवत ग्रंथ का पूजन करके उसे किसी योग्य ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक देता हैं, वह देवी के परमपद को प्राप्त कर लेता हैं.......!!

वशिष्ठ जी के श्राप से निमि को पुन: देह की प्राप्ति नहीं हुई थी! परंतु आगे चलकर निमि की देह में रहने की इच्छा नहीं रही और सम्पूर्ण प्राणियों की दृष्टि में निवास करने की इच्छा जागृत हो गई! देवताओं के मार्ग निर्देश पर निमि ने मां भगवती की भक्ति आरंभ कर उन्हें प्रसन्न कर लिया.....!!

जब जगदम्बा निमि पर प्रसन्न हुई तब मां ने कहा कि तुम्हें विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष बचा हुआ हैं! समस्त प्राणियों के नेत्रों में तुम्हारा निवास होगा! तुम्हारे कारण ही प्राणियों के नेत्रों के पलक गिराने की शक्ति होगी! तुम्हारे निवास के कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी "निमिष" (पलक गिरानेवाले) तथा देवता "अनिमिष" (पलक न गिराने वाले) होगें......!!

जय मां भगवती......!!🚩🚩🚩

🌺कालीशतनामस्तोत्रं🌺ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥कपोला च कराला च काशी कात्या...
12/04/2026

🌺कालीशतनामस्तोत्रं🌺

ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।
क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥
कपोला च कराला च काशी कात्यायनी कुहूः ।
कङ्काली कालदमनी करुणा कमलार्चिता ॥
कादम्बरी कालहरा कौतुकी कारणप्रिया ।
कृष्णा कृष्णाप्रिया कृष्णपूजिता कृष्णवल्लभा ॥
कृष्णाऽपराजिता कृष्णप्रिया च क्रुष्णरूपिणी ।
कालिका कालरात्रिश्च कुलजा कुलपण्डिता ॥
कुलधर्मप्रिया कामा काम्यकर्म विभूषिता ।
कुलप्रिया कुलरता कुलीन परिपूजिता ॥
कुलज्ञा कमला पूज्या कैलाश नगभूषिता ।
कुटजा केशिनी कामा कामदा कामपण्डिता ॥
करालास्या च कन्दर्पकामिनी कामशोभिता ।
केलिप्रिया केलिरता केलिनी केलिभूषिता ॥
केशवस्य प्रिया केशा काश्मीरा केशवार्चिता ।
कमेश्वरी कामरूपा कामदान विभूषिता ॥
कामहंत्री कूर्ममांसप्रिया कूर्मादि पूजिता ।
केलिनी करकी कारा करकूर्म निषेविनी ॥
कटकेशर मध्यस्था कटकी कटकार्चिता ।
कटप्रिया कटरता कटकूर्म्म निषेविनी ॥
कुमारी पूजनरता कुमारी जनसेविता ।
कुलाचार प्रिया कौलप्रिया कुलनिषेविनी ॥
कुलीना कुलधर्मज्ञा कुलभीति विमर्दिनी ।
कामधर्मप्रिया कामा नित्याकाम स्वरूपिणी ॥
कामरूपा कामहरा काममन्दिर पूजिता ।
कामागारस्वरूपा च कामाख्या कामभूषिता ॥
क्रियाभक्तिरता कामा काञ्चिनी चैव कामदा ।
कोलपुष्पाम्बरा कोला निष्कोला कलहान्तिका ॥
कौशिकी केतिकी कुम्भी कुन्तिला दिविभूषिता ।
इत्येवं श्रृणु चार्व्वाङ्गि रहस्यं सर्व मङ्गलम् ॥
यः पठेत् परमा भक्त्या स शिवी नाऽत्र संशयः ।
शतनाम प्रसादेन किं न सिध्यन्ति भूतले ॥
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च वासवाद्या दिवौकराः ।
सहस्त्रपठनाद्देवि सर्वे च विगतज्वराः ॥
नास्ति नास्ति महामाये तंत्रमध्ये कथञ्चन ।
कपया च विना देवि विना भक्त्या महेश्वरी ॥
प्रसन्ना स्यात् करालास्या स्तवपाठाद्दिगम्बरा ।
सत्यं वच्मि महेशानि अतः परतरं न हि ॥
न गोलोके न वैकुण्ठे न च कैलाश मन्दिरे ।
अतः परतरा विद्या स्तोत्रं कवचमेव च ॥
त्रिलोकेषु जगद्धात्री नास्ति नास्ति कदाचन ।
रात्रावपि दिवाभागे सन्ध्यायां वा सुरेश्वरी ॥
प्रजपेत् भक्तिभावेन रहस्यं स्तवमुत्तमम् ।
शतनाम प्रसादेन मंत्रसिद्धिः प्रजायते ॥
कुजवारे चतुर्दश्यां निशाभागे पठेत्तु यः ।
स कृती सर्वशास्त्रज्ञः स कुलीनः सदा शुचिः ॥
सकुलज्ञः सकालज्ञःस धर्मज्ञो महीतले ।
प्राप्नोति देवदेवेशि सत्यं परम सुन्दरी ॥
स्तवपाठाद् वरारोहे किं न सिध्यन्ति भूतले ।
आणिमाद्यष्टसिद्धिश्च भवत्येव न संशयः ॥
रात्रौ बिल्वतलेऽश्वत्थमूले ऽपराजितातले ।
प्रपठेत् कालिकास्तोत्रं यथाभक्त्या महेश्वरी ॥
शतवार प्रपण्नान्मंत्रसिद्धिं भवेद् ध्रुवम् ll

🌺जब अधर्म अपनी सीमा पार करता है,तब माँ काली का उग्र रूप प्रकट होता है।वह बुराई का अंत और धर्म की रक्षा करती हैं।जय महाका...
11/04/2026

🌺जब अधर्म अपनी सीमा पार करता है,
तब माँ काली का उग्र रूप प्रकट होता है।
वह बुराई का अंत और धर्म की रक्षा करती हैं।
जय महाकाली।🌺

जय माता दी वार्ताली देवी (वाराही का एक रूप) साधना एक अत्यंत प्राचीन, दुर्लभ और तीव्र तांत्रिक साधना है, जो मुख्य रूप से ...
09/04/2026

जय माता दी
वार्ताली देवी (वाराही का एक रूप) साधना एक अत्यंत प्राचीन, दुर्लभ और तीव्र तांत्रिक साधना है, जो मुख्य रूप से भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञान (त्रिकालदर्शी), शत्रु स्तम्भन और वाक सिद्धि के लिए की जाती है। यह साधना कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से पूर्णिमा तक या नवरात्र में की जाती है, जिसमें 21 दिनों तक रात्रि में मंत्र जप (रुद्राक्ष/रक्त चंदन माला) और पूजा की जाती है।
वार्ताली देवी साधना की प्रमुख बातें:
मूल मंत्र: ॐ ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवती वार्तालि वाराहि... (विस्तृत मंत्र साधना की गहराई पर निर्भर करता है)।
साधना विधि: पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे के कलश और वार्ताली यंत्र की स्थापना करें। पीतल के दीपक में घी का प्रयोग करें और कच्चे आलू/शकरकंद का भोग लगाएं।
अवधि: यह 21 दिन की साधना है जो मंगलवार या शनिवार से शुरू की जा सकती है।
सात्विक नियम: साधना के दौरान संयम रखना आवश्यक है। साधना पूरी होने पर यंत्र को दाहिनी भुजा पर धारण किया जाता है।
लाभ: साधना सिद्ध होने पर साधक त्रिकालदर्शी बन जाता है, शत्रु का स्तम्भन होता है, और दिव्य प्रकाश की अनुभूति होती है।
सावधानी: वार्ताली साधना एक उग्र साधना मानी जाती है, इसलिए इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही करना उचित होता है।

🌺।। कालीशतनामस्तोत्रं ।।🌺💐ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥कपोला च कराला च काशी...
07/04/2026

🌺।। कालीशतनामस्तोत्रं ।।🌺

💐ॐ करालवदना कालीं कामिनी कमलालया ।
क्रियावती कोटराक्षी कामाक्षा कामसुन्दरी ॥
कपोला च कराला च काशी कात्यायनी कुहूः ।
कङ्काली कालदमनी करुणा कमलार्चिता ॥
कादम्बरी कालहरा कौतुकी कारणप्रिया ।
कृष्णा कृष्णाप्रिया कृष्णपूजिता कृष्णवल्लभा ॥
कृष्णाऽपराजिता कृष्णप्रिया च क्रुष्णरूपिणी ।
कालिका कालरात्रिश्च कुलजा कुलपण्डिता ॥
कुलधर्मप्रिया कामा काम्यकर्म विभूषिता ।
कुलप्रिया कुलरता कुलीन परिपूजिता ॥
कुलज्ञा कमला पूज्या कैलाश नगभूषिता ।
कुटजा केशिनी कामा कामदा कामपण्डिता ॥
करालास्या च कन्दर्पकामिनी कामशोभिता ।
केलिप्रिया केलिरता केलिनी केलिभूषिता ॥
केशवस्य प्रिया केशा काश्मीरा केशवार्चिता ।
कमेश्वरी कामरूपा कामदान विभूषिता ॥
कामहंत्री कूर्ममांसप्रिया कूर्मादि पूजिता ।
केलिनी करकी कारा करकूर्म निषेविनी ॥
कटकेशर मध्यस्था कटकी कटकार्चिता ।
कटप्रिया कटरता कटकूर्म्म निषेविनी ॥
कुमारी पूजनरता कुमारी जनसेविता ।
कुलाचार प्रिया कौलप्रिया कुलनिषेविनी ॥
कुलीना कुलधर्मज्ञा कुलभीति विमर्दिनी ।
कामधर्मप्रिया कामा नित्याकाम स्वरूपिणी ॥
कामरूपा कामहरा काममन्दिर पूजिता ।
कामागारस्वरूपा च कामाख्या कामभूषिता ॥
क्रियाभक्तिरता कामा काञ्चिनी चैव कामदा ।
कोलपुष्पाम्बरा कोला निष्कोला कलहान्तिका ॥
कौशिकी केतिकी कुम्भी कुन्तिला दिविभूषिता ।
इत्येवं श्रृणु चार्व्वाङ्गि रहस्यं सर्व मङ्गलम् ॥
यः पठेत् परमा भक्त्या स शिवी नाऽत्र संशयः ।
शतनाम प्रसादेन किं न सिध्यन्ति भूतले ॥
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च वासवाद्या दिवौकराः ।
सहस्त्रपठनाद्देवि सर्वे च विगतज्वराः ॥
नास्ति नास्ति महामाये तंत्रमध्ये कथञ्चन ।
कपया च विना देवि विना भक्त्या महेश्वरी ॥
प्रसन्ना स्यात् करालास्या स्तवपाठाद्दिगम्बरा ।
सत्यं वच्मि महेशानि अतः परतरं न हि ॥
न गोलोके न वैकुण्ठे न च कैलाश मन्दिरे ।
अतः परतरा विद्या स्तोत्रं कवचमेव च ॥
त्रिलोकेषु जगद्धात्री नास्ति नास्ति कदाचन ।
रात्रावपि दिवाभागे सन्ध्यायां वा सुरेश्वरी ॥
प्रजपेत् भक्तिभावेन रहस्यं स्तवमुत्तमम् ।
शतनाम प्रसादेन मंत्रसिद्धिः प्रजायते ॥
कुजवारे चतुर्दश्यां निशाभागे पठेत्तु यः ।
स कृती सर्वशास्त्रज्ञः स कुलीनः सदा शुचिः ॥
सकुलज्ञः सकालज्ञःस धर्मज्ञो महीतले ।
प्राप्नोति देवदेवेशि सत्यं परम सुन्दरी ॥
स्तवपाठाद् वरारोहे किं न सिध्यन्ति भूतले ।
आणिमाद्यष्टसिद्धिश्च भवत्येव न संशयः ॥
रात्रौ बिल्वतलेऽश्वत्थमूले ऽपराजितातले ।
प्रपठेत् कालिकास्तोत्रं यथाभक्त्या महेश्वरी ॥
शतवार प्रपण्नान्मंत्रसिद्धिं भवेद् ध्रुवम् ॥💐

Address

Una

Opening Hours

Monday 4am - 9pm
Tuesday 4am - 9pm
Wednesday 4am - 9pm
Thursday 4am - 9pm
Friday 4am - 9pm
Saturday 4am - 9pm
Sunday 4am - 9pm

Telephone

+918699467713

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mahakaal Mahakaali Temple posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Mahakaal Mahakaali Temple:

Share

Category