श्रीराम बाबाजी भक्त मंडल

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श्रीराम बाबाजी भक्त मंडल Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from श्रीराम बाबाजी भक्त मंडल, परमहंस श्रीराम विराजमान स्थल, हनुमान मंदिर, उदयपुरा, ज़िला रायसेन, मध्यप्रदेश, Udaipura.

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के चैतन्य अवतार हैं। उनके मूल सिद्धांत परोपकार, भजन, यथा ईश्वरादेश का अनुपालन है। न आश्रम, न वस्तु, न आग्रह, न विग्रह, न फलाकांक्षा, न परनिर्भरता, न रोक, न टोक, न आस, न त्रास, सदा आनंद, सदा ईश्वर की नियति में अखंड विश्वास। हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी घट-घट विराजे परहित हेतु दिव्य साधु हुए। चैतन्य ही ईश्वर है के तात्विक विवेचन के साथ आजीवन न कोई आश्रम, न कोई स्थायी डेरा, न कोई औपचारिक गुरु-शिष्य परंपरा का अनुगमन, न स्थायी विधि अथवा विधान से संचालित किसी पंथ, पक्ष का निर्माण, न कोई संग्रह, न विग्रह, न आस, न त्रास, न जस, न अपजस... सदा एकरस परमहंस श्रीराम बाबाजी पृथ्वी पर रहे। उनके विभिन्न भक्तों ने मिलकर उनके आध्यात्मिक दर्शन को विस्तारित करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया व वेबसाइट shrirambabajee.com का निर्माण किया है। उनका पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थायी डेरा नहीं होने के कारण ही उनकी तात्विक विवेचना लेखन, पठन, वीडियो माध्यमों में विस्तारित होती दिखेगी। आपसे आग्रह है इस पेज को अपनी आध्यात्मिक शीर्षता के विकास को ध्यान में रखते हुए लाइक करें व जुड़े रहें।
जय हो हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी की।

परमहंसियों का चयन समझना कठिन है, गुड्डा बाबा और हनुमान अंश में बहेलिए की तुलना करके दिखिएबरुण सखाजी श्रीवास्तवफिल्म हनुम...
08/09/2026

परमहंसियों का चयन समझना कठिन है, गुड्डा बाबा और हनुमान अंश में बहेलिए की तुलना करके दिखिए

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

फिल्म हनुमान अंश में नीब करोरी बाबाजी अपनी सेवा के लिए एक बहेलिया का चुनाव करते हैं। बहेलिया मतलब चिड़ियों को पकड़कर मारने वाला। इन्हें बेचकर अपना जीवन चलाने वाला। कितनी अजीब बात है। एक तरफ हनुमान अवस्था को प्राप्त प्रकाशित नीब करोरी बाबाजी दूसरी तरफ एक हिंसक, निर्जीव, मूक, असहाय उन्मुक्त प्राणियों को दबोचकर खा जाने वाला बहेलिया। वास्तव में परमहंसों की कई क्रियाएं हमारे इस कूढ़मगज में समाती नहीं हैं। इनका चयन बड़ा अटपटा होता है। इनकी परख अपनी होती है। इनकी दृष्टि सारे बंधन, परदों को भेदने वाली होती है। इनका नजरिया व्यापक होता है। जन्म-जन्मांतर की यात्रा होती है।

बहेलिया इकलौता ऐसा व्यक्ति है जिसे नीब करोरी बाबाजी चैतन्य शिव के रूप में दर्शन देते हैं। साधुओं, संतों को मौंखिक, भौतिक रूप से शिवजी कहना अलग बात है। उन्हें महसूस करना अलग बात है। बहेलिया गोपाल आनंद में उस स्थिति को प्राप्त हो गया जो रामजी के दर्शन करके सुतीक्षण मुनि को प्राप्त हुई थी। वह आनंद से भर जाता है। भौतिक शरीर को बुखार आ जाता है। बहेलिया सीधा है, सरल है। साधारण संसार बाहर दिख रही हिंसा को देख पाएगा, किंतु परमहंस भीतर समाए सत्य को देखते हैं। इसीलिए सारे पर्दों को भेदने वाले ही परमहंस होते हैं।

नीब करोरी बाबाजी का एक संवाद प्रकट होता है। बहेलिया गोपाल निशंक हैं। वे मानते हैं जिनके दर्शन हुए वे बाबा नीब करोरी हैं। वे ही शंकर हैं। किंतु बहेलिया सरल है। सहज है। ज्यों हमारे गुड्डा बाबा। वह प्रश्न करता है, महाराजजी हमने गुफा में जो देखो। महाराजजी नीब करोरी बाबा मुस्कुराते हैं और कहते हैं आंखें वही देखती हैं जो मन में होता है और तुम्हारे मन में शिव हैं। जरा सोचिए, कथा हनुमानजी की चल रही है और प्रकट शिव हो रहे हैं, क्यों? इस क्यों को ही समझने की जरूरत है। क्योंकि शिव ही सहज है। भोला है। सरल है। शंकर है। कण-कण है। वही हनुमान है। वही रुद्र है। परमहंस श्रीराम बाबाजी चैतन्य हनुमानजी हैं। वे ही ग्यारहवें रुद्र हैं। वे चैतन्य देव हैं।

जैसे बाबा नीब करोरी ने बहेलिया को चुना। वैसे ही परमहंस श्रीराम बाबाजी ने गुड्डा बाबा को चुना। गुड्डा बाबा में सेवा, सहजता और सरलता प्रचुरता में है। बंसल अस्पताल में थे भगवान। स्वयं भौतिक पीड़ा में थे, किंतु चिंता गुड्डा बाबा की थी। गुड्डा बाबा को बहेलिया की तरह कैसे दर्शन हुए यह तो किसी को नहीं पता, न किसी को वे बता पाते क्योंकि सरल हैं। सहज हैं। मूल हैं। मेरी या आपकी तरह नहीं अपने ही किस्से सुनाते फिरें, अपना ही भाव बताते फिरें, अपनी ही महिमा महाराजजी के किस्सों के साथ जोड़कर प्रचारित करते फिरें। महाराजजी का चयन परमहंसी है। हमे लगेगा इनका चयन इसके लिए क्यों, कैसे, किसलिए इत्यादि, क्योंकि हम संसार के नजरिए से देखते हैं। परमहंसी का दृष्टिकोण व्यापक, अनंत यात्राओं से विकसित होता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी का गुड्डा बाबा का चयन समझना बड़ा जटिल है, क्योंकि हमारे मापदंड बहुत संकुचित, एकाध जन्म तक सिमटे, एकाध घटना के दायरे में बंधे, एकाध सीमा में गुथे होते हैं। व्यापक नहीं।

बंसल अस्पताल में परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी गुड्डा बाबा की सेवा से ऐसे प्रसन्न हुए कि उन्हें अपना पुत्र कह दिया। एक बार नहीं अनेक बार बोले, ऐसी सेवा बेटा भी नहीं कर सके। मो से बेटा ही निकलो। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के देह तजने के इस दूसरे वर्ष-दिवस में आज यह किस्सा सहज ही ख्याल में आया।
shrirambabajee.com

यह चित्र हमे मध्यप्रदेश ज़िला रायसेन के दहलवाड़ा गांव के निवासी भक्त महेंद्र जी के माध्यम से प्राप्त हुआ है। इसकी तिथि स...
26/08/2026

यह चित्र हमे मध्यप्रदेश ज़िला रायसेन के दहलवाड़ा गांव के निवासी भक्त महेंद्र जी के माध्यम से प्राप्त हुआ है। इसकी तिथि समय तो पता नहीं चल पाई किंतु बहुत पुराना नज़र आ रहा है। इसमें परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी एक मंदिर के सामने खड़े हैं। उनके मुख और मुद्रा को देखकर कोई भी कह सकता है कि ये वही लीलामय हनुमानजी हैं। तेजस्वी, स्पष्ट मुख दर्शन जैसे चैतन्य ही खड़े हों।
परमहंस श्रीराम बाबाजी अब तक पृथ्वी पर आए सभी महात्माओं, साधुओं, ऋषियों, मुनियों, दरवेशों, फ़क़ीरों के प्रतिरूप हैं। उनकी कृपा से ही यह चित्र मिला है।
बोलिए हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी की जय।

कायाकल्प को चमत्कार बताने लगे लोग तो श्रीराम बाबाजी ने देहत्याग ही बेहतर समझाबरुण सखाजी श्रीवास्तवचमत्कार हमारे मन का सब...
23/08/2026

कायाकल्प को चमत्कार बताने लगे लोग तो श्रीराम बाबाजी ने देहत्याग ही बेहतर समझा

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

चमत्कार हमारे मन का सबसे मजबूत और बड़ा आग्रह है। चमत्कार के बिना न आस्था जागती है न विश्वास स्थापित होता है। चमत्कारों में जीने वाले असल में नास्तिकता से भरे होते हैं। जैसे अक्सर नॉनबिलीवर्स यानि नास्तिक कहा करते हैं, अगर वह इतना करुणानिधान है तो अस्पताल क्यों हैं, आपदाएं क्यों हैं, संकट क्यों हैं? दरअसल यह सोच का ऐसा सांचा है जो बहुत कच्ची बातें समझा सकता है। प्रकृति और सनातन दोनों ही विराट में यकीन करते हैं, संकुचितता में नहीं। इन दोनों के बीच में अवरोध बनकर खड़े होने की कोशिश करते हैं चमत्कारवादी यानी नास्तिक यानी आग्रही।

परमहंस श्रीराम बाबाजी सशरीर हनुमानजी के समान आठों सिद्धियों, नौ निधियों के स्वामी थे। इसके बाद भी किसी चमत्कार का न दावा न ऐसे लोगों के सामने खुद को सिद्ध करने की कोशिश। गुरुवर परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी अपने नश्वर शरीर के छूटने से पूर्व बनारस में विराजमान थे। शरीर छोड़ने से पहले 72 दिनों तक उन्होंने एक अन्न का दाना मुंह में नहीं लिया था। न कोई तरल ही लिया था। पानी भी चंद बूंदें पीई थी। इस दौरान आम चर्चा में यह बात आरंभ हो गई कि गुरुवर कायाकल्प कर रहे हैं, चूंकि उनके शरीर पर आए रोग के चिन्ह ढंकने लगे थे। भगवन ने जब काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा की तो कायाकल्प को लेकर लोगों का विश्वास और भी मजबूत हुआ। इस बात की जानकारी लगी तो प्रसन्नता किसे न होती। लोगों को लगने लगा महाराजजी सच में कायाकल्प कर रहे हैं तो चमत्कार प्रेमियों के लिए यह बड़ी बात थी। चमत्कारवादियों में से अनेकों ने कहना शुरू कर दिया, चमत्कार हो गया है, अगर कायाकल्प हो गया तो समझो क्षेत्रभर में डंका बज जाएगा। बस इस बात का प्रचार होना ही था कि उन्होंने सारी क्रियाएं थाम दी।

महाराजजी परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी ने कभी डंका बजाने के लिए कुछ किया ही नहीं। वे तो डंकों से दूर भागते रहे। जहां, जब, जैसे शरीर को सुख मिला उन्होंने तत्क्षण त्यागा। जहां, जब, जैसे भी चमत्कारवादियों का हुजूम जुड़ा वे वहां से भागे। इस चर्चा के बीच भी यही होना था। कायाकल्प की बातें होती रही, वे शरीर को न जीवन में साधते थे न देहत्याग के वक्त। उन्हें अपने कायाकल्पी होने की न तब पड़ी थी न अब, जबकि वे ऐसा एक पल में कर सकते थे।

आगे उनकी ही कृपा से और समझ उत्पन्न हुई तो समझ आया कायाकल्पी देवरहा बाबाजी हुए, तैलंग स्वामी हुए। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी संसार में हुए सभी संतों का समिश्रण हैं। उनकी कायाकल्पी क्रिया देवरहा बाबाजी की, तो देहत्याग के समय पूर्ण धड़ंग होने की क्रिया तैलंग स्वामी की रही। चिंदियों, कागजों को जलाकर यज्ञ की क्रिया दादाजी धूनीवालों के समान रही। मंडला बकछेरादोना आश्रम में झूले पर बैठकर पांव में पायल, सिर पर चुनरी डालकर नर्मदा का स्वरूप दिखाना स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह क्रिया दिखी तो नाभि से निरंतर श्रीराम जय राम जय जय राम का अजपा नींब करौली बाबा का स्वरूप बना। हम अल्पसमझ वालों को अभी तक यह नहीं समझ आया कि परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी हमे चैतन्य समग्र स्वरूपों में भौतिक दर्शन देकर चले गए। अब वे हैं, किंतु भौतिक में नहीं पारलौकिक में। किंतु आपके चमत्कार के लिए वे न अनुभूत होंगे न प्रकट। पमरहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के निर्मल दर्शन बिना चमत्कार की अपेक्षा के ही संभव हैं।

01/08/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी की 40 वर्ष पुरानी तकरीबन 1985-86 की स्मृतियों को हनुमान गढ़ी, अयोध्या और श्रीराम जानकी मंदिर, उदयपुरा जिला रायसेन के महामंडलेश्वर जन्मेजय शरण महाराज जी ने समय के साक्ष्य भाव से सुनाया। आप भी सुनिए, क्या हुआ जब गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी से जन्मेजय शरण जी की भेंट बरमान घाट पर हुई। फिर क्या हुआ जब हरिद्वार कुंभ में महाराज जी हनुमानजी श्रीराम बाबाजी ने कहा आज आम का भंडारा होगा। सबकी विदाई भी होगी और झोले से नोटों की गड्डी की गड्डी निकालकर हाथ में रख दी। 11 हजार क्विंटल आम लाए गए। ऐसा आनंद रसमय वृतांत आपको भी आनंद आएगा।
वीडियो परमहंस श्रीराम बाबाजी के परमसेवक भगत मणि जीतेंद्र रघुवंशी जीतू भाई के भोपाल निवास पर पधारे महात्मा जन्मेजय शरण जी के अवसर का है। इस अवसर पर जन्मेजय शरण महाराज जी ने भगत मणि जीतू के पुत्र राघव को विशेष आशीष दिया।

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परमहंस श्रीराम बाबाजी के प्रति भक्ति-भाव का रसपूरित प्रकटन- रघुवीर मास्साब, धौलपुर, जिला रायसेन, मध्यप्रदेशपरमहंस श्री र...
31/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी के प्रति भक्ति-भाव का रसपूरित प्रकटन

- रघुवीर मास्साब, धौलपुर, जिला रायसेन, मध्यप्रदेश

परमहंस श्री राम बाबा के, नित प्रति चरण मनाऊं l
श्री राम जय राम कीर्तन गाकर, ध्यान मग्न हो जाऊं ll

उर में ज्ञान का दीप जलाकर, तम को दूर भगाया,
जो हैं सेवक उन चरणों के, सच्चा मार्ग दिखाया,,

ऐसे कृपासिंधु गुरुवर के, चरण कमल चित लाऊं lll
श्री राम जय राम कीर्तन गाकर, ध्यान मग्न हो जाऊं l

जिनकी केवल कृपादृष्टि से, सब आनंद हो जाता,
सदवृत्ति मिल जाती है और, मुक्ति द्वार खुल जाता,,
दया करो रघुवीर पे गुरुवर, चरणों की रज पाऊं l
श्री राम जय राम कीर्तन गाकर, ध्यान मग्न हो जाऊं ll

हनुमान जी महाराज की जय
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परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-7ParamhansShrirambabajee: वनगमन में राम लता, पत्तों से सीता का पता पूछते ह...
27/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-7

ParamhansShrirambabajee: वनगमन में राम लता, पत्तों से सीता का पता पूछते हैं, परमहंस श्रीराम बाबाजी गायों से, यही तो विधात्री क्रियाएं हैं

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

परहित बस जिनके मन माहीं, तिनको जग दुर्लभ कछु नाहीं। परमहंस श्रीराम बाबाजी अक्सर गाया करते थे। वे सशरीर इस संसार में हनुमानजी के रूप में विराजमान रहे। परहित की कल्पना नहीं बल्कि मूर्त स्वरूप उनकी क्रियाओं में था। निरंतर, सदा सबका अच्छा करने वाले। सबका हित करने वाले। कभी खुद के लिए एक झोली तक की अपेक्षा, मांग, विचार, चयन भी नहीं करते थे। भाना और न भाना उनके शब्दकोष में नहीं था, लेकिन दूसरों को क्या भाएगा और क्या सही रहेगा, इसकी पूरी कोशिश होती। सदा दूसरों के हित की सोचने वाले ईश्वर ही तो होते हैं। इन्हें हम और कस्टमाइज करेंगे तो वे अवतारों, चरित्रों में मिल जाएंगे।

दूसरों के लिए होने का कॉन्सेप्ट सिर्फ भारतीय दर्शन में पाया जाता है। बाकियों में यह गिव एंड टेक के रूप में है। अच्छा करोगे तो अच्छा पाओगे। हमारे यहां अच्छा करोगे तो अच्छा होगा, पाना-खोना अलग बात है। भारतीय दर्शन में यह सोच निस्वार्थ भाव के साथ समाहित है। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी कौओं, कुत्तों, गायों, मछलियों और बंदरों समेत सभी जीवों में चैतन्य ब्रह्म देखते थे। परमहंस श्रीराम बाबाजी मानते थे, गाय की टहल यही है कि हम इसके दर्शन करें, भोजन दें और पालें। पाल न सकें तो भोजन तो जरूर दें। बंदरों से वे बहुत करीब महसूस करते थे। एक यात्रा में मैं पीछे बैठा था। रास्ते में जंगल के दौरान बंदरों को आम दिए जा रहे थे। गाड़ी रुकी, बंदरों के झुंड के झुंड गाड़ी पर चढ़ गए। महाराज जी ने थोड़ा सा कांच खोला और एक बंदर के हाथ में आम दिया। बंदर लेकर पेड़ पर जा बैठा। पूरे आनंद के साथ वह आम खाने लगा। महाराजजी ने यह क्रिया देखकर कहा, आदमों से अच्छे बंदरा हैं। एक मिनट पहले उन्हें पता नई थो आम मिल है और एक मिनट बाद भी पता नै रै है आम मिल है का कछु और का फिर कछुए नै मिल है। बे चिपके हैं डार पे। नै पानी की चिंता, नै खाबे की, नै रहबे की। जोई तो भरोसो है। आदमी हे देखो पीढ़ियों को इंतजाम धरे बैठो है तो भी मरो जा रौ। जो नईयां बो नइयां। इतना एक फ्लो में बोलकर वे मौन हो गए। मेरे मन में चिंतन शुरू हुआ। सच में हनुमानजी कितने व्यापक और जेनेरिक तरीके से सोचते हैं। बंदरों में हमे एक जंगली जीव दिखाई देता है जिसकी अपनी यही मौलिकता है। किंतु इसे दर्शन से जोड़ना हमारे लिए असंभव है। हमने अगर जोड़ा भी तो हर बंदर को हनुमानजी समझ लिया। महाराज जी ने अपना मौन तोड़ा और बोले, आंखों के अंधे, कानों के बहरे, चुप रै बाबा कुछ मत कह रे। और कार के डैशबोर्ड पर हाथ पटकते हुए गाड़ी को आगे बढ़ाने का इशारा किया।

जब हम सनानत के वांग्मय को देखते हैं तो सबसे अद्भुत विराट स्वरूप माना गया है। इसके अलावा शंकर की बारात के कॉन्सेप्ट भी हमारी फिलॉस्फी में हैं। इसका अर्थ सबमें वही है। जड़ में भी और जिंदा में भी। परमहंस श्रीराम बाबाजी यही करते थे। हमारे आख्यानों में जिक्र है पेड़ों से बात करने का, पहाड़ों से बात करने का, राम जी के सामने तो समुद्र ही मनुष्य शरीर धारण करके प्रकट हो गया था। गिद्ध रावण से लड़ते हैं। बंदर सेना में शामिल होकर युद्ध करते हैं। दो पक्षी राम की कथा कहते हैं। परमहंस श्रीराम बाबाजी की यह क्रियाएं विधात्री क्रियाएं हैं। राम समुद्र से बात करते हैं, श्रीराम बाबाजी गायों से रास्ता पूछते हैं। राम खग, मृग, मधुकर, श्रेनियों, लताओं से सीता का पता पूछते हैं, परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी पहाड़ की चट्टानों में सिंदूर लगाकर हनुमानजी मानकर पूजा कर देते हैं। इधर-उधर से समेटकर लाए कपड़े के टुकड़ों को इकट्ठा करके हवन करवा देते हैं। जैसे साईंखेड़ा वाले दादाजी धूनी वाले करवाते थे। वे शंकर के अवतार थे ही। यह सब विधात्री क्रियाएं होती हैं। इसलिए परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी चैतन्य हनुमानजी थे और अब वे चेतनाओं में सूक्ष्म रूप में विराजमान हनुमानजी हैं। बस अनुभव करके देख लीजिए।
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(आलेख- 8 में पढ़िए अवतार योग)
आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
आलेख-2 ईश्वर तत्व
आलेख-3 ईश्वरीय योग
आलेख-4 परमतत्व की साधना
आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
आलेख-6 विधाता का संवाद
आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
आलेख-8 अवतार योग
आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के विविध चित्र...
25/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के विविध चित्र...

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-6ParamhansShrirambabajee: ईश्वर सिर्फ मनुष्य जैसा नहीं होता, विविध जीवों, ...
22/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-6

ParamhansShrirambabajee: ईश्वर सिर्फ मनुष्य जैसा नहीं होता, विविध जीवों, निर्जीवों में भी है, इस दिशा से ही विधाता से संवाद संभव

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

सोहम की स्थिति में सामान्य देह में साक्षात ब्रह्म विराजता है। यह हमारे सारे ग्रंथ कहते हैं। आध्यात्मिक जितने भी शोध हुए हैं वे सब बताते हैं अहम ब्रह्मास्मि एक स्थिति होती है। आकार या निराकार में खोजते हुए हम कई बार भटक जाते हैं, लेकिन आत्म-ब्रह्ममय हो जाने में भटकाव नहीं होता। यह होना अपनी कोई घोषणा नहीं होती, न ही कोई कर्म प्रयास, यह एक स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए कई सारे पायदान हैं।

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी गायों, कुत्तों, कौओं से बात कर लेते थे। कई बार तो वे पेड़ों से संवाद करते थे। इस सूक्ष्म संवाद को अनुभव करना पड़ता था। कभी यह वाणी से भी होता था, किंतु अधिकतर यह उनकी अपनी शैली में हुआ करता था। यहां तक कि निर्जीव धूनी से भी बात करते थे। अपनी यात्राओं में जुटे नारियल, सूखे पत्ते, लकड़ी के कुछ टुकड़े धूनी में डालते हुए बोलते थे, लो, और लेओ, लेओ और लेओ। अनेक बार तो वे धूनी को अप्रत्यक्ष ही प्रकट कर देते थे। जैसे किसी भक्त के यहां हैं और कई सारी चिंदियां यानी कपड़े के टुकड़े इकट्ठा किए और आग लगाने को बोल देते। फिर कहते भूखी हती भौत दिनों की। जब सामान्य देह सोहम की अवस्था में हो तो वह निर्जीवों, सजीवों में भेद नहीं करती। 64 कलाओं से युक्त परमब्रह्म निर्भेद है। पेड़ों से भी उसी धुन में बात होगी, जानवरों से भी और मनुष्यों से भी। इस बीच जिज्ञासा जन्म लेती है कि अगर संवाद हो रहा है तो जिससे संवाद हो रहा है उसकी प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती वैसी? इस जिज्ञासा का समुचित उत्तर यही है कि हम वह प्रतिक्रिया देख, सुनने, समझने के योग्य नहीं होते। परमब्रह्म कंकड़ से भी संवाद कर लेते हैं। उन्हें इसके लिए वाणी, जिव्हा, स्वर, विचार, शब्द, वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। वे आत्म संवाद करते हैं और आत्म-परमात्म से कनेक्ट है। तब टेलीफोन एक्सचेंज की तरह किसी एक्सचेंजर की जरूरत ही खत्म हो जाती है।

गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के परम सेवक और भक्त शिरोमणि राजकुमार पाराशर एक घटना का जिक्र करते हैं। वे बताते हैं, एक बार भगवान किसी के यहां से ढाल लेकर आए। ढाल बांस के ऊपर छींदे के पेड़ के समान मोरपंख की सजावट से बनी होती है। इस ढाल को भगवान ने अपनी कार में यूं रखा कि उसका एक बड़ा हिस्सा बाहर निकला था। ड्रायविंग सीट पर बैठे पाराशर देख रहे थे, महाराजजी कुछ संवाद कर रहे हैं। कभी बुदबुदाते हुए कहते, भौत परेशान कर रहे थे, अब देखो हम तुम्हें मुक्ति दें, इत्ती दूर छोड़ हैं कि आ नै पा हो। भक्त महात्मा पाराशर को समझ आया कि उस ढाल के जरिए कुछ ऐसी पारलौकिक आत्माएं उस गांव और परिवार पर प्रतिकूल असर डाल रही थी जहां यह ढाल थी। महाराज जी ने अपने संवाद में उनसे कहा, एक बार समझाया था नहीं माने अब चलो।

इस किस्से से पता चलता है भगवान श्रीराम बाबाजी का अपना संवाद का तरीका था। वे हर कण से संवाद स्थापित कर सकते थे। तभी तो इस विकट भौतिक अहंकार केंद्रित संसार से कभी निकट नहीं रहे। आए, गए, चले गए, जो था वो छोड़ा, जो नहीं था वो ओढ़ा, कोई समझा, कोई समझा नहीं, इन सबकी परवाह किए बिना यात्रा आरंभ।

विधाता से संवाद आग्रहों से मुक्त होकर ही संभव है। जब हम मानते हैं ईश्वर सिर्फ मनुष्य के लिए है तो हम बहुत संकुचित सोचते हैं। भारत में अधिकतर प्राचीन हनुमानीजी की मूर्तियां अपूर्ण स्वरूप में होती हैं। कई जगह सिर्फ एक पत्थर है, जिसमें कुछ ऊबड़खाबड़ उभरा है, कई जगह कुछ और। कहीं दूर न जाइए छींद में हनुमानजी को देखिए। छींद से भी अधिक शक्तिशाली उदयपुरा तलापुरा वाले हनुमानजी को देखिए। साफ, सुथरा एकदम समझ आने वाला स्वरूप नहीं होता। इसका अर्थ है ईश्वर सर्वत्र और सबका है। वह सिर्फ मनुष्यों का नहीं। जिन धर्म में ईश्वर को सिर्फ मनुष्य का रूप ही दिया गया है वे अधूरे हैं। संपूर्ण सनातन ही है। इसमें कछुआ, मछली, सुअर, नाग भी ब्रह्म हो सकते हैं। मनुष्य तो हो ही सकता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी उस ब्रह्म को मछलियों, कौओं, कुत्तों, गायों, बंदरों में देखते थे। इसलिए वे स्वयं ब्रह्म हुए। क्योंकि चौसठ कलाओं से परिपूर्ण ब्रह्म ही विस्तार है। जैसे विराट स्वरूप। इन सब बातों को सही दिशा में समझें तो हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी सामान्य मनुष्य देह में चैतन्य हनुमानजी ही थे।
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(आलेख- 7 में पढ़िए विधात्री क्रियाएं)
आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
आलेख-2 ईश्वर तत्व
आलेख-3 ईश्वरीय योग
आलेख-4 परमतत्व की साधना
आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
आलेख-6 विधाता का संवाद
आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
आलेख-8 अवतार योग
आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-5ParamhansShrirambabajee: परमतत्व का बिंब तभी प्रकट होता है जब निर्मल सत्स...
21/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-5

ParamhansShrirambabajee: परमतत्व का बिंब तभी प्रकट होता है जब निर्मल सत्संगति हो रही हो, प्रयोग के अभीष्ट से नहीं

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

जब मन, वचन, कर्म से मनुष्य एक हो जाता है, तब उसमें ईश्वरीय बिंब प्रकट हो जाता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी एक पल के करोड़वें हिस्से में भी किसी दुविधा में नहीं रहे। वे बेधड़क बोलने में, करने में, करवाने में चूके नहीं। जो ठीक लगा तो बहुत तारीफ नहीं, जो खराब लगा तो बहुत बुरा नहीं। उनके मुख से कभी पश्चाताप सूचक शब्द या भाव प्रकट नहीं होते थे। रास्ता भटक गए, कहीं जाना था कहीं और निकल गए, मगर ऐसा नहीं कि ऐसा था तो वैसा क्यों हुआ और वैसा था तो ऐसा क्यों हुआ। वे ईश्वरीय विधान में अपना कोई अभिमत नहीं देते थे। यानी पूर्ण विश्वास के साथ यह मान लेना कि अस्तित्व के हम एक हिस्से हैं। हर समय यह जानते रहना कि जो होगा वही होना था और वही होगा।

जो होना था वही होगा, वही होगा और वही होकर रहेगा। ये वाक्य संसारियों को भ्रमित कर सकता है, किंतु साधुत्व में इसका विराट अर्थ है। इसका संसार में अर्थ अपनी अकर्मण्यता को तर्क से ढंकने के लिए इस्तेमाल होता है, किंतु अध्यात्म में यह निश्चिंतता का अद्वैत तत्व है। परमहंस श्रीराम बाबाजी अपनी कई क्रियाओं से इसका संदेश देते थे। एक यात्रा में सिलवानी से शियरमऊ की ओर घाटी जैसे ही हम चढ़े तो मैंने कहा महाराज जी यहां रास्ते में दीवान बाबा का स्थान पड़ेगा। वह स्थान मेरे इस शरीर के कुलवंश का कुलदेव स्थान है। पहले उन्होंने अनसुना किया। जब मैंने अहंकार के वशीभूत फिर से इस तथ्य को उनके सामने रखा तो उन्होंने एक वाक्य में कहा, जे तो बैठे हैं सब। कुलदेवता, मुलदेवता। उस दिन से मैं कभी दोबारा न उस तरफ गया न सोचा न विचारा। क्योंकि साक्षात चैतन्य ईश्वर बिंब ने हमसे कह दिया, हम ही हैं वो और वो ही हैं हम तो हम क्यों भटकें।

इस भटकाव पर विराम जरूरी है। परमेश्वर का जीवंत बिंब सतत साथ में है हम महज एक साधू मानकर साथ रहें तो यह एक लोक व्यवहार से ज्यादा कुछ भी नहीं। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी लोक व्यवहार को संसार का एक संवाद सेतु तो मानते थे, किंतु यकीन उनका नहीं था। न वे कभी ऐसा दर्शाते थे। उनका भीतरी आनंद निर्मल, निश्छल और निरंतर होने में था। थमने में नहीं। थामने में नहीं। रुकने में नहीं रोकने में नहीं। सदा ही गतिज उनका मार्ग था।

परमेश्वर के बिंब के रूप में एक बार और ऐसी घटना घटी। महाराजजी छतवाले कुएं पर परमभक्त ओमप्रकाशजी के निवास पर थे। मैं ओमप्रकाशजी का परम आभारी हूं, क्योंकि हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी के दर्शन उन्होंने ही मुझे करवाए। मैं महाराजजी को देख तो रहा था वर्षों से, लेकिन दर्शन उनके कारण ही हुए। इसलिए उनके आभार के लिए मेरे पास कोई न शब्द हैं न भाव। मेरे आध्यात्मिक जीवन का यह दर्शन महाद्वार बना। महाराजजी जब नीचे आए तो सामने से निकलते हुए सांड को देखकर कहा, लाओ इनके लिए कुछ लाओ। तत्काल रोटियां लाई गईं। तभी कुत्ते भी आ गए, महाराजजी बोले, अच्छा तुम भी आ गए। अब इन्हें भी कुछ लाओ। फिर रोटियां दी गईं। तभी किसी भक्त ने कहा महाराजजी विराजते रात ज्यादा हो रही है। तो महाराजजी बोले सड़क, सांड, सन्यासी इन्हें कोई नहीं रोक सकता। इस घटना से विचारों ने जो दुहा वह निर्मल दुग्ध बनकर मन को परमेश्वर तत्व की ओर मोड़ता है।

महाराजजी साक्षात हनुमानजी के रूप में विराट बिंब में विराजमान रहे। जो देख पाया वो देख पाया। जो नहीं देख पाया वह तर्क, कुतर्क, विमर्श, बुद्धि, विद्या, परंपरा, रूढ़ी में फंसा रह गया। चमत्कार को नमस्कार करने की वृत्ति यह मानने नहीं देती कि कोई साधारण देह में हनुमानजी हो सकते हैं।

तुलसीदासजी को राम से मिलवाने वाले हनुमानजी किस रूप में मिले थे, यह सारी कथा हम सुनते, समझते, कहते हैं, लेकिन यह पानी को मुंडी पर से उड़ेल देने जैसा होता है। हम उस जल को महसूस नहीं कर पाते। बस सुना है, किंतु माना नहीं है। हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी की देह में विराजमान रहे। इस तथ्य को जानने के लिए उनकी उन क्रियाओं को गौर से सोचिए जब राम की चर्चा हो तो वे प्रकट हो जाते थे। किंतु ध्यान रखिए कभी यह प्रयोग हमने किया हो तो कतई प्रकट नहीं होते थे। जितनी निर्मल चर्चा उतने प्रकट हनुमानजी। चूंकि यह कोई दो और दो चार का फॉर्मूला नहीं है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी कहा भी करते थे, देख रहे हो। देख रहे हो मतलब परख रहे हो। परख अपने आपमें अविश्वास है। अविश्वास से ईश्वर कैसे प्रकट हो सकता है। निरंतर मन को यकीन दिलाओ तो वे साक्षात स्वरूप में भी प्रकट हो सकते हैं। परमतत्व का बिंब तब दिखेगा जब भक्ति का विराट सूरज हो और हमारी उसके तेज को देखने की क्षमता हो। यह क्षमता भी गुरु ही दे सकता है।
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(आलेख-6 में पढ़िए विधाता का संवाद)
आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
आलेख-2 ईश्वर तत्व
आलेख-3 ईश्वरीय योग
आलेख-4 परमतत्व की साधना
आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
आलेख-6 विधाता का संवाद
आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
आलेख-8 अवतार योग
आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य

परमहंस श्रीराम बाबाजी के विविध चित्र व वीडियो दर्शन कीजिए। आनंद कीजिए। गुरु पूर्णिमा आ रही है। गुरुवर की स्मृति आ रही है...
20/07/2026

परमहंस श्रीराम बाबाजी के विविध चित्र व वीडियो दर्शन कीजिए। आनंद कीजिए। गुरु पूर्णिमा आ रही है। गुरुवर की स्मृति आ रही है। जय हो हनुमानजी की।

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परमहंस श्रीराम विराजमान स्थल, हनुमान मंदिर, उदयपुरा, ज़िला रायसेन, मध्यप्रदेश
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464770

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