12/09/2024
*जुलूस-ए-मोहम्मदी का असल मकसद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (ﷺ)* की विलादत की ख़ुशी का इज़हार करना और उनके तालीमात को आम करना है। लेकिन अफसोस की बात है कि आजकल कुछ जगहों पर जुलूस-ए-मोहम्मदी के दौरान डीजे, आतिशबाजी, बेपर्दगी, और लूटपाट जैसी गैर-इस्लामी हरकतें देखने को मिलती हैं। ऐसी हरकतें इस्लामी तालीमात के बिल्कुल खिलाफ हैं और जुलूस-ए-मोहम्मदी के असल मकसद को धुंधला कर देती हैं। कौम-ए-मुस्लिम को इस बारे में गौर और फिक्र करने की जरूरत है।
*कौम-ए-मुस्लिम के लिए पैग़ाम:*
*डीजे और शोर-शराबे से बचें:* इस्लाम सादगी और तहज़ीब का दीन है। जुलूस के दौरान डीजे और शोर-शराबा करना न सिर्फ मोहल्ले और आस-पास के लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता है, बल्कि इस्लामी अदा और तहज़ीब के भी खिलाफ है। हमें सोचना चाहिए कि क्या रसूल अल्लाह (ﷺ) ने कभी ऐसे इज़हार की तालीम दी थी?
*आतिशबाजी से परहेज:* आतिशबाजी का इस्लाम में कोई मक़ाम नहीं है। नबी करीम (ﷺ) की विलादत की खुशी मनाना इबादत, दुआ, और नेक कामों से होनी चाहिए, न कि ऐसी हरकतों से जो सिर्फ दिखावे के लिए की जाएं और दूसरों के लिए मुश्किलात पैदा करें।
*बेपर्दगी से दूर रहें:* जुलूस के दौरान औरतों और मर्दों को इस्लामी पर्दे का ख़याल रखना चाहिए। बेपर्दगी, बेहयाई, और इस्लाम के उसूलों के खिलाफ हरकतें करना इस दिन के पाक मकसद को नुकसान पहुंचाता है।
*लूटपाट और अनुशासनहीनता:* कुछ जगहों पर जुलूस के दौरान अनुशासन की कमी और लूटपाट जैसी हरकतें देखी जाती हैं। इस्लाम ऐसी हरकतों की सख्त मुमानियत करता है। जुलूस के दौरान हर एक मुसलमान को दूसरे के हुकूक का एहतराम करना चाहिए और अमन और सलामती को बरकरार रखना चाहिए।
*जुलूस में जितना हो सके सफेद लिबास पहनें:* सफेद लिबास अमन और पाकीज़गी का पैग़ाम देता है। इसलिए जुलूस के दौरान सफेद कपड़े पहनें ताकि एकजुटता और अमन का पैग़ाम दिया जा सके।
*जुलूस में पुर सुकून माहौल में चलें:* जुलूस के दौरान पूरे सुकून और तहज़ीब के साथ चलें। नारे और सलाम पढ़ते वक्त आवाज में नर्मी और मोहब्बत का पैग़ाम होना चाहिए। कोशिश करें की जुलूस में जितना हो पैदल चलें और गाड़ियों के इस्तेमाल से बचें कियूं इससे जुलूस में चलने वालो को तकलीफ होती है और जुलूस का असल मकसद भी ख़राब होता है।
*इस्लामी तालीमात का इज़हार करें:* जुलूस का मकसद रसूल अल्लाह (ﷺ) की तालीमात को फैलाना है—जैसे कि इंसाफ, सच्चाई, अमनपसंदी, और इंसानियत की खिदमत। हमें चाहिए कि जुलूस के दौरान ऐसे अमल पेश करें जो इस्लामी तालीमात का बेहतरीन नमूना हों।
*सादगी और नेक अमल पर जोर:* जुलूस-ए-मोहम्मदी को सादगी और नेकी से मनाना चाहिए। गरीबों में खाना बांटना, पानी की सबील लगाना, अस्पतालों और यतीमखानों में फल के स्टॉल लगाएं और मरीजों और जरूरतमंदों में फल बांटें और इलाके की सफाई जैसे नेक काम इस दिन की रूह को जिन्दा रखते हैं।
*नसीहत:*
कौम-ए-मुस्लिम को समझना चाहिए कि जुलूस-ए-मोहम्मदी का असल मकसद हमारे नबी (ﷺ) की तालीमात और उनकी सीरत को अपने अन्दर उतारना है। डीजे, आतिशबाजी, बेपर्दगी, और लूटपाट जैसी हरकतें न सिर्फ इस्लाम के खिलाफ हैं, बल्कि हमारे प्यारे नबी (ﷺ) की तालीमात और उनके पैग़ाम की भी तौहीन करती हैं। इसीलिए हमें चाहिए कि हम अपने जुलूसों को इस्लामी अंदाज़ में सादगी, तहज़ीब, और अमन के साथ मनाएं, ताकि इस्लाम का सच्चा पैग़ाम दुनिया के सामने पेश किया जा सके।
*शुक्रिया।*
तौसीफ हुसैन