Srimad Bhagavad Gita

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03/09/2024
02/06/2024

एकादशी का नाम: अपरा एकादशी
एकादशी दिनांक: 03-06-24
एकादशी तिथि का दिवस: सोमवार
एकादशी व्रत के पारण का समय: अगले दिन सूर्योदय के बाद एवं सुबह 9.22 के पहले
सेब और ड्रैगन फलों को छोड़कर सभी फलों की अनुमति है।

Name of Ekadashi: Apara Ekadashi
Ekadashi date: 03-06-24
Ekadashi Day: Monday
Ekadashi Vrat Parana time: Next day after sunrise and before 9.22 in the morning
All fruits except apple and dragon fruits are permitted.

ఏకాదశి పేరు: అపర ఏకాదశి
ఏకాదశి తిథి తేదీ: 03-06-24
ఏకాదశి తిథి రోజు: సోమవారం
మరుసటి రోజు ఏకాదశి వ్రతం యొక్క పారణ సమయం: సూర్యోదయం తర్వాత 9.22 ముందు
యాపిల్ మరియు డ్రాగన్ ఫ్రూట్స్ మినహా అన్ని పండ్లు అనుమతించబడతాయి.

ஏகாதசியின் நாமம் : அபரா ஏகாதசி
ஏகாதசி தினம்: 03-06-25
ஏகாதசி கிழமை: திங்கள் கிழமை
ஏகாதசி பாரயண நேரம்: சூரியன் உதித்த பின் 9.22am முன் பாராயணம் செய்ய வேண்டும்.
ஆப்பிள் மற்றும் டிராகன் பழங்கள் தவிர அனைத்து பழங்களும் அனுமதிக்கப்படுகின்றன.

एकादशीचे नाव : अपरा एकादशी
एकादशी तारीख : ०३-०६-२४
एकादशी तिथीचा दिवस : सोमवार
एकादशी व्रताच्या पारणाची वेळ : दुसऱ्या दिवशी सूर्योदयानंतर आणि सकाळी ९.२२ पूर्वी
सफरचंद आणि ड्रॅगन फळे वगळता सर्व फळांना परवानगी आहे.

একাদশীর নাম: অপরা একাদশী
একাদশী তিথি তারিখঃ ০৩-০৬-২৪
একাদশী তিথির দিন: সোমবার
একাদশীর উপবাসের পারণের সময়: পরদিন সূর্যোদয়ের পর এবং সকাল ৯.২২ টার আগে
আপেল এবং ড্রাগন ফল ছাড়া সব ফল অনুমোদিত।

ഏകാദശിയുടെ പേര്: അപാര ഏകാദശി
തീയതി: 03-06-24
ദിവസം: തിങ്കളാഴ്ച
ഏകാദശി വ്രതത്തിലെ പാരണ സമയം: അടുത്ത ദിവസം സൂര്യോദയത്തിന് ശേഷവും രാവിലെ 9.22 ന് മുമ്പും

12/05/2023

Hare Krishna dear devotees pranam 🙇🏽‍♀️🙏🏽
I welcome you all to a spiritual blissful
program

Program as follows :

Topic :
Srimad Bhagavatam

Date: 12 May 2023

Speaker: Sripad Bhakti-Vedanta Vishnu Daivata maharaja

Time :
Central Usa : 20:pm
Hong Kong : 21:30 pm
India : 19:00 pm
South Africa : 15:30 pm
Sweden 16:30 pm
Guyana 09:30 am
Germany : 15:30 pm

https://meet.google.com/kpi-tzhh-mwr

Looking forward to all your association.

Hare Krsna pranams
Your insignificant servant
Vishaka Devi Dasi mataji 🙏🏽

09/12/2022

Hare Krishna

26/11/2022

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२॥
मर्मानुवाद—हे पार्थ! अन्त्यज, म्लेच्छ और वेश्यादि पतिता स्त्रियां तथा वैश्य-शूद्रादि नीच वर्ण वाले नर मेरी अनन्य भक्ति का विशिष्टरूप से आश्रय लेकर अविलम्ब ही परागति को प्राप्त करते हैं। मेरे शुद्धभक्ति मार्ग में आश्रित व्यक्तियों में जाति-वर्णादि सम्बन्धी किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है॥३२॥
अन्वय—पार्थ! (हे पार्थ!) ये अपि (जो लोग) पापयोनयः (अन्त्यज आदि योनियों में उत्पन्न) स्त्रियः (स्त्री) वैश्या: (वैश्य) तथा शूद्राः (एवं शूद्र) स्यु: (हैं) ते अपि (वे भी) माम् (मुझे) व्यपाश्रित्य (आश्रय कर) परां गतिम् (परम गति को) यान्ति (प्राप्त होते हैं)॥३२॥
टीका—एवं कर्मणा दुराचाराणामागन्तुकान् दोषान् मद्भक्तिर्न गणयतीति किं चित्रम्? यतो जात्यैव दुराचारणां स्वाभाविकानपि दोषान् मद्भक्तिर्न गणयतीत्याह—मामिति। पापयोनयो ऽन्त्यजा म्लेच्छा अपि यदुक्तम्—“किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा, आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। येऽन्ये च पापास्तदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥” “अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” किं पुनः स्त्रीवेश्याद्या अशुद्ध्यलीकादिमन्तः॥३२॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं इस प्रकार मेरी भक्ति दुराचारी व्यक्ति में कर्मवश आये दोषों की गणना नहीं करती है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है? क्योंकि मेरी भक्ति जातिगत दुराचारी व्यक्तियों के स्वाभाविक दोषों की गणना नहीं करती। ‘पापयोनयः’ अन्त्यज़ म्लेच्छादि को कहा गया है। जैसा कि (भा २/४/१८ में भी) कहा गया है—किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, कंक, यवन और खसादि जो समस्त लोग जातिगत पाप से दुष्ट हैं एवं जो कर्म से भी पापयुक्त हैं, वे भी जिन भगवान् के आश्रित भागवतस्वरूप सद्गुरु के चरणाश्रय मात्र से ही जातिगत और कर्मगत दोषोंसे शुद्ध हो जाते हैं, उन शीलतः प्रभुतासम्पन्न भगवान् को नमस्कार है और जिनकी जिह्वा के अग्रभाग में उनका नाम एक बार भी उच्चारित होता है, वे चाण्डाल के गृह में जन्म लेते हुए भी इस नामोच्चारणके कारण पूज्यतम हैं। जो आपके नामका कीर्तन करते हैं, वे सभी प्रकार की तपस्या, यज्ञ, सभी तीर्थों में स्नान, सभी वेदों का अध्ययन और सदाचारादि समाप्त कर चुके हैं, (भा ३/३३/७)। अतः इस अशुद्धि और मिथ्या बोलने वाली स्त्रीवेश्यादि की तो बात ही क्या है?॥३२॥

26/11/2022

अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३०॥
मर्मानुवाद—जो अनन्य चित्त से मेरा भजन करते हैं, सुदुराचारी होने पर भी उन्हें साधु समझना क्योंकि उनका व्यवसाय सर्वप्रकार से सुन्दर है। सुदुराचार शब्द का अर्थ अच्छी तरह समझना चाहिए। बद्ध जीव का आचरण दो प्रकार का है—‘साम्बन्धिक’ और ‘स्वरूपगत’। शरीर की रक्षा, समाज की रक्षा और मन की उन्नति सम्बन्धी जितने प्रकार के शौच, पुण्य, पुष्टि करने वाले और अभाव दूर करने वाले आचरण किये जाते हैं वे सारे ‘साम्बन्धिक’ हैं। शुद्ध जीव स्वरूप आत्मा का मेरे प्रति जो भजन आचरण है, वह जीव का स्वरूपगत है। इसी का दूसरा नाम ‘अमिश्रा’ या ‘केवला’ भक्ति है। बद्ध दशा में जीव की केवला भक्ति भी साम्बन्धिक-आचरण के साथ अनिवार्य सम्बन्ध रखती है। बद्ध जीव की अनन्य भजनरूपी भक्ति उदित होने पर भी देह रहने तक साम्बधिक आचरण अवश्य रहेगा। भक्ति के उदित होने पर जीव की अन्य कामों में रुचि नहीं रहेगी। जितनी मात्रा में कृष्ण में रुचि समृद्ध होती है, उतनी मात्रा में अन्य रुचियां क्षय होती रहती हैं। बिल्कुल समाप्त न होने तक कभी-कभी अन्य तरफ की रुचि अपना प्रभाव दिखाती हुयी कदाचार का अवलम्बन करती है, किन्तु अतिशीघ्र ही वह कृष्ण रुचि द्वारा दमित हो जाती है। भक्ति की उन्नति-सोपान पर आरूढ़ जीवों के कार्य सर्वांग सुन्दर हैं। उसमें यद्यपि घटनावश दुराचार यहां तक कि सुदुराचार (परहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमन, जिनमें भक्तों की सहज रुचि नहीं हो सकती) देखे जाते हैं, वह भी शीघ्र ही दूर हो जायेंगे। इनके द्वारा प्रबल प्रवृत्तिरूपा मेरी भक्ति दूषित नहीं होती, यही जानना। किसी-किसी परम भक्त द्वारा भूतकाल में किये गये मत्स्यादि भोजन एवं परस्त्री-संग आदि को देखते हुए भी उन्हें असाधु नहीं समझना॥३०॥
अन्वय—चेत् (यदि) सुदुराचारः अपि (अतिकुत्सित आचारी व्यक्ति भी) अनन्य भाक् (दूसरों का भजन त्याग एक मात्र) माम् (मेरा) भजते (भजन करते हैं) स: (वे) साधुः एव (साधु ही) मन्तव्य: (माने जाते हैं) हि (क्योंकि) स: (वे सुन्दर निश्चय वाले होते हैं)॥३०॥
टीका—स्वभक्तेष्वासक्तिर्मम स्वाभाविक्येव भवति सा दुराचारेऽपि भक्ते नापयाति तमप्युत्कृष्टमेव करोमीत्याह—अपि चेदिति। सुदुराचारः परहिंसा परदार-परद्रव्यादिग्रहण-परायणोऽपि मां भजते चेत्, कीदृग्भजनवानित्यत आह—अनन्यभाक् मत्तोऽन्यदेवतान्तरं मद्भक्तेरन्यत् कर्मज्ञानादिकं मत्कामनातोऽन्यां राज्यादिकामनां न भजते स साधुः। नन्वेतादृशे कदाचारे दृष्टे सति कथं साधुत्वम्? तत्राह—मन्तव्यो मननीयः साधुत्वेनैव स ज्ञेय इति यावत्; मन्तव्यमिति विधिवाक्यं अन्यथा प्रत्यवायः स्यात्; अत्र मदाज्ञैव प्रमाणमिति भावः। ननु त्वां भजत इत्येतदंशे न साधुः परदारादिग्रहणांशेनासाधुश्च स मन्तव्यस्तत्राह—एवेति। सर्वेणाप्यंशेन साधुरेव मन्तव्यः कदापि तस्यासाधुत्वं न द्रष्टव्यमिति भावः। सम्यग् व्यवसितः निश्चयो यस्य सः। दुस्त्यजेन स्वपापेन नरकं तिर्यग्योनिर्वा यामि ऐकान्तिकं श्रीकृष्णभजनन्तु नैव जिहासामीति स शोभनमध्यवसायं कृतवानित्यर्थः॥३०॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं अपने भक्तों के प्रति मेरी आसक्ति स्वाभाविक ही है। उसके दुराचारी होने पर भी वह आसक्ति दूर नहीं होती है एवं मैं उसे भी श्रेष्ठ ही कर देता हूँ। सुदुराचारी अर्थात् परहिंसा-परस्त्री परद्रव्यादि के परायण होकर भी यदि मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही है। वह किस प्रकार भजन करने वाला होना चाहिए? इस के उत्तरमें कहते है—‘अनन्यभाक्’ अर्थात् जो मुझे छोड़ और किसी देवता का भजन नहीं करता, मेरी भक्ति को छोड़कर ज्ञान कर्मादि का अनुष्ठान नहीं करता है, मेरी प्राप्ति की कामना के अतिरिक्त राज्य-सुखादि की कोई कामना नहीं करता तो वह व्यक्ति साधु है। यहां यदि प्रश्न हो कि इस प्रकार कदाचार के होने पर उसका साधुत्व ही कहाँ रहा? इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं ‘मन्तव्यः’ अर्थात् उसे साधु ही मानना होगा। ‘मन्तव्य’ इस शब्द से विधि (नियम) सूचित होती है, अतः यदि ऐसा न माना जाय तो उससे दोष होगा। इस विषय में मेरा आदेश ही प्रमाण है। यदि कहा जाय कि वह व्यक्ति आपका भजन करता है और दुराचारी भी है, अत: उसे अंशतः असाधु मानना चाहिए। परस्त्रीसंगी है इसलिए असाधु मानना चाहिए तो इसके उत्तर में कहते हैं—‘एव’ अर्थात् पूर्ण अंश में उसे साधु मानना होगा। कभी भी उसका असाधुत्व नहीं देखना, क्योंकि वह ‘सम्यग्व्यवसितः’ अर्थात् दृढ़ निश्चयवान् है। उसका निश्चय ऐसा होता है—अपने पापों से भले ही नरक अथवा पशु-पक्षी योनियों में चला जाऊँ, किन्तु ऐकान्तिक कृष्ण-भक्तिका कभी भी परित्याग नही करूँगा॥३०॥

26/11/2022

अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३०॥
मर्मानुवाद—जो अनन्य चित्त से मेरा भजन करते हैं, सुदुराचारी होने पर भी उन्हें साधु समझना क्योंकि उनका व्यवसाय सर्वप्रकार से सुन्दर है। सुदुराचार शब्द का अर्थ अच्छी तरह समझना चाहिए। बद्ध जीव का आचरण दो प्रकार का है—‘साम्बन्धिक’ और ‘स्वरूपगत’। शरीर की रक्षा, समाज की रक्षा और मन की उन्नति सम्बन्धी जितने प्रकार के शौच, पुण्य, पुष्टि करने वाले और अभाव दूर करने वाले आचरण किये जाते हैं वे सारे ‘साम्बन्धिक’ हैं। शुद्ध जीव स्वरूप आत्मा का मेरे प्रति जो भजन आचरण है, वह जीव का स्वरूपगत है। इसी का दूसरा नाम ‘अमिश्रा’ या ‘केवला’ भक्ति है। बद्ध दशा में जीव की केवला भक्ति भी साम्बन्धिक-आचरण के साथ अनिवार्य सम्बन्ध रखती है। बद्ध जीव की अनन्य भजनरूपी भक्ति उदित होने पर भी देह रहने तक साम्बधिक आचरण अवश्य रहेगा। भक्ति के उदित होने पर जीव की अन्य कामों में रुचि नहीं रहेगी। जितनी मात्रा में कृष्ण में रुचि समृद्ध होती है, उतनी मात्रा में अन्य रुचियां क्षय होती रहती हैं। बिल्कुल समाप्त न होने तक कभी-कभी अन्य तरफ की रुचि अपना प्रभाव दिखाती हुयी कदाचार का अवलम्बन करती है, किन्तु अतिशीघ्र ही वह कृष्ण रुचि द्वारा दमित हो जाती है। भक्ति की उन्नति-सोपान पर आरूढ़ जीवों के कार्य सर्वांग सुन्दर हैं। उसमें यद्यपि घटनावश दुराचार यहां तक कि सुदुराचार (परहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमन, जिनमें भक्तों की सहज रुचि नहीं हो सकती) देखे जाते हैं, वह भी शीघ्र ही दूर हो जायेंगे। इनके द्वारा प्रबल प्रवृत्तिरूपा मेरी भक्ति दूषित नहीं होती, यही जानना। किसी-किसी परम भक्त द्वारा भूतकाल में किये गये मत्स्यादि भोजन एवं परस्त्री-संग आदि को देखते हुए भी उन्हें असाधु नहीं समझना॥३०॥
अन्वय—चेत् (यदि) सुदुराचारः अपि (अतिकुत्सित आचारी व्यक्ति भी) अनन्य भाक् (दूसरों का भजन त्याग एक मात्र) माम् (मेरा) भजते (भजन करते हैं) स: (वे) साधुः एव (साधु ही) मन्तव्य: (माने जाते हैं) हि (क्योंकि) स: (वे सुन्दर निश्चय वाले होते हैं)॥३०॥
टीका—स्वभक्तेष्वासक्तिर्मम स्वाभाविक्येव भवति सा दुराचारेऽपि भक्ते नापयाति तमप्युत्कृष्टमेव करोमीत्याह—अपि चेदिति। सुदुराचारः परहिंसा परदार-परद्रव्यादिग्रहण-परायणोऽपि मां भजते चेत्, कीदृग्भजनवानित्यत आह—अनन्यभाक् मत्तोऽन्यदेवतान्तरं मद्भक्तेरन्यत् कर्मज्ञानादिकं मत्कामनातोऽन्यां राज्यादिकामनां न भजते स साधुः। नन्वेतादृशे कदाचारे दृष्टे सति कथं साधुत्वम्? तत्राह—मन्तव्यो मननीयः साधुत्वेनैव स ज्ञेय इति यावत्; मन्तव्यमिति विधिवाक्यं अन्यथा प्रत्यवायः स्यात्; अत्र मदाज्ञैव प्रमाणमिति भावः। ननु त्वां भजत इत्येतदंशे न साधुः परदारादिग्रहणांशेनासाधुश्च स मन्तव्यस्तत्राह—एवेति। सर्वेणाप्यंशेन साधुरेव मन्तव्यः कदापि तस्यासाधुत्वं न द्रष्टव्यमिति भावः। सम्यग् व्यवसितः निश्चयो यस्य सः। दुस्त्यजेन स्वपापेन नरकं तिर्यग्योनिर्वा यामि ऐकान्तिकं श्रीकृष्णभजनन्तु नैव जिहासामीति स शोभनमध्यवसायं कृतवानित्यर्थः॥३०॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं अपने भक्तों के प्रति मेरी आसक्ति स्वाभाविक ही है। उसके दुराचारी होने पर भी वह आसक्ति दूर नहीं होती है एवं मैं उसे भी श्रेष्ठ ही कर देता हूँ। सुदुराचारी अर्थात् परहिंसा—परस्त्री परद्रव्यादि के परायण होकर भी यदि मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही है। वह किस प्रकार भजन करने वाला होना चाहिए? इस के उत्तरमें कहते है—‘अनन्यभाक्’ अर्थात् जो मुझे छोड़ और किसी देवता का भजन नहीं करता, मेरी भक्ति को छोड़कर ज्ञान कर्मादि का अनुष्ठान नहीं करता है, मेरी प्राप्ति की कामना के अतिरिक्त राज्य—सुखादि की कोई कामना नहीं करता तो वह व्यक्ति साधु है। यहां यदि प्रश्न हो कि इस प्रकार कदाचार के होने पर उसका साधुत्व ही कहाँ रहा? इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं ‘मन्तव्यः’ अर्थात् उसे साधु ही मानना होगा। ‘मन्तव्य’ इस शब्द से विधि (नियम) सूचित होती है, अतः यदि ऐसा न माना जाय तो उससे दोष होगा। इस विषय में मेरा आदेश ही प्रमाण है। यदि कहा जाय कि वह व्यक्ति आपका भजन करता है और दुराचारी भी है, अत: उसे अंशतः असाधु मानना चाहिए। परस्त्रीसंगी है इसलिए असाधु मानना चाहिए तो इसके उत्तर में कहते हैं—‘एव’ अर्थात् पूर्ण अंश में उसे साधु मानना होगा। कभी भी उसका असाधुत्व नहीं देखना, क्योंकि वह ‘सम्यग्व्यवसितः’ अर्थात् दृढ़ निश्चयवान् है। उसका निश्चय ऐसा होता है—अपने पापों से भले ही नरक अथवा पशु-पक्षी योनियों में चला जाऊँ, किन्तु ऐकान्तिक कृष्ण-भक्तिका कभी भी परित्याग नही करूँगा॥३०॥

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Tirupati
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