26/11/2022
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३०॥
मर्मानुवाद—जो अनन्य चित्त से मेरा भजन करते हैं, सुदुराचारी होने पर भी उन्हें साधु समझना क्योंकि उनका व्यवसाय सर्वप्रकार से सुन्दर है। सुदुराचार शब्द का अर्थ अच्छी तरह समझना चाहिए। बद्ध जीव का आचरण दो प्रकार का है—‘साम्बन्धिक’ और ‘स्वरूपगत’। शरीर की रक्षा, समाज की रक्षा और मन की उन्नति सम्बन्धी जितने प्रकार के शौच, पुण्य, पुष्टि करने वाले और अभाव दूर करने वाले आचरण किये जाते हैं वे सारे ‘साम्बन्धिक’ हैं। शुद्ध जीव स्वरूप आत्मा का मेरे प्रति जो भजन आचरण है, वह जीव का स्वरूपगत है। इसी का दूसरा नाम ‘अमिश्रा’ या ‘केवला’ भक्ति है। बद्ध दशा में जीव की केवला भक्ति भी साम्बन्धिक-आचरण के साथ अनिवार्य सम्बन्ध रखती है। बद्ध जीव की अनन्य भजनरूपी भक्ति उदित होने पर भी देह रहने तक साम्बधिक आचरण अवश्य रहेगा। भक्ति के उदित होने पर जीव की अन्य कामों में रुचि नहीं रहेगी। जितनी मात्रा में कृष्ण में रुचि समृद्ध होती है, उतनी मात्रा में अन्य रुचियां क्षय होती रहती हैं। बिल्कुल समाप्त न होने तक कभी-कभी अन्य तरफ की रुचि अपना प्रभाव दिखाती हुयी कदाचार का अवलम्बन करती है, किन्तु अतिशीघ्र ही वह कृष्ण रुचि द्वारा दमित हो जाती है। भक्ति की उन्नति-सोपान पर आरूढ़ जीवों के कार्य सर्वांग सुन्दर हैं। उसमें यद्यपि घटनावश दुराचार यहां तक कि सुदुराचार (परहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमन, जिनमें भक्तों की सहज रुचि नहीं हो सकती) देखे जाते हैं, वह भी शीघ्र ही दूर हो जायेंगे। इनके द्वारा प्रबल प्रवृत्तिरूपा मेरी भक्ति दूषित नहीं होती, यही जानना। किसी-किसी परम भक्त द्वारा भूतकाल में किये गये मत्स्यादि भोजन एवं परस्त्री-संग आदि को देखते हुए भी उन्हें असाधु नहीं समझना॥३०॥
अन्वय—चेत् (यदि) सुदुराचारः अपि (अतिकुत्सित आचारी व्यक्ति भी) अनन्य भाक् (दूसरों का भजन त्याग एक मात्र) माम् (मेरा) भजते (भजन करते हैं) स: (वे) साधुः एव (साधु ही) मन्तव्य: (माने जाते हैं) हि (क्योंकि) स: (वे सुन्दर निश्चय वाले होते हैं)॥३०॥
टीका—स्वभक्तेष्वासक्तिर्मम स्वाभाविक्येव भवति सा दुराचारेऽपि भक्ते नापयाति तमप्युत्कृष्टमेव करोमीत्याह—अपि चेदिति। सुदुराचारः परहिंसा परदार-परद्रव्यादिग्रहण-परायणोऽपि मां भजते चेत्, कीदृग्भजनवानित्यत आह—अनन्यभाक् मत्तोऽन्यदेवतान्तरं मद्भक्तेरन्यत् कर्मज्ञानादिकं मत्कामनातोऽन्यां राज्यादिकामनां न भजते स साधुः। नन्वेतादृशे कदाचारे दृष्टे सति कथं साधुत्वम्? तत्राह—मन्तव्यो मननीयः साधुत्वेनैव स ज्ञेय इति यावत्; मन्तव्यमिति विधिवाक्यं अन्यथा प्रत्यवायः स्यात्; अत्र मदाज्ञैव प्रमाणमिति भावः। ननु त्वां भजत इत्येतदंशे न साधुः परदारादिग्रहणांशेनासाधुश्च स मन्तव्यस्तत्राह—एवेति। सर्वेणाप्यंशेन साधुरेव मन्तव्यः कदापि तस्यासाधुत्वं न द्रष्टव्यमिति भावः। सम्यग् व्यवसितः निश्चयो यस्य सः। दुस्त्यजेन स्वपापेन नरकं तिर्यग्योनिर्वा यामि ऐकान्तिकं श्रीकृष्णभजनन्तु नैव जिहासामीति स शोभनमध्यवसायं कृतवानित्यर्थः॥३०॥
भावानुवाद—भगवान् कहते हैं अपने भक्तों के प्रति मेरी आसक्ति स्वाभाविक ही है। उसके दुराचारी होने पर भी वह आसक्ति दूर नहीं होती है एवं मैं उसे भी श्रेष्ठ ही कर देता हूँ। सुदुराचारी अर्थात् परहिंसा-परस्त्री परद्रव्यादि के परायण होकर भी यदि मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही है। वह किस प्रकार भजन करने वाला होना चाहिए? इस के उत्तरमें कहते है—‘अनन्यभाक्’ अर्थात् जो मुझे छोड़ और किसी देवता का भजन नहीं करता, मेरी भक्ति को छोड़कर ज्ञान कर्मादि का अनुष्ठान नहीं करता है, मेरी प्राप्ति की कामना के अतिरिक्त राज्य-सुखादि की कोई कामना नहीं करता तो वह व्यक्ति साधु है। यहां यदि प्रश्न हो कि इस प्रकार कदाचार के होने पर उसका साधुत्व ही कहाँ रहा? इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् कहते हैं ‘मन्तव्यः’ अर्थात् उसे साधु ही मानना होगा। ‘मन्तव्य’ इस शब्द से विधि (नियम) सूचित होती है, अतः यदि ऐसा न माना जाय तो उससे दोष होगा। इस विषय में मेरा आदेश ही प्रमाण है। यदि कहा जाय कि वह व्यक्ति आपका भजन करता है और दुराचारी भी है, अत: उसे अंशतः असाधु मानना चाहिए। परस्त्रीसंगी है इसलिए असाधु मानना चाहिए तो इसके उत्तर में कहते हैं—‘एव’ अर्थात् पूर्ण अंश में उसे साधु मानना होगा। कभी भी उसका असाधुत्व नहीं देखना, क्योंकि वह ‘सम्यग्व्यवसितः’ अर्थात् दृढ़ निश्चयवान् है। उसका निश्चय ऐसा होता है—अपने पापों से भले ही नरक अथवा पशु-पक्षी योनियों में चला जाऊँ, किन्तु ऐकान्तिक कृष्ण-भक्तिका कभी भी परित्याग नही करूँगा॥३०॥