Daily murli BK Pramod

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10/11/2025

10-11-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे - “तन-मन-धन अथवा मन्सा-वाचा-कर्मणा ऐसी सर्विस करो जो 21 जन्मों का बाप से एवज़ा मिले परन्तु सर्विस में कभी आपस में अनबनी नहीं होनी चाहिए''

प्रश्नः-
ड्रामा अनुसार बाबा जो सर्विस करा रहे हैं उसमें और तीव्रता लाने की विधि क्या है?

उत्तर:-
आपस में एकमत हो, कभी कोई खिट-खिट न हो। अगर खिट-खिट होगी तो सर्विस क्या करेंगे इसलिए आपस में मिलकर संगठन बनाए राय करो, एक दो के मददगार बनो। बाबा तो मददगार है ही परन्तु “हिम्मते बच्चे मददे बाप....'' इसके अर्थ को यथार्थ समझकर बड़े कार्य में मददगार बनो।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे यहाँ आते हैं रूहानी बाप के पास रिफ्रेश होने। जब रिफ्रेश होकर वापिस जाते हैं तो जरूर जाकर कुछ करके दिखलाना है। एक-एक बच्चे को सर्विस का सबूत देना है। जैसे कोई-कोई बच्चे कहते हैं हमारी सेन्टर खोलने की दिल है। गांवड़ों में भी सर्विस करते हैं ना। तो बच्चों को सदैव यह ख्याल रहना चाहिए कि हम मन्सा-वाचा-कर्मणा, तन-मन-धन से ऐसी सर्विस करें जो भविष्य 21 जन्मों का एवज़ा बाप से मिले। यही ओना है। हम कुछ करते हैं? कोई को ज्ञान देते हैं? सारा दिन यह ख्यालात आने चाहिए। भल सेन्टर खोलें परन्तु घर में स्त्री-पुरुष की अनबनी नहीं होनी चाहिए। कोई घमसान नहीं चाहिए। संन्यासी लोग घर के घमसान से निकल जाते हैं। डोंटकेयर कर चले जाते हैं। फिर गवर्मेन्ट उनको रोकती है क्या? वह तो सिर्फ पुरुष ही निकलते हैं। अभी कोई-कोई मातायें निकलती हैं, जिनका कोई धणी-धोणी नहीं होता या वैराग्य आ जाता है, उन्हों को भी वो संन्यासी पुरुष लोग बैठ सिखलाते हैं। उन द्वारा अपना धंधा करते हैं। पैसे आदि सारे उनके पास रहते हैं। वास्तव में घरबार छोड़ा तो फिर पैसे रखने की दरकार नहीं रहती। तो अब बाप तुम बच्चों को समझा रहे हैं। हर एक की बुद्धि में आना चाहिए - हमको बाप का परिचय देना है। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते, बेसमझ हैं। तुम बच्चों के लिए बाप का फरमान है - मीठे-मीठे बच्चों, तुम अपने को आत्मा समझो, सिर्फ पण्डित नहीं बनना है। अपना भी कल्याण करना है। याद से सतोप्रधान बनना है। बहुत पुरुषार्थ करना है। नहीं तो बहुत पछताना पड़ेगा। कहते हैं बाबा हम घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। संकल्प आ जाते हैं। बाबा कहते हैं वह तो आयेंगे ही। तुमको बाप की याद में रह सतोप्रधान बनना है। आत्मा जो अपवित्र है, उनको परमपिता परमात्मा को ही याद कर पवित्र बनना है। बाप ही बच्चों को डायरेक्शन देते हैं - हे फरमानबरदार बच्चों - तुमको फरमान करता हूँ, मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कटेंगे। पहली-पहली बात ही यह सुनाओ कि निराकार शिवबाबा कहते हैं मुझे याद करो - मैं पतित-पावन हूँ। मेरी याद से ही विकर्म विनाश होंगे और कोई उपाय नहीं। न कोई बता सकते हैं। ढेर के ढेर संन्यासी आदि हैं, निमन्त्रण देते हैं - योग कान्फ्रेन्स में आकर शामिल हो। अब उनके हठयोग से किसका कल्याण तो होना नहीं है। ढेर योग आश्रम हैं जिनको इस राजयोग का बिल्कुल पता ही नहीं है। बाप को ही नहीं जानते। बेहद का बाप ही आकर सच्चा-सच्चा योग सिखलाते हैं। बाप तुम बच्चों को आपसमान बनाते हैं। जैसे मैं निराकार हूँ। टेप्रेरी इस तन में आया हूँ। भाग्यशाली रथ तो जरूर मनुष्य का होगा। बैल को तो नहीं कहेंगे। बाकी कोई घोड़ेगाड़ी आदि की बात नहीं है। न लड़ाई की कोई बात है। तुम जानते हो हमको माया से ही लड़ाई करनी है। गाया भी जाता है माया ते हारे हार.... तुम बहुत अच्छी रीति समझा सकते हो - परन्तु अब सीख रहे हो। कोई सीखते-सीखते भी एकदम धरनी पर गिर जाते हैं। कोई खिटखिट हो पड़ती है। दो बहनों की भी आपस में नहीं बनती, लूनपानी हो जाते हैं। तुम्हारी आपस में कोई भी खिट-खिट नहीं होनी चाहिए। खिट-खिट होगी तो बाप कहेंगे यह क्या सर्विस करेंगे। बहुत अच्छे-अच्छे का भी ऐसा हाल हो जाता है। अभी माला बनाई जाए तो कहेंगे डिफेक्टेड माला है। इनमें अजुन यह-यह अवगुण हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार बाबा सर्विस भी कराते रहते हैं। डायरेक्शन देते रहते हैं। देहली में चारों ओर सेवा का घेराव डालो। यह सिर्फ एक को थोड़ेही करना है, आपस में मिलकर राय करनी है। सब एक मत होने चाहिए। बाबा एक है परन्तु मददगार बच्चों बिगर काम थोड़ेही करेंगे। तुम सेन्टर्स खोलते हो, मत लेते हो। बाबा पूछते हैं मदद करने वाले हो? कहते हैं - हाँ बाबा, अगर मदद देने वाले नहीं होंगे तो कुछ कर नहीं सकेंगे। घर में भी मित्र-सम्बन्धी आदि आते हैं ना। भल गाली दें, वह तुमको काटते रहेंगे। तुम्हें उसकी परवाह नहीं करनी है।

तुम बच्चों को आपस में बैठकर राय करनी चाहिए। जैसे सेन्टर्स खोलते हैं तो भी सब मिलकर लिखते हैं - बाबा हम ब्राह्मणी की राय से यह काम करते हैं। सिन्धी भाषा में कहते हैं - ब त बारा (एक के साथ 2 मिलने से 12 हो जाते) 12 होंगे तो और ही अच्छी राय निकलेगी। कहाँ-कहाँ एक-दो से राय नहीं लेते हैं। अब ऐसे कोई काम हो सकता है क्या? बाबा कहेंगे जब तक तुम्हारा आपस में संगठन ही नहीं तो तुम इतना बड़ा कार्य कैसे कर सकेंगे। छोटी दुकान, बड़ी दुकान भी होती है ना। आपस में मिलकर संगठन करते हैं। ऐसे कोई नहीं कहते बाबा आप मदद करो। पहले तो मददगार बनाने चाहिए। फिर बाबा कहते हैं - हिम्मते बच्चे मददे बाप। पहले तो अपने मददगार बनाओ। बाबा हम इतना करते हैं बाकी आप मदद दो। ऐसे नहीं, पहले आप मदद करो। हिम्मते मर्दा...... उनका भी अर्थ नहीं समझते। पहले तो बच्चों की हिम्मत चाहिए। कौन-कौन क्या मदद देते हैं? पोतामेल सारा लिखेंगे - फलाने-फलाने यह मदद देते हैं। कायदेसिर लिखकर देंगे। बाकी ऐसे थोड़ेही एक-एक कहेंगे हम सेन्टर खोलते हैं मदद दो। ऐसे तो बाबा नहीं खोल सकता है क्या? लेकिन ऐसे तो हो नहीं सकता। कमेटी को आपस में मिलना होता है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं ना। कोई तो बिल्कुल कुछ भी नहीं समझते। कोई बहुत हर्षित होते रहते हैं। बाबा तो समझते हैं इस ज्ञान में बहुत खुशी रहनी चाहिए। एक ही बाप, टीचर, गुरू मिलता है तो खुशी होनी चाहिए ना। दुनिया में यह बातें कोई नहीं जानते। शिवबाबा ही ज्ञान सागर, पतित-पावन, सर्व का सद्गति दाता है। सबका फादर भी एक है। यह और कोई की बुद्धि में नहीं है। अभी तुम बच्चे जानते हो वही नॉलेजफुल, लिबरेटर, गाइड है। तो बाप की मत पर चलना पड़े। आपस में मिलकर राय करनी है। खर्चा करना है। एक की मत पर तो नहीं चल सकते। मददगार सब चाहिए। यह भी बुद्धि चाहिए ना। तुम बच्चों को घर-घर में मैसेज देना है। पूछते हैं - शादी में निमन्त्रण मिलता है, जायें? बाबा कहते हैं - क्यों नहीं, जाओ, जाकर अपनी सर्विस करो। बहुतों का कल्याण करो। भाषण भी कर सकते हो। मौत सामने खड़ा है, बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। यहाँ सब पाप आत्मायें हैं। बाप को ही गाली देते रहते हैं। बाप से तुमको बेमुख कर देते हैं। गायन भी है विनाश काले विपरीत बुद्धि। किसने कहा? बाप ने खुद कहा है - मेरे से प्रीत बुद्धि नहीं हैं। विनाश काले विपरीत बुद्धि हैं। मुझे जानते ही नहीं। जिनकी प्रीत बुद्धि है, जो मुझे याद करते हैं, वही विजय पायेंगे। भल प्रीत है परन्तु याद नहीं करते हैं तो भी कम पद पा लेंगे। बाप बच्चों को डायरेक्शन देते हैं। मूल बात सबको मैसेज देना है। बाप को याद करो तो पावन बन, पावन दुनिया का मालिक बनो। ड्रामा अनुसार बाबा को लेना भी बूढ़ा शरीर पड़ता है। वानप्रस्थ में प्रवेश करते हैं। मनुष्य वानप्रस्थ अवस्था में ही भगवान से मिलने के लिए मेहनत करते हैं। भक्ति में तो समझते हैं - जप-तप आदि करना यह सब भगवान से मिलने के रास्ते हैं। कब मिलेगा वह कुछ पता नहीं। जन्म-जन्मान्तर भक्ति करते आये हैं। भगवान तो कोई को मिलता ही नहीं। यह नहीं समझते बाबा आयेंगे ही तब, जब पुरानी दुनिया को नया बनाना होगा। रचयिता बाप ही है, चित्र तो हैं परन्तु त्रिमूर्ति में शिव को नहीं दिखाते हैं। शिवबाबा बिगर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर दिखाये हैं, जैसे गला कटा हुआ है। बाप के बिगर निधनके बन पड़ते हैं। बाप कहते हैं मैं आकर तुमको धनका बनाता हूँ। 21 जन्म तुम धनके बन जाते हो। कोई तकलीफ नहीं रहती। तुम भी कहेंगे - जब तक बाप नहीं मिला है, तो हम भी बिल्कुल निधनके तुच्छ बुद्धि थे। पतित-पावन कहते हैं - परन्तु वह कब आयेंगे, यह नहीं जानते। पावन दुनिया है ही नई दुनिया। बाप कितना सिम्पुल समझाते हैं। तुमको भी समझ में आता है, हम बाप के बने हैं, स्वर्ग के मालिक जरूर बनेंगे। शिवबाबा है बेहद का मालिक। बाप ने ही आकर सुख-शान्ति का वर्सा दिया था। सतयुग में सुख था - बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी। अभी इन बातों को तुम समझते हो। शिवबाबा क्यों आया होगा? जरूर नई दुनिया रचने। पतित को पावन बनाने आये होंगे। ऊंच कार्य किया होगा, मनुष्य बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं। बाप कहते हैं यह भी ड्रामा में नूँध है। तुम बच्चों को बाप बैठ जगाते हैं। तुमको अब इस सारे ड्रामा का पता है - कैसे नई दुनिया फिर पुरानी होती है। बाप कहते हैं और सब कुछ छोड़ एक बाप को याद करो। हमको कोई से ऩफरत नहीं आती। यह समझाना पड़ता है। ड्रामा अनुसार माया का राज्य भी होना है। अब फिर बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, अब यह चक्र पूरा होता है। अब तुमको ईश्वरीय मत मिलती है, उस पर चलना है। अब 5 विकारों की मत पर नहीं चलना है। आधाकल्प तुम माया की मत पर चल तमोप्रधान बने हो। अब मैं तुमको सतोप्रधान बनाने आया हूँ। सतोप्रधान, तमोप्रधान का यह खेल है। ग्लानि की कोई बात नहीं। कहते हैं भगवान ने यह आवागमन का नाटक ही क्यों रचा? क्यों का सवाल ही नहीं उठता। यह तो ड्रामा का चक्र है, जो फिर रिपीट होता रहता है। ड्रामा अनादि है। अभी है कलियुग, सतयुग पास्ट हो गया है। अब फिर बाप आये हैं। बाबा-बाबा कहते रहो तो कल्याण होता रहेगा। बाप कहते हैं यह अति गुह्य रमणीक बातें हैं। कहते हैं शेरनी के दूध लिये सोने का बर्तन चाहिए। सोने की बुद्धि कैसे बनेगी? आत्मा में ही बुद्धि है ना। आत्मा कहती है - मेरी बुद्धि अब बाबा तरफ है। मैं बाबा को बहुत याद करता हूँ। बैठे-बैठे बुद्धि और तरफ चली जाती है ना। बुद्धि में धन्धाधोरी याद आता रहेगा। तो तुम्हारी बात जैसे सुनेंगे नहीं। मेहनत है। जितना-जितना मौत नज़दीक आता जायेगा - तुम याद में बहुत रहेंगे। मरने समय सब कहते हैं भगवान को याद करो। अब बाप खुद कहते हैं मुझे याद करो। तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। वापिस जाना है इसलिए अब मुझे याद करो। दूसरी कोई बात नहीं सुनो। जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा तुम्हारे सिर पर है। शिवबाबा कहते हैं इस समय सब अजामिल हैं। मूल बात है याद की यात्रा जिससे तुम पावन बनेंगे फिर आपस में प्रेम भी होना चाहिए। एक-दो से राय लेनी चाहिए। बाप प्रेम का सागर है ना। तो तुम भी आपस में बहुत प्यारे होने चाहिए। देही-अभिमानी बन बाप को याद करना है। बहन-भाई का संबंध भी तोड़ना पड़ता है। भाई-बहन से भी योग नहीं रखो। एक बाप से ही योग रखो। बाप आत्माओं को कहते हैं - मुझे याद करो तो तुम्हारी विकारी दृष्टि खलास हो जाए। कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। मन्सा में तूफान जरूर आयेंगे। यह बड़ी मंजिल है। बाबा कहते हैं देखो कर्मेन्द्रियां धोखा देती हैं तो खबरदार हो जाओ। अगर उल्टा काम कर लिया तो खलास। चढ़े तो चाखे वैकुण्ठ का मालिक.... मेहनत के सिवाए थोड़ेही कुछ होता है। बहुत मेहनत है। देह सहित देह के.... कोई-कोई को तो बन्धन नहीं है तो भी फँसे रहते हैं। बाप की श्रीमत पर नहीं चलते हैं। लाख दो हैं, भल बड़ा कुटुम्ब है तो भी बाबा कहेंगे जास्ती धन्धे आदि में नहीं फंसो। वानप्रस्थी बन जाओ। खर्चा आदि कम कर लो। गरीब लोग कितना साधारण चलते हैं। अभी क्या-क्या चीजें निकली हैं, बात मत पूछो। खर्चा ही खर्चा साहूकारों का चलता है। नहीं तो पेट को क्या चाहिए? एक पाव आटा। बस। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) आपस में बहुत-बहुत प्यारे बनना है लेकिन भाई-बहन से योग नहीं रखना है। कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है

2) एक ईश्वरीय मत पर चलकर सतोप्रधान बनना है। माया की मत छोड़ देनी है। आपस में संगठन मजबूत करना है, एक-दो के मददगार बनना है।

वरदान:-
लक्ष्य के प्रमाण लक्षण के बैलेन्स की कला द्वारा चढ़ती कला का अनुभव करने वाले बाप समान सम्पन्न भव

बच्चों में विश्व कल्याण की कामना भी है तो बाप समान बनने की श्रेष्ठ इच्छा भी है, लेकिन लक्ष्य के प्रमाण जो लक्षण स्वयं को वा सर्व को दिखाई दें उसमें अन्तर है इसलिए बैलेन्स करने की कला अब चढ़ती कला में लाकर इस अन्तर को मिटाओ। संकल्प है लेकिन दृढ़ता सम्पन्न संकल्प हो तो बाप समान सम्पन्न बनने का वरदान प्राप्त हो जायेगा। अभी जो स्वदर्शन और परदर्शन दोनों चक्र घूमते हैं, व्यर्थ बातों के जो त्रिकालदर्शी बन जाते हो - इसका परिवर्तन कर स्वचिंतक स्वदर्शन चक्रधारी बनो।

स्लोगन:-
सेवा का भाग्य प्राप्त होना ही सबसे बड़ा भाग्य है।

अव्यक्त इशारे - अशरीरी व विदेही स्थिति का अभ्यास बढ़ाओ

अभ्यास करो - देह और देह के देश को भूल अशरीरी परमधाम निवासी बन जाओ, फिर परमधाम निवासी से अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाओ, फिर सेवा के प्रति आवाज़ में आओ, सेवा करते हुए भी अपने स्वरूप की स्मृति में रहो, अपनी बुद्धि को जहाँ चाहो वहाँ एक सेकेण्ड से भी कम समय में लगा लो तब पास विद आनर बनेंगे।

10/11/2025

Good morning ओम शांति 🌞🌈🕉️💫

01/11/2025

01-11-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम इस रूहानी युनिवर्सिटी के स्टूडेण्ट हो, तुम्हारा काम है सारी युनिवर्स को बाप का मैसेज देना''

प्रश्नः-
अभी तुम बच्चे कौन सा ढिंढोरा पीटते और कौन सी बात समझाते हो?

उत्तर:-
तुम ढिंढोरा पीटते हो कि यह नई दैवी राजधानी फिर से स्थापन हो रही है। अनेक धर्मों का अब विनाश होना है। तुम सबको समझाते हो कि सब बेफिकर रहो, यह इन्टरनेशनल रोला है। लड़ाई जरूर लगनी है, इसके बाद दैवी राजधानी आयेगी।

ओम् शान्ति। यह है रूहानी युनिवर्सिटी। सारे युनिवर्स की जो भी आत्मायें हैं, युनिवर्सिटी में आत्मायें ही पढ़ती हैं। युनिवर्स अर्थात् विश्व। अब कायदे अनुसार युनिवर्सिटी अक्षर तुम बच्चों का है। यह है रूहानी युनिवर्सिटी। जिस्मानी युनिवर्सिटी होती ही नहीं। यह एक ही गॉड फादरली युनिवर्सिटी है। सभी आत्माओं को लेसन मिलता है। तुम्हारा यह पैगाम कोई न कोई प्रकार से सबको जरूर पहुँचना चाहिए, मैसेज देना है ना और यह मैसेज बिल्कुल सिम्पुल है। बच्चे जानते हैं वह हमारा बेहद का बाप है, जिसको सब याद करते हैं। ऐसे भी कहें वह हमारा बेहद का माशूक है, जो भी विश्व में जीव आत्मायें हैं वह उस माशूक को याद जरूर करती हैं। यह प्वाइंट्स अच्छी रीति धारण करनी है। जो फ्रेश बुद्धि होंगे वह अच्छी रीति धारण कर सकेंगे। युनिवर्स में जो भी आत्मायें हैं उन सबका बाप एक ही है। युनिवर्सिटी में तो मनुष्य ही पढ़ेंगे ना। अभी तुम बच्चे यह भी जानते हो - हम ही 84 जन्म लेते हैं। 84 लाख की तो बात ही नहीं। युनिवर्स में जो भी आत्मायें हैं, इस समय सब पतित हैं। यह है ही छी-छी दुनिया, दु:खधाम। उसे सुखधाम में ले जाने वाला एक ही बाप है, उनको लिबरेटर भी कहते हैं। तुम सारे युनिवर्स वा विश्व के मालिक बनते हो ना। बाप सबके लिए कहते हैं यह मैसेज पहुँचाकर आओ। बाप को सब याद करते हैं, उनको गाइड, लिबरेटर, मर्सीफुल (रहमदिल) भी कहते हैं। अनेक भाषायें हैं ना। सभी आत्मायें एक को पुकारती हैं तो वह एक ही सारी युनिवर्स का टीचर भी हुआ ना। बाप तो है ही परन्तु यह किसको पता नहीं कि वह हम सब आत्माओं का टीचर भी है, गुरू भी है। सबको गाइड भी करते हैं। इस बेहद के गाइड को सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो। तुम ब्राह्मणों के सिवाए और कोई नहीं जानते। आत्मा को भी तुमने जाना है कि आत्मा क्या चीज़ है। दुनिया में तो एक भी मनुष्य नहीं, खास भारत आम दुनिया किसको भी पता नहीं कि आत्मा क्या चीज़ है। भल कहते हैं भ्रकुटी के बीच चमकता है अजब सितारा। परन्तु समझ कुछ नहीं। अभी तुम जानते हो आत्मा तो अविनाशी है। वह कभी बड़ी या छोटी नहीं होती। जैसे तुम्हारी आत्मा है, बाप भी वही बिन्दी है। बड़ा छोटा नहीं। वह भी है आत्मा सिर्फ परम आत्मा है, सुप्रीम है। बरोबर सभी आत्मायें परमधाम में रहने वाली हैं। यहाँ आती हैं पार्ट बजाने। फिर अपने परमधाम जाने की कोशिश करते हैं। परमपिता परमात्मा को सब याद करते हैं क्योंकि आत्माओं को परमपिता ने ही मुक्ति में भेजा था तो उनको ही याद करते हैं। आत्मा ही तमोप्रधान बनी है। याद क्यों करते हैं? इतना भी पता नहीं। जैसे बच्चा कहेगा - “बाबा'', बस। उनको कुछ भी पता ही नहीं। तुम भी बाबा मम्मा कहते हो, जानते कुछ नहीं हो। भारत में एक नेशनल्टी थी, उनको डीटी नेशनल्टी कहा जाता है। फिर बाद में और भी उनमें इन्टर हुए हैं। अभी कितने ढेर हो गये हैं, इसलिए इतने झगड़े आदि होते हैं। जहाँ-जहाँ जास्ती घुस गये हैं, उनको वहाँ से निकालने की कोशिश करते रहते हैं। बहुत झगड़े हो गये हैं। अन्धियारा भी बहुत हो गया है। कुछ तो लिमिट भी होनी चाहिए ना। एक्टर्स की लिमिट होती है। यह भी बना बनाया खेल है। इसमें जितने भी एक्टर्स हैं, उसमें कम जास्ती हो न सके। जब सब एक्टर्स स्टेज पर आ जाते हैं फिर उनको वापिस भी जाना है। जो भी एक्टर्स रहे हुए होंगे, आते रहेंगे। भल कितना भी कन्ट्रोल आदि करने के लिए माथा मारते रहते हैं, परन्तु कर नहीं सकते। बोलो, हम बी.के. ऐसा बर्थ कन्ट्रोल कर देते हैं जो बाकी 9 लाख जाकर रहेंगे। फिर सारी आदमशुमारी ही कम हो जायेगी। हम आपको सत्य बताते हैं, अब स्थापना कर रहे हैं। नई दुनिया, नया झाड़ जरूर छोटा ही होगा। यहाँ तो यह कन्ट्रोल कर नहीं सकेंगे क्योंकि तमोप्रधान और होता जाता है। वृद्धि होती जाती है। एक्टर्स जो भी आने वाले हैं, यहाँ ही आकर शरीर धारण करेंगे। इन बातों को कोई समझते नहीं हैं। शुरूड़ बुद्धि समझते हैं राजधानी में तो हर प्रकार के पार्टधारी होते हैं। सतयुग में जो राजधानी थी वह फिर से स्थापन हो रही है। ट्रांसफर हो जायेंगे। तुम अभी तमोप्रधान से सतोप्रधान क्लास में ट्रांसफर होते हो। पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाते हो। तुम्हारी पढ़ाई इस दुनिया के लिए नहीं है। ऐसी युनिवर्सिटी और कोई हो न सके। गॉड फादर ही कहते हैं हम तुमको अमर-लोक के लिए पढ़ाते हैं। यह मृत्युलोक खलास होना है। सतयुग में इन लक्ष्मी-नारायण की राजधानी थी। यह स्थापन कैसे हुई, यह किसको पता नहीं है।

बाबा हमेशा कहते हैं जहाँ तुम भाषण करते हो तो यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र जरूर रखो। इनमें डेट भी जरूर लिखी हुई हो। तुम समझा सकते हो कि नये विश्व की शुरूआत से 1250 वर्ष तक इस डिनायस्टी का राज्य था। जैसे कहते हैं ना - क्रिश्चियन डिनायस्टी का राज्य था। एक दो के पिछाड़ी चले आते हैं। तो जब ये देवता डिनायस्टी थी तो दूसरा कोई था नहीं। अब फिर यह डिनायस्टी स्थापन हो रही है। बाकी सबका विनाश होना है। लड़ाई भी सामने खड़ी है। भागवत आदि में इस पर भी कहानी लिख दी है। छोटेपन में यह कहानियां आदि सुनते रहते थे। अभी तुम जानते हो यह राजाई कैसे स्थापन होती है। जरूर बाप ने ही राजयोग सिखाया है। जो पास होते हैं वह विजय माला का दाना बनते हैं और कोई इस माला को जानते नहीं। तुम ही जानते हो। तुम्हारा प्रवृत्ति मार्ग है। ऊपर में बाबा खड़ा है, उनको अपना शरीर है नहीं। फिर ब्रह्मा सरस्वती सो लक्ष्मी-नारायण। पहले चाहिए बाप फिर जोड़ा। रूद्राक्ष के दाने होते हैं ना। नेपाल में एक वृक्ष है, जहाँ से यह रूद्राक्ष के दाने आते हैं। उनमें सच्चे भी होते हैं। जितना छोटे उतना दाम बहुत। अभी तुम अर्थ को समझ गये हो। यह विष्णु की विजय माला अथवा रूण्ड माला बनती है। वो लोग तो सिर्फ माला फेरते-फेरते राम-राम करते रहेंगे, अर्थ कुछ भी नहीं। माला का जाप करते हैं। यहाँ तो बाप कहते हैं मुझे याद करो। यह है अजपाजाप। मुख से कुछ बोलना नहीं है। गीत भी स्थूल हो जाता है। बच्चों को तो सिर्फ बाप को याद करना है। नहीं तो फिर गीत आदि याद आते रहेंगे। यहाँ मूल बात है ही याद की। तुमको आवाज से परे जाना है। बाप का डायरेक्शन है ही मनमनाभव। बाप थोड़ेही कहते हैं गीत गाओ, रड़ी मारो। मेरी महिमा गायन करने की भी दरकार नहीं है। यह तो तुम जानते हो वह ज्ञान का सागर, सुख-शान्ति का सागर है। मनुष्य नहीं जानते। ऐसे ही नाम रख दिये हैं। तुम्हारे सिवाए और कोई भी नहीं जानते। बाप ही आकर अपना नाम रूप आदि बताते हैं - मैं कैसा हूँ, तुम आत्मा कैसी हो! तुम बहुत मेहनत करते हो - पार्ट बजाने। आधाकल्प भक्ति की है, मैं तो ऐसे पार्ट में आता नहीं हूँ। मैं दु:ख सुख से न्यारा हूँ। तुम दु:ख भोगते हो फिर तुम ही सुख भोगते हो - सतयुग में। तुम्हारा पार्ट मेरे से भी ऊंच है। मैं तो आधाकल्प वहाँ ही आराम से बैठा रहता हूँ वानप्रस्थ में। तुम मुझे पुकारते आते हो। ऐसे नहीं कि मैं वहाँ बैठ तुम्हारी पुकार सुनता हूँ। मेरा पार्ट ही इस समय का है। ड्रामा के पार्ट को मैं जानता हूँ। अब ड्रामा पूरा हुआ है, मुझे जाकर पतितों को पावन बनाने का पार्ट बजाना है और कोई बात है नहीं। मनुष्य समझते हैं परमात्मा सर्वशक्तिमान् है, अन्तर्यामी है। सबके अन्दर क्या-क्या चलता है, वह जानते हैं। बाप कहते हैं ऐसे है नहीं। तुम जब बिल्कुल तमोप्रधान बन जाते हो - तब एक्यूरेट टाइम पर मुझे आना पड़ता है। साधारण तन में ही आता हूँ। तुम बच्चों को आकर दु:ख से छुड़ाता हूँ। एक धर्म की स्थापना ब्रह्मा द्वारा, अनेक धर्मों का विनाश शंकर द्वारा... हाहाकार के बाद जयजयकार हो जायेगी। कितना हाहाकार होना है। आफतों में मरते रहेंगे। नेचुरल कैलेमिटीज की भी बहुत मदद रहती है। नहीं तो मनुष्य बहुत रोगी, दु:खी हो जाएं। बाप कहते हैं बच्चे दु:खी न पड़े रहें इसलिए नेचुरल कैलेमिटीज भी ऐसी जोर से आती हैं जो सबको खत्म कर देती हैं। बॉम्बस तो कुछ नहीं हैं, नेचुरल कैलेमिटीज बहुत मदद करती हैं। अर्थक्वेक में ढेर खत्म हो जाते हैं। पानी का एक दो घुटका आया यह खत्म। समुद्र भी जरूर उछल खायेगा। धरती को हप करेगा, 100 फुट पानी उछल खाये तो क्या कर देगा। यह है हाहाकार की सीन। ऐसी सीन देखने के लिए हिम्मत चाहिए। मेहनत भी करना है, निर्भय भी बनना है। तुम बच्चों में अहंकार बिल्कुल नहीं होना चाहिए। देही-अभिमानी बनो। देही-अभिमानी रहने वाले बड़े मीठे होते हैं। बाप कहते हैं - मैं तो हूँ निराकार और विचित्र। यहाँ आता हूँ - सर्विस करने के लिए। हमारी बड़ाई देखो कितनी करते हैं। ज्ञान का सागर... हे बाबा और फिर कहते हैं पतित दुनिया में आओ। तुम निमन्त्रण तो बड़ा अच्छा देते हो। ऐसा भी नहीं कहते कि स्वर्ग में आकर सुख तो देखो। कहते हैं हे पतित-पावन हम पतित हैं, हमको पावन बनाने आओ। निमन्त्रण देखो कैसा है। एकदम तमोप्रधान पतित दुनिया और फिर पतित शरीर में बुलाते हैं। बड़ा अच्छा निमन्त्रण देते हैं भारतवासी! ड्रामा में राज़ ही ऐसा है। इनको भी थोड़ेही पता था कि मेरा बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है। बाबा ने प्रवेश किया है तब बताते हैं। बाबा ने हर एक बात का राज़ समझाया है। ब्रह्मा को ही वन्नी (पत्नी) बनना है। बाबा खुद कहते हैं - मेरी यह वन्नी है। मैं इनमें प्रवेश कर इन द्वारा तुमको अपना बनाता हूँ। यह सच्ची-सच्ची बड़ी माँ हो गई और वह एडाप्टेड मॉ ठहरी। मॉ बाप तुम इनको कह सकते हो। शिवबाबा को सिर्फ फादर ही कहेंगे। यह है ब्रह्मा बाबा। मम्मा गुप्त है। ब्रह्मा है मॉ परन्तु तन पुरुष का है। यह तो सम्भाल नहीं सकेंगे इसलिए एडाप्ट किया है बच्ची को। नाम रख दिया है मातेश्वरी। हेड हो गई। ड्रामा अनुसार है ही एक सरस्वती। बाकी दुर्गा, काली आदि सब अनेक नाम हैं। मॉ बाप तो एक ही होते हैं ना। तुम सब हो बच्चे। गायन भी है ब्रह्मा की बेटी सरस्वती। तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां हो ना। तुम्हारे ऊपर नाम बहुत हैं। यह सब बातें तुम्हारे में भी नम्बरवार समझेंगे। पढ़ाई में भी नम्बरवार तो होते हैं ना। एक न मिले दूसरे से। यह राजधानी स्थापन हो रही है। यह बना बनाया ड्रामा है। इनको विस्तार से समझना है। बहुत ढेर प्वाइंट्स हैं। बैरिस्टरी पढ़ते हैं फिर उनमें भी नम्बरवार होते हैं। कोई बैरिस्टर तो 2-3 लाख कमाते हैं। कोई देखो कपड़े भी फटे हुए पहनेंगे। इसमें भी ऐसे हैं।

तो बच्चों को समझाया गया है कि यह इन्टरनेशनल रोला है। अभी तुम समझाते हो कि सब बेफिकर रहो। लड़ाई तो जरूर लगनी ही है। तुम ढिंढोरा पीटते हो कि नई दैवी राजधानी फिर से स्थापन हो रही है। अनेक धर्मों का विनाश होगा। कितना क्लीयर है। प्रजापिता ब्रह्मा से यह प्रजा रची जाती है। कहते हैं यह है मेरी मुख वंशावली। तुम मुख वंशावली ब्राह्मण हो। वह कुख वंशावली ब्राह्मण हैं। वह हैं पुजारी, तुम अभी पूज्य बन रहे हो। तुम जानते हो हम सो देवता पूज्य बन रहे हैं। तुम्हारे ऊपर अभी लाइट का ताज नहीं है। तुम्हारी आत्मा जब पवित्र बनेंगी तब यह शरीर छोड़ देगी। इस शरीर पर तुमको लाइट का ताज नहीं दे सकते, शोभेगा नहीं। इस समय तुम हो गायन लायक। इस समय कोई की भी आत्मा पवित्र नहीं है, इसलिए किसके ऊपर भी इस समय लाइट नहीं होनी चाहिए। लाइट सतयुग में होती है। दो कला कम वाले को भी यह लाइट नहीं देनी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुड़मार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपनी स्थिति ऐसी अचल और निर्भय बनानी है जो अन्तिम विनाश की सीन को देख सकें। मेहनत करनी है देही-अभिमानी बनने की।

2) नई राजधानी में ऊंच पद पाने के लिए पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है। पास होकर विजय माला का दाना बनना है।

वरदान:-
सदा भगवान और भाग्य की स्मृति में रहने वाले सर्वश्रेष्ठ भाग्यवान भव

संगमयुग पर चैतन्य स्वरूप में भगवान बच्चों की सेवा कर रहे हैं। भक्ति मार्ग में सब भगवान की सेवा करते लेकिन यहाँ चैतन्य ठाकुरों की सेवा स्वयं भगवान करते हैं। अमृतवेले उठाते हैं, भोग लगाते हैं, सुलाते हैं। रिकार्ड पर सोने और रिगार्ड पर उठने वाले, ऐसे लाडले वा सर्व श्रेष्ठ भाग्यवान हम ब्राह्मण हैं - इसी भाग्य की खुशी में सदा झूलते रहो। सिर्फ बाप के लाडले बनो, माया के नहीं। जो माया के लाडले बनते हैं वह बहुत लाडकोड करते हैं।

स्लोगन:-
अपने हर्षितमुख चेहरे से सर्व प्राप्तियों की अनुभूति कराना - सच्ची सेवा है।

अव्यक्त इशारे - अशरीरी व विदेही स्थिति का अभ्यास बढ़ाओ

अशरीरी बनना अर्थात् आवाज़ से परे हो जाना। शरीर है तो आवाज़ है। शरीर से परे हो जाओ तो साइलेंस। एक सेकेण्ड में सर्विस के संकल्प में आये और एक सेकेण्ड में संकल्प से परे स्वरूप में स्थित हो जायें। कार्य प्रति शारीरिक भान में आयें फिर सेकेण्ड में अशरीरी हो जायें, जब यह ड्रिल पक्की होगी तब सभी परिस्थितियों का सामना कर सकेंगे।

Good 😊 morning ओम शांति friends 🙏
01/11/2025

Good 😊 morning ओम शांति friends 🙏

31/10/2025

31-10-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठेबच्चे - तुम हो स्प्रीचुअल, रूहानी इनकागनीटो सैलवेशन आर्मी, तुम्हें सारी दुनिया को सैलवेज करना है, डूबे हुए बेडे को पार लगाना है“

प्रश्नः-
संगम पर बाप कौन-सी युनिवर्सिटी खोलते हैं जो सारे कल्प में नहीं होती?

उत्तर:-
राजाई प्राप्त करने के लिए पढ़ने की गॉड फादरली युनिवर्सिटी वा कॉलेज संगम पर बाप ही खोलते हैं। ऐसी युनिवर्सिटी सारे कल्प में नहीं होती। इस युनिवर्सिटी में पढ़ाई पढ़कर तुम डबल सिरताज राजाओं का राजा बनते हो।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठेरूहानी बच्चों से पहले-पहले बाबा पूछते हैं यहाँ आकर जब बैठते हो तो अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते हो? क्योंकि यहाँ तुमको कोई धंधाधोरी, मित्र-सम्बन्धी आदि भी नहीं हैं। तुम यह विचार करके आते हो कि हम बेहद के बाप से मिलने जाते हैं। कौन कहते हैं? आत्मा शरीर द्वारा बोलती है। पारलौकिक बाप ने यह शरीर उधार पर लिया है, इनसे समझाते हैं। यह एक ही बार होता है जो बेहद का बाप आकर सिखलाते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करने से तुम्हारा बेडा पार होगा। हर एक का बेडा डूबा हुआ है, जो जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना बेडा पार होगा। गाते हैं ना - हे मांझी बेड़ी (नैया) मेरी पार लगाओ। वास्तव में हर एक को अपने पुरुषार्थ से पार जाना है। जैसे तैरना सिखलाते हैं फिर सीख जाते हैं तो आपेही तैरते हैं। वह सब हैं जिस्मानी बातें। यह हैं रूहानी बातें। तुम जानते हो आत्मा अभी कीचड़ के दुबन (दलदल) में फँस गई है। इस पर हिरण का भी मिसाल देते हैं। पानी समझ जाते हैं, परन्तु वह होती है कीचड़, तो उसमें फँस पड़ते हैं। कभी-कभी स्टीमर्स, मोटरें आदि भी कीचड़ में फँस पड़ती हैं। फिर उनको सैलवेज करते हैं। वह सब हैं सैलवेशन आर्मी। तुम हो रूहानी। तुम जानते हो सब माया के दुबन में बहुत फँसे हुए हैं, इनको माया का दुबन कहा जाता है। बाप आकर समझाते हैं - इनसे तुम कैसे निकल सकते हो। वह सैलवेज करते हैं, उसमें मदद चाहिए आदमी को आदमी की। यहाँ तो फिर आत्मा जाकर दुबन में फँसी है। बाप रास्ता बताते हैं इनसे तुम कैसे निकल सकते हो। फिर दूसरों को भी रास्ता बता सकते हो। अपने को और दूसरों को रास्ता बताना है कि तुम्हारी नईया इस विषय सागर से क्षीरसागर में कैसे जाये। सतयुग को कहते हैं क्षीरसागर अर्थात् सुख का सागर। यह है दु:ख का सागर। रावण दु:ख के सागर में डुबोते हैं। बाप आकर सुख के सागर में ले जाते हैं।

तुमको रूहानी सैलवेशन आर्मी कहा जाता है। तुम श्रीमत पर सबको रास्ता बताते हो। हर एक को समझाते हो - दो बाप हैं, एक हद का, दूसरा बेहद का। लौकिक बाप होते हुए भी सब पारलौकिक बाप को याद करते हैं परन्तु उनको जानते बिल्कुल नहीं हैं। बाबा कोई ग्लानि नहीं करते हैं परन्तु ड्रामा का राज़ समझाते हैं। यह भी समझाने के लिए ही कहते हैं कि इस समय सभी मनुष्य मात्र 5 विकारों रूपी दलदल में फँसे हुए आसुरी सम्प्रदाय हैं। दैवी सम्प्रदाय को आसुरी सम्प्रदाय जाकर नमन करते हैं क्योंकि वह सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। संन्यासियों को नमन करते हैं वह भी घरबार छोड़कर जाते हैं। पवित्र रहते हैं। इन संन्यासियों और देवताओं में रात-दिन का फ़र्क है। देवताओं का तो जन्म भी योगबल से होता है। इन बातों को कोई जानते नहीं। सब कहते हैं ईश्वर की गति मत न्यारी, ईश्वर का अन्त नहीं पा सकते। सिर्फ ईश्वर वा भगवान कहने से इतना लव नहीं आता है। सबसे अच्छा अक्षर है बाप। मनुष्य बेहद के बाप को नहीं जानते तो जैसे आरफन हैं।

मैगजीन में भी निकाला है, मनुष्य क्या कहते और भगवान क्या कहते हैं। बाप कोई गाली नहीं देते हैं, बच्चों को समझाते हैं क्योंकि बाप तो सबको जानते हैं ना। समझाने लिए कहते हैं - इनमें आसुरी गुण हैं, आपस में लड़ते रहते हैं। यहाँ तो लड़ने की दरकार नहीं है। वह हैं कौरव अर्थात् आसुरी सम्प्रदाय। यह हैं दैवी सम्प्रदाय। बाप समझाते हैं - मनुष्य, मनुष्य को मुक्ति वा जीवनमुक्ति के लिए राजयोग सिखलायें यह हो नहीं सकता। इस समय बाप ही तुम आत्माओं को सिखला रहे हैं। देह-अभिमान, देही-अभिमानी में फर्क देखो कितना है। देह-अभिमान से तुम गिरते आये हो। बाप एक ही बार आकर तुमको देही-अभिमानी बनाते हैं। ऐसे नहीं कि तुम सतयुग में देह से सम्बन्ध नहीं रखेंगे। वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता कि मैं आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। यह ज्ञान अभी ही तुमको मिलता है जो प्राय: लोप हो जाता है। तुम ही श्रीमत पर चल प्रालब्ध पाते हो। बाप आते ही हैं राजयोग सिखलाने। ऐसी पढ़ाई और कोई होती नहीं। डबल सिरताज राजायें सतयुग में होते हैं। फिर सिंगल ताज वालों की राजाई भी है, अभी वह राजाई नहीं रही है, प्रजा का प्रजा पर राज्य है। तुम बच्चे अभी राजाई के लिए पढ़ते हो, इसको गॉड फादरली युनिवर्सिटी कहा जाता है। तुम्हारा नाम भी लिखा हुआ है। वो लोग भल नाम रखते हैं गीता पाठशाला। पढ़ाते कौन हैं? श्रीकृष्ण भगवानुवाच कह देंगे। अब श्रीकृष्ण तो पढ़ा न सकें। श्रीकृष्ण तो खुद पाठशाला में पढ़ने जाते हैं। प्रिन्स-प्रिन्सेज कैसे स्कूल में जाते हैं, वहाँ की भाषा ही दूसरी है। ऐसे भी नहीं कि संस्कृत में गीता गाई है। यहाँ तो अनेक भाषायें हैं। जो जैसा राजा होता है वह अपनी भाषा चलाते हैं। संस्कृत भाषा कोई राजाओं की नहीं है। बाबा कोई संस्कृत नहीं सिखलाते हैं। बाप तो राजयोग सिखलाते हैं, सतयुग के लिए।

बाप कहते हैं काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो। प्रतिज्ञा कराते हैं, यहाँ जो भी आते हैं उनसे प्रतिज्ञा कराई जाती है। काम पर जीत पाने से तुम जगतजीत बनेंगे। यह है मुख्य विकार। यह हिंसा द्वापर से चली आती है, जिससे वाम मार्ग शुरू हुआ। देवतायें कैसे वाम मार्ग में जाते हैं, उनका भी मन्दिर है। वहाँ बहुत छी-छी चित्र बनाये हैं। बाकी वाम मार्ग में कब गये, उसकी तिथि-तारीख तो है नहीं। सिद्ध होता है काम चिता पर बैठने से काले बनते हैं परन्तु नाम-रूप तो बदल जाता है ना। काम चिता पर चढ़ने से आइरन एजड बन पड़ते हैं। अभी तो 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं ना, इसलिए शरीर भी ऐसे तमोप्रधान बनते हैं। जन्म से ही कोई कैसे, कोई कैसे हो पड़ते हैं। वहाँ तो एकदम सुन्दर शरीर होते हैं। अभी तमोप्रधान होने के कारण शरीर भी ऐसे हैं। मनुष्य ईश्वर प्रभू आदि भिन्न-भिन्न नामों से याद करते हैं परन्तु उन बिचारों को पता ही नहीं है। आत्मा अपने बाप को याद करती है - हे बाबा, आकर शान्ति दो। यहाँ तो कर्मेन्द्रियों से पार्ट बजा रहे हैं तो शान्ति कैसे मिलेगी। विश्व में शान्ति थी जबकि इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। परन्तु लाखों वर्ष कल्प की आयु कह दी है तो मनुष्य बिचारे कैसे समझेंगे। जब इनका (देवताओं का) राज्य था तो एक राज्य एक धर्म था और कोई खण्ड में ऐसे नहीं कहते कि एक धर्म एक राज्य हो। यहाँ आत्मा मांगती है एक राज्य हो। तुम्हारी आत्मा जानती है अब हम एक राज्य स्थापन कर रहे हैं। वहाँ सारे विश्व के मालिक हम रहेंगे। बाप हमको सब कुछ दे देते हैं। कोई भी हमसे राजाई छीन नहीं सकते। हम सारे विश्व के मालिक बन जाते हैं। विश्व में कोई सूक्ष्मवतन, मूलवतन नहीं आता है। यह सृष्टि का चक्र यहाँ ही फिरता रहता है। इसको बाप, जो रचयिता है वही जानते हैं। ऐसे नहीं कि रचना रचते हैं। बाप आते ही हैं संगम पर, पुरानी दुनिया से नई दुनिया बनाने। दूरदेश से बाबा आया हुआ है, तुम जानते हो नई दुनिया हमारे लिए बन रही है। बाबा हम आत्माओं का श्रृंगार कर रहे हैं। उनके साथ फिर शरीरों का भी श्रृंगार हो जायेगा। आत्मा पवित्र होने से फिर शरीर भी सतोप्रधान मिलेंगे। सतोप्रधान तत्वों से शरीर बनेंगे। इन्हों का सतोप्रधान शरीर है ना इसलिए नेचुरल ब्युटी रहती है। गाया भी जाता है रिलीजन इज़ माइट। अब माइट मिली कहाँ से? एक ही देवी-देवताओं का रिलीजन है जिससे माइट मिलती है। यह देवतायें ही सारे विश्व के मालिक बनते हैं और कोई विश्व के मालिक नहीं बनते हैं। तुमको कितनी माइट मिलती है। लिखा हुआ भी है आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा करते हैं। यह बातें दुनिया में कोई जानते थोड़ेही हैं। बाप कहते हैं मैं ब्राह्मण कुल स्थापन करता हूँ फिर उन्हों को सूर्यवंशी डिनायस्टी में ले आता हूँ। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं वह पास हो सूर्यवंशी में आते हैं। है सारी ज्ञान की बात। उन्होंने फिर स्थूल बाण हथियार आदि दिखाये हैं। बाण चलाना भी सीखते हैं। छोटे बच्चों को भी बन्दूक चलाना सिखाते हैं। तुम्हारा फिर है योग बाण। बाप कहते हैं मामेकम् याद करोगे तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। हिंसा की कोई बात नहीं है। तुम्हारी पढ़ाई भी है गुप्त। तुम हो स्प्रीचुअल, रूहानी सैलवेशन आर्मी। यह कोई को मालूम नहीं है कि रूहानी आर्मी कैसे होती है। तुम हो इनकागनीटो, स्प्रीचुअल रूहानी सैलवेशन आर्मी। सारी दुनिया को तुम सैलवेज करते हो। सबका बेडा डूबा हुआ है। बाकी सोने की लंका कोई है नहीं। ऐसे नहीं कि सोनी द्वारिका नीचे चली गई है, वह निकल आयेगी। नहीं, द्वारिका में भी इनका राज्य था परन्तु सतयुग में था। सतयुगी राजाओं की ड्रेस ही अलग होती है, त्रेता की अलग। भिन्न-भिन्न ड्रेस, भिन्न-भिन्न रसम रिवाज होती है। हर एक राजा की रसम-रिवाज अपनी-अपनी, सतयुग का तो नाम लेते ही दिल खुश हो जाती है। कहते ही हैं स्वर्ग, पैराडाइज़ परन्तु मनुष्य कुछ भी जानते नहीं। मुख्य तो है यह देलवाड़ा मन्दिर। हूबहू तुम्हारा यादगार है। मॉडल्स तो हमेशा छोटा बनाते हैं ना। यह बिल्कुल एक्यूरेट मॉडल्स हैं। शिवबाबा भी है, आदि देव भी है, ऊपर में वैकुण्ठ दिखाया है। शिवबाबा होगा तो जरूर रथ भी होगा। आदि देव बैठा है, यह भी किसको पता नहीं है। यह शिवबाबा का रथ है। महावीर ही राजाई प्राप्त करते हैं। आत्मा में ताकत कैसे आती है, यह भी तुम अभी समझते हो। घड़ी-घड़ी अपने को आत्मा समझो। हम आत्मा सतोप्रधान थी तो पवित्र थी। शान्तिधाम, सुखधाम में जरूर पवित्र ही रहेंगे। अब बुद्धि में आता है, कितनी सहज बात है। भारत सतयुग में पवित्र था। वहाँ अपवित्र आत्मा रह न सके। इतनी सब पतित आत्मायें ऊपर कैसे जायेंगी। जरूर पवित्र बनकर ही जायेंगी। आग लगती है फिर सभी आत्मायें चली जायेंगी। बाकी शरीर रह जाते हैं। यह सब निशानियाँ भी हैं। होलिका का अर्थ कोई समझते थोड़ेही हैं। सारी दुनिया इसमें स्वाहा होनी है। यह ज्ञान यज्ञ है। ज्ञान अक्षर निकाल बाकी रूद्र यज्ञ कह देते हैं। वास्तव में यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। यह ब्राह्मणों द्वारा ही रचा जाता है। सच्चे-सच्चे ब्राह्मण तुम हो। प्रजापिता ब्रह्मा की तो सब औलाद हैं ना। ब्रह्मा द्वारा ही मनुष्य सृष्टि रची जाती है। ब्रह्मा को ही ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर कहा जाता है, इनका सिजरा होता है ना। जैसे अलग-अलग बिरादरी का सिजरा रखते हैं। तुम्हारी बुद्धि में है कि मूलवतन में है आत्माओं का सिजरा, कायदेमुज़ीब। शिवबाबा फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर लक्ष्मी-नारायण आदि ये सब हैं मनुष्यों के सिज़रे। अच्छा!

मीठे-मीठेसिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूहानी सैलवेशन आर्मी बन स्वयं को और सर्व को सही रास्ता बताना है। सारी दुनिया को विषय सागर से सैलवेज़ करने के लिए बाप का पूरा-पूरा मददगार बनना है।

2) ज्ञान-योग से पवित्र बन आत्मा का श्रृंगार करना है, शरीरों का नहीं। आत्मा के पवित्र बनने से शरीर का श्रृंगार स्वत: हो जायेगा।

वरदान:-
किनारा करने के बजाए हर पल बाप का सहारा अनुभव करने वाले निश्चय बुद्धि विजयी भव

विजयी भव की वरदानी आत्मा हर पल स्वयं को सहारे के नीचे अनुभव करती है। उनके मन में संकल्पमात्र भी बेसहारे वा अकेलेपन का अनुभव नहीं होता। कभी उदासी या अल्पकाल के हद का वैराग्य नहीं आता। वे कभी किसी कार्य से, समस्या से, व्यक्ति से किनारा नहीं करते लेकिन हर कर्म करते हुए, सामना करते हुए, सहयोगी बनते हुए बेहद की वैराग्य वृत्ति में रहते हैं।

स्लोगन:-
एक बाप की कम्पन्नी में रहो और बाप को ही अपना कम्पैनियन बनाओ।

अव्यक्त इशारे - स्वयं और सर्व के प्रति मन्सा द्वारा योग की शक्तियों का प्रयोग करो

दिव्य-बुद्धि रूपी विमान द्वारा सबसे ऊंची चोटी की स्थिति में स्थित हो, अव्यक्त वतनवासी बन विश्व की सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना के सहयोग की लहर फैलाओ। योग के प्रयोग द्वारा दु:खी-अशान्त आत्माओं को शान्ति और शक्ति की सकाश दो।

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