16/04/2026
जब श्रीकृष्ण और उनके भ्राता बलराम मथुरा की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उनके साथ उनके परम भक्त अक्रूर भी थे। मार्ग में यमुना तट पर पहुँचकर अक्रूर जी के हृदय में स्नान करने की इच्छा जागृत हुई।
उन्होंने विनम्र भाव से श्रीकृष्ण से आज्ञा ली और यमुना के निर्मल जल में प्रवेश किया। जैसे ही वे जल में डूबे, उनके चित्त में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ—मानो बाह्य संसार लुप्त हो गया और एक दिव्य दृश्य प्रकट होने लगा।
अक्रूर जी ने देखा कि उसी यमुना जल के भीतर अनंत शेषनाग पर विराजमान साक्षात् भगवान विष्णु विराजित हैं, जिनके चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल रहा है। उनके समीप माता लक्ष्मी सेवा में लीन हैं, और देवगण स्तुति कर रहे हैं। यह दृश्य इतना अलौकिक था कि अक्रूर जी विस्मित और भाव-विभोर हो उठे।
वे तुरंत जल से बाहर आए और देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो रथ पर ही बैठे हैं। यह देखकर उनके मन में आश्चर्य और बढ़ गया। वे पुनः जल में उतरे—और वही दिव्य विष्णु रूप पुनः प्रकट हुआ।
अब अक्रूर जी समझ गए कि यह कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि स्वयं परम ब्रह्म, नारायण का अवतार हैं। वे जल से बाहर आकर श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े, उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे और वे स्तुति करने लगे—
“हे प्रभु! आप ही सृष्टि के कर्ता, पालक और संहारक हैं। आपने मुझे अपने साक्षात् स्वरूप का दर्शन देकर धन्य कर दिया।”
श्रीकृष्ण ने मधुर मुस्कान के साथ अपने भक्त को उठाया और करुणा भरी दृष्टि से उन्हें आशीर्वाद दिया।
इस प्रकार यह लीला दर्शाती है कि सच्चे भक्त को प्रभु स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं, और भक्ति ही वह मार्ग है जो परम सत्य तक पहुँचाता है।