bk surendra 1975

bk surendra 1975 सुरेन्द्र कुमार साह
ओम् शान्ति �
रोज की मुरली | राजयोग | सकारात्मक विचार
"परचिंतन छोड़, अपना कल्याण

 # # # 🌸 “ईश्वरीय सेवा में कभी थकना नहीं” — भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्याॐ शान्ति।“ईश्वरीय सेवा में कभी थकना नहीं” का ...
12/10/2026

# # # 🌸 “ईश्वरीय सेवा में कभी थकना नहीं” — भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

ॐ शान्ति।

“ईश्वरीय सेवा में कभी थकना नहीं” का भावार्थ है कि परमात्मा द्वारा दिए गए ज्ञान, शक्तियों और गुणों को स्वयं में धारण करते हुए दूसरों के जीवन में भी शान्ति, प्रेम, सुख और खुशी बाँटने का कार्य निरन्तर करते रहना। सेवा करते समय कभी हिम्मत नहीं हारनी, निराश नहीं होना और किसी परिस्थिति के कारण अपने शुभ संकल्पों को छोड़ना नहीं।

# # # 1\. ईश्वरीय सेवा का वास्तविक अर्थ क्या है?

ब्रह्माकुमारी दृष्टिकोण से ईश्वरीय सेवा केवल भाषण करना, मुरली सुनाना या किसी कार्यक्रम में भाग लेना ही नहीं है। ईश्वरीय सेवा के तीन मुख्य स्वरूप हैं:

* मन्सा सेवा: अपने श्रेष्ठ संकल्पों, शुभ भावनाओं और शुद्ध वाइब्रेशन द्वारा दूसरों को शान्ति एवं शक्ति देना।

* वाचा सेवा: अपने मधुर बोल, सत्य ज्ञान और प्रेरणादायक शब्दों से आत्माओं का मार्गदर्शन करना।

* कर्मणा सेवा: अपने श्रेष्ठ कर्मों, सहयोग, प्रेम, नम्रता और व्यवहार से दूसरों के सामने उदाहरण बनना।

इसलिए हम जहाँ भी हैं, घर में, कार्यस्थल पर या समाज में, अपने गुणों द्वारा ईश्वरीय सेवा कर सकते हैं।

# # # 2\. सेवा में थकान क्यों आती है?

कभी-कभी हम सेवा करते-करते सोचने लगते हैं कि मैंने इतना किया, फिर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी। मैंने दूसरों की मदद की, लेकिन मुझे सहयोग नहीं मिला। ऐसी सोच से मन निराश और थका हुआ अनुभव करने लगता है।

इसके पीछे कुछ कारण हो सकते हैं:

* सेवा के परिणाम की जल्दी अपेक्षा करना।

* दूसरों से प्रशंसा या सम्मान की आशा रखना।

* अपनी शक्ति से अधिक जिम्मेदारी उठा लेना।

* किसी के व्यवहार से दुखी होकर सेवा से पीछे हट जाना।

* अपने आत्मिक बल और परमात्मा की याद से दूर हो जाना।

सच्चा सेवाधारी वह है जो सेवा के साथ-साथ अपने मन की शान्ति, खुशी और संतुलन भी बनाए रखता है।

# # # 3\. सेवा में कभी थकें नहीं, इसके लिए क्या करें?

1\. परमात्मा की याद से शक्ति लें

प्रतिदिन अमृतवेले शान्त मन से परमात्मा शिव को याद करें। स्वयं को शान्त स्वरूप आत्मा अनुभव करें। जब मन परमात्मा की याद से शक्तिशाली होता है, तो कठिन परिस्थितियों का सामना करना आसान हो जाता है।

2\. सेवा को अपना सौभाग्य समझें

यह विचार रखें कि मुझे आत्माओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर मिला है। सेवा को बोझ नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कर्म और सौभाग्य समझकर करें।

3\. परिणाम की चिंता छोड़ें

हमारा कर्तव्य शुभ भावना और सही मार्ग दिखाना है। हर व्यक्ति अपनी समझ और समय के अनुसार परिवर्तन करता है। इसलिए किसी के तुरंत न बदलने पर निराश न हों।

4\. स्वयं को भी रिचार्ज करें

सेवा के साथ पर्याप्त विश्राम, नियमित दिनचर्या और आत्मचिन्तन भी जरूरी हैं। शरीर की थकान होने पर आराम करें और मन को फिर से सकारात्मक संकल्पों से भरें। लगातार काम करते रहना ही सच्ची सेवा नहीं है।

# # # 4\. एक सुंदर उदाहरण

मान लीजिए, एक सेवाधारी प्रतिदिन लोगों को ईश्वरीय ज्ञान सुनाता है। कुछ लोग उसकी बात ध्यान से सुनते हैं, कुछ अनसुना कर देते हैं और कुछ उसकी आलोचना भी करते हैं।

यदि वह दूसरों की प्रतिक्रिया देखकर निराश हो जाए, तो उसकी सेवा प्रभावित होगी। लेकिन यदि वह यह समझे कि मेरा कार्य प्रेमपूर्वक ज्ञान देना, स्वयं श्रेष्ठ बनना और दूसरों के प्रति शुभ भावना रखना है, तो वह अपनी खुशी बनाए रख सकेगा।

जैसे सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देता है, वैसे ही सेवाधारी को भी अपनी शुभ भावना बनाए रखनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी सीमाओं की उपेक्षा करे, बल्कि यह कि वह परिस्थितियों के कारण अपनी आन्तरिक शान्ति और सद्भावना न खोए।

# # # 5\. आत्मचिन्तन के लिए श्रेष्ठ संकल्प

आँखें बन्द करके कुछ क्षण स्वयं से कहें:

“मैं एक शक्तिशाली, शान्त स्वरूप आत्मा हूँ। परमात्मा मेरा सर्वोच्च सहारा है। सेवा करना मेरा सौभाग्य है। मैं किसी की प्रतिक्रिया से निराश नहीं होऊँगा। मैं अपनी वाणी, संकल्प और कर्म से सबको सुख देने का प्रयास करूँगा। मैं अपनी शक्तियों को पहचानकर संतुलित रूप से सेवा करूँगा। मेरी सेवा में सच्चाई, नम्रता, प्रेम और निरन्तरता रहेगी।”

# # # 🌺 सारांश

ईश्वरीय सेवा में कभी थकना नहीं का वास्तविक संदेश है—सेवा करते हुए अपनी खुशी, शान्ति, हिम्मत और श्रेष्ठ संकल्पों को बनाए रखना। प्रशंसा मिले या न मिले, सहयोग मिले या न मिले, हम अपनी शुभ भावना नहीं छोड़ें। परमात्मा की याद से शक्ति लेकर स्वयं भी सम्पन्न बनें और दूसरों को भी अपने गुणों से सम्पन्न बनाने का प्रयास करें।

आज का श्रेष्ठ संकल्प: “मैं स्वयं भी शान्ति और शक्ति का अनुभव करूँगा तथा अपने सम्पर्क में आने वाली प्रत्येक आत्मा को अपने श्रेष्ठ संकल्पों और व्यवहार से सुख देने का प्रयास करूँगा।”

ॐ शान्ति। 🌷

 # # # ओम् शान्ति 🙏 # # # 10 अक्टूबर 2026 की प्रातः मुरली का भाव आज की मुरली में बापदादा हमें एक बहुत ही गहरी और सुंदर श...
10/10/2026

# # # ओम् शान्ति 🙏

# # # 10 अक्टूबर 2026 की प्रातः मुरली का भाव

आज की मुरली में बापदादा हमें एक बहुत ही गहरी और सुंदर शिक्षा दे रहे हैं कि सच्चा परोपकारी वह नहीं है जो केवल अपने प्रियजनों के लिए अच्छा करे, बल्कि वह है जो अपने प्रति बुरा व्यवहार करने वाले के प्रति भी शुभ भावना रखे। जो दूसरों की कमियों को देखकर स्वयं भी कमज़ोर नहीं बनता, बल्कि अपने गुणों और शक्तियों से उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास करता है, वही सच्चा सेवाधारी है।

# # # 1\. परोपकार की भावना का वास्तविक अर्थ

परोपकार का अर्थ है — अपने मन, वाणी और कर्म से दूसरों का कल्याण करना। किसी को सुख देना, किसी निराश व्यक्ति में आशा जगाना, किसी क्रोधित व्यक्ति को शान्ति देना और किसी कमज़ोर आत्मा को हिम्मत देना भी परोपकार है।

परोपकार केवल धन दान करने या किसी की बाहरी सहायता करने तक सीमित नहीं है। इसके कई रूप हैं:

* मन से परोपकार: हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और श्रेष्ठ संकल्प रखना।

* वाणी से परोपकार: ऐसे मीठे और ज्ञानयुक्त बोल बोलना, जिससे किसी को हिम्मत और शान्ति मिले।

* कर्म से परोपकार: अपनी शक्ति, समय और गुणों से दूसरों की सहायता करना।

* दृष्टि से परोपकार: किसी की कमियों को देखने के बजाय उसके भीतर छिपे गुणों को पहचानना।

जब हमारे कारण किसी के मन को शान्ति मिलती है, किसी को सही दिशा मिलती है और किसी के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है, तब हम परोपकार की सच्ची भावना को जीवन में धारण करते हैं।

# # # 2\. ब्रह्मा बाबा ने स्वयं को सेवाधारी क्यों बनाया?

मुरली में बापदादा का उदाहरण दिया गया है कि ब्रह्मा बाबा ने बच्चों को मालिक बनाया और स्वयं को सेवाधारी समझा।

सामान्यतः जब किसी व्यक्ति को पद, सम्मान, अधिकार या सफलता मिलती है, तो उसके मन में यह भावना आ सकती है कि लोग उसकी प्रशंसा करें, उसका नाम हो और सभी उसके अनुसार चलें। लेकिन ब्रह्मा बाबा का जीवन हमें सिखाता है कि महानता दूसरों पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि दूसरों को आगे बढ़ाने में है।

सच्चा सेवाधारी सोचता है:

* मुझे कितना सम्मान मिला, यह मुख्य बात नहीं; मैंने कितनों को सम्मान दिया?

* मेरा नाम कितना हुआ, यह मुख्य बात नहीं; मैंने कितनों को योग्य बनाया?

* कितने लोग मेरी प्रशंसा करते हैं, यह मुख्य बात नहीं; मेरे कारण कितनों के जीवन में शान्ति आई?

जहाँ अहंकार कहता है, “सब मेरा सम्मान करें”, वहीं परोपकार की भावना कहती है, “मैं सबको सम्मान देना सीखूँ।”

जब हम दूसरों की सफलता में अपनी सफलता अनुभव करते हैं, तब हमारे भीतर ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और अहंकार कम होने लगते हैं।

# # # 3\. मालिकपन का त्याग करके सेवाधारी बनना

मालिकपन का अर्थ केवल किसी वस्तु या पद का स्वामी होना नहीं है। आध्यात्मिक जीवन में मालिकपन की भावना तब दिखाई देती है, जब हम सोचते हैं कि सब कुछ मेरी इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, परिवार में कोई हमारी बात न माने, कार्यस्थल पर कोई हमारे विचार से सहमत न हो या सेवा में कोई दूसरा व्यक्ति आगे बढ़ जाए, तो मन में असन्तोष पैदा हो सकता है।

लेकिन सेवाधारी आत्मा अपने आपसे पूछती है:

“क्या मैं सबको अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहता हूँ, या सबके कल्याण के लिए सहयोग देना चाहता हूँ?”

इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी जिम्मेदारियाँ छोड़ दें या गलत बात को स्वीकार कर लें। इसका अर्थ है कि हम अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अहंकार, क्रोध और अधिकार जताने की भावना से मुक्त रहें।

सच्ची सेवा में अधिकार से अधिक जिम्मेदारी, अपेक्षा से अधिक सहयोग और अहंकार से अधिक नम्रता होती है।

# # # 4\. अपकारी पर भी उपकार करना क्या है?

यह आज के अव्यक्त इशारे का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है।

अपकारी वह व्यक्ति है जो हमारे साथ अनुचित व्यवहार करे, हमारी सहायता का गलत लाभ उठाए या हमें दुख पहुँचाए। ऐसे व्यक्ति के प्रति शुभ भावना रखना आसान नहीं होता। सामान्यतः मन में उसके प्रति नाराज़गी पैदा होती है और हम भी वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं।

लेकिन आध्यात्मिक पुरुषार्थ हमें एक नई दिशा देता है।

यदि कोई क्रोध करता है और हम भी क्रोध करने लगें, तो दोनों की अशान्ति बढ़ती है। लेकिन यदि हम अपनी आत्मिक स्थिति में स्थिर रहकर शान्ति और समझदारी से उत्तर दें, तो परिस्थिति को बेहतर बनाने की सम्भावना बढ़ जाती है।

अपकारी पर उपकार करने का अर्थ है:

* उसके गलत व्यवहार को अपने भीतर घृणा बनने न देना।

* उसके प्रति भी शुभ भावना रखना।

* सम्भव हो तो उसे प्रेमपूर्वक सही मार्ग समझाना।

* उसकी गलती से सीखना और स्वयं वैसी गलती न करना।

* अपनी शान्ति और आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए उचित निर्णय लेना।

याद रखें, किसी के प्रति शुभ भावना रखना और उसके अनुचित व्यवहार को सहते रहना दो अलग बातें हैं। परोपकार का अर्थ अन्याय को बढ़ावा देना नहीं है। आवश्यकता होने पर स्पष्ट सीमा बनाना और उचित सहायता लेना भी समझदारी है।

# # # 5\. दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना

मुरली में कहा गया है कि बच्चों की विस्मृति के कारण होने वाले दुःख को ब्रह्मा बाबा ने अपना दुःख समझा।

इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि सच्चा शुभचिंतक दूसरों की कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील होता है। वह यह सोचकर अलग नहीं हो जाता कि यह मेरी समस्या नहीं है।

यदि कोई ज्ञान की बात भूलकर अशान्त हो जाता है, कोई अपनी कमज़ोरी के कारण निराश होता है या कोई सही मार्ग जानते हुए भी पुरुषार्थ नहीं कर पाता, तो शुभचिंतक आत्मा उसकी निन्दा करने के बजाय उसे शक्ति देने का प्रयास करती है।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति बार-बार क्रोध करता है। हम उसे केवल क्रोधी कहकर छोड़ सकते हैं, लेकिन परोपकारी दृष्टि यह भी समझने का प्रयास करेगी कि उसे धैर्य, समझ और आत्मनियन्त्रण का अभ्यास चाहिए।

इसका अर्थ उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना नहीं, बल्कि उसे अपनी जिम्मेदारी निभाने में सहायता देना है।

# # # 6\. फॉलो फादर — बाप समान बनने का अभ्यास

आज की मुरली हमें प्रेरणा देती है कि जैसे बाप ने बच्चों को नाम, मान और शान दिया, वैसे ही हम भी दूसरों को आगे बढ़ाने वाले बनें।

इसके लिए प्रतिदिन तीन अभ्यास कर सकते हैं:

पहला अभ्यास — गुणों को देखना। किसी की एक कमी देखने से पहले उसके एक अच्छे गुण को पहचानें।

दूसरा अभ्यास — श्रेय देना। यदि किसी ने अच्छा कार्य किया है, तो उसकी प्रशंसा करें और उसे आगे बढ़ने का अवसर दें।

तीसरा अभ्यास — निःस्वार्थ सहयोग। किसी की सहायता करके बदले में प्रशंसा, धन्यवाद या सम्मान मिलने की अपेक्षा न रखें।

जब हम दूसरों को आगे बढ़ाते हैं, तो हमारा अपना व्यक्तित्व भी विशाल और शक्तिशाली बनता है। यही बाप समान बनने की दिशा में व्यावहारिक कदम है।

# # # 7\. मन, वाणी और कर्म में परोपकार

मन से परोपकारी बनें

किसी के प्रति बदले की भावना रखने के बजाय यह संकल्प करें — “यह आत्मा भी शान्ति और सुख का अनुभव करे। मैं अपनी शुभ भावना बनाए रखूँगा।”

वाणी से परोपकारी बनें

कठोर शब्दों के स्थान पर स्पष्ट, मधुर और सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें। सत्य बोलें, लेकिन किसी को अपमानित करने के उद्देश्य से नहीं।

कर्म से परोपकारी बनें

जहाँ सहायता की आवश्यकता हो, वहाँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग दें। किसी की कठिनाई कम करना, उसे सही दिशा दिखाना और जिम्मेदारी निभाने में सहायता देना भी सेवा है।

# # # 8\. परोपकार से विश्व कल्याण कैसे होगा?

विश्व कल्याण केवल बड़े कार्यक्रमों या बड़े भाषणों से नहीं होगा। इसकी शुरुआत एक-एक आत्मा के विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण में परिवर्तन से होती है।

यदि परिवार का एक सदस्य शान्त और सहनशील बनता है, तो घर का वातावरण बदल सकता है। यदि शिक्षक प्रेम और धैर्य से पढ़ाता है, तो विद्यार्थी का आत्मविश्वास बढ़ सकता है। यदि सेवा करने वाला व्यक्ति अहंकार छोड़कर सबको सम्मान देता है, तो संगठन में सहयोग बढ़ सकता है।

इसी प्रकार एक आत्मा का श्रेष्ठ परिवर्तन अनेक आत्माओं को प्रेरित कर सकता है।

इसलिए परोपकार की भावना से सम्पन्न आत्मा केवल अपने सुख के बारे में नहीं सोचती, बल्कि यह भी सोचती है कि मेरे सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को शान्ति, शक्ति और खुशी कैसे मिले।

# # # 9\. आज की मुरली से स्व-परिवर्तन के लिए अभ्यास

आज रात सोने से पहले स्वयं से ये प्रश्न पूछें:

* क्या आज मेरे मन, वाणी या कर्म से किसी को दुःख पहुँचा?

* क्या मैंने किसी की कमी देखकर आलोचना की, या उसे सुधारने में सहयोग दिया?

* क्या मैंने किसी की सफलता देखकर खुशी अनुभव की?

* क्या मैंने बिना किसी अपेक्षा के किसी की सहायता की?

* क्या मैंने कठिन परिस्थिति में भी अपनी शान्ति और आत्मसम्मान बनाए रखा?

यदि कोई कमी दिखाई दे, तो स्वयं को दोष देने के बजाय अगले दिन उसे सुधारने का संकल्प करें। यही सच्चा पुरुषार्थ है।

# # # 10\. आत्मिक संकल्प

🌺 मेरा आज का श्रेष्ठ संकल्प 🌺

मैं एक शान्त, प्रेमपूर्ण और शुभचिंतक आत्मा हूँ।

मैं किसी की कमी देखकर स्वयं में नफरत या अहंकार नहीं बढ़ाऊँगा।

मैं मन से शुभ भावना, वाणी से मधुरता और कर्म से सहयोग दूँगा।

मैं अपकारी के प्रति भी शुभ भावना रखूँगा, लेकिन विवेक और आत्मसम्मान के साथ व्यवहार करूँगा।

मैं ब्रह्मा बाबा के समान दूसरों को आगे बढ़ाने वाला सेवाधारी बनूँगा।

मेरा सुख दूसरों को सुख देने में है, और मेरी महानता दूसरों को महान बनाने में है।

# # # आज की मुरली का निष्कर्ष

परोपकार कोई एक दिन किया जाने वाला कार्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला है। जब हम अपने मान-सम्मान की अपेक्षा छोड़कर दूसरों के कल्याण को महत्त्व देते हैं, तब हमारे भीतर नम्रता, सहनशीलता, प्रेम और आत्मिक शक्ति विकसित होती है।

ब्रह्मा बाबा के जीवन से यही प्रेरणा मिलती है कि स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के बजाय दूसरों को योग्य बनाएँ, स्वयं नाम कमाने के बजाय दूसरों को सम्मान दें और अपकार का उत्तर अपकार से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण शुभ भावना से दें।

यही फॉलो फादर है, यही सच्ची ईश्वरीय सेवा है और यही विश्व कल्याण की भावना है।

ओम् शान्ति। 🙏

हिंदी (Hindi)Daily Murli07-10-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन“मीठे बच्चे - देरी से आते हुए तेज़ पुरुषार्थ करो...
07/10/2026

हिंदी (Hindi)
Daily Murli
07-10-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन

“मीठे बच्चे - देरी से आते हुए तेज़ पुरुषार्थ करो तो बहुत आगे जा सकते हो, दूसरों की चिंता छोड़ अपने पुरुषार्थ में लग जाओ''

प्रश्नः-कौन सा कर्तव्य एक बाप का है जो कोई मनुष्य का नहीं हो सकता?

उत्तर:-मनुष्य को देवता बनाना, उसे शान्तिधाम, सुखधाम का मालिक बना देना, यह कर्तव्य एक बाप का ही है जो कोई मनुष्य नहीं कर सकता। तुम्हें निश्चय है संगम पर ही हम भगवानुवाच सुनते हैं। अभी स्वयं भगवान कल्प पहले मुआफिक राजयोग सिखला रहे हैं।

ओम् शान्ति। रूहानी बेहद का बाप बेहद के रूहानी बच्चों प्रति समझाते हैं। यह एक-एक अक्षर वा ज्ञान रत्न लाखों रूपयों का है। बाप ने समझाया है - परमात्मा को रूप-बसन्त भी कहते हैं। उनका रूप भी है, नाम शिवबाबा है। वह ज्ञान का सागर है, जिस ज्ञान से सद्गति होती है। ज्ञान धन भी है, ज्ञान पढ़ाई भी है। यह ज्ञान देते हैं - स्प्रीचुअल फादर। आत्मा को कहा जाता है - स्प्रीचुअल रूह। भक्ति मार्ग में आत्मायें कितना भटकती हैं, बाप से मिलने के लिए। उनको ढूँढती हैं। समझते भी हैं भगवान एक शिव है फिर भी धक्के खाते रहते हैं। बाप आकर समझाते हैं कि रूहानी बच्चों, तुम तो अविनाशी हो, परमधाम में रहने वाले हो, जहाँ से फिर आते हो यहाँ पार्ट बजाने। तुम दूरदेश के रहने वाले हो। यह ड्रामा है, इसका नाम है हार-जीत का खेल। सुख-दु:ख का खेल। बाप समझाते हैं कि हम और तुम सब शान्तिधाम के रहने वाले हैं। उसको निर्वाणधाम भी कहते हैं। पहले तो यह निश्चय करना है कि हम वहाँ के रहने वाले हैं। हम आत्मा का स्वधर्म है शान्त। आत्मा बिन्दी में सारा अविनाशी पार्ट भरा हुआ है। बाप पढ़ाते भी तुमको हैं, तुम दुनिया वाले मनुष्यों की चिंता करते हो। तुमको निश्चय है ना कि भगवानुवाच होता ही संगम पर है, फिर कब होता नहीं। कोई भी मनुष्य को देवता नहीं बना सकता। शान्तिधाम, सुखधाम का मालिक नहीं बना सकता। कल्प पहले भी बाप ने बनाया था। अब जो प्रेजीडेन्ट बना है 5 हजार वर्ष के बाद वही बनेगा। सारी दुनिया की जो सीन सीनरियाँ हैं, 5 हजार वर्ष के बाद रिपीट होंगी। बुढ़ियाँ इतना सब धारण नहीं कर सकती हैं तो उन्हों को कहा जाता है सिर्फ 3 बातें याद करो - हम आत्मा शान्तिधाम की रहने वाली हैं, फिर सुख-धाम में आते हैं फिर आधाकल्प के बाद जब रावणराज्य शुरू होता है तो विकारी बन जाते हैं, इसको कहा जाता है दु:खधाम। जब दु:खधाम पूरा होता है तब बाप कहते हैं मुझे याद करो। मुझे आना पड़ता है तुमको शान्तिधाम, सुखधाम में ले जाने के लिए।

अब जो आकर बाप के बने हैं, वही वर्सा पायेंगे। यह सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन हो रही है। करोड़ों मनुष्य आकर कुछ न कुछ बाप से सुनेंगे, समझेंगे। वृद्धि होती जायेगी। सब तरफ तुमको जाकर समझाना होगा। अखबार द्वारा भी बहुत सुनेंगे, पाकिस्तान में भी अखबार द्वारा पढ़ेंगे। वहाँ बैठे भी यह ज्ञान सुनेंगे। गीता का प्रचार सारी दुनिया में बहुत है। बाप कहते हैं - मामेकम् याद करो और वर्से को याद करो। यह लिखत अखबार में पढ़ेंगे इसलिए भी बहुत ब्राह्मण बनेंगे, जिन्हों को वर्सा लेना होगा तो वह जरूर आकर लेंगे। अभी टाइम थोड़ा पड़ा है, वृद्धि होती रहेगी। देरी से आयेंगे तो फिर तीखा पुरुषार्थ करना पड़ेगा। कल्प पहले जितने स्वर्गवासी बने थे, उतने अब भी बनेंगे जरूर। इसमें जरा भी फर्क नहीं पड़ सकता है। शान्तिधाम वाले शान्तिधाम में जायेंगे। फिर अपने-अपने समय पर पार्ट बजाने आयेंगे। अब बाप कहते हैं बच्चे मुझे याद करो तो तुम घर पहुँच जायेंगे। संन्यासी मुक्ति के लिए माथा मारते हैं, इसलिए सबको कहते हैं मुक्ति ही ठीक है। सुख तो काग विष्टा के समान है। शास्त्रों में लिख दिया है कि सतयुग में भी दु:ख की बातें थी, समझते कुछ भी नहीं। कहते हैं परमात्मा को आना है। पतित-पावन परमात्मा आओ, आकर हमको रास्ता बताओ। दूसरे तरफ कहते गंगा पतित-पावनी है। गंगा स्नान, यज्ञ-तप, यात्रा करना यह सब भगवान से मिलने के रास्ते हैं। जबकि बुलाते हो परमात्मा को, फिर धक्के क्यों खाते हो! यह सब भक्ति मार्ग की नूँध है। मनुष्यों को जो आता सो बोलते रहते हैं। कितनी मेहनत करते हैं परमात्मा से मिलने के लिए। अब भगवान से मिलने भगत जायेंगे या भगवान को यहाँ आना पड़ेगा? पतित आत्मा तो जा न सके। बाप आते हैं ले जाने के लिए। सभी आत्माओं का पण्डा एक ही है। तुम भी पवित्र बन उनके पीछे चले जायेंगे। साज़न तुमको ज्ञान रत्नों से श्रृंगारते हैं - महारानी-महाराजा बनाने। बाकी श्रीकृष्ण के लिए दिखाते हैं - फलानी को भगाया, पटरानी बनाया। यह बातें लगती नहीं हैं। तुम बच्चे जानते हो हम स्वर्ग की महारानी बनेंगे। तुम ही स्वर्गवासी थे। अब बाप फिर बनाने आया है। 84 जन्मों की बात है। 84 लाख जन्म कोई याद कर न सके। सतयुग को लाखों वर्ष दे दिये हैं, त्रेता को कम दिये हैं। यह तो हिसाब ही नहीं बनता। बाप कितना सहज कर बताते हैं कि सिर्फ दो बातें याद करनी है - अल्फ और बे। तो तुम पवित्र भी बनेंगे, उड़ भी सकेंगे और ऊंच पद भी पायेंगे। तो यह ओना रखना चाहिए कि कैसे भी करके बाप को याद करना है। माया के तूफान भी आयेंगे, परन्तु हार नहीं खाना। भल कोई क्रोध भी करे परन्तु तुम नहीं बोलो। संन्यासी भी कहते हैं - मुख में ताबीज़ (मुहलरा) डाल दो, तो वह बोल-बोल कर चुप हो जायेगा। बाप भी कहते हैं - कोई क्रोध से बोले तो तुम शान्त होकर देखते रहो। कोई भी हालत में तुम्हें शिवबाबा को याद करना है। बाबा की याद से ही वर्सा भी याद आयेगा। तुम्हारे अतीन्द्रिय सुख का गायन है कि हम 21 जन्म के लिए स्वर्ग के परीज़ादे बनेंगे। वहाँ दु:ख का नाम भी नहीं होगा। तुम 50-60 जन्म सुख भोगते हो, सुख का हिसाब जास्ती है। सुख-दु:ख इक्वल हो तो फायदा ही क्या! तुम्हारे पास धन भी बहुत होता है। कुछ समय पहले यहाँ भी बहुत सस्ता अनाज था। राजाओं की बड़ी राजाई थी। बाबा ने 10 आने मण बाजरी बेची है। तो उनसे भी आगे कितनी सस्ताई होगी। मनुष्य थोड़े होंगे, अन्न की परवाह नहीं होगी। अब यह तो याद रहना चाहिए कि पहले हम घर जाकर फिर नई दुनिया में आकर नया पार्ट बजायेंगे। वहाँ हमारा शरीर भी सतोप्रधान तत्वों से बनेगा। अब 5 तत्व बिल्कुल ही तमोप्रधान पतित बन गये हैं। आत्मा और शरीर दोनों ही पतित हैं। वहाँ शरीर रोगी नहीं होता। यह सब समझने की बातें हैं। बच्चों को यहाँ अच्छी रीति समझाते हैं - फिर घर में जाकर भूल जाते हैं। यहाँ बादल भरकर कितना खुश होते हैं, बाहर जाने से भूल जाते हैं। आगे रास-विलास बहुत चलता था। फिर वह सब बन्द कर दिया। मनुष्य समझते थे - जादू है। भक्ति में जब नौधा भक्ति करते हैं तब मुश्किल साक्षात्कार होता है। यहाँ भक्ति की तो बात ही नहीं, बैठे-बैठे साक्षात्कार में चले जाते थे, इसलिए जादू समझते थे।

आजकल दुनिया में कितने भगवान बन गये हैं। नाम रखते हैं सीताराम, राधेकृष्ण आदि। कहाँ वह स्वर्ग के मालिक, कहाँ यह नर्कवासी। इस समय सब नर्कवासी हैं। सीढ़ी में साफ दिखाया है। सीढ़ी बच्चों ने अपने विचार सागर मंथन से बनाई है। बाबा देख खुश हुआ। सीढ़ी में सब बातें आ जाती हैं। द्वापर से विकारी राजायें कैसे भक्ति करते-करते नीचे आये हैं। अभी तो कोई ताज नहीं है। चित्र पर समझाना सहज होता है। 84 जन्मों में कैसे उतरती कला होती है, फिर चढ़ती कला कैसे होती है। गाते भी हैं चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। बाप आकर सबको सुख देते हैं। सब पुकारते हैं कि हे बाबा हमारा दु:ख हरो, सुख दो। परन्तु कैसे दु:ख हरते हैं, सुख कैसे मिलता है, यह किसको मालूम नहीं।

आजकल मनुष्य गीता कण्ठ कर सुनाते हैं, नटशेल में अर्थ समझा देते हैं। संस्कृत में श्लोक कण्ठ करके सुनाते हैं तो कह देते यह महात्मा अच्छा है। लाखों मनुष्य जाकर पांव पड़ते हैं। उस पढ़ाई में (लौकिक पढ़ाई में) तो 15-20 वर्ष लग जाते हैं। उन्हों में कोई बुद्धिवान होते हैं तो झट श्लोक आदि कण्ठ कर सुनाने लगते हैं, तो उनके पास ढेर पैसे इकट्ठे हो जाते हैं। यह सब कमाई के रास्ते हैं। जब कोई देवाला मारता है तो भी जाकर संन्यास धारण करता है, तो सब चिंतायें दूर हो जाती हैं फिर कुछ न कुछ मन्त्र-जन्त्र याद कर लेते हैं, चक्र लगाते रहते हैं। ट्रेन में भी चक्र लगाते रहते हैं। यहाँ तो बाप कहते हैं कि अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। बाप और आत्मायें सब निराकारी दुनिया में रहती हैं। वहाँ से साकारी दुनिया में आते हैं पार्ट बजाने। अब नाटक पूरा होना है। तुम तमोप्रधान होने के कारण वापिस जा नहीं सकते। अब बाबा आया है - तुमको सतोप्रधान बनाने। सभी अपने घर जायेंगे। बाकी स्वर्ग में सिर्फ देवी-देवताओं का राज्य होगा। शान्तिधाम, सुखधाम, दु:खधाम... कब-कब था - यह भी किसकी बुद्धि में नहीं आयेगा क्योंकि घोर अन्धियारे में हैं। समझते हैं कलियुग का अन्त अजुन इतने हजार वर्षों के बाद होगा। कोई हिसाब ही नहीं है। मनुष्य बढ़ते जाते हैं, अन्न मिलता नहीं। 40 हजार वर्ष अभी और हों तो पता नहीं क्या हो जाए। जो बोलते हैं वह बिल्कुल ही झूठ। सच की रत्ती भी नहीं। अब बाप सिखलाते हैं रावण पर कैसे विजय पानी है। रावण पर जीत तुम ही पाते हो। सारी दुनिया को रावण से छुड़ा देते हैं। तुम्हारी शक्ति सेना है, तुम भारत को स्वर्ग बना रहे हो। कितनी अच्छी-अच्छी बातें समझाते हैं। फिर तुमको बाप और वर्से को याद कर कितना खुश रहना चाहिए। ज्ञान मार्ग में खुशी बहुत होती है। अभी बाबा आया हुआ है, अभी हम इस पुरानी दुनिया से गये कि गये। बाबा को याद करने से सतोप्रधान बनेंगे। नहीं तो सजायें खानी पड़ेगी, फिर करके रोटी टुकड़ा मिलेगा, इससे क्या फायदा। जितना हो सके अपना पुरुषार्थ करना है। श्रीमत पर चलना है। कदम-कदम पर बाबा से राय लेनी है। कोई कहते हैं बाबा धन्धे में झूठ बोलना पड़ता है। बाप कहते हैं - धन्धे में तो झूठ होता ही है, तुम बाबा को याद करते रहो। ऐसे नहीं विकार में जाकर फिर कहो मैं बाबा की याद में था। नहीं, विकार में गये तो मरे। यह तो बाप के साथ प्रतिज्ञा की है ना। पवित्रता के लिए ही राखी बांधी जाती है। क्रोध के लिए कब राखी नहीं बांधी जाती। राखी बंधन का मतलब ही है कि विकार में नहीं जाना है। मनुष्य कहते हैं पतित-पावन आओ।

तुम बच्चों के अन्दर में खुशी बहुत होनी चाहिए। बाबा हमको पढ़ा रहे हैं, फिर बाबा साथ ले जायेंगे। वहाँ से स्वर्ग में चले जायेंगे। जितना हो सके सवेरे उठकर बाबा को याद करना है। याद करना गोया कमाई करना, इसमें आशीर्वाद क्या करेंगे। ऐसे थोड़ेही कहना है - आप आशीर्वाद करो तो हम याद करें। सब पर आशीर्वाद करें तो सब स्वर्ग में चले जायें। यहाँ तो मेहनत करनी है। जितना हो सके बाबा को याद करना है। बाबा माना वर्सा। जितना याद करेंगे उतना राजाई मिलेगी, याद से बहुत फायदा है। सस्ता सौदा है। ऐसा कोई सस्ता सौदा दे न सके। यह भी कोई विरला ही लेते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जब कोई क्रोध करता है तो बहुत-बहुत शान्त रहना है। क्रोधी के साथ क्रोधी नहीं बन जाना है। माया के किसी भी तूफान से हारना नहीं है।

2) सवेरे-सवेरे बाप को याद करना है, अपनी कमाई जमा करनी है। पवित्रता की पक्की राखी बांधनी है।

वरदान:-अपने अव्यक्त शान्त स्वरूप द्वारा वातावरण को अव्यक्त बनाने वाले साक्षात मूर्त भव

जैसे सेवाओं के और प्रोग्राम बनाते हो ऐसे सवेरे से रात तक याद की यात्रा में कैसे और कब रहेंगे यह भी प्रोग्राम बनाओ और बीच-बीच में दो तीन मिनट के लिए संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप कर लो, जब कोई व्यक्त भाव में ज्यादा दिखाई दे तो उनको बिना कहे अपना अव्यक्ति शान्त रूप ऐसा धारण करो जो वह भी इशारे से समझ जाये, इससे वातावरण अव्यक्त रहेगा। अनोखापन दिखाई देगा और आप साक्षात्कार कराने वाले साक्षात मूर्त बन जायेंगे।

स्लोगन:-सम्पूर्ण सत्यता ही पवित्रता का आधार है।

ये अव्यक्त इशारे - परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

अगर कोई आपके सहयोगी भाई व बहन, परिवार की आत्मायें, बेसमझी वा बालहठ से अल्पकाल की वस्तु को सदाकाल की प्राप्ति समझ, अल्पकाल का मान-शान-नाम वा अल्पकाल की प्राप्ति की इच्छा रखती हैं तो दूसरे को मान देकर के स्वयं निर्मान बनना यही परोपकार है। यह देना ही सदा के लिए लेना है।

हिंदी (Hindi)Daily Murli06-10-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन“मीठे बच्चे - अब सीखने के साथ-साथ टीचर बन सिखाना...
06/10/2026

हिंदी (Hindi)
Daily Murli
06-10-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन

“मीठे बच्चे - अब सीखने के साथ-साथ टीचर बन सिखाना भी है, यह पढ़ाई इस अन्तिम जन्म के लिए ही है, इसलिए अच्छी रीति पढ़ो और पढ़ाओ''

प्रश्नः-सतयुगी राजधानी किस आधार पर स्थापन होती है?

उत्तर:-संगम की पढ़ाई के आधार पर। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं अथवा जिन पर ब्रह्स्पति की दशा है वह सूर्यवंशी में आते हैं। जो पढ़ते नहीं, सर्विस नहीं करते उन पर बुध की दशा बैठती, वह जैसे बुद्धू हैं। वह प्रजा में आ जाते हैं। ऊंच प्रजा, नौकर चाकर आदि सब इस समय की पढ़ाई के आधार पर ही बनते हैं।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों प्रति अथवा आत्माओं प्रति रूहानी बाप अर्थात् परमात्मा बैठ समझा रहे हैं। रूहानी बाप को परमात्मा कहा जाता है। सभी आत्माओं का बाप एक परमपिता परमात्मा है। वह बैठ ब्रह्मा तन द्वारा समझाते हैं। भक्तिमार्ग में मनुष्य कहते हैं त्रिमूर्ति ब्रह्मा। अभी तुम ब्राह्मण ऐसे नहीं कहेंगे। तुम तो कहते हो त्रिमूर्ति शिव अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का रचयिता शिव। त्रिमूर्ति ब्रह्मा का कोई अर्थ नहीं निकलता है। इन तीनों देवताओं का रचयिता है ही शिव, इसलिए त्रिमूर्ति शिव कहा जाता है। एक रचयिता, बाकी सब हैं रचना। बेहद का बाप एक ही है। लौकिक बाप तो हर एक का अपना-अपना है। इस समय तो सब शिवबाबा के बच्चे बने हैं। बच्चों को मालूम है, हम आत्मायें 84 का चक्र लगाती हैं। तो 84 बाप बनते हैं हद के। सतयुग में भी माँ बाप कोई बेहद का वर्सा नहीं देते हैं। सतयुग के लिए बेहद का वर्सा तो अभी तुमको मिलता है। वहाँ लक्ष्मी-नारायण की राजधानी है और जो भी राजाई वाले रजवाड़े होंगे उनके बच्चों को अपने बाप का वर्सा मिलेगा। फिर भी वहाँ सुख बहुत है। इस समय तुमको बेहद का बाप बेहद विश्व का मालिक बनाते हैं। सदा सुख का 21 जन्मों के लिए वर्सा मिलता है। वहाँ दु:ख का नाम निशान नहीं होता। वाम मार्ग शुरू होने से ही दु:ख शुरू हो जाता है। जो भी आये उन्हें यह समझाना है कि तुम्हें दो बाप हैं। 84 जन्मों में तो 84 बाप हद के मिलते हैं। बेहद का बाप तो एक ही है।

अभी तुम बच्चों की बुद्धि में यह भी समझ है कि मूलवतन क्या है! मूलवतन जो चित्र में दिखाते हो वह भी बड़ा-बड़ा बनाना चाहिए, उसमें छोटी-छोटी आत्मायें सितारे मिसल चमकती हों। जैसे आगे तुम फायर फ्लाई का हार बनाते थे, वैसे यह मूलवतन का भी बनाना चाहिए। प्रोजेक्टर शो दिखाते हैं तो उसमें भी मूलवतन का चित्र ऐसा दिखाना चाहिए। झाड़ बड़ा हो तो क्लीयर दिखाई पड़े कि हम आत्मायें वहाँ रहती हैं। बच्चों को समझने में भी सहज होगा। यह है बेहद का बाबा, जो ब्रह्मा द्वारा दैवी सम्प्रदाय की स्थापना कर रहे हैं। तुम अभी ब्राह्मण हो फिर दैवी गुणों वाले देवता बनेंगे। अभी सभी में आसुरी गुण हैं, उनको आसुरी अवगुण कहेंगे। वाम मार्ग से दु:ख शुरू होता है। ऐसे नहीं कि रजोप्रधान बनने से फट दु:खी होते हैं। नहीं, थोड़ी-थोड़ी कला कमती होती जाती है। मुख्य चित्र है ही त्रिमूर्ति, गोला और नर्क-स्वर्ग के गोले। यह पहले-पहले समझाने के लिए बहुत जरूरी है। झाड़ के चित्र में भी आधा-आधा कल्प का माप पूरा है। एक्यूरेट होने से पूरा समझाने में आयेगा। यह ज्ञान सिवाए बाप के और कोई समझा न सके। घड़ी-घड़ी समझाने के लिए त्रिमूर्ति का चित्र जरूर चाहिए। यह है निराकार बेहद का बाप, जिसको सब याद करते हैं। आत्मा जानती है वह हमारा बेहद का बाप है, उनको दु:ख में सब याद करते हैं। सतयुग में याद करने की दरकार ही नहीं। वह तो है ही सुखधाम। देवतायें ही पुनर्जन्म लेते आये हैं। यह भी किसको पता नहीं।

तुम जानते हो - सतोप्रधान से फिर हम कैसे सतो रजो तमो में आते हैं। आत्मा में खाद पड़ती जाती है। तुम्हारी आत्मा जानती है कि हमको 84 जन्मों का पार्ट बजाना है। वह एक्यूरेट हमारी आत्मा में नूँध है। कितनी छोटी सी आत्मा में पार्ट सारा नूँधा हुआ है। यह है गुह्य ते गुह्य समझने की बातें। कोई भी मनुष्य मात्र संन्यासी, उदासी आदि की बुद्धि में यह बातें आ नहीं सकती। भल नाटक कहते हैं, नाटक को ड्रामा नहीं कहा जाता। यह ड्रामा है। ड्रामा, बाइसकोप आदि आगे नहीं थे। पहले मूवी थे, अभी टाकी बने हैं। हम आत्मायें भी साइलेन्स से टॉकी में आती हैं। टॉकी से फिर मूवी में जाए बाद में साइलेन्स में जाते हैं इसलिए तुम बच्चों को सिखाया जाता है कि जास्ती टॉक न करो। रॉयल मनुष्य बहुत आहिस्ते बोलते हैं। तुमको जाना है - सूक्ष्मवतन में। सूक्ष्मवतन का ज्ञान अभी बाप ने समझाया है। यह है टॉकी दुनिया, वह है मूवी। वहाँ ईश्वर से बातचीत चलती है। वहाँ सफेद लाइट का रूप है, आवाज नहीं। वहाँ की मूवी भाषा एक दो में समझ जाते हैं। तो अभी तुमको जाना है साइलेन्स में वाया मूवी। बाप कहते हैं मुझे पहले-पहले सूक्ष्म सृष्टि रचनी पड़े फिर पीछे स्थूल। गाया भी जाता है मूलवतन, सूक्ष्म, स्थूल...मनुष्यों को यह भी पता नहीं कि ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सूक्ष्मवतनवासी हैं। वहाँ कोई दुनिया नहीं है। सिर्फ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर देखने में आते हैं। विष्णु 4 भुजा वाला देखते हो, इससे सिद्ध है, प्रवृत्ति मार्ग है। संन्यासियों का है निवृति मार्ग। यह भी ड्रामा है, जिसका वर्णन करके बाप समझाते हैं। मुख्य बात तो बाप कहते हैं मनमनाभव। बाकी है डिटेल। वह समझने में टाइम लगता है। नटशेल में है बीज और झाड़। बीज को देखने से सारा झाड़ बुद्धि में आ जाता है। बाप बीज-रूप है, उनको इस झाड़ का और सृष्टि के चक्र का सारा नॉलेज है, समझाने के लिए सृष्टि चक्र अलग है। झाड़ अलग है। झाड़ में यह सब चित्र दिये हैं। कोई भी धर्म वाले को दिखाया जाए तो समझ सकते हैं। हम स्वर्ग में तो आ नहीं सकेंगे। भारत जब प्राचीन है तो सिर्फ देवी-देवतायें ही थे। बाकी सब शान्तिधाम में रहते हैं।

तुम बीज और झाड़ दोनों को जानते हो। बीज ऊपर में है, जिसको वृक्षपति कहते हैं। अब तुम बाप के बने हो तो तुम्हारे ऊपर ब्रह्स्पति की दशा बैठी हुई है। जो बाप के बनते हैं उनके ऊपर ब्रह्स्पति की दशा कहेंगे। फिर है शुक्र की दशा, बुध की दशा। ब्रह्स्पति की दशा वाले सूर्यवंशी बनते हैं। बुध की दशा वाले प्रजा में चले जाते हैं, सर्विस नहीं कर सकते। बाप को याद नहीं कर सकते हैं तो बुद्धू ठहरे, इसमें भी नम्बरवार बुद्धू बनते हैं। कोई ऊंच प्रजा कोई कम प्रजा। कहाँ साहूकार प्रजा फिर कहाँ उनके भी नौकर चाकर। सारा पढ़ाई पर मदार है। पढ़ाई भी सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी होती है। राजधानी स्थापन हो रही है। जो होशियार हैं वह बाप की याद में भी रहते हैं। सारा झाड़ बुद्धि में रहता है। पढ़ाई से ही टीचर, बैरिस्टर बनते हैं। टीचर फिर दूसरे को भी पढ़ाते हैं। पढ़ते तो सब हैं। एक ही पढ़ाई है फिर कोई तो पढ़कर ऊंच चढ़ जाते हैं, कोई फिर वहाँ ही टीचर बन जाते हैं। जो सीखे हैं वह पढ़ाते हैं। अभी तुम भी पढ़ते हो। कोई तो पढ़ते-पढ़ते टीचर बन जाते हैं। खुद कहते हैं टीचर का काम है आपसमान टीचर बनाना। टीचर नहीं बनेंगे तो औरों का कल्याण कैसे करेंगे। टाइम थोड़ा है, जब तक विनाश हो तब तक सीखते रहेंगे। फिर तो सीखना बन्द हो जायेगा। फिर बाबा 5 हजार वर्ष बाद आकर सिखलायेंगे। यह पढ़ाई कोई सैकड़ों वर्ष नहीं चलने वाली है। यह तो है ही इस अन्तिम जन्म के लिए पढ़ाई। पढ़ना और पढ़ाना है। सब तो टीचर नहीं बन सकते हैं। अगर सब टीचर बन जाएं फिर तो बहुत ऊंच पद पा लें। नम्बरवार तो होते ही हैं। पहले-पहले कोई को भी दो बाप का परिचय दो। चित्र होने से अच्छा समझेंगे। त्रिमूर्ति का चित्र तो जरूर साथ होना चाहिए। यह शिवबाबा, यह प्रजापिता ब्रह्मा। सभी का ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। तो जरूर पहले आया होगा ना। सबसे आगे है ब्रह्मा। अभी रचना रच रहे हैं। अभी तुम ब्राह्मण बने हो फिर ब्राह्मण ही देवता बनेंगे। ब्राह्मणों का झाड़ छोटा है। देवतायें थोड़े होते हैं फिर बाद में वृद्धि को पाते जाते हैं। यह तुम्हारा नया झाड़ स्थापन हो रहा है। वह और धर्म वाली आत्मायें तो ऊपर से आती हैं - पार्ट बजाने, गिरने की बात नहीं है। यहाँ तो तुम्हारा नया झाड़ स्थापन होता है। माया भी सामने है। तुमको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना ही है। ट्रांसफर होना है क्योंकि दुनिया बदल रही है, इसलिए मेहनत होती है। देवी-देवता धर्म की यहाँ संगमयुग पर स्थापना होती है। तुम यह भी बतलाते हो कि सतयुग कितने वर्ष का है। सतयुग से फिर कलियुग कैसे बनता है। कलियुग में तमोप्रधान तो होना ही है। तमोप्रधान हों तब तो फिर सतोप्रधान बनें। तुम सतोप्रधान थे फिर खाद पड़ती गई है। अभी भल कोई नई आत्मा 2-3 जन्म ले तो भी झट खाद पड़ जाती है। उनमें ही सुख, उनमें ही दु:ख भोगती है। कोई का एक जन्म भी होता है। जब आना बन्द हो जायेगा तब विनाश होगा। फिर सभी आत्माओं को वापिस जाना होगा। पाप आत्मायें और पुण्य आत्मायें इकट्ठी जाती हैं। फिर पुण्य आत्मायें नीचे उतरती हैं। संगम पर सारी बदली होती है। तो बच्चों को सारा ड्रामा बुद्धि में रखना चाहिए। बाप के पास यह सारी नॉलेज है ना। कहते हैं मैं आकर सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त का सारा राज़ समझाता हूँ। भक्ति मार्ग में थोड़ेही यह ज्ञान सुनाता हूँ। भगत याद करते हैं तो उनको साक्षात्कार कराता हूँ। भक्ति मार्ग शुरू होता है तब मेरा भी पार्ट शुरू होता है। सतयुग त्रेता में मैं वानप्रस्थ में रहता हूँ। बच्चों को सुख में भेज दिया बाकी क्या! मैं वानप्रस्थ लेता हूँ। यह वानप्रस्थ लेने की रसम भारत में ही है। बेहद का बाप कहते हैं मैं वानप्रस्थ में बैठ जाता हूँ। बेहद का बाप ही आकर गुरू के रूप में वानप्रस्थ में ले जाते हैं। मनुष्य गुरूओं का संग लेते हैं - भगवान से मिलने लिए। शास्त्र पढ़ेंगे, तीर्थों पर जायेंगे, गंगा स्नान करेंगे। परन्तु मिला तो कुछ भी नहीं है। अभी तुमको बेहद का बाप मिला है। दु:ख से छुड़ाकर, रावण राज्य से निकाल रामराज्य में ले जाते हैं। बेहद का बाप एक ही बार आकर रावण के दु:ख से छुड़ाते हैं, इसलिए उनको लिबरेटर कहा जाता है। सतयुग में है ही रामराज्य। बाकी आत्मायें शान्तिधाम चली जाती हैं। यह भी कोई नहीं जानते हैं। मुझ आत्मा का स्वधर्म ही है - शान्त। यहाँ पार्ट में आने से अशान्त बने हैं फिर शान्ति याद आती है। असुल में रहवासी शान्तिधाम के हैं। अब कहते हैं मुझे शान्ति चाहिए। मन को शान्ति चाहिए। समझाया जाता है - आत्मा मन-बुद्धि सहित है। आत्मा है ही शान्त स्वरूप फिर यहाँ कर्म में आती है। यहाँ शान्ति कैसे मिलेगी। यह तो है ही अशान्तिधाम। सतयुग में सुख शान्ति दोनों हैं। पवित्रता भी है, धन दौलत भी है।

बाप समझाते हैं तुमको कितना सुख-शान्ति, धन दौलत आदि सब कुछ था। अब फिर तुमको औरों को समझाना है। जिन्होंने कल्प पहले वर्सा लिया था वही अच्छी रीति समझने की कोशिश करेंगे। भल देरी से आते हैं परन्तु पुरानों से झट आगे चले जाते हैं। देरी से आने वालों को और ही प्वाइंट्स अच्छी मिलती हैं। दिन-प्रतिदिन सहज होता जाता है। यह भी समझेंगे अब हमने समझा तो सब है फिर तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने की मेहनत भी करनी है। उसके लिए तीव्र पुरुषार्थ करने लग पड़ेंगे क्योंकि समझते हैं टाइम थोड़ा है, जितना हो सके पुरुषार्थ में लग जायें। मौत से पहले हम पुरुषार्थ कर लेवें। वह अपना चार्ट रखते होंगे। पढ़ाई तो सहज है। बाकी है याद की बात। गाया भी हुआ है - राम सुमिर प्रभात मोरे मन... आत्मा कहती है हे मेरे मन, राम का सिमरण करो। भक्ति मार्ग में तो यह भी किसको पता नहीं है कि राम कौन है। वह रघुपति राघौ राजाराम कह देते हैं। कितनी गड़बड़ कर दी है। सबका भगवान वह राम कौन है, मनुष्य कुछ भी समझते नहीं हैं। वेस्ट ऑफ टाइम, वेस्ट ऑफ मनी करते रहते। तुम बच्चों को हमने विश्व का राज्य भाग्य दिया था, फिर कहाँ किया? 5 हजार वर्ष पहले तुमको स्वर्ग की राजाई दी थी, वह फिर कैसे गँवाई? अब तुम समझते हो - कैसे हम नीचे गिरते आये हैं। अभी फिर चढ़ना है। चढ़ती कला एक सेकेण्ड में, उतरती कला 5 हजार वर्ष में। ब्रह्मा सो विष्णु बनने में एक सेकेण्ड, विष्णु से ब्रह्मा बनने में 5 हजार वर्ष लगते हैं। कितनी प्वाइंट्स समझाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अब टॉकी से मूवी, मूवी से साइलेन्स में जाना है, इसलिए टॉकी (बातचीत) बहुत कम करनी है। रॉयल्टी से बहुत आहिस्ते बोलना है।

2) नॉलेज समझने के बाद तीव्र पुरुषार्थ कर सतोप्रधान बनना है। याद का चार्ट रखना है।

वरदान:-इस लोक के लगाव से मुक्त बन अव्यक्त वतन का सैर करने वाले उड़ता पंछी भव in

बुद्धि रूपी विमान से अव्यक्त वतन व मूलवतन का सैर करने के लिए उड़ता पंछी बनो। बुद्धि द्वारा जब चाहो, जहाँ चाहो पहुंच जाओ। यह तब होगा जब बिल्कुल इस लोक के लगाव से परे रहेंगे। यह असार संसार है, इस असार संसार से जब कोई काम नहीं, कोई प्राप्ति नहीं तो बुद्धि द्वारा भी जाना बन्द करो। यह रौरव नर्क है इसमें जाने का संकल्प और स्वप्न भी न आये।

स्लोगन:-अपने चेहरे और चलन से सत्यता की सभ्यता का अनुभव कराना ही श्रेष्ठता है।

ये अव्यक्त इशारे - परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

जो परोपकार की भावना से सम्पन्न है, वह सदा सन्तुष्टमणी के समान स्वयं भी सन्तुष्ट होगा और सर्व को भी सन्तुष्ट करने वाला होगा। कमाल यह है जो होपलेस में होप पैदा कर देगा, जिसके प्रति सब निराशा दिखायें, ऐसे व्यक्ति वा ऐसी स्थिति में सदा के लिए उनकी आशा के दीपक जगा देगा। अपने उपकार की शुभ भावना से, स्नेह से, शक्ति से, मीठे बोल से, उत्साह-उमंग के सहयोग से दिलशिकस्त को शक्तिवान बना देगा अर्थात् भिखारी को बादशाह बना दे

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