Gayatri Pariwar Sikar - Diya Sikar

👉 *मृत्यु से वापसी**विगत श्रावण की नाग पंचमी को मैं हरिद्वार गया वहाँ 12 दिन तक ऋषिकेश गंगा तट पर निवास किया तत्पश्चात् ...
10/11/2025

👉 *मृत्यु से वापसी*

*विगत श्रावण की नाग पंचमी को मैं हरिद्वार गया वहाँ 12 दिन तक ऋषिकेश गंगा तट पर निवास किया तत्पश्चात् जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा पहुँचा। कई दिन तक श्री गुरुदेव आचार्य जी के संपर्क में रहा। तदुपरान्त अपने सम्बन्धियों से मिलता हुआ आगरा होता हुआ धौलपुर गया।*

*मथुरा से जब मैं विदा ले रहा था तब आचार्य जी चिन्तित, गम्भीर, उद्विग्न और विषादपूर्ण मुद्रा में थे। उनका कंठ रुँधा हुआ था, विदा करते समय वे बड़े दुखी हो रहे थे। मैंने सोचा मेरे प्रति उनको जो प्रेम तथा वात्सल्य है उसी के कारण वियोग के समय उनकी यह स्थिति हो रही है परन्तु मन न माना उनकी समुद्र जैसी गम्भीर मनोभूमि मैं मेरे जैसे व्यक्ति के जाने की साधारण सी घटना का इतना प्रभाव नहीं हो सकता कि वे ऐसी अधीरता का परिचय दें। चित्त में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठने लगे बहुत विचारने पर भी कुछ समाधान न हो सका। बुद्धि ने हार मान ली और मै धौलपुर पहुँचा। रास्ते भर इस गुत्थी को सुलझाता रहा, पर वह सुलझ न सकी।*

*धौलपुर पहुँचते-पहुँचते मैं बीमार पड़ गया। चिकित्सा चलती रही पर बीमारी न घटी। एक दिन रोग तीव्र प्रकोप हुआ। सन्निपात, वमन अतिसार के कारण मैं मृत्यु-शैया पर पहुँच गया। मैं स्वयं डॉक्टर हूँ। लक्षणों से विश्वास हो गया कि मेरी अन्तिम घड़ी है। अपने भांजे भगवान स्वरूप से मैंने लड़खड़ाती जबान में अपनी अंत्येष्टि सम्बन्धी सब आदेश दे दिये और शीतल पसीने आने की विपन्न दशा में बेहोश हो गया।*

*उधर स्वजन सम्बन्धियों को मेरा कोई समाचार न मिलने से बड़ी चिन्ता हो रही थी। बरेली वाली मेरी बहिन ने चारों ओर को पत्र भेजे और ज्योतिषी अशर्फीलाल जी को बुलाकर गृह दशा दिखवाई। ज्योतिषी जी ने बताया कि वह बड़े संकट में है यदि 10-25 दिन में न आये तो उनके आने की आशा भी नहीं। कारण यह यह था कि छः ग्रह एक साथ मेरे जन्म स्थान में प्रवेश कर रहे थे और मार्केश बन रहा था। जिस समय मैं मृत्युशय्या पर पड़ा अन्तिम साँस ले रहा था। उसी समय गढ़वाल में मेरे मित्र पं॰ रामदत्त शर्मा को स्वप्न हुआ मैं माला हाथ में लेकर गंगा जी को पार कर रहा हूँ। उनकी तुरन्त आँख खुल गई और अपनी पत्नी से कहा अब डॉक्टर साहब नहीं मिलेंगे।*

मरने से डरना क्या ? | Marne Se Darna Kya | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी | https://youtu.be/jEQzWSjLhr8?si=EoNeE8NnBw3x7pSp

*जैसा कि पं॰ रामदत्त जी ने स्वप्न देखा था सचमुच ही मेरा प्राण इस शरीर से सम्बन्ध तोड़ रहा था। मुझे लगा कि मैं बहुत हल्का होकर ऊपर आकाश में उड़ रहा हूँ। आर्श्रय, कौतूहल के साथ इस विचित्र दशा में पड़ा हुआ कुछ निर्णय न कर पा रहा था कि मैं किस अवस्था में हूँ, कहाँ हूँ, उड़ता हुआ कहाँ जा रहा हूँ। अकस्मात इसी अवस्था में मुझे अनन्त तेजोमयी, परम स्वरूपी, दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हंसारूढ़ वेदमाता गायत्री के दर्शन हुए हैं। मैं उनके चरणों की ओर बढ़ी, उनने मस्तक पर हाथ धर दिया। यह स्पर्श ऐसा सुखद था कि मैं सारी सुधि-बुधि भूलकर एक विचित्र आनन्द सागर में निमग्न हो गया। कई घण्टे बाद संज्ञा शून्य शरीर में चेतना फिर लौट गई। मृत्युशय्या पर करवटें बदली और धीरे-धीरे अच्छा होने लगा। कुछ दिन दवा-दारु करते ठीक हो गया और घर चला आया।*

*मन में बार-बार प्रश्न उठता है कि उस माता की शरणागति से अलग होकर मुझे फिर क्यों यह जीवन जीने के लिए लौटना पड़ा? गुरुदेव ने बताया है कि जो अपूर्णताएं रह गई हैं उनको पूरा करने के लिए, कच्चेपन को पकाने के लिए अभी कुछ समय की साधना और आवश्यक है। नया जन्म लेकर उस कमी को पूरा करना संदिग्ध था। कौन जाने अगले जन्म में वे प्राप्त होती या न होती। इसलिए वर्तमान सुयोग से लाभ उठाकर जीवन लक्ष्य तक पहुँच जाना ही श्रेयकर था।*

*मथुरा से चलते समय आचार्य जी का उद्विग्न हो उठना मेरी समझ में आता है। वे अपनी सूक्ष्म दृष्टि से मेरा भविष्य देख रहे थे। उसी से उनका माता जैसा कोमल हृदय पिघल कर छलका पड़ रहा था। मृत्यु से वापिस लौटने में उनका कितना प्रचण्ड प्रयत्न मेरे प्रति रहा इनका उल्लेख करना उसका महत्व कम करना है।*

*अज्ञानी बालक जैसे अपने अभिभावकों के आदेशों का अनुसरण करता है, उसी प्रकार माता की प्रेरणा और गुरुदेव की आशा का संबल पकड़ कर चल रहा हूँ। प्राण माता के चरणों में रम रहे हैं, हर साँस में माता की पुकार उठती है। वे जहाँ मुझे पहुँचा देंगी वहीं मेरा कल्याण होगा ऐसी भावना के साथ गायत्री उपासना में संलग्न हूँ। अब यही एक मात्र मेरी जीवन साधना है।*

✍🏻 *डा. रामनरायन भटनागर, इटौआ धुरा*
📖 *अखण्ड ज्योति जुलाई 1951*

मरने से डरना क्या ? | Marne Se Darna Kyaपरम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को यह समझाने के .....

26/10/2025

श्रेष्ठ पुरुष वहीं होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के केवल दूसरों की भलाई करना ही अपना धर्म समझते हैं। दूसरों को कष्ट में देखकर उन्हें स्वयं गहन पीड़ा होने लगती है और वे उसके निराकरण में प्राणप्रण से जुट जाते हैं। ये देवकोटि में गिने जाते हैं ।
दूसरे वे लोग हैं जो अपना भी कार्य सँवार लेते हैं और दूसरों का भी कार्य बना देते हैं। ये मनुष्य कोटि में आते हैं।
तीसरे राक्षस कोटि के व्यक्ति होते हैं जो अपना काम तो निकाल लेते हैं, पर दूसरों का काम बिगाड़ देते हैं।

30/08/2025

अच्छाई और बुराई साथ साथ नहीं चल सकती 😇

ब्रह्मपरायणता क्या है ?
07/08/2025

ब्रह्मपरायणता क्या है ?

‼ *हमारा महान शत्रु-आलस्य (भाग 1)* ‼            ‼ *शांतिकुंज ऋषि चिंतन* ‼➖➖➖➖‼️➖➖➖➖ 🌞 *06 August, 2025 Wednesday* 🌞🍀 *०६...
06/08/2025

‼ *हमारा महान शत्रु-आलस्य (भाग 1)* ‼
‼ *शांतिकुंज ऋषि चिंतन* ‼
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
🌞 *06 August, 2025 Wednesday* 🌞
🍀 *०६ अगस्त, २०२५ बुधवार* 🍀
*!! श्रावण माह, शुक्ल पक्ष, द्वादशी तिथि, संवत २०८२ !!*
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🔵 *किसी भी कार्य की सिद्धि में आलस्य सबसे बड़ा बाधक है, उत्साह की मन्दता प्रवृत्ति में शिथिलता लाती है। हमारे बहुत से कार्य आलस्य के कारण ही सम्पन्न नहीं हो पाते। दो मिनट के कार्य के लिए आलसी व्यक्ति फिर करूंगा, कल करूंगा-करते-करते लम्बा समय यों ही बिता देता है। बहुत बार आवश्यक कार्यों का भी मौका चूक जाता है और फिर केवल पछताने के आँतरिक कुछ नहीं रह जाता।*

🔴 *हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग आलस्य में ही बीतता है अन्यथा उतने समय में कार्य तत्पर रहे तो कल्पना से अधिक कार्य-सिद्धि हो सकती है। इसका अनुभव हम प्रतिपल कार्य में संलग्न रहने वाले मनुष्यों के कार्य कलापों द्वारा भली-भाँति कर सकते हैं। बहुत बार हमें आश्चर्य होता है कि आखिर एक व्यक्ति इतना काम कब एवं कैसे कर लेता है। स्वर्गीय पिताजी के बराबर जब हम तीन भाई मिल कर भी कार्य नहीं कर पाते, तो उनकी कार्य क्षमता अनुभव कर हम विस्मय-विमुग्ध हो जाते हैं। जिन कार्यों को करते हुए हमें प्रातःकाल 9-10 बज जाते हैं, वे हमारे सो कर उठने से पहले ही कर डालते थे।*

*आलस्य न करना ही अमृत पद है।

🟡 *जब कोई काम करना हुआ, तुरन्त काम में लग गये और उसको पूर्ण करके ही उन्होंने विश्राम किया। जो काम आज हो सकता है, उसे घंटा बाद करने की मनोवृत्ति, आलस्य की निशानी है। एक-एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गये तो बहुत से कार्य पूर्ण कर सकेंगे, पर बहुत से काम एक साथ लेने से- किसे पहले किया जाय, इसी इतस्ततः में समय बीत जाता है और एक भी काम पूरा और ठीक से नहीं हो पाता। अतः पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि जो कार्य आज और अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़, तत्काल कर डालिए, कहा भी है-*
*काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।*
*पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब॥*

🔵 *दूसरी बात ध्यान में यह रखनी है कि एक साथ अधिक कार्य हाथ में न लिये जायं, क्योंकि इससे किसी भी काम में पूरा मनोयोग एवं उत्साह नहीं रहने से सफलता नहीं मिल सकेगी। अतः एक-एक कार्य को हाथ में लिया जाय और क्रमशः सबको कर लिया जाय अन्यथा सभी कार्य अधूरे रह जायेंगे और पूरे हुए बिना कार्य का फल नहीं मिल सकता। जैन धर्म में कार्य सिद्धि में बाधा देने वाली तेरह बातों को तेरह काठियों (रुकावट डालने वाले) की संज्ञा दी गई है। उसमें सबसे पहला काठिया ‘आलस्य’ ही है। बहुत बार बना बनाया काम तनिक से आलस्य के कारण बिगड़ जाता है।*


🟣 *प्रातःकाल निद्रा भंग हो जाती है, पर आलस्य के कारण हम उठकर काम में नहीं लगते। इधर-उधर उलट-पुलट करते-करते काम का समय गंवा बैठते हैं। जो व्यक्ति उठकर काम में लग जाता है, वह हमारे उठने के पहले ही काम समाप्त कर लाभ उठा लेता है। दिन में भी आलसी व्यक्ति विचार में ही रह जाता है, करने वाला कमाई कर लेता है। अतः प्रति समय किसी न किसी कार्य में लगे रहना चाहिए। कहावत भी है ‘बैठे से बेगार भली’। निकम्मे आदमी में कुविचार ही घूमते हैं। अतः निकम्मेपन को हजार खराबियों की जड़ बतलाया गया है।*

🟡 *मानव जीवन बड़ा दुर्लभ होने से उसका प्रति क्षण अत्यन्त मूल्यवान है। जो समय जाता है, वापिस नहीं आता। प्रति समय आयु क्षीण हो रही है, न मालूम जीवन दीप कब बुझ जाय। अतः क्षण मात्र भी प्रमाद न करने का उपदेश भगवान महावीर ने दिया है। महात्मा गौतम गणधर को सम्बोधित करते हुए उन्होंने उत्तराध्ययन-सूत्र में ‘समयं गोयम मा पमायए’ आदि- बड़े सुन्दर शब्दों में उपदेश दिया है। जिसे पुनः-पुनः विचार कर प्रमाद का परिहार कर कार्य में उद्यमशील रहना परमावश्यक है। जैन दर्शन में प्रमाद निकम्मे पन के ही अर्थ में नहीं, पर समस्त पापाचरण के आसेवन के अर्थ में है। पापाचरण करके भी जीवन के बहुमूल्य समय को व्यर्थ ही न गंवाइये।*

🔵 *आलस्य के कारण हम अपनी शक्ति से परिचित नहीं होते- अनन्त शक्ति का अनुभव नहीं कर पाते और शक्ति का उपयोग न कर, उसे कुँठित कर देते हैं। किसी भी यन्त्र एवं औजार का आप उपयोग करते रहते हैं तो ठीक और तेज रहता है। उपयोग न करने से पड़ा-पड़ा जंग लगकर बरबाद और निकम्मा हो जाता है। उसी प्रकार अपनी शक्तियों को नष्ट न होने देकर सतेज बनाइये। आलस्य आपका महान शत्रु है। इसको प्रवेश करने का मौका ही न दीजिए एवं पास में आ जाए तो दूर हटा दीजिए। सत्कर्मों में तो आलस्य तनिक भी न करे क्योंकि “श्रेयाँसि बहु विघ्नानि” अच्छे कामों में बहुत विघ्न जाते हैं। आलस्य करना है, तो असत् कार्यों में कीजिए, जिससे आप में सुबुद्धि उत्पन्न हो और कोई भी बुरा कार्य आप से होने ही न पावे।*

*📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 12*

आलस्य न करना ही अमृत पद है। | Aalasya Na Karna Hi Amrit Pad Haiपूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य मेंShantikunj Rishi Chintan...

06/08/2025

आचार्य जी द्वारा पहनाए गए पीले वस्त्रों की गरिमा 👇

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आलस्य त्यागें, सुसंपन्न बनें...

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