माँ जीण का भव्य मंदिर
माँ जीण !कलयुग! में शक्ति के अवतार का भव्य मंदिर सीकर जीले की रेवासा पहाडियों में स्थित है। ये जयपुर (राजस्थान ) से लगभग 115 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है॥ ये भव्य मंदिर चारों तरफ़ से ऊँची ऊँची पहाडियों से घिरा हुआ है। बरसात हो या सावन का महिना इन दिनों पहाडो की हरियाली देखने लायक होती है। राष्ट्रिय राजमार्ग 11 से ये लगभग 10 या 12 किलोमीटर की दुरी पर है। जहाँ राणोली से माता के
दरबार में दर्शन के लिए अच्छी सड़क बनाई गयी है.
जीण माता के इतिहास के बारे में अभी कोई सही जानकारी नहीं है . लेकिन कहा और सुना जाता है की माता का मंदिर लगभग १०० साल पुराना है.
कथनानुसार जीण माता का अवतार चुरू जीले के घांघू गाँव में हुआ था। जीण माता के बड़े भाई का नाम हर्ष था । माता जीण को दुर्गा माँ शक्ति का अवतार माना गया है और हर्ष को भगवन शिव का अवतार माना गया है॥ कहते है की दोनों बहन भाइयो में बहुत प्यार था लेकिन जीण माता की भाभी के कारण जीण माता ने अपना घर त्याग दिया .और इन पहाडियों पर आकर तपस्या करने लगी .और पीछे पीछे हर्षनाथ भी अपनी लाडली बहन को मानाने के लिए आए लेकिन जीण माता जीद्द करने लगी साथ जाने से मना कर दिया ।
हर्षनाथ का मन बहुत उदास हो गया और उन्होंने कहा की बहन तू नहीं जाएगी तो में भी नहीं जाउगा और वे भी वहां से कुछ दूर जाकर वहां पर तपस्या करने लगे।
दोनों भाई बहन के बीच हुई बातचीत का सुलभ वर्णन आज भी राजस्थान के लोक गीतों में मिलता है॥
भगवन हर्षनाथ का भव्य मन्दिर आज भी राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में स्थित है।
यहाँ में एक लोक कथा का वर्णन करना चाहूँगा।
दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने एक बार इस पर्वत माला पर आक्रमण किया और पुरे मंदिरों , गुफाओं, और अनेक भवनों को क्षत विक्षत कर दिया। फ़िर वो माता के मदिर की और बढ़ा। कहा जाता है की तब माता ने भंवरा मधुमखियों से उसकी पूरी सेना पर आक्रमण करवा दिया
मधुमखियों के दंश से बेहाल पूरी सेना और घोडे मैदान छोड़कर भाग गए।
तब औरंगजेब ने हारकर माता के चरणों में शीश नवाया और क्षमा याचना की। तब जाकर कहीं उसका पीछा छूटा । माता की शक्ति को जानकर उसने वहां पे भंवरो की रानी के नाम से शुद्ध खालिस सोने की बनी मूर्ति भेंट की और "अखंड ज्योत जलाई" और आज शताब्दियों के बाद भी वो अखंड ज्योत जल रही है।
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कहा जाता है की जीण माता के चरणों में शीश नवाकर जो भी दिल से से माँगा जाता है वो जरुर पुरा होता।
चैत्र और आश्विन माह में नवरात्री पर्व पर लाखों की संख्या में श्रदालु जीणमाता के दर्शन करने आते है। कुछ लोग तो नौ दिनों तक मन्दिर पूजा करते है...
शरद पूर्णिमा और फाल्गुन माह में हर्ष भैरूं मेला यहाँ के मुख्य आकर्षण हटा है है॥