Aadhas Pariwaar Sangaria

Aadhas Pariwaar Sangaria पुरुषार्थ ही देव है।

पंथो में बंटे संतों को कुश-लव जैसी शिक्षा-दीक्षा और एकता की सख्त जरूरत है। --दर्शन 'रत्न' रावण वाल्मीकि विजय दिवस क्या ह...
18/11/2021

पंथो में बंटे संतों को कुश-लव जैसी शिक्षा-दीक्षा और एकता की सख्त जरूरत है। --दर्शन 'रत्न' रावण

वाल्मीकि विजय दिवस क्या है ?
वाल्मीकि विजय दिवस से क्या शिक्षा मिलती है ?
वाल्मीकि विजय दिवस को मनाने का कारण क्या है ?

वाल्मीकि विजय दिवस की जानकारी हमें वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में मिलती है। राजा रामचन्द्र जब महात्मा रावण को घोर छल-कपट से हरा कर अयोध्या आये तो अपनी जीत के अहंकार से बुरी तरह पीड़ित हो गए। यह आम आदमी के लिए स्वाभाविक भी है। राजा रामचन्द्र के मन में चक्रवर्ती राजा बनने की इच्छा जागृत हुई। उस वक्त छोटे-छोटे राज हुआ करते थे। लगभग आज के एक शहर जितने। उन सभी को धमका कर चौधरी बनने को चक्रवर्ती राजा कहते थे।

चक्रवर्ती राजा बनने के लिए राजा रामचन्द्र ने एक घोड़ा अपनी सेना के साथ भेजा। यह दूसरे छोटे-बड़े राज्यों {रियासतों} को अपना गुलाम बनाने के लिए चलाया। घोड़ा शक्ति का प्रतीक है और शक्ति अहंकार का प्रतीक है। राजा रामचन्द्र जी ने उस घोड़े पर एक सन्देश लिखी तख्ती भी टाँग दी। जिस पर लिखा था,

"यह घोड़ा जिस किसी राज्य से गुजर जाएगा वो सभी राज्य मेरे अधीन हो जाएंगे। जिस राजा को यह बात स्वीकार न हो उसे मेरे {राजा रामचन्द्र} साथ युद्ध करना होगा।"

ये सारा पैगाम या धमकी अहंकार से भरी हुई ही थी। अहंकार यह कि जब मैंने महात्मा रावण जैसे विद्वान, मेघनाद जैसे पराक्रमी योद्धा वीर कुम्भकर्ण जैसे अद्वितीय योद्धा और असंख्य पराक्रमी शूरवीरों को हरा दिया तो बाकी किसी की क्या औकात ?
अज्ञानता आदमी की समझ और धीरता खा लेते हैं। राजा राम चंद्र उस वक्त इसी अवस्था में थे।

आखिर ईश्वर का इन्साफ भी तो कोई मायने रखता है और हुआ यह कि दो छोटे-छोटे वीर बालक कुश-लव आगे आए। जब उन्होंने पढ़ा अहंकार से भरे पैगाम को और पकड़ ली घोड़े की लगाम फिर जो भी लड़ने आया सभी को मिट्टी में मिला दिया।

अब सवाल यह कि वाल्मीकि विजय दिवस क्यों ?

1. क्योंकि कुश-लव को शिक्षा-दीक्षा सृष्टिकर्ता वाल्मीकि दयावान ने दी थी।
2. उस करुणासागर वाल्मीकि त्रिकाल ने जो कौंच की पुकार पर भी प्रकट होते हैं। कुश-लव में वही करूणा भी भरी थक। फिर इंसानों को गुलाम कैसे सहन करते ?
3. एक पक्षी की जान को भी इंसान के बराबर मानना ही इंसानियत है।

विजय के विशेष कारण
1. कुश-लव की शिक्षा एक थी। 2. कुश-लव का विचार एक था। 3. उनका साहस एक जैसा था। 4. सबसे उत्तम बात कुश-लव में एकता थी।

हमें यही बात सीखनी है कि आप अगर एक हैं, आपके विचार एक हैं, आप में संघर्ष की ईच्छ एक-सी है तो दुनिया की कोई ताकत आपको हरा नहीं सकती। यह बात हमारी कौम से ज्यादा हमारे संतों को सीखनी होगी। जिनके कई पंथ हैं मगर वाल्मीकि धर्म उनके मन में कहीं नहीं है।

पंथो में बंटे संतों को कुश-लव जैसी शिक्षा-दीक्षा और एकता की सख्त जरूरत है।
वाल्मीकि रचना महाकाव्य से प्रेरित हो कर ही वंशदानी डाॅ भीम राव अम्बेडकर ने भी अपना मूलमंत्र बनाया।
शिक्षित हो (कुश-लव की तरह)
संगठित हो (कुश-लव की तरह)
संघर्ष करो (कुश-लव की तरह अन्याय (घोड़ा) रोको ।

परम आदरणीय आदि धर्म गुरु दर्शन 'रत्न' रावण जी द्वारा लिखित पुस्तक "तमसा के तीर" में से।
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आओ योगविशिष्ट को जाने {भाग-2} --दर्शन 'रत्न' रावणपुरुषार्थ ही दैव है। --पावन योगविशिष्टजीवन कितना होता है यह निश्चित नही...
18/06/2020

आओ योगविशिष्ट को जाने {भाग-2} --दर्शन 'रत्न' रावण
पुरुषार्थ ही दैव है। --पावन योगविशिष्ट

जीवन कितना होता है यह निश्चित नहीं। हाँ जीवन बहुत सारे रंगों से भरा होता है। कुछ रंग लुभाते हैं, कुछ आँखों को राहत देते हैं और कुछ जलाते भी हैं। इस सारी उथल-पुथल में कैसे जीवन को जीना है इसका ज्ञान भी देता है पावन योगविशिष्ट।

कई बार एक सवाल आया कि इतने सारे पक्षियों के होते परमेश्वर के हाथ में केवल मोर-पँख ही क्यों ? मोर का अकेला ऐसा पँख होता है जिसमें हर तरह का रंग देखने को मिलता है। उस बहुरंगी कलम से परमेश्वर जीवन के अलग-अलग रंगों सुख-दुःख सभी को लिखते हैं और हमें मार्ग भी दिखाते हैं।

हम रंग कैसा भी चाहे मगर उसका द्वार केवल और केवल पुरुषार्थ से हो कर ही जाता है। आप योगविशिष्ट में फरमाते हैं,"पुरुषार्थ ही देव है।" पुरुषार्थ का अगर साधारणतः अर्थ करें तो मेहनत कह सकते हैं। योगेश्वर वाल्मीकि दयावान जब पुरुषार्थ कहते हैं तो वो उसके एक-एक पहलु को खोल कर बताते हैं।

जीवन की चार अवस्थाओं के अनुरूप करुणासागर वाल्मीकि त्रिकाल पुरुषार्थ को भी चार भागों में प्रस्तुत करते हैं। जैसे जीवन की चार अवस्थाएं कही गई बचपन, किशोरावस्था, जवानी और बुढ़ापा। चार आश्रम भी कहा कहा जाता है। ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास।

विश्वेश्वर वाल्मीकि ने ठीक इन्हीं के अनुसार पुरुषार्थ को भी चार भागों में अवस्था अनुसार रखा गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अवस्था को समझना बहुत जरुरी है। पहली बचपन इस अवस्था में धर्म को अनिवार्य कहा गया है। याद रहे आज धर्म किसी खास पहचान, क्रिया और रिवाज़ को मान लिया गया है। जबकि यह धर्म नहीं।

कमलेश्वर वाल्मीकि दयावान का धर्म से अभिप्राय सीखना है। शिक्षा या ज्ञान। दूसरा है 'अर्थ'। भाव धन, अपने पैरों पर खड़े हो जाना आदि। इसके बाद तीसरा स्थान आता है 'काम' अर्थात गृहस्त जीवन। भाव आत्म-योग {विवाह} अंतिम यानि चौथा कहा गया मोक्ष। जिसका अर्थ मोह का नाश {क्षय}

पुरुषार्थ के साधारण अर्थ मेहनत की तरह ही आश्रम का अर्थ भी मेहनत ही होता है। आश्रम=स्म्यक् प्रकार से श्रम। यह अलग बात कि आज आश्रमों में निठल्ले, पेटू, अय्याश किस्म के लोग बैठे हैं। आश्रम को जीवन की वो स्थिति माना जाता है जिसमें कर्तव्यपालन के लिए पूर्ण परिश्रम किया जाए।

इसी तरह हम पुरुषार्थ को और अच्छे से समझ सकते हैं। पुरुषार्थ=पुरुष+अर्थ, अर्थात पुरुष होने के मायने। केवल पुरुष ही नहीं सृष्टिकर्ता ने असंख्य जीव पैदा किए हैं। अगर भेद देखें तब साफ़ समझ में आता है कि इंसान बुद्धि के कारण सभी जीवों में श्रेष्ट है।

मानव अपनी बुद्धि के कारण ही श्रेष्ट नहीं माना जा सकता। उसमें मानवता भी हो। पुरुष में पुरुषार्थ और परमार्थ भी हो। नहीं तो रात को कई घण्टे इंतज़ार तो चोर भी करता है कि कब लोगों का आना रुके और वो ताला तोड़े। मगर इसे पुरुषार्थ नहीं कहा जा सकता।

अगले भाग में हम पुरुषार्थ के चार भागों अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के गहरे अर्थ और विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे। साथ में समझेंगे उनकी क्रम अनुसार जरूरत को।

आओ योगविशिष्ट को जाने {भाग-1} --दर्शन 'रत्न' रावणजब ईश्वर का यह कथन हम पढ़ते हैं कि तप दान और तीर्थ से भी मोक्ष की प्राप्...
17/06/2020

आओ योगविशिष्ट को जाने {भाग-1} --दर्शन 'रत्न' रावण

जब ईश्वर का यह कथन हम पढ़ते हैं कि तप दान और तीर्थ से भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। तब हर कोई विश्वेश्वर पर आस्था बनाए रखते हुए धीमे से सवाल करता है। क्या तप, दान और तीर्थ फिर बेकार है ? सवाल करना अविश्वास नहीं है बल्कि ठीक से समझने वाले का घोतक है।

परमेश्वर वाल्मीकि दयावान सम्पूर्णता की बात करते हैं। खण्डों की नहीं। आदिकवि अपनी रचना योगविशिष्ट द्वारा मार्ग और मंज़िल दोनों की बात कहते हैं। यहाँ वो पुरुषार्थ की बात करते हए मिलेंगे वहीँ पर उसके फल की बात भी कहते हैं।

इसे हम इस तरह समझ सकते हैं। जैसे कोई छात्र जब अपनी परीक्षा {Exam} देने जाता है। उस वक्त अगर पेन घर भूल जाए तो काम चल सकता है। केवल पेन उसे पास नहीं करवा सकता। हार्ड-बोर्ड के बिना भी परीक्षा दी जा सकती है। हार्ड-बोर्ड की व्यवस्था हो सकती है।

मुझे याद है हम जब सालाना परीक्षा के लिए नहा-धो कर तैयार हो जाते और जब घर से चलने लगते तो दादी हाथ में दही की कटोरी लिए सामने आ खड़ी होती। "पहले मुँह खोलो" दादी का आदेश मिलता। हम मुँह खोलते और दही का चमच सीधा मुँह में धकेल दिया जाता।

दादी का मानना था कि दही खा कर एग्जाम के लिए घर से निकलना पास होने के लिए या अच्छा शगुन है। शायद इससे परीक्षा में उत्तीर्ण होना माना जाता था। अब बहुत सारे बच्चे दही खाने से मुँह सिकोड़ा लेते हैं। आज बहुत सारे ऐसे हैं जो दादी से दूर हॉस्टल या पिता की पोस्टिंग स्थल पर हैं।

किसी दही, पूजा-पाठ, धागा-ताबीज़ या किसी भी युक्ति व पाखण्ड से कोई भी छोटा-बड़ा एग्जाम पास नहीं किया जा सकता। दही, टोटका, पेन और हार्ड बोर्ड के बिना काम चल सकता है। मगर बिना किताब को पढ़े, बिना ज्ञान अर्जित किए कोई परीक्षा नहीं हो सकती।

स्वयं सिद्ध सृष्टिकर्ता कहते क्या हैं ? आगे वो स्पष्ट करते है कि मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। संभव है। मगर केवल ज्ञान के द्वारा। ज्ञान को कमलेश्वर वाल्मीकि त्रिकाल मूल आधार मानते हैं। सब सुखों का रास्ता केवल ज्ञान से हो कर ही जाता है।

वर्तमान मिसाल ले लीजिए ! बाबा-ए-कौम डॉ भीम राव अम्बेडकर ! कौन-सा रास्ता चुना ? किस रास्ते से वंशदानी डॉ अम्बेडकर एक युग को पलटने में कामयाब हो गए ? वो मार्ग था ज्ञान का, शिक्षा का। फिर किसी हथियार, किसी फौज की जरूरत नहीं पड़ी और टकरा गए सदियों के मनुवाद और ब्रिटिश साम्राज्य से।

इस तरह हम इस नतीजे पर पहुँचे कि जिस प्रकार पेन, हार्ड-बोर्ड परीक्षा करने के साधन तो हैं अर्थात उत्तर-पुस्तिका को ठीक से रखने और जवाब लिखने के साधन हैं। मगर मगर सवालों के जवाब पेन, हार्ड-बोर्ड और दही नहीं देती वो हमारा प्राप्त किया हुआ ज्ञान देता है। जिसकी पूर्ती परीक्षा वाले दिन परीक्षा केन्द्र से नहीं हो सकती।

हम इस गूढ़-ज्ञान की बात को समझने में सफल हुए कि तप, दान व तीर्थ की जरूरत तो है। मगर मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञान का होना अति-जरुरी है। परीक्षा चाहे स्कूल/कॉलेज की हो या जीवन की। ज्ञान लाज़मी है।

 #वाल्मीकि_आश्रम_में_लंगर_सेवा_का_समापनलॉक डॉउन के दौरान से निरन्तर  #वाल्मीकि_आश्रम_संगरिया द्वारा जरूरतमंद व असहाय परि...
26/05/2020

#वाल्मीकि_आश्रम_में_लंगर_सेवा_का_समापन

लॉक डॉउन के दौरान से निरन्तर #वाल्मीकि_आश्रम_संगरिया द्वारा जरूरतमंद व असहाय परिवारों, प्रवासी मजदूरों को बना बनाया भोजन वाल्मीकि आश्रम सेवादारों द्वारा लगातार 52 दिनों तक देने के पश्चात विराम दे दिया गया।
खाना बनाने के लिए निरन्तर अपनी सेवा दे रहे हलवाईयो की टीम को सेवादारों द्वारा रसद सामग्री, कोरोना योद्धा सम्मान पत्र के साथ कुछ नगद राशि भेंट करके सम्मान किया गया। साथ ही उनका वाल्मीकि आश्रम द्वारा आभार प्रकट किया। इस दौरान अपनी सेवाएं देने वाले और #दानवीर_भामाशाहों का दिल से आभार इसके अलावा चाय की सेवा देने वाले प्रेम जी सहारण, देवेन्द्र भोबिया जी की पूरी टीम व समस्त पत्रकार साथियों का भी आभार व्यक्त किया।
#वाल्मीकि_आश्रम_अन्तर्गत_आदि_धर्म_समाज की और से विशेष आभार बड़े भाई साहब बहादुर सिंह कंडा, वेद प्रकाश पिवाहल, विजय लोहरा, संजय रैगर, रवि पुरुषार्थी, दीपक रैगर, जितेंद्र लोहरा, धर्मवीर सोलंकी, सुनील द्रविड़,सागर अम्बेडकर, सुनील पंवार, नीरज लोहिया,राकेश लुगरिया, जगदीश , मोहन नाथ, विशाल दैत्य,सागर कंडा, विशाल बूर्ट, देव धिलोड, हरी ओम, अनुराग कांडा, जतिन,जुगल किशोर,समीर इत्यादि

समझो इस शैतानी को - दर्शन रत्न रावणप्रश्न: ___________एक नव बौद्धि के अल्पज्ञान से उपजा एक प्रश्न अगर वाल्मीकि अन्त्यज ह...
18/05/2020

समझो इस शैतानी को - दर्शन रत्न रावण
प्रश्न: ___________
एक नव बौद्धि के अल्पज्ञान से उपजा एक प्रश्न अगर वाल्मीकि अन्त्यज होता ।
होता शिक्षा की परिधि से बाहर तब कैसा रच पाता महाकाव्य रामायण ?
उत्तर ____________
क्या नहीं जानते आप, वेद व्यास भी शुद्र था।
फिर कैसे रच पाया, महाभारत वो शूद्र
और एकलव्य भी, भीलों में था पैदा हुआ
सीख धनुष की विद्या, बना चुनौती क्षत्रियों पर
शम्बूक ने तो, पाठशाला खोलने के कथित जुर्म में
कटवा डाली थी अपनी गर्दन
महाश्य आप, शीघ्र ही इन सभी की
जन्म पत्रियां बदल कर
बना दोगे, इन्हें भी एक दिन
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य
लगता है आपकी खोपड़ियां
बुध्दि से है डैस, बुध्दि से है डैस।

3 अक्टूबर 1996 को यह कविता एक मूर्ख द्वारा ऊपर लिखी पंक्तियां के जवाब में लिखी थी मगर रखदी बन्द करके अब जब ये ज्यादा गन्दगी फ़ैलाने लगे तब 'कलम' उठानी पड़ी।

यह पुस्तक में से लिया गया है
आदिकवि वाल्मीकि के कुशी- लव क्यों हुए रक्षस से भंगी
लेखक : आदरणीय दर्शन रत्न रावण जी

 ी_भूखा_न_रहे_कोईमानवता के अस्तित्व को बचाना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।क्योंकि मानवता की सेवा करने वाले हाथ उतने ही...
16/05/2020

ी_भूखा_न_रहे_कोई
मानवता के अस्तित्व को बचाना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
क्योंकि मानवता की सेवा करने वाले हाथ उतने ही पवित्र है जितने कि ईश्वर की आराधना करने वाले होठ होते है। कोरोना वायरस के चलते जरूरतमंद व असहाय परिवारों को निरन्तर भोजन वाल्मीकि आश्रम संगरिया द्वारा उपलब्ध करवाया जा रहा है
नोट:- वाल्मीकि आश्रम सेवादारों द्वारा किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन पैकेट्स वितरण करते समय फोटो /वीडियो नही ली जाती हैं क्योकि आश्रम के सेवादार किसी जरूरतमंद व्यक्ति / परिवार के मान सम्मान ,प्रतिष्ठा एव भावनाओं को आहत नही करना चाहते है। आश्रम के सेवादार सभी व्यक्तियों की प्रतिष्ठा एव भावनाओं का सम्मान करते हैं।
जिस किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन पैकेट्स की आवश्यकता हो कृपया हमें सूचित करें!
ये सेवा जबसे लॉक डॉउन लगा है तब से आजतक जारी है.........
#आदि_धर्म_समाज_अन्तर्गत_वाल्मीकि_आश्रम_संगरिया

ज्यादा से ज्यादा बच्चों से करें सम्पर्ककल 17  हिरण्य (मई) 2020 को होगा On Line Webinar --Darshan 'Ratna' Raavan
16/05/2020

ज्यादा से ज्यादा बच्चों से करें सम्पर्क
कल 17 हिरण्य (मई) 2020 को होगा
On Line Webinar --Darshan 'Ratna' Raavan

दलित, गरीब, मजदूर, घास खाओ , पैदल चलो आत्मनिर्भर बनो ये मोदी सरकार का कहना है।
16/05/2020

दलित, गरीब, मजदूर, घास खाओ , पैदल चलो आत्मनिर्भर बनो ये मोदी सरकार का कहना है।

वाल्मीकि विजय दिवस पर संगरूर के कुछ मनमोहक दृश्य....
14/11/2019

वाल्मीकि विजय दिवस पर संगरूर के कुछ मनमोहक दृश्य....

 #ऐसे_पुरुष_मिलते_रहे_सिमरन_हो_तेरा_नाम! ाणी_और_कर्म_से_करे_सदा_शुभ_काम!!         वाल्मीकि विजय दिवस के पावन अवसर पर वाल...
14/11/2019

#ऐसे_पुरुष_मिलते_रहे_सिमरन_हो_तेरा_नाम!
ाणी_और_कर्म_से_करे_सदा_शुभ_काम!!
वाल्मीकि विजय दिवस के पावन अवसर पर वाल्मीकि आश्रम संगरिया में #आदि_नित्यनेम_पाठ करवाया गया। प्रसाद स्वरूप बूंदी और हलवे का प्रसाद वितरण किया गया। इसी अवसर पर बड़े वीर वेद पिवाहल (पीएनबी) परिवार सहित उपस्थित हो #स्टील_का_लेक्चरर_स्टैंड वाल्मीकि आश्रम को सप्रेम भेंट किया।
जब कभी भी हम अपने मार्ग से भटकते हुए नजर आते है तो बड़े भाई हर वक़्त हमें भाई की तरह नहीं बल्कि एक गुरु (पिता) के सम्मान सही मार्गदर्शन करते है डांट की जगह डांट फटकार कर भी समझाते है।
हम पूरे आधस परिवार की और से बहुत बहुत आभार व्यक्त करते है.....

योगेश्वर-पर्व। क्या अर्थ समझे हम योगेश्वर पर्व का ? --दर्शन 'रत्न' रावण  योग कई प्रकार के होते हैं। व्यायाम व ध्यान जैसे...
03/05/2019

योगेश्वर-पर्व। क्या अर्थ समझे हम योगेश्वर पर्व का ? --दर्शन 'रत्न' रावण

योग कई प्रकार के होते हैं। व्यायाम व ध्यान जैसे योग को हम ज्यादा जानते हैं। मगर करुणासागर वाल्मीकि दयावान ने योग को मानव के स्वभाव, समृद्धि, सुख व मुक्ति के मार्ग के लिए रचा। व्यायाम या ध्यान जैसा योग आपके शरीर व मस्तिष्क को क्षण भर के लिए राहत दे सकता है।

योगेश्वर वाल्मीकि त्रिकाल पूरे जीवन को सुखी व समृद्ध बनाने का योग प्रदान करते हैं। योग का साधारणतः अर्थ होता है जोड़। परमेश्वर वाल्मीकि कमलेश्वर अपनी रचना 'योगविशिष्ट' के द्वारा प्राणी का योग {जोड़} ज्ञान से करवाने पर जोर देते हैं। प्राणी+ज्ञान=समृद्धि। यह है योगेश्वर वाल्मीकि दयावान का ज्ञान।

हम यही प्रयास आधस के मंच से करने का पूरा-पूरा प्रयास कर रहें हैं। इतिहास, धर्म, मर्यादा, शिक्षा व संस्कृति अर्थात प्रत्येक पक्ष से हम मानव का विकास चाहते हैं। आओ आप भी हिस्सा बनो इस आन्दोलन का। 9 तमसा {जून} 2019 प्रातः 11-34 जवाहर भवन, नजदीक शास्त्री भवन, नई दिल्ली।

योगेश्वर-पर्व समर्पण भी है, आस्था, कक्षा और परीक्षा भी। --दर्शन 'रत्न' रावण  किसी पौधे को जिन्दा रखने व फलदायक बनाने के ...
02/05/2019

योगेश्वर-पर्व समर्पण भी है, आस्था, कक्षा और परीक्षा भी। --दर्शन 'रत्न' रावण

किसी पौधे को जिन्दा रखने व फलदायक बनाने के लिए निरंतर सींचने और देखभाल की जरुरत होती है। कभी-कभी कुछ दोस्त कहते हैं कि अभी-अभी तो आपका कार्यक्रम हुआ था फिर एक और आयोजन रख लिया, ऐसा क्यों ?

अगर आप दिमाग पर थोड़ा ज़ोर देंगे तो आपको महसूस होगा कि आधस या आधस के अन्य अंगों {वाल्मीकि अम्बेडकर फांऊडेशन, आदि अम्बेदक आन्दोलन} जो भी आयोजन होता है वह नारों से भी ऊपर उठ कर एक तरह का कैडर {कक्षा} ही होती है।

पिछले कुछ वर्षों से हमने अलग-अलग विश्वविद्यालों से बड़े-बड़े शिक्षाविदों को बुलाना शुरू किया है। हम इस अहंकार से भी बचे कि हमीं सब कुछ जानते हैं। शिक्षा सेमिनार के आलावा दिल्ली में किये जा रहे आयोजनों में बहुत कुछ सीख पा रहे हैं।

सच यही है कि हमारी बस्तियां केवल शहरों से दूर नहीं रखी गई बल्कि यह कोशिश थी हमें शिक्षा, सभ्यता व संस्कृति से दूर रखने की। अब हमें सर्वांगीण प्रयास करने होंगे जो हम कर रहे हैं। योगेश्वर-पर्व भी केवल एक भीड़ इकठ्ठा करना नहीं है।

योगेश्वर-पर्व समर्पण भी है, आस्था, कक्षा और परीक्षा भी। योगविशिष्ट के रचयिता को समर्पित यह पर्व योगीमा-पर्व के विपरीत एकदम कड़कती धुप में दिल्ली जैसे पथरीले शहर में होता है। परमेश्वर के प्रति आस्था, गर्मी में परीक्षा और विद्वानों की कक्षा हमारी कौम को पूरी तरह बदल देगी।

सभी लोग परिवारों सहित आएं। धर्म, सभ्यता व संस्कृति परिवार के किसी एक आदमी से निर्मित नहीं होती। ये पनपते हैं परिवारों के समूह में। जैसा हमें आधस परिवार खड़ा किया है। आओ एक नई तहज़ीब {बोलने, उठने-बैठने और व्यवहार} अपने स्वभाव में पैदा करें।

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