18/11/2021
पंथो में बंटे संतों को कुश-लव जैसी शिक्षा-दीक्षा और एकता की सख्त जरूरत है। --दर्शन 'रत्न' रावण
वाल्मीकि विजय दिवस क्या है ?
वाल्मीकि विजय दिवस से क्या शिक्षा मिलती है ?
वाल्मीकि विजय दिवस को मनाने का कारण क्या है ?
वाल्मीकि विजय दिवस की जानकारी हमें वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में मिलती है। राजा रामचन्द्र जब महात्मा रावण को घोर छल-कपट से हरा कर अयोध्या आये तो अपनी जीत के अहंकार से बुरी तरह पीड़ित हो गए। यह आम आदमी के लिए स्वाभाविक भी है। राजा रामचन्द्र के मन में चक्रवर्ती राजा बनने की इच्छा जागृत हुई। उस वक्त छोटे-छोटे राज हुआ करते थे। लगभग आज के एक शहर जितने। उन सभी को धमका कर चौधरी बनने को चक्रवर्ती राजा कहते थे।
चक्रवर्ती राजा बनने के लिए राजा रामचन्द्र ने एक घोड़ा अपनी सेना के साथ भेजा। यह दूसरे छोटे-बड़े राज्यों {रियासतों} को अपना गुलाम बनाने के लिए चलाया। घोड़ा शक्ति का प्रतीक है और शक्ति अहंकार का प्रतीक है। राजा रामचन्द्र जी ने उस घोड़े पर एक सन्देश लिखी तख्ती भी टाँग दी। जिस पर लिखा था,
"यह घोड़ा जिस किसी राज्य से गुजर जाएगा वो सभी राज्य मेरे अधीन हो जाएंगे। जिस राजा को यह बात स्वीकार न हो उसे मेरे {राजा रामचन्द्र} साथ युद्ध करना होगा।"
ये सारा पैगाम या धमकी अहंकार से भरी हुई ही थी। अहंकार यह कि जब मैंने महात्मा रावण जैसे विद्वान, मेघनाद जैसे पराक्रमी योद्धा वीर कुम्भकर्ण जैसे अद्वितीय योद्धा और असंख्य पराक्रमी शूरवीरों को हरा दिया तो बाकी किसी की क्या औकात ?
अज्ञानता आदमी की समझ और धीरता खा लेते हैं। राजा राम चंद्र उस वक्त इसी अवस्था में थे।
आखिर ईश्वर का इन्साफ भी तो कोई मायने रखता है और हुआ यह कि दो छोटे-छोटे वीर बालक कुश-लव आगे आए। जब उन्होंने पढ़ा अहंकार से भरे पैगाम को और पकड़ ली घोड़े की लगाम फिर जो भी लड़ने आया सभी को मिट्टी में मिला दिया।
अब सवाल यह कि वाल्मीकि विजय दिवस क्यों ?
1. क्योंकि कुश-लव को शिक्षा-दीक्षा सृष्टिकर्ता वाल्मीकि दयावान ने दी थी।
2. उस करुणासागर वाल्मीकि त्रिकाल ने जो कौंच की पुकार पर भी प्रकट होते हैं। कुश-लव में वही करूणा भी भरी थक। फिर इंसानों को गुलाम कैसे सहन करते ?
3. एक पक्षी की जान को भी इंसान के बराबर मानना ही इंसानियत है।
विजय के विशेष कारण
1. कुश-लव की शिक्षा एक थी। 2. कुश-लव का विचार एक था। 3. उनका साहस एक जैसा था। 4. सबसे उत्तम बात कुश-लव में एकता थी।
हमें यही बात सीखनी है कि आप अगर एक हैं, आपके विचार एक हैं, आप में संघर्ष की ईच्छ एक-सी है तो दुनिया की कोई ताकत आपको हरा नहीं सकती। यह बात हमारी कौम से ज्यादा हमारे संतों को सीखनी होगी। जिनके कई पंथ हैं मगर वाल्मीकि धर्म उनके मन में कहीं नहीं है।
पंथो में बंटे संतों को कुश-लव जैसी शिक्षा-दीक्षा और एकता की सख्त जरूरत है।
वाल्मीकि रचना महाकाव्य से प्रेरित हो कर ही वंशदानी डाॅ भीम राव अम्बेडकर ने भी अपना मूलमंत्र बनाया।
शिक्षित हो (कुश-लव की तरह)
संगठित हो (कुश-लव की तरह)
संघर्ष करो (कुश-लव की तरह अन्याय (घोड़ा) रोको ।
परम आदरणीय आदि धर्म गुरु दर्शन 'रत्न' रावण जी द्वारा लिखित पुस्तक "तमसा के तीर" में से।
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