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यंत्र मंत्र तंत्र सिद्ध यंत्र मंत्र और तंत्र की साधना के द्वारा सब प्रकार की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास। सशुल्क।

सबको प्रणाम।कुछ दिवस बाद कुछ विशेष यंत्र बहुत कम दक्षिणा शुल्क पर बनाना आरंभ करूंगा, किसी को आवश्यकता हो तो स्मरण करा दी...
01/02/2026

सबको प्रणाम।
कुछ दिवस बाद कुछ विशेष यंत्र बहुत कम दक्षिणा शुल्क पर बनाना आरंभ करूंगा, किसी को आवश्यकता हो तो स्मरण करा दीजिएगा। यंत्र ताबीज में डालने वाले होंगे। दक्षिणा बहुत कम होगी, मात्र 51 रुपए परन्तु पोस्टल चार्ज अलग से लगेगा। शुल्क के एक महीने बाद पोस्ट किया जाएगा, उतने समय उसकी पूजा अर्चना में समय चाहिए।

वैसे तो देवी देवता बाल रूप मे होते नहीं। हमारे लिए वे सदा हमारे माता पिता और गुरु के रूप मे ही अधिकतर रहे हैं किन्तु ये ...
05/04/2024

वैसे तो देवी देवता बाल रूप मे होते नहीं। हमारे लिए वे सदा हमारे माता पिता और गुरु के रूप मे ही अधिकतर रहे हैं किन्तु ये कोई सार्वभोमिक नियम नही हैं। हम उनसे भाई बहन मित्र और यहाँ तक की एक संतान की भांति भी प्रेम कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आपका उनके साथ गहरा जुड़ाव होना चाहिए, मायने ये नही रखता आप उन्हे किस रूप मे देखते हैं। जो स्वरूप् भाता है जो रिश्ता भाता है वही जोड़ लीजिए उसी से जुड़ जाईये।
मन करता है तो मां बोलिए मन करता है तो बहन बोलिए।
जिस भावना मे आप अधिक डूब सकते हैं वही रिश्ता बना लीजिए इससे आपके लिए भक्ति साधना बोरिंग नही होगी बोझ नही लगेगी बल्कि बिल्कुल सहज हो जाएगी।
ऐसा मेरा निजी दृष्टिकोण है, मै नही जानता ये कितना सही है कितना गलत किन्तु मुझे अच्छा अनुभव हुआ इससे आप चाहे तो इसे अपना सकते हैं,चाहे तो त्याग सकते हैं।

मृत्यु मुर्दे श्मशान अंधकार अग्नि और अंत। ये सब जीवन की कटु सत्यता होती है। लोग इनसे दूर रहने का प्रयास करते हैं। किन्तु...
31/03/2024

मृत्यु मुर्दे श्मशान अंधकार अग्नि और अंत। ये सब जीवन की कटु सत्यता होती है। लोग इनसे दूर रहने का प्रयास करते हैं। किन्तु इनसे निर्भयता तो तभी आना सम्भव है जब व्यक्ति इन्ही के मध्य रहता है।
ऐसा मेरा अपना दृष्टिकोण है कोई सार्वभोमिक नियम या सिद्धांत नही है।

आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरूप याहि यज्ञम् | वायोअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ||        ...
16/03/2024

आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरूप याहि यज्ञम् | वायोअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः || ऋग्वेद 7/92/5 परमात्मा ने वेद में शिक्षा दी है कि हे यजमानों! सैकडों और सहस्रों शक्तियों वाले कर्मयोगी विद्वानों को बुलाने करने का उपदेश किया है। तुम अपने यज्ञों में ऐसे विद्वान और सिद्ध को बुलाओ जिनके पास सैकडों प्रकार की शक्तियां हैं और सांसारिक लाभ से संबंधित विद्याओं के विषय मे ज्ञान हो। उनको बुलाकर तुम उनसे उपदेश सुनो ||

गुरु आपको मंत्र दे सकता है, साधना का मार्ग सुझा सकता है, मार्ग मे आने वाली बाधाओं के प्रति सचेत करता है और भी काफी कुछ स...
15/03/2024

गुरु आपको मंत्र दे सकता है, साधना का मार्ग सुझा सकता है, मार्ग मे आने वाली बाधाओं के प्रति सचेत करता है और भी काफी कुछ सुलझा देता है जो हम देख नही पाते और कदाचित वे बताते भी नहीं। किन्तु आगे तो मनुष्य को स्वयं ही बढ़ना होता है पुरुषार्थ तो करना ही होगा मुझे नही लगता कि कोई गुरु किसी शिष्य को बिना अभ्यास करवाए कोई सिद्धि या मुक्ति दे सकता है, और यदि बहुत वर्षो की सेवा से प्रसन्न होकर गुरु ऐसा करता भी है तब भी वह एक प्रकार से उसकी सेवा का ही फल है वहां गुरु तो निमित्त मात्र हैं साधना के बिना तो कभी किसी को कुछ मिलता नही फिर चाहे सेवा रूप मे की जाये, अनवरत दान रूप मे, स्वाध्याय, पाठ, योग, चिंतन अथवा कोई और स्वरूप ये सभी साधना ही हैं।
गुरु हों या ऋषि मुनी या संत जन वे सभी के उद्धार की कामना करते हैं, सभी शिष्यों के साथ और साधारण जनता के साथ भी समान व्यवहार करते थे और अब भी करते हैं जो वास्तव मे साधु संत हैं किन्तु क्या उनके सभी शिष्य समान योग्यता अर्जित कर पाते हैं या वे सभी मुक्त हुए हैं कभी, उत्तर होगा नही। गुरु की कितनी भी कामना हो शिष्य के उत्थान की उद्धार की किन्तु वो अकेले अपने पुरुषार्थ से उसको कभी पार उतार ही नही सकता, वो योग्यता तो शिष्य को स्वयं अर्जित करनी ही पड़ेगा। वरना पुराने ऋषि मुनी संत देवता सबको पार ना उतार देते।

सबका अपना भाव होता है कोई ज्ञान के प्रति झुकता है कोई योग के प्रति तो कोई प्रेम भक्ति के प्रति तो कोई कोई सेवा भाव के प्...
15/03/2024

सबका अपना भाव होता है कोई ज्ञान के प्रति झुकता है कोई योग के प्रति तो कोई प्रेम भक्ति के प्रति तो कोई कोई सेवा भाव के प्रति। असल मे मुझे तो सेवा भाव सबसे कठिन लगता है।
एक आचार्य जी ने कहा है___
स्वामी होना सहज है, मुश्किल होना दास।
हनुमान सा हेत ले, रामचंद्र के पास।।
अर्थात स्वामी बनना फिर भी सहज है किन्तु सेवा भाव धारण करके सहज रूप से बिना ना नुकुर के सेवा करते रहने वाला सेवक बनना बहुत कठिन है, उदाहरण हनुमान जी का दिया है, जिसे सेवा भाव सीखना है हनुमान जी से सीखिए सामर्थ्यवान होते हुए भी उनमे सामर्थ्य का अह्म ना होकर सेवा भाव था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की सेवा मे सर्वदा तत्पर रहे। और यह तो मात्र जीवनी हमारे समक्ष श्री रामचंद्र जी की प्रस्तुत है, इसलिए उनकी सेवा का वर्णन ही अधिक मिलता है अन्यथा उनमे सेवा भाव तो अपने सभी रिश्ते नातेदारो, राजा और सामान्य जन के प्रति भी उतना ही था। माँ अंजनी हों या राजा सुग्रीव अथवा ऋषि मुनी गण सभी की सेवा उन्होंने सदा मन से ही की। तो जो व्यक्ति सेवा के मार्ग से अध्यात्मिक होना चाहते हैं उन्हे केवल अपने ईष्ट के विग्रह की सेवा से सेवा की पूर्णता प्राप्त नही हो सकती, उनकी सेवा तब पूर्ण होगी जब वे सम्पूर्ण सृष्टि के हर प्राणी मे अपने ईष्ट की छवि देखकर उतनी ही तन्मयता के साथ हर उस प्राणी की और प्रकृति की सेवा करें जिनको सेवा की आवश्यकता है।

संतान के लिए... वैदिक अनुष्ठान भी हैं तांत्रिक अनुष्ठान भी हैं। गोपाल जी से संबंधित सिद्ध यंत्र धारण करके गोपाल संतान दा...
05/03/2024

संतान के लिए...
वैदिक अनुष्ठान भी हैं तांत्रिक अनुष्ठान भी हैं। गोपाल जी से संबंधित सिद्ध यंत्र धारण करके गोपाल संतान दायी मंत्र का अच्छे से जाप कर सकते हैं। किन्तु इन सबके साथ अपनी पूर्ण चिकित्स्कीय जाँच के उपरांत आयुर्वेद की अच्छी औषधियों का साथ मे सेवन अवश्य करें। और कुछ माह या संभव हो तो पति पत्नी वर्ष भर के ब्रह्मचर्य के बाद संतान का प्रयास करें। तब लगभग लगभग संतान होने की सबसे अधिक संभावना होती है। और हाँ ज्योतिष विशेषज्ञ से पति पत्नी और यदि पहले कोई संतान है तो उनकी भी कुंडली का विश्लेषण संतान के संबंध मे अवश्य करवा लें।

मृत्यु तो सबकी आनी है उसे रोका नही जा सकता किन्तु जिसके वश मे है उन साधको को चाहिए कि कुछ लोगो की ऐसी मृत्यु को रोके जो ...
05/03/2024

मृत्यु तो सबकी आनी है उसे रोका नही जा सकता किन्तु जिसके वश मे है उन साधको को चाहिए कि कुछ लोगो की ऐसी मृत्यु को रोके जो प्राकृतिक ना हो प्रकृति की शक्तियों द्वारा ना हुयी हो।
प्रकृति द्वारा दी जाने वाली मृत्यु को रोकना तो असम्भव जैसा है और उचित भी नही है किन्तु मानव रचित या संभावी दुर्घटनाओं को कभी कभी रोका जा सकता है।

ये भी बड़ी विडंबना है कि जिसको असमय जाना होता है उसको पता होता नहीं और जिस किसी को इस विषय मे पता चल जाता है उसकी कोई मान...
05/03/2024

ये भी बड़ी विडंबना है कि जिसको असमय जाना होता है उसको पता होता नहीं और जिस किसी को इस विषय मे पता चल जाता है उसकी कोई मानता नहीं, क्यूंकि भविष्य के विषय मे प्रस्तुत करने के लिए कोई प्रमाण नही होता उसके पास। और बता देने पर प्रकृति भी दुघटनाओं को और मृत्यु को थोड़ा बहुत आगे पीछे करके बताने वाले को गलत सिद्ध कर देती है। समझ नही आता ऐसे मे करे तो क्या करें!!!

माता आदि शक्ति जगदम्बा दुर्गा का भोग विषय:-आदि शक्ति से तो सारी सृष्टि है महादेवी जो भी आपको उचित लगे दे सकती हैं, वे तो...
04/03/2024

माता आदि शक्ति जगदम्बा दुर्गा का भोग विषय:-
आदि शक्ति से तो सारी सृष्टि है महादेवी जो भी आपको उचित लगे दे सकती हैं, वे तो सब प्रकार का सात्विक तामसिक राजसिक आहार ग्रहन कर लेती हैं। किन्तु वैष्णव सम्प्रदाय वालो को तो सात्विक भोग ही देना चाहिए। मेरी कुलदेवी भी आदि शक्ति जगदम्बा दुर्गा हैं। देशी घी का बना हलवा पूरी ही सर्वोत्तम भोग है। शेष मिष्ठान तो बाद के युग मे बनना आरम्भ हुए हैं। हमारे पूर्वज तो सदा से हलवा पूरी का ही भोग लगाते रहे हैं।
और माता काली और शीतला माता आदि को गुड़ तेल से बने पूड़े पापड़ी गुलगुले और बतासे ये भोग लगते रहे हैं। और जहाँ पान आदि के सेवन के चलन रहा है पुराने दौर से वहां साथ मे मीठा पान लोंग इलायची और जायफल लगता है। पान मे पत्ता पूरा danthal सहित होना चाहिए। लोंग मुर्गे की जगह इलायची बकरे की जगह जायफल भैंसे की जगह और नारियल मनुष्य की जगह बली रूप मे चढ़ाये जाते हैं।
कभी भी भोग के विषय मे विचार करना हो आपको तो आप स्वयं को पुराने समय मे ले जाएँ और उस समय के व्यंजनों पर विचार करें। वही वास्वतिक भोग होगा।
और जब कुछ समझ ना आये तो पीले गैंदे के फूल, केले का फल, और बेसन की बूंदी का लड्डू और पीला वस्त्र और शुद्ध देशी घी का दीपक या आहुति ये सब ऐसे द्रव्य हैं जिन्हे कभी कोईदेवता कोई देवी शक्ति अस्वीकार नही करती। ये सबको स्वीकार होते हैं।

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