15/03/2024
गुरु आपको मंत्र दे सकता है, साधना का मार्ग सुझा सकता है, मार्ग मे आने वाली बाधाओं के प्रति सचेत करता है और भी काफी कुछ सुलझा देता है जो हम देख नही पाते और कदाचित वे बताते भी नहीं। किन्तु आगे तो मनुष्य को स्वयं ही बढ़ना होता है पुरुषार्थ तो करना ही होगा मुझे नही लगता कि कोई गुरु किसी शिष्य को बिना अभ्यास करवाए कोई सिद्धि या मुक्ति दे सकता है, और यदि बहुत वर्षो की सेवा से प्रसन्न होकर गुरु ऐसा करता भी है तब भी वह एक प्रकार से उसकी सेवा का ही फल है वहां गुरु तो निमित्त मात्र हैं साधना के बिना तो कभी किसी को कुछ मिलता नही फिर चाहे सेवा रूप मे की जाये, अनवरत दान रूप मे, स्वाध्याय, पाठ, योग, चिंतन अथवा कोई और स्वरूप ये सभी साधना ही हैं।
गुरु हों या ऋषि मुनी या संत जन वे सभी के उद्धार की कामना करते हैं, सभी शिष्यों के साथ और साधारण जनता के साथ भी समान व्यवहार करते थे और अब भी करते हैं जो वास्तव मे साधु संत हैं किन्तु क्या उनके सभी शिष्य समान योग्यता अर्जित कर पाते हैं या वे सभी मुक्त हुए हैं कभी, उत्तर होगा नही। गुरु की कितनी भी कामना हो शिष्य के उत्थान की उद्धार की किन्तु वो अकेले अपने पुरुषार्थ से उसको कभी पार उतार ही नही सकता, वो योग्यता तो शिष्य को स्वयं अर्जित करनी ही पड़ेगा। वरना पुराने ऋषि मुनी संत देवता सबको पार ना उतार देते।