Kayasth Temples of Jharkhand

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Kayasth Temples of Jharkhand (KTJ) is an apolitical platform created to research and integrate the presence and activities of all Kayasth temples in the state including Shri Chitragupta and Lord Brahma in order to foster and promote their unity.

11/04/2025

श्रीराम का अवतरण सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) में हुआ था, जो क्षत्रिय कुल माना जाता है। श्रीकृष्ण का अवतरण यदुवंश (चंद्....

श्री चित्रगुप्त भगवान के अवतरण दिवस (12 अप्रैल 2025) पर प्रस्तुत है कायस्थ इनसाइक्लोपीडिया के लेखक और पूर्व आईपीएस अधिका...
11/04/2025

श्री चित्रगुप्त भगवान के अवतरण दिवस (12 अप्रैल 2025) पर प्रस्तुत है कायस्थ इनसाइक्लोपीडिया के लेखक और पूर्व आईपीएस अधिकारी श्री उदय सहाय का लेख। श्री चित्रगुप्त भगवान का अवतरण दिवस हमें अत्यंत गहन और प्रेरक आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है। चित्रगुप्त भगवान केवल मृत्यु के बाद कर्मों का लेखा रखने वाले देवता नहीं हैं, बल्कि वे जीवन में विवेक, आत्मनिरीक्षण और न्यायप्रियता के प्रतीक हैं। इस तरह, उनकी उपासना आत्म-जागरूकता की उपासना है। आधुनिक युग में, जहाँ बाह्य आकर्षण और आत्मकेंद्रित जीवनशैली का बोलवाला है, चित्रगुप्त भगवान हमें यह स्मरण कराते हैं कि हर विचार, हर कर्म, हर भावना ब्रह्मांड में अंकित होती है।



श्री चित्रगुप्त भगवान के अवतरण की कथा श्री चित्रगुप्त भगवान का पृथ्वी पर उज्जैन के क़रीब शिप्रा नदी के तट पर उतरने...

01/01/2025
31/12/2024

कायस्थों के मुख्य पर्व(उदय सहाय)————————-श्री चित्रगुप्त जी पृथ्वीलोक पर तीन बार प्रकट हुए। इसमें सबसे धूम-धाम और विधिवत...
02/11/2024

कायस्थों के मुख्य पर्व
(उदय सहाय)
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श्री चित्रगुप्त जी पृथ्वीलोक पर तीन बार प्रकट हुए। इसमें सबसे धूम-धाम और विधिवत ढंग से मनाई जाती है उत्तर भारत में श्री चित्रगुप्त पूजा। इस पूजा से जुड़े दो आख्यान हैं: एक जुड़ा है भाई-बहन (यम और यमुना) के भोजन आमंत्रण के क़िस्से से और साथ ही कायस्थों द्वारा कलम न छुने के क़िस्से से।

श्री चित्रगुप्त जी के पृथ्वी पर पदार्पण का दूसरा वाक़या जुड़ा है महाभारत काल के भीष्म पितामह के सशक्तिकरण की कहानी से। इस पदार्पण की तीसरी कहानी है श्री चित्रगुप्त के अवतरण की। हम आज कायस्थों के इन तीनों पर्वों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

१. दावात पूजा या श्री चित्रगुप्त पूजा
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आज श्री चित्रगुप्त भगवान की पूजा का दिन है। कार्तिक यम द्वितीया के दिन, यानि यह दिवाली के अगले दिन के बाद वाला दिन हिन्दी पट्टी के और दक्षिण के कायस्थों में धूम धाम से मनाया जाता हैं। चारों चित्रगुप्त धाम के मन्दिरों - अयोध्या, पटना, उज्जैन, और कांचीपुरम - में इसकी सार्वजनिक पूजा होती है। साथ ही हर कायस्थ गृहस्थ इसे घर की चारदीवारी के बीच भी संपन्न करता है। श्री चित्रगुप्त पूजा करने वाले कायस्थों को चित्रगुप्तवंशीय कायस्थ कहते हैं।

दो कथाओं से जुड़ा है यह दिन। पहला जब यम देव की बहन यमुना ने अपने भाई को विधिवत आमंत्रित किया, और साथ ही मृत्यु लोक के स्वामी श्री चित्रगुप्त जी को भी आमंत्रित किया और भोजन परोसने के पहले दोनों की विधिवत पूजा अर्चना की। दूसरी कहानी जुड़ी है श्री राम जी के राज्याभिषेक से, जब आमंत्रण देने के ज़िम्मेवार वशिष्ठ मुनि इस कार्य में चूक गये। श्री राम जी के टोके जाने पर आनन फ़ानन में आमंत्रण पाकर लेखा जोखा का काम छोड़कर श्री चित्रगुप्त तत्काल रवाना हुए। दावत पूजा के बाद कायस्थों द्वारा 24 घंटे कागज़-कलम त्यागने की कहानी इसी कथा से प्रेरित है।

प्रकटोत्सव या वरदान दिवस
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यह पर्व वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन मनाई जाती है पर्व मई के महीने में। महाभारत काल में इस दिन श्री चित्रगुप्त भीष्म पितामह को परशुराम से युद्ध में अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने प्रकट हुए। मान्यता यह भी है कि इस अवसर पर श्री चित्रगुप्त में भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया और इसलिए इस दिवस को वरदान दिवस भी कहा जाता है।

अवतरण दिवस
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श्री चित्र गुप्त भगवान के पृथ्वी पर उतरने की मान्यता के पहले उनके अवतरण की मान्यता समझनी ज़रूरी है। माण्डव ऋषि द्वारा यम को दिये हुए श्राप से श्री चित्रगुप्त जी के अवतरण की कथा जुड़ी है। श्रापित यम के सहायता बतौर पर्यवेक्षक प्रदान करने के आग्रह पर, श्री ब्रह्म जी ने वर्षों तपस्या की। जिससे देवलोक में श्री ब्रह्म जी की सम्पूर्ण काया से चार भुजा वाले श्री चित्तगुप्त भगवान का अवतरण हुआ। अवतरण के बाद श्री ब्रह्म जी ने श्री चित्रगुप्त जी का अस्तित्व, नामकरण, और भूमिका तय किया। यह चैत्र पूर्णिमा का दिन था (अप्रैल के महीनें में)। इसी दिन श्याम वर्ण के चार भुजाओं वाले श्री चित्रगुप्त जी श्री ब्रह्म जी के सम्पूर्ण काया से अवतरित हुए। उनके एक हाथ में लेखन-तुलिका, एक हाथ में तलवार, एक हाथ में वेद, और चौथे हाथ आशीर्वाद देता हुआ है।

इसी दिन श्री ब्रह्म जी ने अवतरित स्वरूप का नामकरण श्री चित्तगुप्त बतौर यह कह कर कि वह श्री ब्रह्म के चित्त में गुप्त रूप से वर्षों अवतरित रहे। कालांतर में चित्त गुप्त शब्द के अपभ्रंश से चित्रगुप्त शब्द प्रचलित हो गया। ब्रह्म जी ने आगे कहा की उनके संतान कायस्थ कहलायेंगे, चुकि वह श्री चित्त गुप्त श्री ब्रह्म की काया में वर्षों अस्त यानि विराजमान रहे। श्री ब्रह्म जी ने श्री चित्रगुप्त जी की भूमिका बतौर पाप-पुण्य लेखाकार, न्यायाधिकारी, और दंडाधिकारी तय किया।

तत्पश्चात श्री ब्रह्म जी के ही निर्देश पर श्री चित्रगुप्त ने सृष्टि-चालन के विधि-विधान में पांडित्य प्राप्त करने के लिये अवन्ति (उज्जैन) के कायथा गाँव के लिए तत्काल प्रस्थान किया। यहाँ शिप्रा नदी के किनारे वर्षों की तपस्या उपरांत, और सृष्टि को संचालित करने के विधि विधान में पांडित्य प्राप्त करने के बाद, श्री ब्रह्म जी ने दो महिलाओं से श्री चित्रगुप्त जी का विवाह सम्पन्न करवाया। इसी जगह पर श्री चित्रगुप्त जी के 12 पुत्रों ने जन्म लिया। अपने इन 12 पुत्रों को श्री चित्रगुप्त जी ने उस समय के श्रेष्ठतम गुरुकुलों में शिक्षा के लिए भेजा। शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये पुत्र कायथा लौटे जहां उनका विवाह श्री चित्रगुप्त ने नाग वंशी महिलाओं से कराया। तत्पश्चात श्री चित्रगुप्त ने अपनी-अपनी यश और समृद्धि की ध्वजा फैलाने के लिए इन पुत्रों को पत्नियों सहित भारत के अलग-अलग दिशाओं में विदा किया। पृथ्वी पर गृहस्थी की ज़िम्मेवारियों से निपट कर श्री चित्रगुप्त अपने मूल स्थान को अपने मूल भूमिका के निर्वाह के लिए लौट गये।

उपरोक्त तीन मुख्य पर्वों के अलावा निकट भविष्य में दो और कायस्थ संबंधित पर्वों के प्रचलित होने की पूरी संभावना हैः

पहला। श्री चित्रगुप्त जी का विवाह दिवस का दिनांक तय ना होने के कारण इसे पर्व के तौर पर मनाया नहीं जा सका है। अगर कोई शोधार्थी इस तिथि का निर्धारण एक शास्त्र सम्मत ढंग से कर सके, तब वह दिन दूर नहीं जब कायस्थ समुदाय इसे धूम धाम से मनाने लगेगा।

दूसरा। इसी तरह नाग पंचमी का पर्व कायस्थों के लिए महत्वपूर्ण है। श्री चित्रगुप्त के बारहों पुत्रों का विवाह नागवंशी पुत्रियों से हुआ, और इस तरह मान्यता है कि कायस्थों का ननिहाल नागवंश है।

उपरोक्त पर्वों का व्याख्यान कायस्थ-महाआख्यान (Grand Narrative) में वर्णित है। जहां यह पूर्ण होती है, वहीं कायस्थ-इतिहास की शुरुआत होती है। उज्जैन के समीप स्थित ‘कायथा’ इस तरह कायस्थों से जुड़े महाआख्यायनों और इतिहास का संगम है। कायथा से ही कायस्थों की बारहों उपजातियाँ भारत के अलग अलग हिस्सों में जा बसीं॥

13/09/2024

यह खुशी की बात है कि कम समय में इस फेसबुक पेज से दो हजार से ज्यादा चित्रांश जुड़ चुके हैं। आग्रह है कि परिवार के अन्य सदस्यों को जोड़ने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

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Kayasth Temples of Jharkhand (KTJ) is an apolitical platform created to research and integrate the presence and activities of all Kayasth temples in the state including Shri Chitragupta and Lord Brahma in order to foster and promote their unity.

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा की रांची जिला ईकाई की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में  50 मेधावी चित्रांश छात्र-छात्राओं को प्र...
13/09/2024

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा की रांची जिला ईकाई की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में 50 मेधावी चित्रांश छात्र-छात्राओं को प्रशस्ति पत्र, मोमेंटो, सर्टिफिकेट एवं मेडल प्रदान किया गया। इस मौके पर समाज के शिक्षाविदों ने इन छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए मार्गदर्शन किया।

13/09/2024

मध्य प्रदेश के शिप्रा नदी के समीप कायथा गाँव के पास अवतरित होकर, श्री चित्रगुप्त जी ने वर्षों विधि विधान पर पारंगत होने ...
10/08/2024

मध्य प्रदेश के शिप्रा नदी के समीप कायथा गाँव के पास अवतरित होकर, श्री चित्रगुप्त जी ने वर्षों विधि विधान पर पारंगत होने की तपस्या की। तपस्या पूर्ण होने पर यहीं भगवान श्री चित्रगुप्त की दो शादियाँ संपन्न की भगवान ब्रह्मा जी ने, जिनसे 12 पुत्र थे। श्री चित्रगुप्त भगवान ने इन पुत्रों को भारत के तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ गुरुकुलों में भेजा। तत्पश्चात् इन पुत्रों का विवाह नागराज बासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। इसी कारण से कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है| इस नागपंचमी के दिन पुराने कायस्थ परिवारों में विधिवत ढंग से पूजा होती है। इस मान्यतानुसार कायस्थ कभी साँपों को नहीं मारते।

कायस्थों के लिए नागपंचमी की महत्ता/ उदय सहाय
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आज नाग पंचमी है। मान्यता है कि कायस्थो का ननिहाल "नागवंश" है। आज भी कश्मीर के कई इलाक़ों का नाम नाग़ है, (अनंतनाग, वेरिनाग, नीलानाग आदि) जहाँ सैंकड़ों वर्ष तक कायस्थों का राज रहा। वर्तमान मध्य प्रदेश के शिप्रा नदी के समीप कायथा गाँव के पास अवतरित होकर, श्री चित्रगुप्त जी ने वर्षों विधि विधान पर पारंगत होने की तपस्या की। तपस्या पूर्ण होने पर यहीं भगवान श्री चित्रगुप्त की दो शादियाँ संपन्न की भगवान ब्रह्मा जी ने, जिनसे 12 पुत्र थे। श्री चित्रगुप्त भगवान ने इन पुत्रों को भारत के तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ गुरुकुलों में भेजा। तत्पश्चात् इन पुत्रों का विवाह नागराज बासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। इसी कारण से कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है| इस नागपंचमी के दिन पुराने कायस्थ परिवारों में विधिवत ढंग से पूजा होती है। इस मान्यतानुसार कायस्थ कभी साँपों को नहीं मारते।

श्री चित्रगुप्त भगवान की पहली पत्नी सूर्यदक्षिणा/नंदनी थीं। इनसे 4 पुत्र हुए जो भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू कहलाए। दूसरी पत्नी एरावती/शोभावति थी, इनसे 8 पुत्र हुए जो चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र,और अतिन्द्रिय कहलाए।| जिसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी दिया गया है |

माता सूर्यदक्षिणा / नंदिनी ( श्राद्धदेव की कन्या ) के चार पुत्र काश्मीर के आस -पास जाकर बसे तथा ऐरावती / शोभावति के आठ पुत्र गौड़ देश के आसपास बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल में जा बसे | बंगाल उस समय गौड़ देश कहलाता था, पद्म पुराण में इसका उल्लेख किया गया है |

माता सूर्यदक्षिणा / नंदिनी के पुत्रों का विवरण

1 - भानु ( श्रीवास्तव ) - उनका राशि नाम धर्मध्वज था | चित्रगुप्त जी ने श्री श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार के इलाके में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ | उस विवाह से श्री देवदत्त और श्री घनश्याम नामक दो दिव्य पुत्रों की उत्पत्ति हुई | श्री देवदत्त को कश्मीर का एवं श्री घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला | श्रीवास्तव 2 वर्गों में विभाजित हैं। खरे एवं दूसरे। कालांतर में कश्मीर से उतर कर यह अयोध्या, पूर्वी उप्र के भोजपुरी क्षेत्र, उत्तरी बिहार, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ में बसे।

2 - विभानू (सूर्यध्वज ) - उनका राशि नाम श्यामसुंदर था | उनका विवाह नाग कन्या देवी मालती से हुआ | महाराज चित्रगुप्त ने श्री विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | चूंकि उनकी माता दक्षिणा सूर्यदेव की पुत्री थीं,तो उनके वंशज सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाये और सूर्यध्व्ज नाम से जाने गए | अंततः वह मगध में आकर बसे|

3 - विश्वभानू ( बाल्मीकि ) - उनका राशि नाम दीनदयाल था और वह देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | श्री विश्वभानु का विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ | यह ज्ञात है की उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया | इस तपस्या के समय उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढका हुआ था | उनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने | उनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात में जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए | आज वह गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं | गुजरात में उनको "वल्लभी कायस्थ" भी कहा जाता है |

4 - वीर्यभानू (अष्ठाना) - उनका राशि नाम माधवराव था और उन्हीं ने नागकन्या देवी सिंघध्वनि से विवाह किया | वे देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे| महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री वीर्यभानु को आधिस्थान में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | उनके वंशज अष्ठाना नाम से जाने गए और रामनगर- वाराणसी के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया | आज अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं | मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या ध्यान रखने योग्य है |

माता ऐरावती / शोभावति के पुत्रों का विवरण

1- चारु ( माथुर )- वह गुरु मथुरे के शिष्य थे | उनका राशि नाम धुरंधर था और उनका विवाह नाग कन्या देवी पंकजाक्षी से हुआ | वह देवी दुर्गा की आराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनके वंशज माथुर नाम से जाने गाये |उन्होंने राक्षसों (जोकि वेद में विश्वास नहीं रखते थे ) को हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया | इसके पश्चात् उनहोंने आर्यावर्त के अन्य हिस्सों में भी अपने राज्य का विस्तार किया | माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई पद ग्रहण किये | माथुर 3 वर्गों में विभाजित हैं यथा देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी | उनके बीच 84 अल हैं| कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि| इटावा के मदनलाल तिवारी द्वारा लिखित मदन कोश के अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की आज के समय में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था| माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे |

2- सुचारु ( गौड़) - वह गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था | वह देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री सुचारू को गौड़ क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था | श्री सुचारू का विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ | गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त प्रसिद्द हैं |

3- चित्र ( चित्राख्य ) ( भटनागर ) - वह गुरू भट के शिष्य थे |उनका विवाह नागकन्या देवी भद्रकालिनी से हुआ था | वह देवी जयंती की अराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | उन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए | उनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए | भटनागर 84 अल में विभाजित हैं | कुछ अल इस प्रकार हैं- दासनिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है |

4- मतिभान ( हस्तीवर्ण ) ( सक्सेना ) - माता शोभावती (इरावती) के तेजस्वी पुत्र का विवाह देवी कोकलेश से हुआ | वे देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे | चित्रगुप्त जी ने श्री मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा | उनके पुत्र एक महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया | आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था| आज वे कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावाह, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना 'खरे' और 'दूसर' में विभाजित हैं।

5- हिमवान (अम्बष्ठ ) - उनका राशि नाम सरंधर था और उनका विवाह नागकन्या देवी भुजंगाक्षी से हुआ | वह देवी अम्बा माता की अराधना करते थे | गिरनार और काठियवाड के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा | श्री हिमवान की पांच दिव्य संतानें हुईं : श्री नागसेन , श्री गयासेन, श्री गयादत्त, श्री रतनमूल और श्री देवधर | ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया | अंततः वह पंजाब-दक्षिण कश्मीर में जाकर बसे| सिकन्दर से इन्हें हार का सामना करना पड़ा पर उस युद्ध में सिकंदर आहत हो गया और उसने अपने सेनापति को इन्हें सामूल नाश का आदेश दिया। वहाँ से पलायन कर चंद्रगुप्त के निमंत्रण पर वह पाटलिपुत्र के इर्द गिर्द गाँवों में बसे। यह गाँव इनके "खास घर" कहलाये। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी इस्तेमाल किये जाते हैं |

6- चित्रचारु ( निगम) - उनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह नागकन्या अशगंधमति से हुआ | वह देवी दुर्गा की अराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र(सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। मुख्य तौर पर यह उत्तर प्रदेश में बसे हैं।

7- चित्रचरण (कर्ण ) - उनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह नागकन्या देवी कोकलसुता से हुआ | वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारूण को कर्ण क्षेत्र (आधुनिक कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | उनके वंशज समय के साथ उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और आज नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं | उनकी बिहार की शाखा दो भागों में विभाजित है : 'गयावाल कर्ण' – जो गया में बसे और 'मैथिल कर्ण' जो मिथिला में जाकर बसे | मगध सम्राट महापदमानन्द के समय में कर्ण ऊँचे पदों पर थे। सत्ता परिवर्तन में ये आज का ओड़िसा, आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, और तमिल नाडु में जा बसे। कलूचरी राज्य की संरक्षण में यह वापस भारत नेपाल सीमा पर इन्होंने कर्नाट राज्य की स्थापना की। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि उपनाम प्रचलित है| मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है | पंजी वंशावली रिकॉर्ड की एक प्रणाली है | इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है |

8- चारुण [श्री अतिन्द्रिय] ( कुलश्रेष्ठ )- उनका राशि नाम सदानंद है और उन्हों ने नागकन्या देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया | वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते हैं | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री अतिन्द्रिय (जितेंद्रिय) को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था| श्री अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से अधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाली संतानों में से थे | उन्हें 'धर्मात्मा' और 'पंडित' नाम से जाना गया और स्वभाव से धुनी थे | उनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए |आधुनिक काल में वे मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, इटाह, इटावाह और मैनपुरी में पाए जाते हैं |

सौजन्य: www.kayasthencyclopedia.com
श्री चित्रगुप्त जी की दैविक छवि। चित्रकार संतन कुमार

श्री चित्रगुप्त मंदिरों के उत्थान के लिए इसलिए आवश्यक है कि वहाँ श्री चित्रगुप्त भगवान की चार भुजाओं वाली दैविक मूर्ति स...
05/08/2024

श्री चित्रगुप्त मंदिरों के उत्थान के लिए इसलिए आवश्यक है कि वहाँ श्री चित्रगुप्त भगवान की चार भुजाओं वाली दैविक मूर्ति स्थापित हो। साथ ही वहाँ विष्णु, ब्रह्म, शिव, दुर्गा, सूर्य भगवान की मूर्ति स्थापित ज़रूर हो - उदय सहाय, लेखक, Kayastha Encyclopedia

STANDARDINZATION, UPSCALING & MAINSTREAMING OF SHRI CHITRAGUPTA

शास्त्रनुसार श्री चित्रगुप्त भगवान की दो प्रकार की छवि या मूर्ति वर्णित हैं: (१) पारिवारिक मूर्ति जिसमें वह अपने १२ पुत्रों और दो पत्नियों के साथ दिखते हैं। ऐसी मूर्ति की पूजा साधारणतः घर के अन्दर दवात पूजा के अवसर पर की जाती है। (२) उपरोक्त वर्णित श्री चित्रगुप्त भगवान की दैविक मूर्ति। यह छवि ब्रह्म जी के वर्षों की तपस्या के पश्चात उनके समक्ष अवतरित हुई थी, और उनसे अपने अस्तित्व और अवतरण के प्रयोजन के विषय में अपनी जिज्ञासा रखी थी। शास्त्र वर्णित इस दैविक मूर्ति की निम्नलिखित शर्ते हैं: (१) इसमें वह श्याम वर्ण के हैं। (२) इसमें उनकी चार भुजाएँ है। जिसमें एक में वेद है, दूसरे में क़लमनुमा मोर पंख है, तीसरे में शस्त्र (तलवार) है, और चौथे में आशीर्वाद है। (३) पंच नाग उनकी रक्षा में हर समय अदृश्य साये के तरह पीछे खड़े हैं। (४) उनकी इष्ट देवी माँ दुर्गा सदा अदृश्य ढंग से वायीं तरफ़ उपस्थित हैं और उनके इष्टदेव सूर्य भगवान की अदृश्य उपस्थिति दायीं तरफ़ हैं। (५) अवतरण की इस दैविक मूर्ति में श्री चित्रगुप्त भगवान की मूंछे नहीं हैं। (६) श्री चित्रगुप्त की इस छवि को मन्दिरों या सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित करनी चाहिए।

हिन्दी पट्टी राज्यों के श्री चित्रगुप्त मन्दिरों के दर्शन के दरमियान मैंने पाया की जिन मंदिरों में श्री चित्रगुप्त अपने १२ लड़कों के साथ स्थापित किए गये है, वहाँ श्रद्धालुओं की संख्या एक्का-दुक्का ही है। कायस्थ ऐसे मन्दिरों में नित्य नहीं जाते, दवात-पूजा के दिन को छोड़ कर यदि देखें। फलस्वरूप चढ़ावा आदि नहीं चढ़ता, जिससे मन्दिर के पुजारी तंगी में जीने को बाध्य होते हैं।इन गृहस्थ पुजारियों का परिवार मुख्यतः मन्दिर के चढ़ावे और मन्दिर समिति से मिली तनख़ाह से अपना गुजारा करते हैं। अन्य जातियों के श्रद्धालु इन मन्दिरों में जाने से यह कह कर परहेज़ करते हैं की ऐसे मन्दिर कायस्थों का पारिवारिक या जातीय स्थल है, वहाँ वह क्यों जायें। इससे भिन्न स्थिति उन श्री चित्रगुप्त मंदिरों की है, जहां परिसर में अन्य हिंदू देवी देवता की मूर्तियाँ लगी हैं। तमाम जाति के लोग ऐसे मंदिरों में जाना पसंद करते हैं जिससे मन्दिर की समृद्धि बनी रहती है।

श्री चित्रगुप्त मंदिरों के उत्थान के लिए इसलिए आवश्यक है कि वहाँ श्री चित्रगुप्त भगवान की चार भुजाओं वाली दैविक मूर्ति स्थापित हो। साथ ही वहाँ विष्णु, ब्रह्म, शिव, दुर्गा, सूर्य भगवान की मूर्ति स्थापित ज़रूर हो। मन्दिर के स्थानीय पुजारी जी को प्रोत्साहित किया जाये की वह आने वाले श्रद्धालुओं को इन मूर्तियों का श्री चित्रगुप्त भगवान से रिश्ता बताये और प्रचारित करे। उन्हें समझाए कि कैसे ब्रह्म जी श्री चित्रगुप्त के पिता हुए, कैसे विष्णु जी उनके दादा हुए, कैसे शिव जी उनके चाचा हुए, कैसे दुर्गा जी उनकी इष्टदेवी हुईं, और कैसे सूर्य भगवान उनके इष्टदेव हुए। यही हिंदू विकास क्रम की गाथा है। दूसरे जातियों के श्रद्धालुओं को ख़ास तौर पर दुहराने की आज ज़रूरत है कि श्री चित्रगुप्त भगवान हिंदू मान्यतानुसार तमाम जातियों के गणक, लेखाकार और न्यायधिकारी हैं। मेरा विश्वास है कि इन कदमों से श्री चित्रगुप्त मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या में अपार वृद्धि होगी।

यह श्री चित्रगुप्त भगवान की दैविक मूर्ति www.kayasthencyclopedia.com पर ९” X १२” साइज में उपलब्ध है। यह महज़ एक रिफरेन्स मूर्ति है। आप चाहें तो ऐसी प्रतिमा दिये गये मानकों को ध्यान में रख कर चाहें तो ख़ुद गढ़वा सकते हैं। जो श्रद्धालु मन्दिरों में उससे बड़ी मूर्ति लगाना चाहें, वह मूर्ति की दी गई उपरोक्त ६ शर्तों या मानकों को अपनाकर बड़ी मूर्ति ख़ुद गढ़वा कर स्थापित करा सकते हैं। यह अभियान श्री चित्रगुप्त भगवान की शास्त्र-सम्मत एकरूपता को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। एकरूपता (standardization) के बाद अगला महत्वपूर्ण कदम होगा upscaling, और इन सब का नतीजा होगा वृहत हिन्दू जगत में श्री चित्रगुप्त भगवान का पुनरुत्थान और mainstreaming.

23/07/2024
23/07/2024

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