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18/08/2026

Vrindavan Mein Adhyatmik Charcha | Shri Hit Sukrit Goswami Ji × Rajan Chaudhary

Vrindavan ki pavitra bhoomi par Shri Hit Sukrit Goswami Ji ke saath ek gahri adhyatmik baatcheet 🙏
Is podcast mein bhakti, Radha Rani ki kripa, jeevan ka uddeshya aur inner peace par bahut sundar charcha hui.

Agar aap spirituality aur self-growth mein interest rakhte hain, toh yeh episode zaroor dekhein ❤️

Guest: Shri Hit Sukrit Goswami
Host: Rajan Chaudhary

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उचित कर्म पता कैसे हो?प्रश्नकर्ता: राजन  जी, पता कैसे लगे कि यज्ञादि और शुभ कर्म कौन से हैं? जब सब परिस्थितियों में मन व...
18/08/2026

उचित कर्म पता कैसे हो?
प्रश्नकर्ता: राजन जी, पता कैसे लगे कि यज्ञादि और शुभ कर्म कौन से हैं? जब सब परिस्थितियों में मन विचलित ही रहता हो, तो उचित या शुभ कर्म का पता लगेगा कैसे?
राजन चौधरी : इतना अभागा कोई नहीं होता। ऐसा अन्याय अस्तित्व किसी के साथ नहीं करता कि चौबीसों घंटे और सब जगह सदैव और सर्वत्र वो विचलित ही रहता हो। ऐसा होता नहीं। मन के मौसम बदलते हैं। जैसे ज्येष्ठ मास की गर्मी में भी रात के तीसरे पहर कुछ तो राहत मिल ही जाती है और सावन में भी आकाश सदा मेघाच्छादित नहीं रहता। बीच-बीच में बादल छटते हैं, आसमान साफ हो जाता है। पुनः आ जाते हैं बादल। सावन हो, आषाढ़ हो और पुनः छा जाता है ताप।
यदि ग्रीष्म ऋतु हो तो भी यह भूलना मत कि राहत के, चैन के कुछ पल सदा उपलब्ध होते ही रहते हैं। और उन पलों का विशेष महत्व है। जब आसमान से सूरज कोड़ो की तरह बरस रहा हो, तब साँझ ज़रा पुरवाई चल जाए, तो जो अनुभव मिलता है, वो अन्यथा कभी हवा के चलने पर थोड़े ही मिलता है। देखा है न, जाड़ों की धूप को तुम कैसे याद रखते हो। और जाड़ा जितना हाड़ कँपता हो, धूप का खिलना उतना ही मंगल-उत्सव जैसा बन जाता है। उस धूप में कोई विशेष दम नहीं होता, जाड़ों की धूप है। बस कुछ देर को सहला कर चली जाती है, लेकिन उसकी बड़ी कीमत है। वैसी ही कीमत जैसी रेगिस्तान में पानी की होती है। कितना पानी होता है रेगिस्तान में? थोड़ा सा। आप कहोगे, "थोड़ा सा पानी है इसकी क्या कीमत होगी?" पर उसकी कीमत है ही इसीलिए क्योंकि थोड़ा सा है। अब आप उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
तुम्हें भी तुम्हारे जीवन में थोड़ा सा तो चैन मिलता होगा। चौबीस घंटे हैं दिन के, उनमें दस-पंद्रह मिनट तो शांत हो पाते होओगे? सैकड़ों लोगों के संपर्क में आते हो, कोई एक-दो तो ऐसे होंगे न जिनके सानिध्य में शांत हो जाते होगे? वहीं से शुरुआत कर लो। उसके अलावा तुम्हारे पास चारा भी क्या है? डूबते को तिनके का सहारा। जो बिलकुल ही अंधेरे में हो उसको तो जहाँ ज़रा सी रोशनी दिखे, उधर ही बढ़ना ही होगा। तुम ये कह कर के रुके नहीं रह सकते कि, "मैं तो मजबूर हूँ, अंधेरा बहुत बड़ा है, बहुत घना, बड़ा व्यापक और रौशनी ज़रा सी है बस टिमटिमाती सी।" जितनी भी है तुम्हें उसी का सहारा लेना पड़ेगा। जाड़े की धूप जितनी भी होती है तुम तो उसी से लाभ ले लेते हो।
जो थोड़ा सा मिल रहा है तुम्हें तुम्हारी वर्तमान अवस्था में उसी की ओर बढ़ो, उसका मिलना भी बढ़ जाएगा। सबसे पहले तो होश और ईमानदारी से ये देखो कि जितनी भी बंधी हुई या गिरी हुई तुम्हारी हालत है अभी, उस हालत में भी मुक्ति और शांति के दो-चार पल तुम्हें कब और कहाँ उपलब्ध होते हैं गौर से देखो।
मैंने आरंभ में ही कहा कि इतना अभाग किसी का नहीं होता कि उसका संताप सदा एक सा रहे और चरम पर रहे। राहत के क्षण आते ज़रूर हैं और उन्हीं क्षणों में मौका है तुम्हारा, चूको मत उनसे। कारागार में कैदी एक बंद है और बंधन तोड़ कर भागना चाहता है। सामने उसके सिपाही पहरा दे रहे हैं। कहाँ है मौका उसके लिए? वह कहता है, "चौबीस घंटे में कुछ क्षण तो ऐसे आते हैं न जब पहरा टूटता है। लगे हैं ये सारे सिपाही मेरे इर्द-गिर्द बंधन बुनने में। मैं जहाँ कैद हूँ वहाँ का चक्कर लगाते ही रहते हैं, लगाते ही रहते हैं। पर बीच-बीच में क्षण आते हैं जब इनका चक्र टूटता है। वो क्षण बहुत छोटे से होते हैं। क्षणभर को ऐसा होता है कि मेरे सामने से मेरे बंधनों का रक्षक गुज़र गया और उसकी पीठ है मेरी ओर अभी, उसका ध्यान नहीं मुझ पर। अगले ही क्षण दूसरा संतरी आ जाएगा गश्त पर, पर पहला बाएँ को गुज़रा और दाएँ की दिशा में दूसरा आया गश्त पर, उसके बीच में एक क्षण है ऐसा जिसमें मेरे लिए आशा है।" उसी एक क्षण को परमात्मा की भाँति पकड़ लो। ये मत कह देना कि, "मेरी कैद बहुत गहरी है, बेड़ियाँ बहुत मजबूत हैं, सलाखें बहुत मोटी हैं और आज़ादी के लिए जो पल मिला है वो पल बहुत छोटा है।" ये मत कह देना। ये कहकर के तुम अपनी मुक्ति की संभावना को दरकिनार कर रहे हो, तुम मुक्ति की संभावना का अपमान कर रहे हो। वो जो क्षीणतम, न्यूनतम अवसर मिला है उसको भुनाओ। बहाने बना कर मत गँवाओ।
तो सबसे पहले तो यह कहने से बाज़ आओ कि मन तुम्हारा सब परिस्थितियों में ही विचलित रहता है। नहीं, ये बात झूठ है, ऐसा हो नहीं सकती। मन तुम्हारा यदि सब परिस्थितियों में ही विचलित रहता होता तो तुम यह प्रश्न भी सीधे-सीधे लिख नहीं पाते, यह प्रश्न भी विचलित हो जाता। इस प्रश्न की मौजूदगी बताती है कि अभी तुम पर परम सत्ता की अनुकंपा शेष है। अभी पूरी तरह से ही विचलित, विक्षिप्त, पागल नहीं हो गए तुम।
गौर करो, अपने समय पर और अपने संसार पर, किसी-न-किसी समय और संसार के किसी-न-किसी कोने में तुमने आज़ादी का अनुभव किया ज़रूर होगा। उसको क्यों भुला देते हो? गौर करो और याद करो जब भी और जहाँ भी तुमने पंख पसारे थे, वही तो जगह थी तुम्हारी। उस जगह पर तुम्हें उड़ान मिली थी, पर तुम बड़े बेअदब निकले। तुम उस उड़ान का दुरुपयोग करके उस जगह से ही दूर उड़ गए। जिस जगह तुमने पंख पाए, तुम उन्हीं पंखों पर सवार होकर उस जगह से ही छूमंतर हो गए। तुम कहीं ऐसी जगह पहुँच गए जहाँ अब जाड़ों में धूप खिलती नहीं। ऐसे घोर रेगिस्तान में जहाँ पीने को अब एक बूंद पानी नहीं। “पानी में मीन प्यासी।” किसी कवि ने कहा है, "वाटर वाटर एवरीव्हेयर बट नॉट अ ड्राप टू ड्रिंक” (हर तरफ़ पानी-ही-पानी लेकिन पीने के लिए एक बूंद भी नहीं) ऐसी गहरी तृष्णा, असीम पानी के मध्य असीम प्यास।
ये तुमने अपने ऊपर आमंत्रित किया है, पर अभी भी जहाँ हो वो जगह पूर्णरूपेण तुम्हारे लिए एक कारा नहीं बन पाई, प्रमाण है उसका यह प्रश्न। तुम्हारे मन को अगर पूरे तरीके से कैद ही कर लिया गया होता तो तुम मुक्ति की बात भी नहीं पूछ पाते। तुम्हारे मन को अगर पूरे तरीके से जकड़ कर यंत्रवत संस्कारित ही कर दिया गया होता तो तुम कैसे पूछ पाते कि, "बताइए उचित कर्म क्या?"
आत्मा की और मुक्ति की लौ जल रही है। संसार की कोई ताकत इतनी बड़ी नहीं कि उसको पूर्णतया बुझा दे, किसी के भी अंदर। तुममें भी जल रही है, सब में जल रही है। इंसान और इंसान में फर्क बस इतना होता है कि किसी की लौ लपट बनकर निखरती है, एक पूर्णरूपेण अभिव्यक्त महाज्वाला, और किसी की बस टिमटिमाती रह जाती है।
और एक तीसरी श्रेणी के भी होते हैं जिनके प्रकाश के इर्द-गिर्द इतनी प्रकार की धूलें और राखें इकट्ठी हो जाती हैं कि उनका प्रकाश मृतवत ही प्रतीत होता है कि जैसे अब टिमटिमाने को भी कुछ शेष ना बचा हो। पर ऐसा होता कोई नहीं जिसका प्रकाश मर गया हो। यह संभव नहीं है। वो कितना अभिव्यक्त है इसमें अंतर हो सकता है। तुमने उसका कितना समर्थन किया है इसमें अंतर हो सकता है। अपनी ही आत्मा, अपनी ही आज़ादी, अपनी ही मुक्त अभिव्यक्ति के सामने तुमने कितने अवरोध खड़े किए हैं इसमें अंतर हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि आग बुझ गई हो और आग यदि है अभी तो उसे भड़ककर फैलते कितनी देर लगेगी। छोटी सी चिंगारी तत्काल महादाह बन जाएगी, सब जला देगी।
वो चिंगारी है अभी, उसका समर्थन करो, उसके सामने झुको, उसके साथ चलो, उसकी सुनो, उसकी उपेक्षा मत करो, उसे प्रेम दो, आदर दो। रौशनी छोटी सी हो जाती है तो अंधेरे की सत्ता हो जाती है। हम सत्ता के सामने झुकने वाले लोग हैं। सत्ता के साथ रहने में बड़ी सुविधाएँ हैं। वो सुविधाएँ अगर तुम्हें इतनी ही भा रही होतीं, तो तुमने क्यों पूछा होता कि, "शुभ क्या है और उचित क्या है?" फिर तो अंधेरे से जो आराम मिला है, अंधकार से जो सुविधा मिली है वही शुभ है, वही उचित है। तुमने उस सत्ता के साथ हो कर के देख लिया है, कई बार देखा है। वो ललचाती है, लुभाती है, ज़रा चैन का, आराम का एहसास कराती है, और फिर धोखा दे जाती है। धोखे खाने से बाज़ आओ।
उन क्षणों को पकड़ लो, जिन क्षणों में तुम्हें आश्वस्ति है कि, "अभी धोखा नहीं खा रहा हूँ।" कह दो, "मिल गया घर, यही है मंज़िल! अगर यहाँ धोखा नहीं खा रहा तो कहीं और क्यों जाना?" पकड़ लो वैसे ही जैसे बंदरिया का बच्चा माँ को पकड़े रहता है। वो देख ही नहीं रहा, वो जाँच ही नहीं रहा कि माँ जा कहाँ रही है और कर क्या रही है। उसे बस पकड़ने से मतलब है। माँ जो करती हो वही शुभ, माँ जहाँ जाती हो, वही उचित। मुझे यह विचार करना ही नहीं है कि मेरा क्या होगा। मेरा जो होता हो वही उचित, जब तक मैंने पकड़ रखा है माँ को। वो पकड़े रहना बड़ा आवश्यक है।
निराशा अपने ऊपर इतनी हावी मत हो जाने दो कि बीच-बीच में प्रकाश और मुक्ति के जो अवसर आएँ तुम उनको भी निराशा में अनदेखा कर दो। ये हम करते हैं। हम हथियार ही डाल देते हैं। हम गलत जगह घुटने टेक देते हैं। फिर कोई सहारा भी देने आता है तो हम कहते हैं कोई फायदा नहीं, हमारा खेल खत्म हो चुका है, अब सहारा देकर क्या होगा। जैसे तुम्हारा पुराना, सच्चा, गहरा पर खोया हुआ प्रेमी एक दिन तुमसे मिलने आए और तुम कहो, "अब क्या फायदा, मेरा तो विवाह किसी और से हो गया।" किसी और से तुम्हारा विवाह हो ही नहीं सकता, हुआ है तो झूठा है। इतने भी निराश मत हो जाओ। मुक्ति का मौका, मुक्ति का पल जब सामने आए तो कोई बहाना मत बनाओ, अपनी स्थितियों का रोना मत रोओ। ये सब बातें छोड़ो कि, "अब बहुत देर हो गई, अब तो हम बहुत फँस गए!" अगर मौका सामने खड़ा है तो देर कैसे हो गई? क्या विक्षिप्तों जैसी बात करते हो। जीवन यदि सामने खड़ा है तो तुम्हारी मौत कैसे हो गई? तुम डूब रहे हो, किसी ने बचाने के लिए हाथ बढ़ा रखा है और तुम कह रहे हो, "अब रहने दो बहुत देर हो गई।" ये कैसी बात है? तुम यदि कह रहे हो अभी, कुछ भी, तो अर्थ यही है कि अभी तुममें प्राण शेष है। और यदि तुममें प्राण शेष है तो प्राणों को बचाने के लिए जो हाथ सामने बढ़ा है उसे थामते क्यों नहीं।
निराशा, अश्रद्धा का दूसरा नाम है। श्रद्धा रखो कि मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है और तुम्हारी नियति। तो कोई-न-कोई आएगा ही बचाने। भीतर से तुम्हारे प्रेरणा उठेगी ही बचने की। तुम प्रकाशित होना भी चाहोगे और प्रकाशित होने के अवसर भी कहीं-न-कहीं से आएँगे। ये श्रद्धा है कि जो अनिवार्य है, वो तो होगा न। अनहोनी होनी नहीं।
ये अनहोनी है कि तुम अपनी अपरिहार्य नियति से चूक जाओ, ये होगा नहीं। तो तुम सदा तैयार रहो। आज़ादी का मौका, मुक्ति का मसीहा कभी भी आ सकता है। उसे आना ही है। क्योंकि मुक्ति तुम्हें मिलनी ही है। दुर्भाग्य ये नहीं होगा कि वो आया नहीं, दुर्भाग्य ये होगा कि वो आया और तुमने उसे पहचाना नहीं। तुम अपने ही अवसाद में इतने डूबे बैठे थे कि तुमने मौका जाने दिया। तैयार रहो, वो कभी भी आ सकता है। हो सकता है, वो मौका प्रस्तुत ही हो, अभी हो, सामने हो, तुम सजग रहो। बार-बार चूके हो अब मत चूक जाना।

17/08/2026

अंधविश्वास का रामबाण इलाज

ईश्वर जो करता है, हमेशा हमारे भले के लिए ही करता है। प्रकृत्य ऋषि और डाकू अस्थिमाल की यह कथा आपको जीवन में कभी निराश नही...
17/08/2026

ईश्वर जो करता है, हमेशा हमारे भले के लिए ही करता है। प्रकृत्य ऋषि और डाकू अस्थिमाल की यह कथा आपको जीवन में कभी निराश नहीं होने देगी।
॥ ईश्वर का न्याय और कर्मों का रहस्य ॥
यह कथा कर्म के गहन सिद्धांत को दर्शाती है और बताती है कि ईश्वर का न्याय कैसे काम करता है।
एक जंगल में 'प्रकृत्य' नामक ऋषि प्रतिदिन भगवान शिव की कठोर तपस्या और पूजा किया करते थे। उसी जंगल में 'अस्थिमाल' नाम का एक खूंखार डाकू भी रहता था।
एक दिन अस्थिमाल ने धन के लालच में पूजा करते हुए ऋषि पर प्राणघातक हमला कर दिया। वार इतना तेज़ था कि ऋषि सीधे शिवलिंग पर जा गिरे और उनका सिर बुरी तरह फट गया। लेकिन आश्चर्य! जैसे ही ऋषि गिरे, शिवालय की छत से कुछ सोने की मोहरें सीधे डाकू अस्थिमाल के सामने आ गिरीं।
अस्थिमाल हँसने लगा और ऋषि को पाखंडी समझने लगा। लहूलुहान और दुखी ऋषि ने तब भोलेनाथ से न्याय की पुकार की।
भगवान शिव का प्रकटीकरण और पूर्वजन्म का रहस्य:
पुकार सुनकर महादेव प्रकट हुए और उन्होंने दोनों के कर्मों और पूर्वजन्म का अद्भुत भेद खोला। भगवान ने कहा-
डाकू को सोने की मोहरें क्यों मिलीं?
शिवजी ने बताया- "यह डाकू पूर्वजन्म में एक बहुत बड़ा और ज्ञानी ब्राह्मण था, जिसने मेरी खूब भक्ति की थी। लेकिन एक बार इसने एक प्यासे बछड़े को पानी पीने से रोक दिया था। उस एक निर्दयी पाप के कारण इसे इस जन्म में डाकू बनना पड़ा। इसके पिछले जन्म की भक्ति के प्रताप से आज इसका राजतिलक होने वाला था (यह राजा बनने वाला था), लेकिन इसके इस जन्म के बुरे कर्मों (पापों) ने इसके राजयोग को नष्ट कर दिया और इसे राजा बनने की बजाय सिर्फ कुछ सोने की मोहरें ही नसीब हुईं।"
ऋषि को मृत्यु-तुल्य घाव क्यों मिला?
शिवजी ने आगे कहा- "यह ऋषि पूर्वजन्म में एक मछुआरा था। लेकिन उसी मछुआरे ने उस प्यासे बछड़े को पानी पिलाया था। उस एक बड़े पुण्य के कारण इसे इस जन्म में ऋषि बनने का सौभाग्य मिला। हालाँकि, मछुआरे के रूप में इसने कई मछलियों की जान ली थी, इसलिए आज के ही दिन इसकी मृत्यु निश्चित थी! लेकिन इस जन्म की अटूट भक्ति और तपस्या ने इसके उस भयंकर पाप को काट दिया। इसीलिए मृत्यु इसे छूकर निकल गई और सिर्फ एक घाव देकर लौट गई।"
कथा का महान सार (जीवन की सीख):
ईश्वर हमेशा हमारे लिए वही करते हैं जो वास्तव में हमारे लिए सबसे अच्छा होता है। वे हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का हिसाब रखकर ही हमें फल देते हैं।
यदि आपको कभी लगे कि अच्छे कर्मों के बावजूद आपको कष्ट मिल रहा है, तो निराश न हों... समझ लीजिये कि ईश्वर ने आपकी भक्ति और पुण्यों के प्रभाव से आपके किसी बहुत बड़े कष्ट या दुर्घटना को एक छोटी सी परेशानी में बदलकर टाल दिया है!
ईश्वर पर विश्वास रखें, वे जो करेंगे, उत्तम ही करेंगे।
प्रेम से बोलिए-
॥ राधे राधे ॥
॥ हर हर महादेव ॥

ईश्वर बड़ा से सच्चा हितैषी ------- एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उस...
16/08/2026

ईश्वर बड़ा से सच्चा हितैषी ------- एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।
वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।
वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।
गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।
गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,....
बिलकुल नहीं।
मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?
थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
गाय ----समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ ----अहंकारी मन है।
और
मालिक---- ईश्वर का प्रतीक है।
कीचड़---- यह संसार है। और
यह संघर्ष---- अस्तित्व की लड़ाई है।
किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।
ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है |

ईश्वर दयालु और न्यायकारी है --- शिवराम नामक एक भले स्वभाव का सदाचारी मनुष्य एक गाँव में रहता था, उसी गाँव में एक डाकू का...
15/08/2026

ईश्वर दयालु और न्यायकारी है --- शिवराम नामक एक भले स्वभाव का सदाचारी मनुष्य एक गाँव में रहता था, उसी गाँव में एक डाकू का घर था | शिवराम कभी-कभी उससे डकैती की घटनाएँ सुनता था | कुसंग का फल बहुत बुरा होता है | शिवराम का मन एक दिन ललचाया | लोभ ने उसकी बुद्धि बिगाड़ दी, परिणाम, ज्ञान-शून्य होकर वह नन्दराम नामक गृहस्थ के घर डाका डालकर तीन हजार रूपये नकद और कुछ गहने लूट लाया | आत्मरक्षा के लिये रोकने वालों पर दो-चार लाठियाँ भी जमा दीं |
धन लेकर घर पहुँचा और अपनी स्त्री से सारा हाल कहा | शिवराम की पत्नी बड़ी साध्वी थी, उसे स्वामी के इस कृत्य को सुनकर बड़ा दुःख हुआ | उसने चरणों में सिर टेककर स्वामी को धर्म सुझाया और प्रार्थना की कि यह धन अभी आप लौटा दीजिये | शिवराम वास्तव में अच्छा आदमी था, वह डकैती पेशावाला तो था ही नहीं, कुसंग से उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी | स्त्री के समझाने पर उसे अपना अपराध दीपक की ज्योति की भाँति स्पष्ट दीखने लगा | पत्नी की सलाह से वह तुरंत धन लेकर कलक्टर साहिब के बँगले पर गया और रूपये तथा गहने उसके पास रखकर आत्मसमर्पण करते हुए उसने गिडगिडाकर कहा कि ‘मुझसे बड़ा भारी अपराध हो गया, कुसंग से मेरे मन में लोभ पैदा हो गया था, जिससे मेरी मति मारी गयी | मैंने बेचारे नन्दराम को अन्यायरूप से सताया और वह कुकर्म किया, जो मेरे बाप-दादों में किसी ने भी नहीं किया था | मेरा अपराध किसी प्रकार क्षम्य तो नहीं है, परंतु मैं आपकी शरण हूँ, आप मुझे बचाइये | भविष्य में मैं कभी ऐसा कुकर्म नहीं करूँगा |’ कलक्टर को उसकी बात पर विश्वास हो गया, उसने सोचा कि यदि इसकी नियत खराब होती तो माल लेकर हाजिर क्यों होता | कलक्टर ने उसे वहीँ रोककर पुलिस के द्वारा नन्दराम को बुलवाया | नन्दराम पुलिस में इतला करने जा ही रहा था कि उसको एक कान्सटेबल ने आकर कहा –‘तुम्हारे घर जिसने डकैती की है, वह मालसमेत कलक्टर साहिब के बँगले पर हाजिर है, साहेब ने तुम्हे अभी बुलाया है |’ माल मिलने की बात सुनते ही नन्दराम को बड़ी ख़ुशी हुई और वह तुरंत ही सिपाही के साथ साहेब के बँगले पर जा पहुँचा | उसे देखकर शिवराम ने उसके चरण पकड़ लिये और अपना अपराध क्षमा करने के लिये रो-रोकर प्रार्थना करने लगा | नन्दराम ने उसकी एक भी नहीं सुनी और कहा कि ‘तुझे जेल भिजवाये बिना मैं कभी न छोडूँगा |’ मामला कोर्ट में गया | कलक्टर साहेब के पूछने पर शिवराम ने वे ही बातें साफ़-साफ़ कह दीं, जो उसने बँगले पर कही थीं, इस पर साहेब ने नन्दराम से पूछा कि ‘बताओ, इसके चाल-चलन के सम्बन्ध में तुम्हारा कुआ ख्याल है ?’ नन्दराम को स्वीकार करना पड़ा कि ‘मैं इसे जानता हूँ, यह अच्छे घराने का है, डाकुओं की संगति से इसे दुर्बुद्धि पैदा हुई होगी | परंतु इसे सजा जरुर मिलनी चाहिये, नहीं तो यह फिर ऐसे ही काम करेगा |’ कलक्टर दयालु था; वह शिवराम की सरलता और सत्यता पर मुग्ध हो गया और उसने भविष्य के लिये सावधान करके शिवराम को छोड़ दिया | इस प्रकार दया करने वाला कलक्टर क्या अन्यायी समझा जायगा ? इसी प्रकार सच्चे और सरल ह्रदय से भगवान् की शरण होने पर वे भी मुक्त कर देते हैं |

14/08/2026

अंतिम समय में क्या करना चाहिए? | मोक्ष और आत्मिक शांति का रहस्य | Rajan Chaudhary

अंतिम समय में क्या करना चाहिए?
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि जीवन का अंतिम समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। उस समय मन जिस भाव में रहता है, उसी के अनुसार आत्मा की गति निर्धारित होती है।

इस प्रवचन में Rajan Chaudhary (Spiritual Speaker) बताते हैं कि मृत्यु के समय मन की स्थिति कैसी होनी चाहिए और भगवान का स्मरण क्यों जरूरी है।

इस वीडियो में आप जानेंगे:

• अंतिम समय में क्या करना चाहिए
• भगवान का स्मरण क्यों जरूरी है
• मृत्यु के समय मन की अवस्था का महत्व
• आत्मा की यात्रा का आध्यात्मिक रहस्य
• मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

यदि आपको spiritual knowledge, moksha, meditation, bhakti, dharmik gyan, hindu spirituality जैसे विषय पसंद हैं तो यह वीडियो आपके लिए बहुत उपयोगी होगा।

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आध्यात्मिक ज्ञान का महत्व क्या है

Disclaimer ☛ The Video you're about to watch is inspired by Hindu Mythology and Folk legends. These Stories are based on religious scriptures believed to be thousands of years old. Please note our objective is not to hurt sentiments of any particular person, sect or religion. These are mythological stories meant only for educational purposes and we hope they'd be taken likewise.

भगवद गीता क्या है
भगवद गीता के श्लोक अर्थ
भगवद गीता का सार
भगवद गीता सिखावन
भगवद गीता ज्ञान
भगवद गीता के उपदेश
मोह और प्रेम भगवद गीता
जीवन में उद्देश्य भगवद गीता
कृष्ण का उपदेश भगवद गीता
अध्यात्मिक वीडियो भगवद गीता
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कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग
मन की शांति भगवद गीता
जीवन में संतुलन भगवद गीता
डर और शोक भगवद गीता
धन और सफलता भगवद गीता
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भगवद गीता हमें क्या सिखाती है?
भगवद गीता पढ़ने के फायदे
भगवद गीता से जीवन कैसे बदलें?
मोह और इच्छाओं को कैसे नियंत्रित करें?
कृष्ण ने अर्जुन को क्या सिखाया?
Bhagavad Gita meaning
Bhagavad Gita teachings
What is Moh in Bhagavad Gita

ईश्वर जब परीक्षा लेते हैं, तो क्या होता है? एक गरीब किसान की अद्भुत कहानी...   गणेश एक बहुत ही सीधा-साधा इंसान था। वह अप...
14/08/2026

ईश्वर जब परीक्षा लेते हैं, तो क्या होता है? एक गरीब किसान की अद्भुत कहानी...
गणेश एक बहुत ही सीधा-साधा इंसान था। वह अपनी पत्नी के साथ एक गाँव में रहता था। गरीबी के कारण उनका गुजारा बहुत मुश्किल से होता था। उनके पास दो भैंसें थीं। एक दिन घर का खर्च चलाने के लिए, गणेश अपनी एक भैंस बेचने बाज़ार की ओर निकल पड़ा।
रास्ते में उसे एक आदमी मिला, जो अपना घोड़ा बेचने जा रहा था। उसने गणेश से कहा, "भाई, तुम मेरा घोड़ा ले लो और अपनी भैंस मुझे दे दो।" गणेश ने खुशी-खुशी सौदा कर लिया। लेकिन कुछ दूर चलने पर उसे पता चला कि घोड़ा तो अंधा है! गणेश निराश नहीं हुआ और आगे बढ़ा। रास्ते में उसे एक गाय वाला मिला। उसने कहा, "मुझे घोड़े की सख्त जरूरत है, तुम मेरी गाय ले लो।" गणेश ने फिर अदला-बदली कर ली, लेकिन कुछ दूर जाकर पता चला कि गाय लंगड़ी है। आगे चलकर उसने वह लंगड़ी गाय एक बीमार बकरी से बदल ली। बाज़ार पहुँचकर उसने वह बीमार बकरी मात्र पाँच रुपये में बेच दी। उसे बहुत भूख लगी थी, इसलिए उन पैसों से उसने थोड़ा खाना खरीदा।
जैसे ही वह एक पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगा, वहाँ एक बूढ़ा व्यक्ति आया और बोला, "बेटा, मैं बहुत भूखा हूँ, क्या मुझे थोड़ा खाना मिल सकता है?" गणेश का हृदय पिघल गया। उसने अपना सारा खाना उस भूखे इंसान को दे दिया और खुद भूखे पेट घर लौट आया।
घर पहुँचकर जब उसने पत्नी को सारी बात बताई, तो वह क्रोधित होने के बजाय बोली, "आपने बहुत अच्छा काम किया है। भगवान सब देख रहे हैं।"
अगली सुबह जब गणेश ने दरवाज़ा खोला, तो वह हैरान रह गया! दरवाज़े के बाहर कल वाले सभी जानवर (घोड़ा, गाय, बकरी और उसकी भैंस) बँधे हुए थे—और सभी बिल्कुल स्वस्थ थे! उन्हें समझ आ गया कि वह भूखा व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर थे जो उनकी नेकी की परीक्षा ले रहे थे।
सीख: नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती। निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म हमेशा कई गुना होकर लौटता है। कर भला तो हो भला!
।। जय श्री कृष्ण ।।

ईश्वर को चाहना या ईश्वर से चाहना? एक अद्भुत कहानी...  एक नगर के राजा ने घोषणा करवाई कि कल जब महल का मुख्य दरवाज़ा खुलेगा...
13/08/2026

ईश्वर को चाहना या ईश्वर से चाहना? एक अद्भुत कहानी...
एक नगर के राजा ने घोषणा करवाई कि कल जब महल का मुख्य दरवाज़ा खुलेगा, तब जो व्यक्ति जिस वस्तु को छू लेगा, वह हमेशा के लिए उसकी हो जाएगी!
यह सुनकर पूरे नगर में हलचल मच गई। हर कोई अपनी मनपसंद चीज़ें—स्वर्ण, कीमती आभूषण, शानदार घोड़े, हाथी या दुधारू गाएं—पाने के सपने देखने लगा। सोचिए, वह कैसा अद्भुत दृश्य रहा होगा!
अगले दिन जैसे ही दरवाज़ा खुला, लोग अपनी-अपनी मनचाही चीज़ों की तरफ पागलों की तरह दौड़ पड़े। सबको जल्दी थी और मन में यह डर भी था कि कहीं कोई और उनकी पसंद की वस्तु को पहले हाथ न लगा दे।
राजा अपने सिंहासन पर बैठकर यह भाग-दौड़ देख रहा था और मुस्कुरा रहा था। तभी भीड़ में से एक छोटी सी बच्ची निकली और राजा की तरफ बढ़ने लगी। राजा को लगा कि शायद यह बच्ची बहुत छोटी है और मुझसे कुछ पूछने आ रही है।
लेकिन वह बच्ची धीरे-धीरे चलते हुए राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से सीधे राजा को ही छू लिया! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस बच्ची का हो गया, और ज़ाहिर है, राजा की प्रत्येक वस्तु भी उसी की हो गई।
कहानी की सीख:
जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन्होंने गलती की.. ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमें हर रोज़ मौका देते हैं और हम हर रोज़ वही गलती करते हैं।
हम ईश्वर को पाने की बजाय उनकी बनाई हुई संसारी वस्तुओं (धन, दौलत, सुख) की कामना करते हैं और उन्हें पाने के लिए भागते रहते हैं। पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि स्वयं ईश्वर हमारे हो गए, तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी।
"ईश्वर को चाहना और ईश्वर से चाहना... दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।"

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12/08/2026

अंतिम यात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ क्यों बोला जाता है? | जीवन और मृत्यु का आध्यात्मिक रहस्य | Rajan

अंतिम यात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ क्यों बोला जाता है?
हिंदू परंपरा में अंतिम यात्रा के समय यह वाक्य अक्सर बोला जाता है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है, जो जीवन की नश्वरता और परम सत्य की ओर संकेत करता है।

इस प्रवचन में Rajan Chaudhary (Spiritual Speaker) बताते हैं कि:

• ‘राम नाम सत्य है’ का वास्तविक अर्थ क्या है
• अंतिम यात्रा में यह वाक्य क्यों बोला जाता है
• जीवन और मृत्यु का आध्यात्मिक संदेश
• आत्मा की यात्रा का रहस्य
• भगवान के नाम का महत्व

यदि आपको spiritual knowledge, hindu traditions, dharmik gyan, ram bhakti, life and death philosophy जैसे विषय पसंद हैं तो यह वीडियो आपके लिए बहुत उपयोगी होगा।

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भगवान का स्मरण क्यों जरूरी है
आत्मा और परमात्मा का संबंध क्या है
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मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा
हिंदू धर्म में मृत्यु के संस्कार
आध्यात्मिक जीवन कैसे जिएं
भगवान की भक्ति कैसे करें
मन को शांत कैसे करें
भगवान की कृपा कैसे प्राप्त करें
जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है
आध्यात्मिक ज्ञान का महत्व क्या है
भक्ति का सही मार्ग क्या है
मृत्यु का डर कैसे दूर करें
भगवान का अनुभव कैसे करें
आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें
आध्यात्मिक जागरण क्या है
जीवन का परम सत्य क्या है
राम नाम की महिमा क्या है

Extracts of Bhagwat Geeta presented to you in curated manner.

We also have such moments in our life and these teaching will surely guide us through | Radhey Radhey !

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