28/05/2026
अश्वत्थामा द्वारा उपपांडवों की हत्या और द्रौपदी की करुणा — विस्तृत कथा
यह प्रसंग महाभारत और विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित अत्यंत मार्मिक घटनाओं में से एक है। यह केवल प्रतिशोध की कथा नहीं, बल्कि धर्म, करुणा, क्रोध और न्याय के गहरे संघर्ष की कहानी है।
युद्ध का अंत और दुर्योधन की दशा
कुरुक्षेत्र का भयंकर युद्ध समाप्ति की ओर था।
कौरव सेना लगभग नष्ट हो चुकी थी। भीमसेन ने गदा युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ दी थी। घायल दुर्योधन एक सरोवर के पास पड़ा अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा कर रहा था।
उसी समय गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा वहाँ पहुँचा।
उसके साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा भी थे।
दुर्योधन की दशा देखकर अश्वत्थामा का हृदय क्रोध और प्रतिशोध से भर उठा। उसे लगा कि पांडवों ने छल से उसके पिता द्रोणाचार्य का वध कराया और अब दुर्योधन को भी अधर्मपूर्वक हराया।
उसने प्रतिज्ञा की—
“मैं आज रात पांडवों का वंश समाप्त कर दूँगा।”
रात्रि का भयानक हमला
रात्रि का समय था।
युद्ध समाप्त मानकर पांडवों का शिविर शांत था। सभी योद्धा गहरी नींद में थे।
अश्वत्थामा ने कपटपूर्वक रात में शिविर में प्रवेश किया।
वह अत्यंत क्रूर और क्रोध से अंधा हो चुका था।
उसने सबसे पहले धृष्टद्युम्न का वध किया, जो द्रोणाचार्य के वध का कारण बने थे। फिर उसने सोए हुए सैनिकों को मारना शुरू कर दिया।
अंत में वह उस तंबू में पहुँचा जहाँ द्रौपदी के पाँच पुत्र — उपपांडव — सो रहे थे।
वे थे:
प्रतिविन्ध्य
सुतसोम
श्रुतकर्मा
शतानीक
श्रुतसेन
अश्वत्थामा ने उन्हें सोते समय ही मार डाला।
उसे लगा कि उसने पांडवों का अंत कर दिया है।
लेकिन वे पाँचों पांडव नहीं, उनके पुत्र थे।
द्रौपदी का विलाप
प्रातःकाल जब यह समाचार फैला, पूरा शिविर शोक में डूब गया।
द्रौपदी अपने पुत्रों के शव देखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
एक माँ का हृदय टूट चुका था।
उसका विलाप सुनकर सभी की आँखें भर आईं।
भीमसेन क्रोध से कांप उठे। उन्होंने तुरंत अश्वत्थामा को मार डालने की प्रतिज्ञा की।
अर्जुन की प्रतिज्ञा
अर्जुन ने द्रौपदी से कहा—
“मैं तुम्हारे पुत्रों के हत्यारे का सिर लाकर तुम्हारे चरणों में रखूँगा।”
इसके बाद अर्जुन अपने रथ पर सवार हुए।
रथ के सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे।
अर्जुन और श्रीकृष्ण अश्वत्थामा का पीछा करने निकल पड़े।
ब्रह्मास्त्र का प्रयोग
जब अश्वत्थामा ने देखा कि अर्जुन उसका पीछा कर रहे हैं, तो वह भयभीत हो गया।
उसे पता था कि युद्ध में वह अर्जुन का सामना नहीं कर सकता।
तब उसने अंतिम उपाय के रूप में भयंकर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया।
ब्रह्मास्त्र इतना शक्तिशाली था कि उससे पूरी सृष्टि संकट में पड़ सकती थी।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा—
“अर्जुन! इसका सामना केवल ब्रह्मास्त्र से ही किया जा सकता है।”
तब अर्जुन ने भी मंत्रों द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
दोनों दिव्य अस्त्रों के टकराने से आकाश अग्नि से भर गया। पृथ्वी कांपने लगी। ऋषि-मुनि भयभीत हो उठे।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश दिया कि वे अपना ब्रह्मास्त्र वापस बुला लें। अर्जुन ने ऐसा कर लिया, क्योंकि वे अस्त्र को नियंत्रित करना जानते थे।
लेकिन अश्वत्थामा अपना अस्त्र वापस लेना नहीं जानता था।
अश्वत्थामा का नया अधर्म
जब अश्वत्थामा अस्त्र वापस नहीं ले पाया, तब उसने उसे पांडव वंश के अंतिम उत्तराधिकारी को नष्ट करने के लिए मोड़ दिया।
उस समय उत्तरा गर्भवती थीं। उनके गर्भ में परीक्षित थे।
अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ की ओर भेज दिया।
उत्तरा भयभीत होकर श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचीं—
“हे प्रभु! मेरे गर्भ की रक्षा कीजिए!”
तब श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन और योगमाया से गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा की।
अश्वत्थामा को बंदी बनाना
इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया।
उसे रस्सियों से बांधकर शिविर में लाया गया।
भीमसेन उसे तुरंत मार डालना चाहते थे।
लेकिन तभी एक अद्भुत घटना हुई।
द्रौपदी की करुणा
जिस अश्वत्थामा ने उसके पाँच पुत्रों की हत्या कर दी थी, उसी को देखकर द्रौपदी की आँखों में करुणा आ गई।
उसने कहा—
“यह गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है।
जैसे मैं अपने पुत्रों के वियोग में दुखी हूँ, वैसे ही इसकी माता कृपी भी पुत्र-वियोग में रोएगी।
मैं नहीं चाहती कि एक और माँ मेरी तरह दुख सहन करे।”
द्रौपदी ने यह भी कहा कि गुरु-पुत्र होने के कारण अश्वत्थामा सम्मान के योग्य है।
उसकी करुणा देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।
श्रीकृष्ण का निर्णय
श्रीकृष्ण जानते थे कि अश्वत्थामा ने घोर अधर्म किया है।
लेकिन वे द्रौपदी की करुणा और अर्जुन की प्रतिज्ञा — दोनों को सत्य रखना चाहते थे।
उन्होंने अर्जुन को ऐसा दंड देने का उपाय बताया जिससे:
अश्वत्थामा जीवित भी रहे,
और उसकी वीरता, सम्मान तथा शक्ति समाप्त हो जाए।
दिव्य मणि निकालना
अर्जुन ने अश्वत्थामा के माथे पर लगी दिव्य मणि निकाल ली।
उस मणि के कारण अश्वत्थामा को:
रोग नहीं होते थे,
भूख-प्यास नहीं लगती थी,
और वह तेजस्वी रहता था।
मणि निकलते ही उसका तेज नष्ट हो गया।
अर्जुन ने उसके केश काट दिए और उसे अपमानित करके शिविर से बाहर निकाल दिया।
अश्वत्थामा का श्राप
श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया—
“तू हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकेगा।
तेरे शरीर से रक्त और पीप बहता रहेगा।
लोग तुझसे दूर भागेंगे।
तू अकेला, पीड़ित और अपमानित जीवन जीएगा।”
कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी चिरंजीवी रूप में पृथ्वी पर भटक रहा है।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
1. क्रोध बुद्धि नष्ट कर देता है
अश्वत्थामा क्रोध में इतना अंधा हो गया कि उसने सोते हुए निर्दोष बच्चों की हत्या कर दी।
2. करुणा सबसे बड़ी शक्ति है
द्रौपदी ने अपने पुत्रों के हत्यारे पर भी दया दिखाई।
3. अधर्म का दंड निश्चित है
अश्वत्थामा महान योद्धा था, फिर भी अधर्म के कारण उसे भयानक श्राप मिला।
अ4. श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा करते हैं
उन्होंने परीक्षित की रक्षा कर पांडव वंश को बचाया।
यह प्रसंग महाभारत के सबसे भावुक और गहरे अध्यायों में माना जाता है, जहाँ एक ओर प्रतिशोध की अग्नि है, तो दूसरी ओर द्रौपदी की अद्भुत क्षमा और मातृत्व।
साभार भक्ति की बाते