Mandir Radhe Shyam Pundri

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मौनी अमावस्या की कथा मौनी अमावस्या की प्रचलित कथा इस प्रकार है कि, एक ब्राह्मण परिवार प्राचीन काल में कांचीपुरी में रहता...
18/01/2026

मौनी अमावस्या की कथा

मौनी अमावस्या की प्रचलित कथा इस प्रकार है कि, एक ब्राह्मण परिवार प्राचीन काल में कांचीपुरी में रहता था। दोनों पति पत्नी धर्मात्मा थे और धर्म पूर्वक अपनी गृहस्थी चलाया करते थे। देव स्वामी और उनकी पत्नी धनवती के सात पुत्र और एक मात्र गुणवती नामक पुत्री थी। जब गुणवती बड़ी हो गई तो देव स्वामी ने पत्नी से पुत्री के विवाह के लिए वर देखने को कहा। ब्राह्मण ने अपने छोटे पुत्र को बहन गुणवती की कुंडली दी और कहा जाओ इस कुंडली को ज्योतिषी से दिखवाकर ले आओ ताकि गुणवती के विवाह की बात आगे चल सके। ज्योतिषी ने जब कन्या की कुंडली देखी तो उसने बताया कि विवाह होते ही कन्या विधवा हो जाएगी। ज्योतिषी की इस बात को जानकर पूरा ब्राह्मण परिवार बहुत दुखी हो गया और ज्योतिषी से इसका उपाय पूछा। तब ज्योतिषी ने बताया की सिंहल द्वीप में एक पतिव्रता महिला निवास करती है जिसका नाम सोमा धोबिन है। अगर कन्या के विवाह के पहले सोमा आपके घर आकर पूजन करे और आशीर्वाद दे दे तो यह दोष दूर हो सकता है।

इसके बाद, ब्राह्मण ने अपनी पुत्री गुणवती और छोटे बेटे को सिंहल द्वीप भेज दिया। दोनों भाई बहन सागर किनारे पहुंचने के बाद उसे पार करने का तरीका खोजने लगे। लेकिन जब समुद्र को पार करने का कोई रास्ता नहीं मिला तो दोनों भूखे प्यासे जाकर एक पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए और वहां आराम करने लगे। वहां, वृक्ष पर घोसले में एक गिद्ध का परिवार रहता था। तब घोसले में केवल गिद्ध के बच्चे मौजूद थे जो सुबह से भाई बहन की बातों और क्रियाकलापों को देख रहे थे। शाम को जब गिद्ध की माता बच्चों के लिए भोजन लेकर घोसले में पहुंची तो बच्चों ने वृक्ष के नीचे आराम कर रहे भाई-बहन की कहानी बताई। बच्चों की बात सुनकर गिद्धों की माता को दोनों भाई बहन पर दया आ गई और बच्चों से कहा कि तुम लोग चिंता मत करो मैं इन्हें सागर पार करवा दूंगी। यह बात सुनकर बच्चों ने खुशी-खुशी भोजन किया।गिद्ध की माता बच्चों को भोजन करवाने के बाद नीचे बैठे भाई बहन के पास पहुंची और बोली की मैं तुम्हारी समस्या जानती हूं। आप चिंता मत कीजिए आपकी समस्या का निदान मैं कर सकती हूं। आपको सोमा धोबन तक पहुंचा दूंगी। गिद्ध की बात को सुनकर दोनों भाई बहन प्रसन्न हो गए और उन्होंने वन में मौजूद कंद मूल को खाकर रात काटी। सुबह होते ही गिद्ध ने दोनों को समुद्र पार करवाया और सिंहल द्वीप में सोमा धोबिन के घर के पहुंचा दिया। सोमा धोबन के घर के पास गुणवती छिपकर रहने लग गई। प्रत्येक दिन सुबह होने से पहले गुणवती सोमा का घर लीप देती थी। एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से सवाल किया कि रोज सुबह हमारा घर कौन लीपता है। तब बहुओं ने प्रशंसा के लोभ से कहा की हमारे सिवा यह काम और कौन कर सकता है। लेकिन सोमा को बहुओं की बात पर भरोसा नहीं हुआ और इस बात का पता लगाने के लिए वह पूरी रात जागती रही की आखिर कौन हर दिन सूर्योदय से पहले घर लीपकर चला जाता है। सोमा ने पाया कि एक कन्या उसके आंगन में आकर घर लीपने लगी। तब सोमा गुणवती के पास गई और उससे पूछा की तुम कौन हो और प्रतिदिन सुबह मेरा आंगन क्यों लीपकर जाती हो। तब गुणवती ने अपनी सारी बात बता दी। उसकी बातों को सुनकर सोमा ने कहा कि तुम्हारे सुहाग के लिए मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूं।

सोमा ने ब्राह्मण के घर आकर पूजन किया। लेकिन विधि का विधान कौन टाल सकता था। जैसे ही गुणवती का विवाह हुआ वैसे ही उसके पति की मृत्यु हो गई। इस बात का पता चलने पर सोमा ने अपने सभी पुण्य गुणवती को दान कर दिए। उनके पुण्य के चलते गुणवती का पति जीवित हो गया। लेकिन पुण्यों की कमी होने के चलते सोमा के पति और बेटे की मृत्यु हो गई। सोमा ने अपने घर से निकलते समय ही बहुओं से कह दिया था कि अगर मेरे लौटने से पहले मेरे पति और पुत्रों को कुछ हो जाए, तो उनके शरीर को संभालकर रखना। अपनी सास की आज्ञा का पालन करते हुए बहुओं ने सभी के शरीर को संभालकर रखा। दूसरी और सोमा ने सिंहल द्वीप वापस जाते वक्त रास्ते में पीपल वृक्ष की छाया में विष्णुजी की पूजा की और 108 बार पीपल की परिक्रमा की। इसी पुण्य के प्रभाव से सोमा के घर वापस पहुंचते ही उसके पति और बेटे वापस जीवित हो गए। इसलिए मौनी अमावस्या के दिन व्रती को कथा सुनकर पीपल के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए।

🤔 सोचिये! एक को मिली 'बाणों की शय्या' और दूसरे को 'प्रभु की गोद'... ऐसा अंतर क्यों?🔥 कर्म की गति: जटायु की गोद और भीष्म ...
13/01/2026

🤔 सोचिये! एक को मिली 'बाणों की शय्या' और दूसरे को 'प्रभु की गोद'... ऐसा अंतर क्यों?
🔥 कर्म की गति: जटायु की गोद और भीष्म की शरशय्या 🔥
जब रावण ने गिद्धराज जटायु के दोनों पंख काट डाले, तो साक्षात 'काल' उन्हें लेने आ पहुँचा।
किंतु, धन्य हैं जटायु! उन्होंने मौत को ललकार कर कहा— "खबरदार ऐ मृत्यु! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना। मैं तुझे स्वीकार करूँगा, लेकिन तब तक तू मुझे छू नहीं सकती, जब तक मैं माता सीता की सुधि मेरे प्रभु श्रीराम तक न पहुँचा दूँ!"
मौत काँपती रही, ठिठक कर खड़ी रही। यही जटायु का 'इच्छा मृत्यु' का वरदान था, जो उन्होंने अपने कर्मों से अर्जित किया था।..और दूसरा दृश्य देखिए महाभारत का!
इच्छा मृत्यु का वरदान पाए भीष्म पितामह छह महीने तक तीरों की चुभती शय्या पर लेटे मौत का इंतजार करते रहे। आँखों में आँसू थे, वे रो रहे थे और भगवान श्रीकृष्ण मन ही मन मुस्कुरा रहे थे।
कितना अलौकिक और विरोधाभासी है यह दृश्य!
✨ रामायण में जटायु भगवान श्रीराम की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं। प्रभु रो रहे हैं और जटायु हँसते हुए प्राण त्याग रहे हैं।
✨ महाभारत में भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे रो रहे हैं और भगवान हँस रहे हैं।
आखिर ऐसा अंतर क्यों?
यह अंतर 'कर्म' का है।
भरे दरबार में जब द्रौपदी की इज़्ज़त लुट रही थी, वह चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन भीष्म पितामह सामर्थ्य होते हुए भी सिर झुकाए मौन बैठे रहे। नारी की रक्षा नहीं कर पाए।
➡️ परिणाम: इच्छा मृत्यु के वरदान के बावजूद 'बाणों की शय्या' मिली।
और जटायु? उन्होंने नारी सम्मान के लिए एक पल नहीं सोचा, रावण से भिड़ गए और अपने प्राणों की आहुति दे दी।
➡️ परिणाम: मरते समय स्वयं भगवान श्रीराम की 'गोद की शय्या' मिली।
सीख:
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आँखें मूंद लेते हैं, उनकी गति भीष्म जैसी होती है। और जो परिणाम जानते हुए भी धर्म और न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, उनका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है।
।। जय श्री राम ।। 🚩🏹

20/09/2025

श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता।

आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है ।क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी आ जाए उनकी पत्नी आ जाए साथ में बच्चे आ जाएं कोई हर्ज नहीं पर अकेली ब्राह्मणी को भोजन कराना शास्त्र विरुद्ध है।

20/09/2025

पितरों को पहले थाली नहीं देवें,
पित्तृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। वैष्णवो में पहले भोजन बनाकर पृथम ठाकुर जी को भोग लगाना चाहिए, और फिर वह प्रसाद पितरों को देना चाहिए, कारण क्या है वैष्णव कभी भी अमनिया वस्तु किसी को नहीं देगा। भगवान का प्रसाद ही अर्पण करेगा और भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि होगी। इसलिए पितरों को प्रसाद अर्पण करना चाहिए ।
पित्तृ लोक का एक दिन मृत्यु लोक के 1 वर्ष के बराबर होता है ।यहां 1 वर्ष बीतता है पितृ लोक में 1 दिन बीतता है ।
केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम ,श्री महा मंत्र का जप ,और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है ।

19/09/2025

अश्विन अमावस्या पर लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में दृश्य नहीं है अतः इस सूर्य ग्रहण का भारत में कोई प्रभाव नहीं होगा। दैनिक कार्य सूचारू रूप से कर सकते।
जय श्री हरि

15/09/2025

इंदिरा एकादशी व्रत 17 सितंबर 2025 दिन बुधवार को रखा जाएगा।
जय श्री हरि

15/09/2025

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अ‍धोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है।

प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।

सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो।

मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।

इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।

हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।

रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।

नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया। हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा।

जय श्री कृष्णा भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता, शेषावतार, कृषकों के आराध्य देव, हलधर भगवान श्री बलराम जी की जयंती व हल...
14/08/2025

जय श्री कृष्णा भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता, शेषावतार, कृषकों के आराध्य देव, हलधर भगवान श्री बलराम जी की जयंती व हलछठ के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं🙏
श्री राधे ❤️

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