Sri Jhalimali Mandir Samiti, Khugush

Sri Jhalimali Mandir Samiti, Khugush Jai Ma jhalimali

'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'-उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा...
03/06/2022

'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'-
उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री के अतिरिक्त अन्य कई स्थानीय रूप हैं। इनमें नंदा राजराजेश्वरी, चन्द्रबदनी, सुरकंडा, कोट भ्रामरी, मठियाणा, कुंजापुरी, धारी देवी, ज्वालपा, गढ़देवी, कंसमर्दिनी, अनुसूया, पुण्यासणी, पाताल भुवनेश्वरी, झूलादेवी, भद्रकाली और बराही देवी आदि हैं। लोकदेवी झालीमाली देवी इन्हीं में शामिल है। यह भी मान्यता है कि नंदा, भ्रामरी, बाराही, भीमा, बालासुन्दरी, शाकम्बरी देवी का प्राचीन रूप झालीमाली है।

झालीमाली का अर्थ है-सुन्दर, सजी-धजी दिखने वाली देवी। झालीमाली शब्द झालमाल से बना है। जिसका भाव है- सम्पूर्णता के साथ फला-फूला समृद्ध समाज। अतः झालीमाली देवी सम्पूर्णता की प्रतीक है।

झालीमाली को ‘अग्नि की देवी’ माना गया है। संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देव नहीं, देवी के रूप प्रतिष्ठापित हुई है। हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देवी को झालीमाली, ज्वालपा और ज्वाला आदि नामों से जाना जाता है। एक जागर में ज्वालपा को झालीमाली की छोटी बहिन कहा गया है। झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा की ज्योति को अन्य स्थानों में ले जाने की परम्परा है
(डाॅ. गोविंद चातक-1990)।

झालीमाली को ‘युद्ध की देवी’ भी कहा गया है। हिमालयी राजाओं द्वारा युद्ध में विजय की कामना लिए हुए झालीमाली की जोत और ध्वजा को लेकर जाने की परम्परा का उल्लेख लोक-कथाओं एवं गाथाओं में उल्लेखित है। तिब्बत में हूणों की इष्टदेवी से भी झालीमाली को जोड़ा जाता है। हूण देश में झालीमाली को धन्य-धान्य की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। झालीमाली के जागरों में ‘हूणों की झालीमाली’ का जिक्र कई बार आता है। झालीमाली के मंदिर नेपाल में भी हैं।
(डाॅ. शिवप्रसाद नैथानी-2005)

हिट भूली, हुनदेश जूलो, तरूंल झुपर्याली साडों
खरूंल घुडंर्याली ऊन, ली ऊंलों बुकी वाला सुनू,
तै ऊन साटूंल भूली, कत्यूर रैनी-सैनी तोली,
कत्यूर रैनी-सैनी तोली, बैठली झालीमाली देवी,
कत्यूर झालीमाली देवी, त्वी देवी ह्यवे वरदैणी।
(डाॅ. एस.एस. पांगती-2016, 'जौहार के स्वर')

इतिहासविदों का मानना है कि उत्तराखंड के प्राचीन शासक सूर्यवंशी कत्यूरी (कैंतुरा), काली कुमाऊं के महर एवं रौत राजाओं की कुल देवी झालीमाली थी जिसे बाद में नंदा कहा जाने लगा। कोट भ्रामरी एवं बाराही देवी झालीमाली के विशिष्ट रूप हैं।

कत्यूरी झालीमाली देवी, कत्यूरी नीली छ चौंरी
रणचूलीहाट, राज कियो आसन्दी ने।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी -1994)

पौड़ी के कण्डारा गांव के झालीमाली मंदिर के जागरों में मालूशाही, उसके पुत्र मल्योहीत और उसके बाद के वंशज हरूहीत और पुष्कर हीत के शासन की चर्चा होती है।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी-1994)

देवी जागरों में यह उल्लेख मिलता है कि झालीमाली कत्यूरी राजा की रूपवान वीरांगना बेटी थी जो अपनी वीरता के कारण बाद में कत्यूरी वंश की कुल देवी प्रतिष्ठापित कर दी गई थी।
(गणेश खुगशाल ‘गणी’-2016)

'अग्नि की देवी झालीमाली' का मूल स्थान फुंगर गांव (चम्पावत) में है। प्राचीन काल में वहां झालीमाली को एक ज्योति के रूप में पूजा जाता था। यद्यपि वर्तमान समय में इस स्थान पर कई मूर्तियों का समूह है। यह मूर्तियां विभिन्न स्थानीय देवी-देवताओं की हैं। ये सभी मूर्तियां विविध समयों में फुंगर गांव के आस-पास के क्षेत्र में हुयी खुदाई से मिली हैं।

झालीमाली मातृदेवी है। यह भी मान्यता है कि झाली और माली दो बहिनें थी जो कि बाद में एकसार एवं एक तत्व होकर झालीमाली के रूप में विख्यात हुई हैं। झालीमाली का आदि संबध मां बाला त्रिपुरा सुन्दरी से भी माना जाता है।
(मोहन सिंह ‘गांववासी’-2012)

झाली माली देवी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने भक्तों को उनके जीवन में आने वाले अपशगुन/कष्टों के बारे में स्वप्न में आकर सचेत कर देती है। उत्तराखंड के ऐतिहासिक पात्र सदेई, रणूरौत, भीमा कठैत, सूरजनाग, जियारानी आदि की कथाओं में झालीमाली देवी ने सपने में आकर उनकी मदद की थी। इसीलिए मां झालीमाली को ‘स्वप्न की देवी’ भी कहा जाता है।

भाई-बहिन के अटूट प्रेम की कथा और गाथा ‘सदेई' गढ़वाल में घर-घर में सुनाई और गाई जाती है। सदेई पहली बार अपने भाई के उसके ससुराल आने की खुशी में अपनी पूर्व प्रतिज्ञानुसार झालीमाली देवी को अठ्वाड् (पशु बलि) देने लगी तो देवी ने उसके पुत्रोें या भाई की बलि की मांग कर दी। सदेई किसी भी हालत में अपने छोटे भाई को नहीं खोना चाहती थी। अतः उसने अपने दोनों पुत्रों को भाई के बदले बलि स्वरूप झालीमाली देवी को भेंट कर दिए। अपने छोटे भाई के प्रति अपार स्नेह वाली सदेई पर देवी झालीमाली ने प्रसन्न होकर उसके भेंट चढ़ाये गए दोनों पुत्रों उमरा और सुमरा को जीवित कर दिया था।

सदेई के भातृ प्रेम की यह कथा अमर हो गई। गढ़वाल में सदेई कथा (चैत्वाली) के जागर की अतिंम पंक्तियां इस प्रकार हैं-

धन्य होली वा वैण सदेई,
धन्य होलू वो भाई सदेऊ,
धन्य भाई-बैंण की वा पीरीत,
जु हमन गीत मा गाई,
सदेई का घर जनो होए मंगल,
होयान तुमकू भी दिशा-धियाण्यों।

जीवन में सर्वगुण सम्पन्न वर-वधू की मनोकामना के लिए अविवाहित युवक-युवतियों द्वारा झालीमाली, ज्वालपा, ज्वाला देवी को विशेष रूप में पूजने की प्रथा भी है।
(डॉ. गोविंद चातक-1990)।

इसी तरह सुयोग्य संतान प्राप्ति के लिए भी झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा का स्मरण विशेष फलदाई माना गया है। सामान्य रूप में झालीमाली को सौम्य एवं परिपूर्णता की देवी माना जाता है परन्तु तेजस्वी रूप में झालीमाली मां काली स्वरूप है। उदाहरण के लिए किवदन्ती है कि मुण्डनेश्वर (पौड़ी गढ़वाल) मंदिर परिसर में विराजमान मां काली की मूर्ति मूलतः झालीमाली ही है।
(पंडित भवानंद 'नैनवाल, नैनवाल वंश भास्कर')

उत्तराखंड में ममगांई, कैन्तुरा, गुंसाई, बडोनी, खुगशाल, मधवाल, कुकरेती, चमोला, बडोला, चमोली, रतूड़ी, नैनवाल, सती, महर, तड़ियाल, रावत, पयाल, बिष्ट, जोशी, बौंठियाल आदि जातियों की किन्हीं क्षेत्र विशेष में कुलदेवी झालीमाली है।

उत्तराखंड में झालीमाली के प्राचीन एवं प्रसिद्व देवस्थल हैं- प्रथम- चम्पावत के पास फुंगर गांव की चोटी।
द्वितीय- जोशीमठ में नरसिंह मंदिर परिसर।
(वर्तमान में मूर्ति विद्यमान नहीं है)
तृतीय- बैजनाथ की रणचूला की चोटी में कोट भ्रामरी मंदिर। चतुर्थ- पौड़ी के समीप कंडारा गांव।
पंचम- गौचर (चमोली) के निकट झालीमठ गांव।
षष्ट- खुगशा गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल।
सप्तम-नैल गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल

उक्त देवस्थलों के अलावा गढ़वाल में पौड़ी जनपद के डंगी, धमेली (असवालस्यूं), नवन मल्ला (सितोनस्यूं), सिराला (सबदरखाल), कठूड (कोटद्वार), कंडी (रावतस्यूं), मज्याणीसैंण, घीड़ी (रिखणीखाल), बैंग्वाड़ी (बारहजूला), मडाऊं (मौदाड़स्यूं), बरसूड़ी एवं जसपुर (द्वारीखाल), मन्दोली (खिर्सू), काण्डाई (पौड़ी), कुलासू, कठुली, डोबल एवं नाव (ऐकेश्वर), बादकोट (देवीखाल), चमोली जनपद में सणकोट (थराली) एवं टिहरी जनपद में खतवाड (लोस्तु बडियार), बांसकाटल (दोगी पट्टी), पौंसाड़ (हिण्डोलाखाल), बनगढ़ जरौला (खास पट्टी), खोन (देवप्रयाग) रुद्रप्रयाग जनपद में कोरछुला गांव, झाली गांव, खल्याण बांगर (जखोली), मंवाण गांव (तिलवाडा) में झालीमाली के मंदिर हैं।

दिव्यधाम झालीमाली मंदिर, खुगशा-
असवालस्यूं, पौड़ी (गढ़वाल) के खुगशा, कंडार और किनगोड़ीखाल गांव के समीवर्ती धार पर मां झालीमाली का प्रसिद्ध मंदिर है। झालीमाली की मूर्ति यहां किस काल में आयी और कैसे-कितने वर्षों तक जमीन के अंदर दबी रही यह सब इतिहास के गर्भ में अभी तक अज्ञात है। परन्तु यह कहा जाता है कि सन् 1906 में यहां पर स्थानीय लोगों द्वारा झालीमाली मंदिर का निर्माण किया गया था। इसके बारे में एक घटना प्रचलित है।

बात सन् 1906 की है। खुगशा गांव निवासी पंडित रूप राम खुगशाल के 12 वर्षीय पुत्र तारा दत्त खुगशाल अपनी ननिहाल नैल गांव में रह रहे थे। एक रात्रि को नैल गांव के झालीमाली मंदिर में देवी अनुष्ठान के दौरान तारा दत्त जी पर मां झालीमाली अवतरित हुई। बालक तारादत्त उसी समय रात को ही नाचते-नाचते नैल गांव से सीधे खुगशा गांव की धार की ओर चल दिए। वर्तमान मंदिर परिसर में प्रातःकालीन समय में नैल और नजदीकी गांवों के कई सयाने लोग भी उनके साथ-साथ यहां पहुंचे थे। तारादत्त जी ने वर्तमान देवी स्थल पर एक जोरदार प्रहार किया था। उनके कहने पर उसी स्थल पर अन्य लोगों द्वारा खुदाई करने पर मां झालीमाली देवी की अष्टधातु मूर्ति, चांदी का अर्कपात्र और एक खड्ग मिला। उसी समय वहां उपस्थित लोगों ने वहीं पर मां झालीमाली मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना आरंभ कर दी। तब से प्रमुखतया खुगशाल लोग नियमित रूप में इस मंदिर में पूजा-पाठ करने लगे हैं।

वर्तमान में यह दिव्य धाम भव्य सिद्धपीठ स्वरूप देश-दुनिया में झालीमाली देवी के प्रसिद्ध मंदिरों में प्रतिष्ठापित है।

प्रत्येक वर्ष 3 से 5 जून तक 'दिव्यधाम श्रीझालीमाली मंदिर, खुगशा', पौड़ी (गढ़वाल) में वार्षिक पूजा का आयोजन किया जाता है।

दिव्यधाम श्रीझालीमाली मंदिर, खुगशा, पौड़ी (गढ़वाल) आने-जाने के सड़क मार्ग-
1. कोटद्वार-गुमखाल-सतपुली-बौंसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-75 किमी.
2. ऋषिकेश-देवप्रयाग-व्यासघाट-सतपुली-बौंसाल- कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-175 किमी.
3. पौड़ी-ज्वाल्पा देवी-पाटीसैंण-बौंसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-60 किमी.
4. पौड़ी-अदवानी-कल्जीखाल-मुडंनेश्वर-भेटी-कंडारपानी-
झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-55 किमी.

संदर्भ-
'हिमालय की लोकदेवी झालीमाली'- डॉ. अरुण कुकसाल,
समय साक्ष्य प्रकाशन, 15 फालतू लाइन,
देहरादून- 248001,
दूरभाष- 0135-2658894, मोबाइल- 9412058952

विशेष- 'हिमालय की लोकदेवी झालीमाली' पुस्तक 'समय साक्ष्य' देहरादून के अलावा अमेजाॅन, ट्रांस मीडिया, श्रीनगर (गढ़वाल) और जैन पुस्तक, अपर बाजार, श्रीनगर (गढ़वाल) में उपलब्ध है।

कंडारपाणी की रामलीलापहाड़ के गांवों में विगत 60 सालों के अंतराल में रामलीला का बाहरी आवरण जरूर बदला पर उसकी मूल आत्मा मे...
15/10/2021

कंडारपाणी की रामलीला

पहाड़ के गांवों में विगत 60 सालों के अंतराल में रामलीला का बाहरी आवरण जरूर बदला पर उसकी मूल आत्मा में पात्र और दर्शक वहीं और वैसे ही हैं। रामलीला के पात्रों और दर्शकों का हमारे अतंर्मन में बसा यह चिरंजीवी आत्मिक मौन संवाद की छवि ही है जो हमें अपनी पैतृक जड़ों के पास बार-बार ले जाता है।

यह मजबूती जब तक रहेगी तब तक हम गांव में रहने वालों के लिए 'पलायन' शब्द का कोई अर्थ नहीं है। पलायन पर पलने वाले लोग हमारे लिए निक्कजू और फैशनपरस्त ही रहेंगे। फिलहाल बात हो रही थी अपने बचपन की रामलीला की तो चलो, वहीं चलते हैं।

गांव में बचपन की रामलीला के 10-12 दिन-रात सबसे मजे के होते। घर, खेत, स्कूल जहां भी हों, हम बच्चों की आपस में रामलीला के ही संवाद चलते रहते थे। दिन-भर धनुष-तीर से हर बच्चा लैस रहता था। स्कूल जाते-आते हुए भी ये साथ रहते। स्कूल में मास्साब की मार न पड़े इसलिए रास्ते में ही धनुष-तीर को गुप्त ठिकानों में, दोस्तों से छुपा के रखना होता था।

गांव की दीदी-फूफू के सुरक्षा घेरे में खाजा-बुखाणां के साथ रात को छिल्लों के उजाले में चामी से 1 किमी. की चढ़ाई चढ़कर कण्डारपाणी रामलीला देखने पहुंचते थे।

कण्डारपाणी का तप्पड 5-6 से अधिक गैस (पैट्रोमेक्स) के उजालों से जगमगा रहा होता था। पैट्रोमेक्स देखना, हमारे लिए रामलीला के अलावा एक अन्य बहुत बड़ा आकर्षण और अचरज़ रहता था। हर पैटोमैक्स ऊंचे स्थान पर बड़े लड़कों की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में जगमगाता रहता। हम बच्चों को उसके पास जाने की सख्त मनाही होती थी। पर वो बच्चा ही क्या जो मना करने वाले काम को न करे। हम पैटोमैक्स के उजाले में रात को हुए इस दिन का मजा लेने उनके पास ही मंडराते रहते।

अपने गांव चामी के कलाकार हमारी पहली पंसद के होते थे। सीता स्वयंवर में छवि राजा बने गयाप्रसाद ब्याडा जी (ताऊ जी) की जोकरिंग मजेदार होती। वे खूब सारे फटेपुराने कपड़े पहनकर स्टेज पर गाते.......
छः स्यारों छछिडों खा छै,
छः स्यारों बसिंगों,
अर भुक्की रै गो मि ब्याले रात.....

तब कण्डारपाणी स्कूल के ऊपर वाले तप्पड़ पर जाड़ों में रामलीला होती थी। रामलीला के मुख्य पात्र बनना तो दूर हम छोटे बच्चों के लिए बंदर या राक्षस बनने के लिए भी जुगाड़ लगाना पड़ता था। बंदर बनने की होड रहती, क्योंकि राक्षसों से जीतना तो आखिर में बंदरों को ही था। साथ ही राक्षसों को बेमतलब की मार भी ज्यादा खानी होती थी और फिर राक्षस तो राक्षस ही ठहरा।

बंदर बनने में एक दिक्कत आडे़ आती थी कि उसमें ज्यादातर को मुखोटा पहनना पड़ता था। जिससे दर्शक दीर्घा में बैठे अपने परिवारजनों, गांववालों और दोस्तों को पता ही नहीं चल पाता था कि मैं स्टेज पर बंदर का पात्र निभा रहा हूं। इसकी तोड़ के लिए हम बीच-बीच में मुखौटा उठा कर दर्शकों (विशेष कर अपने परिचितों की ओर) को अपना मुंह बार-बार दिखाते रहते, ताकि घर-गांव में हमारा रुतवा बना रहे। हमारी इस हरकत पर हनुमान जी या बड़ा बंदर अपने गदे से हमारी पीठ पर जोर की घौल जमाता।

कभी-कभी रामलीला की मर्यादा को तोड़ते हुए मंच पर ही बंदर और राक्षस आपस में सचमुच ही लडने लगते। कमेटी वाले उन्हें जबरदस्ती स्टेज से खींच कर हटाते। स्टेज के पीछे ले जाकर तब वे ही हमारी असली धुनाई करते थे।

मैकपमैन की सख्त हिदायत रहती कि कल सुबह मुहं मत धोना। वरना उसे दूसरे दिन फिर से मैकअप करना पड़ता था। हमारे स्कूल के मास्साब रामलीला के मुख्य मेकअप मेन होते थे। परन्तु वे बड़े कलाकारों मसलन राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, रावण आदि के ही मेकअप करते थे। मेकअप के सारे रंग प्राकृतिक फूल, पत्ती और विभिन्न लकडियों की राख के बने होते।

रामलीला शुरू होने के कई दिन पहले हर प्रकार की लकड़ियों को अलग-अलग ढेरियों में पहले खूब जलाया जाता। फिर उसे महीन कपड़े में छानकर रखा जाता था। वैसे सभी लकड़ियों की राख सफेद होती पर उसमें भी उनके अलग-अलग सैड होते। सौंदर्य प्रसाधन के पाउडर के रूप में मुख्यतया भीमल की लकड़ी की राख पात्रों के चेहरे पर लगाई जाती थी। पात्रों के मैकअप में इन राखों का सबसे ज्यादा योगदान रहता था।

रामलीला के कुछ पात्र अपने घर से ही सज-धज कर आते थे। ऐसा वो अपने रोल को अलग हट कर और आकर्षक बनाने के लिए करते थे। रामलीला के मैकपमैन पर उनका भरोसा कम ही रहता। ऐसे कलाकार अनुभवी, वरिष्ठ और बुजुर्गवार होते थे। इसमें सीता स्वयंवर में छवि राजा बनने वाले मंझे कलाकार होते थे।

खुगशा गांव के पीताम्बर दत्त खुगशाल जी और चामी गांव के गया प्रसाद खुगशाल जी छवि राजा के रूप में बहुत लोकप्रिय थे। अलग-अलग गांवों से रात को अपने रोल का मेकअप किए रामलीला में पाठ खेलने आते लोगों को देखना हमारे लिए बहुत रोमांचक होता था।

सबसे मजेदार बात तो यह होती थी कि रामलीला मंचन स्थल कण्डारपाणी से 2 किमी दूर के गांव सरासू से एक लोकप्रिय कलाकार (नारायण दत्त घिल्डियाल जी) ताड़िका बनकर छम-छम अपने दल-बल के साथ ऊंची-ऊंची किटकताल (अठ्ठाहास) मारते हुआ आता था। उसके पीछे-पीछे लेकिन थोड़ा दूरी पर रास्ते के गांवों के लोगों का हूजूम भी उनके साथ हो लेता था। उस ताडि़का के दांये-बांये और आगे-पीछे राक्षस बने लड़के खूब शोर मचाते चलते थे।

रास्ते भर उनकी किलकारियां और ताडि़का का अठ्ठाहास हम बच्चों के लिए भयानक माहौल होता था। पर फिर भी उनको देखने और साथ चलने के रोमांच को हम छोड़ नहीं पाते थे। उस ताड़िका बने कलाकार की गब्बर गर्जना से पेड़ों और झाडि़यों में सोई चिड़ियायें अचानक जागकर चिल्लाने लगती, पेड़ों पर सोये कुछ बंदर तो पत्त से नीचे गिर जाते थे और नजदीकी जंगल के जानवर यथा-बाघ, गुलदार, सियार, सुवर आदि जंगल से छू-मंतर हो जाते थे।

रात की रामलीला खेलने के बाद दूसरे दिन स्कूल में रंग-बिरंगे मुंह वाले बच्चे ही ज्यादा दिखाई देते। बिना मुहं धुले लाल ओंठों के साथ सबके माथे पर लाल नीली-पीली बिंदियां चमकती रहती थी। ओंठों को लाल करना तब सबसे बड़ा शौक होता था। क्लास में पाठ-पहाड़ा याद करते हुए अथवा कान पकडकर खड़े या मुर्गा बने रंग-बिरंगे बच्चों का स्कूली सीन तब जबरदस्त दिखता रहा होगा।

मुझे याद है कि स्कूल के हाफ टाइम में रामलीला में लक्ष्मण और सीता बने दोनों लड़कों में आपस में किसी बात पर हाथा-पाई हो गयी थी। मास्साब जी ने देखा तो तुरन्त दोनों को सजा के तौर पर मुर्गा बना दिया।

मजा तब आया जब उसी रात को रामलीला के शुभारंभ में वही मास्साब जी लक्ष्मण और सीता बने उन्हीं लडकों की आरती उतारते हुये तल्लीनता से गा रहे थे-
‘श्री रामचन्द्र कृपाल भज मन हरण भय.............।

डाॅ. अरुण कुकसाल

अपनी यात्रा-पुस्तक 'चले साथ पहाड़' पर अपनी बात-(वैसे, अपनी किताब प्रकाशित होने पर अपनी कहां रह जाती है, वह तो पाठकों की ...
18/08/2021

अपनी यात्रा-पुस्तक 'चले साथ पहाड़' पर अपनी बात-

(वैसे, अपनी किताब प्रकाशित होने पर अपनी कहां रह जाती है, वह तो पाठकों की हो जाती है।)

मनुष्य हर क्षण यात्रा में रहता है। तन से, मन से और अक्सर तन-मन दोनों से। इन अर्थों में यात्रायें जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। जो सुना और पढ़ा उसे देखने की सुगबुहाट और बैचेनी यात्राओं का आरंभ बिंदु है। यात्राएं आदमी को जगत और जीवन की व्यापकता, गूढ़ता, विकटता और सौन्दर्य का बोध कराती हैं। बचपन से आज तक चल रही अनवरत और अनगिनित यात्राओं ने आज जैसा मैं हूं, वैसा बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।

बचपन में घर के छज्जे से सामने के पहाड़ के उस पार की दुनिया की मैं काल्पनिक यात्राऐं करता था। गांव की सबसे ऊंची धार से दिखने वाले पहाड़, जंगल, नदी मुझे अपने पास बुलाते नजर आते थे। इसीलिए शादी-बरात और मेला-त्यौहार में अनजाने इलाकों में जाने का कोई अवसर मैं हाथ से न जाने देता था। गांव से बाहर आने के बाद स्कूल, कालेज, सामाजिक आन्दोलन, शोध, नौकरी के दौरान की गई पहाड़ी यात्राएं मेरी खास अभिरुचियों में शामिल रही हैं। इन यात्राओं ने मेरी जीवनीय दिशा को एक सामाजिक समझ प्रदान की हैं। यह खुशनसीबी है कि यात्राओं का यह सिलसिला अभी भी जारी है।

मित्रों के बीच मेरी यात्राओं पर अक्सर व्यापक चर्चायें हुई हैं। उनका सुझाव था कि इन यात्राओं पर एक किताब आनी चाहिए। मित्रों का आदेश सिर-आखों पर। ‘चले साथ पहाड़’ किताब आपके पास पहुंच रही है। किताब में मेरी विगत 30 साल की यात्रायें शामिल हैं। सुंदरढुंगा ग्लेशियर यात्रा अक्टूबर, 1990 की है। इस नाते वह इस किताब में शामिल यात्राओं में सबसे पुरानी है। तबसे बहुत समय बदल गया है। परन्तु बिडम्बना यह है कि सुन्दरढुंगा ग्लेशियर जाने के आखिरी आबादी वाले जातोली गांव के लोग जीवन की मूलभूत सुविधाओं अभी भी वंचित हैं।

दानपुर यात्रा यहां के लोगों के इस दुखःदर्द को बयां करते हैं। सर-बडियाड़ की यात्रा में पहाड़ी जनजीवन की जीवटता और संघर्ष की झलक है। श्रीनगर-रानीखेत और श्रीनगर-अल्मोड़ा यात्रा गढ़वाल-कुमाऊं की आपसी साझी सांस्कृतिक विरासत को दिखाती है। मध्यमहेश्वर, कार्तिक स्वामी, तुंगनाथ और रुद्रनाथ यात्रा गढ़वाल के खूबसूरत परन्तु अनजाने तीर्थ स्थलों की ओर आपको ले जाती है। केदारनाथ यात्रा जून, 2013 की आपदा के बाद के केदार घाटी के पारिस्थितिकीय बदलावों को सामने लाती है। कुल मिलाकर ये यात्रायें आज के उत्तराखंड की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर को लाने की कोशिश भर है। इस दिशा में मैं कितना सार्थक लिख पाया हूं, आप विद्वतजन इसको बता पायेंगे।

मेरा अहो भाग्य! कि इस किताब की भूमिका प्रसिद्ध विज्ञान लेखक और घुमक्कड़ देवेंद्र मेवाड़ी जी ने लिखी है। किताब का नामकरण ‘चले साथ पहाड़’ भी उन्होंने ही किया है। मेरे लिए बड़े भाई देवेंद्र मेवाड़ी जी यह आशीर्वाद जीवन की अमूल्य धरोहर है। मित्र सुरेश भट्ट, ट्रांस मीडिया, श्रीनगर, गढ़वाल ने इन यात्राओं को सजा-संवार कर खूबसूरत रूप दिया है। उन्हें तहे दिल से धन्यवाद। ‘चले साथ पहाड’ किताब को श्री अभिषेक अग्रवाल जी ने संभावना प्रकाशन से प्रकाशित करके मेरा मान बढ़ाया है। उन्हें उनकी प्रकाशन टीम के साथ मित्रवत घन्यवाद।

यात्राओं में साथ रहे साथी इस किताब के प्रमुख किरदार हैं। किताब की जीवंतता उन्हीं से है। उनका स्नेह ही मुझे अगली यात्रा के लिए प्रेरित करता है। सुपुत्री हिमाली ने बार-बार किताब प्रकाशित करने को प्रोत्साहित किया तो सुपुत्र अमन और धर्मपत्नी दीना जी ने घर के जिम्मेदारियों से मुझे हमेशा मुक्त रखा है। उन्हें धन्यवाद कैसे कहूं, उनसे अलग तो मेरा व़जूद कहीं दिखता नहीं है।

किताब पर स्नेही पाठकों की प्रतिक्रया और सुझाव मुझे आत्मबल प्रदान करेंगे। ताकि अगली यात्रा पुस्तक लिखने के लिए मेरे उत्साह को नई ताकत मिल सके।

यात्रा-पुस्तक 'चले साथ पहाड़' अभिषेक अग्रवाल, संभावना प्रकाशन, मोबाइल नंबर- 7017437410 अथवा अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं-
https://www.amazon.in/dp/8195294901?ref=myi_title_dp

अरुण कुकसाल
चामी गांव, असवालस्यूं
पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)

'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा,...
24/10/2020

'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'
उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री के अतिरिक्त अन्य कई स्थानीय रूप हैं। इनमें नंदा राजराजेश्वरी, चन्द्रबदनी, सुरकंडा, कोट भ्रामरी, मठियाणा, कुंजापुरी, धारी देवी, ज्वालपा, गढ़देवी, कंसमर्दिनी, अनुसूया, पुण्यासणी, पाताल भुवनेश्वरी, झूलादेवी, भद्रकाली और बराही देवी आदि हैं। लोकदेवी झालीमाली देवी इन्हीं में शामिल है। यह भी मान्यता है कि नंदा, भ्रामरी, बाराही, भीमा, बालासुन्दरी, शाकम्बरी देवी का प्राचीन रूप झालीमाली है।

झालीमाली का अर्थ है-सुन्दर, सजी-धजी दिखने वाली देवी। झालीमाली शब्द झालमाल से बना है। जिसका भाव है- सम्पूर्णता के साथ फला-फूला समृद्ध समाज। अतः झालीमाली देवी सम्पूर्णता की प्रतीक है।

झालीमाली को ‘अग्नि की देवी’ माना गया है। संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देव नहीं, देवी के रूप प्रतिष्ठापित हुई है। हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देवी को झालीमाली, ज्वालपा और ज्वाला आदि नामों से जाना जाता है। एक जागर में ज्वालपा को झालीमाली की छोटी बहिन कहा गया है। झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा की ज्योति को अन्य स्थानों में ले जाने की परम्परा है
(डाॅ. गोविंद चातक-1990)।

झालीमाली को ‘युद्ध की देवी’ भी कहा गया है। हिमालयी राजाओं द्वारा युद्ध में विजय की कामना लिए हुए झालीमाली की जोत और ध्वजा को लेकर जाने की परम्परा का उल्लेख लोक-कथाओं एवं गाथाओं में उल्लेखित है। तिब्बत में हूणों की इष्टदेवी से भी झालीमाली को जोड़ा जाता है। हूण देश में झालीमाली को धन्य-धान्य की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। झालीमाली के जागरों में ‘हूणों की झालीमाली’ का जिक्र कई बार आता है। झालीमाली के मंदिर नेपाल में भी हैं।
(डाॅ. शिवप्रसाद नैथानी-2005)

हिट भूली, हुनदेश जूलो, तरूंल झुपर्याली साडों
खरूंल घुडंर्याली ऊन, ली ऊंलों बुकी वाला सुनू,
तै ऊन साटूंल भूली, कत्यूर रैनी-सैनी तोली,
कत्यूर रैनी-सैनी तोली, बैठली झालीमाली देवी,
कत्यूर झालीमाली देवी, त्वी देवी ह्यवे वरदैणी।
(डाॅ. एस.एस. पांगती-2016, 'जौहार के स्वर')

इतिहासविदों का मानना है कि उत्तराखंड के प्राचीन शासक सूर्यवंशी कत्यूरी (कैंतुरा), काली कुमाऊं के महर एवं रौत राजाओं की कुल देवी झालीमाली थी जिसे बाद में नंदा कहा जाने लगा। कोट भ्रामरी एवं बाराही देवी झालीमाली के विशिष्ट रूप हैं।

कत्यूरी झालीमाली देवी, कत्यूरी नीली छ चौंरी
रणचूलीहाट, राज कियो आसन्दी ने।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी -1994)

पौड़ी के कण्डारा गांव के झालीमाली मंदिर के जागरों में मालूशाही, उसके पुत्र मल्योहीत और उसके बाद के वंशज हरूहीत और पुष्कर हीत के शासन की चर्चा होती है।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी-1994)

देवी जागरों में यह उल्लेख मिलता है कि झालीमाली कत्यूरी राजा की रूपवान वीरांगना बेटी थी जो अपनी वीरता के कारण बाद में कत्यूरी वंश की कुल देवी प्रतिष्ठापित कर दी गई थी।
(गणेश खुगशाल ‘गणी’-2016)

'अग्नि की देवी झालीमाली' का मूल स्थान फुंगर गांव (चम्पावत) में है। प्राचीन काल में वहां झालीमाली को एक ज्योति के रूप में पूजा जाता था। यद्यपि वर्तमान समय में इस स्थान पर कई मूर्तियों का समूह है। यह मूर्तियां विभिन्न स्थानीय देवी-देवताओं की हैं। ये सभी मूर्तियां विविध समयों में फुंगर गांव के आस-पास के क्षेत्र में हुयी खुदाई से मिली हैं।

झालीमाली मातृदेवी है। यह भी मान्यता है कि झाली और माली दो बहिनें थी जो कि बाद में एकसार एवं एक तत्व होकर झालीमाली के रूप में विख्यात हुई हैं। झालीमाली का आदि संबध मां बाला त्रिपुरा सुन्दरी से भी माना जाता है।
(मोहन सिंह ‘गांववासी’-2012)

झाली माली देवी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने भक्तों को उनके जीवन में आने वाले अपशगुन/कष्टों के बारे में स्वप्न में आकर सचेत कर देती है। उत्तराखंड के ऐतिहासिक पात्र सदेई, रणूरौत, भीमा कठैत, सूरजनाग, जियारानी आदि की कथाओं में झालीमाली देवी ने सपने में आकर उनकी मदद की थी। इसीलिए मां झालीमाली को ‘स्वप्न की देवी’ भी कहा जाता है।

भाई-बहिन के अटूट प्रेम की कथा और गाथा ‘सदेई' गढ़वाल में घर-घर में सुनाई और गाई जाती है। सदेई पहली बार अपने भाई के उसके ससुराल आने की खुशी में अपनी पूर्व प्रतिज्ञानुसार झालीमाली देवी को अठ्वाड् (पशु बलि) देने लगी तो देवी ने उसके पुत्रोें या भाई की बलि की मांग कर दी। सदेई किसी भी हालत में अपने छोटे भाई को नहीं खोना चाहती थी। अतः उसने अपने दोनों पुत्रों को भाई के बदले बलि स्वरूप झालीमाली देवी को भेंट कर दिए। अपने छोटे भाई के प्रति अपार स्नेह वाली सदेई पर देवी झालीमाली ने प्रसन्न होकर उसके भेंट चढ़ाये गए दोनों पुत्रों उमरा और सुमरा को जीवित कर दिया था।

सदेई के भातृ प्रेम की यह कथा अमर हो गई। गढ़वाल में सदेई कथा (चैत्वाली) के जागर की अतिंम पंक्तियां इस प्रकार हैं-

धन्य होली वा वैण सदेई,
धन्य होलू वो भाई सदेऊ,
धन्य भाई-बैंण की वा पीरीत,
जु हमन गीत मा गाई,
सदेई का घर जनो होए मंगल,
होयान तुमकू भी दिशा-धियाण्यों।

जीवन में सर्वगुण सम्पन्न वर-वधू की मनोकामना के लिए अविवाहित युवक-युवतियों द्वारा झालीमाली, ज्वालपा, ज्वाला देवी को विशेष रूप में पूजने की प्रथा भी है।
(डॉ. गोविंद चातक-1990)।

इसी तरह सुयोग्य संतान प्राप्ति के लिए भी झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा का स्मरण विशेष फलदाई माना गया है। सामान्य रूप में झालीमाली को सौम्य एवं परिपूर्णता की देवी माना जाता है परन्तु तेजस्वी रूप में झालीमाली मां काली स्वरूप है। उदाहरण के लिए किवदन्ती है कि मुण्डनेश्वर (पौड़ी गढ़वाल) मंदिर परिसर में विराजमान मां काली की मूर्ति मूलतः झालीमाली ही है।
(पंडित भवानंद 'नैनवाल, नैनवाल वंश भास्कर')

उत्तराखंड में ममगांई, कैन्तुरा, गुंसाई, बडोनी, खुगशाल, मधवाल, कुकरेती, चमोला, बडोला, चमोली, रतूड़ी, नैनवाल, सती, महर, तड़ियाल, रावत, पयाल, बिष्ट, जोशी, बौंठियाल आदि जातियों की किन्हीं क्षेत्र विशेष में कुलदेवी झालीमाली है।

उत्तराखंड में झालीमाली के प्राचीन एवं प्रसिद्व देवस्थल हैं- प्रथम- चम्पावत के पास फुंगर गांव की चोटी।
द्वितीय- जोशीमठ में नरसिंह मंदिर परिसर।
(वर्तमान में मूर्ति विद्यमान नहीं है)
तृतीय- बैजनाथ की रणचूला की चोटी में कोट भ्रामरी मंदिर। चतुर्थ- पौड़ी के समीप कंडारा गांव।
पंचम- गौचर (चमोली) के निकट झालीमठ गांव।
षष्ट- खुगशा गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल।
सप्तम-नैल गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल

उक्त देवस्थलों के अलावा गढ़वाल में पौड़ी जनपद के डंगी, धमेली (असवालस्यूं), नवन मल्ला (सितोनस्यूं), सिराला (सबदरखाल), कठूड (कोटद्वार), कंडी (रावतस्यूं), मज्याणीसैंण, घीड़ी (रिखणीखाल), बैंग्वाड़ी (बारहजूला), मडाऊं (मौदाड़स्यूं), बरसूड़ी एवं जसपुर (द्वारीखाल), मन्दोली (खिर्सू), काण्डाई (पौड़ी), कुलासू, कठुली, डोबल एवं नाव (ऐकेश्वर), बादकोट (देवीखाल), चमोली जनपद में सणकोट (थराली) एवं टिहरी जनपद में खतवाड (लोस्तु बडियार), बांसकाटल (दोगी पट्टी), पौंसाड़ (हिण्डोलाखाल), बनगढ़ जरौला (खास पट्टी), खोन (देवप्रयाग) रुद्रप्रयाग जनपद में कोरछुला गांव, झाली गांव, खल्याण बांगर (जखोली), मंवाण गांव (तिलवाडा) में झालीमाली के मंदिर हैं।

दिव्यधाम झालीमाली मंदिर, खुगशा-
असवालस्यूं, पौड़ी (गढ़वाल) के खुगशा, कंडार और किनगोड़ीखाल गांव के समीवर्ती धार पर मां झालीमाली का प्रसिद्ध मंदिर है। झालीमाली की मूर्ति यहां किस काल में आयी और कैसे-कितने वर्षों तक जमीन के अंदर दबी रही यह सब इतिहास के गर्भ में अभी तक अज्ञात है। परन्तु यह कहा जाता है कि सन् 1906 में यहां पर स्थानीय लोगों द्वारा झालीमाली मंदिर का निर्माण किया गया था। इसके बारे में एक घटना प्रचलित है। बात सन् 1906 की है। खुगशा गांव निवासी पंडित रूप राम खुगशाल के 12 वर्षीय पुत्र तारा दत्त खुगशाल अपनी ननिहाल नैल गांव में रह रहे थे। एक रात्रि को नैल गांव के झालीमाली मंदिर में देवी अनुष्ठान के दौरान तारा दत्त जी पर मां झालीमाली अवतरित हुई। बालक तारादत्त उसी समय रात को ही नाचते-नाचते नैल गांव से सीधे खुगशा गांव की धार की ओर चल दिए। वर्तमान मंदिर परिसर में प्रातःकालीन समय में नैल और नजदीकी गांवों के कई सयाने लोग भी उनके साथ-साथ यहां पहुंचे थे। तारादत्त जी ने वर्तमान देवी स्थल पर एक जोरदार प्रहार किया था। उनके कहने पर उसी स्थल पर अन्य लोगों द्वारा खुदाई करने पर मां झालीमाली देवी की अष्टधातु मूर्ति, चांदी का अर्कपात्र और एक खड्ग मिला। उसी समय वहां उपस्थित लोगों ने वहीं पर मां झालीमाली मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना आरंभ कर दी। तब से प्रमुखतया खुगशाल लोग नियमित रूप में इस मंदिर में पूजा-पाठ करने लगे हैं। वर्तमान में यह दिव्य मंदिर एक भव्य सिद्धपीठ स्वरूप देश-दुनिया में झालीमाली देवी के प्रसिद्ध मंदिरों में प्रतिष्ठापित है।

श्रीझालीमाली मंदिर, खुगशा आने-जाने के सड़क मार्ग-
1. कोटद्वार-गुमखाल-सतपुली-बौंसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-75 किमी.
2. ऋषिकेश-देवप्रयाग-व्यासघाट-सतपुली-बौंसाल- कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-175 किमी.
3. पौड़ी-ज्वाल्पा देवी-पाटीसैंण-बौंसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-60 किमी.
4. पौड़ी-अदवानी-कल्जीखाल-मुडंनेश्वर-भेटी-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-55 किमी.

संदर्भ-
'हिमालय की लोकदेवी झालीमाली'- डॉ. अरुण कुकसाल,
समय साक्ष्य प्रकाशन, 15 फालतू लाइन,
देहरादून- 248001,
दूरभाष- 0135-2658894, मोबाइल- 9412058952

06/06/2020
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'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा,...
01/11/2019

'संपूर्णता की देवी श्रीझालीमाली'
उत्तराखंड में देवी भगवती के नौ रूपों यथा- शैलपुत्री, ब्रहृमचारिणी, चन्द्रघंटा, कुशमांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री के अतिरिक्त अन्य कई स्थानीय रूप हैं। इनमें नंदा राजराजेश्वरी, चन्द्रबदनी, सुरकंडा, कोट भ्रामरी, मठियाणा, कुंजापुरी, धारी देवी, ज्वालपा, गढ़देवी, कंसमर्दिनी, अनुसूया, पुण्यासणी, पाताल भुवनेश्वरी, झूलादेवी, भद्रकाली और बराही देवी आदि हैं। लोकदेवी झालीमाली देवी इन्हीं में शामिल है। यह भी मान्यता है कि नंदा, भ्रामरी, बाराही, भीमा, बालासुन्दरी, शाकम्बरी देवी का प्राचीन रूप झालीमाली है।

झालीमाली का अर्थ है-सुन्दर, सजी-धजी दिखने वाली देवी। झालीमाली शब्द झालमाल से बना है। जिसका भाव है- सम्पूर्णता के साथ फला-फूला समृद्ध समाज। अतः झालीमाली देवी सम्पूर्णता की प्रतीक है।

झालीमाली को ‘अग्नि की देवी’ माना गया है। संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देव नहीं, देवी के रूप प्रतिष्ठापित हुई है। हिमालयी क्षेत्र में अग्नि देवी को झालीमाली, ज्वालपा और ज्वाला आदि नामों से जाना जाता है। एक जागर में ज्वालपा को झालीमाली की छोटी बहिन कहा गया है। झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा की ज्योति को अन्य स्थानों में ले जाने की परम्परा है
(डाॅ. गोविंद चातक-1990)।

झालीमाली को ‘युद्ध की देवी’ भी कहा गया है। हिमालयी राजाओं द्वारा युद्ध में विजय की कामना लिए हुए झालीमाली की जोत और ध्वजा को लेकर जाने की परम्परा का उल्लेख लोक-कथाओं एवं गाथाओं में उल्लेखित है। तिब्बत में हूणों की इष्टदेवी से भी झालीमाली को जोड़ा जाता है। हूण देश में झालीमाली को धन्य-धान्य की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। झालीमाली के जागरों में ‘हूणों की झालीमाली’ का जिक्र कई बार आता है। झालीमाली के मंदिर नेपाल में भी हैं।
(डाॅ. शिवप्रसाद नैथानी-2005)

हिट भूली, हुनदेश जूलो, तरूंल झुपर्याली साडों
खरूंल घुडंर्याली ऊन, ली ऊंलों बुकी वाला सुनू,
तै ऊन साटूंल भूली, कत्यूर रैनी-सैनी तोली,
कत्यूर रैनी-सैनी तोली, बैठली झालीमाली देवी,
कत्यूर झालीमाली देवी, त्वी देवी ह्यवे वरदैणी।
(डाॅ. एस.एस. पांगती-2016, 'जौहार के स्वर')

इतिहासविदों का मानना है कि उत्तराखंड के प्राचीन शासक सूर्यवंशी कत्यूरी (कैंतुरा), काली कुमाऊं के महर एवं रौत राजाओं की कुल देवी झालीमाली थी जिसे बाद में नंदा कहा जाने लगा। कोट भ्रामरी एवं बाराही देवी झालीमाली के विशिष्ट रूप हैं।

कत्यूरी झालीमाली देवी, कत्यूरी नीली छ चौंरी
रणचूलीहाट, राज कियो आसन्दी ने।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी -1994)

पौड़ी के कण्डारा गांव के झालीमाली मंदिर के जागरों में मालूशाही, उसके पुत्र मल्योहीत और उसके बाद के वंशज हरूहीत और पुष्कर हीत के शासन की चर्चा होती है।
(डाॅ. दीपचंद चौधरी-1994)

देवी जागरों में यह उल्लेख मिलता है कि झालीमाली कत्यूरी राजा की रूपवान वीरांगना बेटी थी जो अपनी वीरता के कारण बाद में कत्यूरी वंश की कुल देवी प्रतिष्ठापित कर दी गई थी।
(गणेश खुगशाल ‘गणी’-2016)

'अग्नि की देवी झालीमाली' का मूल स्थान फुंगर गांव (चम्पावत) में है। प्राचीन काल में वहां झालीमाली को एक ज्योति के रूप में पूजा जाता था। यद्यपि वर्तमान समय में इस स्थान पर कई मूर्तियों का समूह है। यह मूर्तियां विभिन्न स्थानीय देवी-देवताओं की हैं। ये सभी मूर्तियां विविध समयों में फुंगर गांव के आस-पास के क्षेत्र में हुयी खुदाई से मिली हैं।

झालीमाली मातृदेवी है। यह भी मान्यता है कि झाली और माली दो बहिनें थी जो कि बाद में एकसार एवं एक तत्व होकर झालीमाली के रूप में विख्यात हुई हैं। झालीमाली का आदि संबध मां बाला त्रिपुरा सुन्दरी से भी माना जाता है।
(मोहन सिंह ‘गांववासी’-2012)

झाली माली देवी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने भक्तों को उनके जीवन में आने वाले अपशगुन/कष्टों के बारे में स्वप्न में आकर सचेत कर देती है। उत्तराखंड के ऐतिहासिक पात्र सदेई, रणूरौत, भीमा कठैत, सूरजनाग, जियारानी आदि की कथाओं में झालीमाली देवी ने सपने में आकर उनकी मदद की थी। इसीलिए मां झालीमाली को ‘स्वप्न की देवी’ भी कहा जाता है।

भाई-बहिन के अटूट प्रेम की कथा और गाथा ‘सदेई' गढ़वाल में घर-घर में सुनाई और गाई जाती है। सदेई पहली बार अपने भाई के उसके ससुराल आने की खुशी में अपनी पूर्व प्रतिज्ञानुसार झालीमाली देवी को अठ्वाड् (पशु बलि) देने लगी तो देवी ने उसके पुत्रोें या भाई की बलि की मांग कर दी। सदेई किसी भी हालत में अपने छोटे भाई को नहीं खोना चाहती थी। अतः उसने अपने दोनों पुत्रों को भाई के बदले बलि स्वरूप झालीमाली देवी को भेंट कर दिए। अपने छोटे भाई के प्रति अपार स्नेह वाली सदेई पर देवी झालीमाली ने प्रसन्न होकर उसके भेंट चढ़ाये गए दोनों पुत्रों उमरा और सुमरा को जीवित कर दिया था।

सदेई के भातृ प्रेम की यह कथा अमर हो गई। गढ़वाल में सदेई कथा (चैत्वाली) के जागर की अतिंम पंक्तियां इस प्रकार हैं-

धन्य होली वा वैण सदेई,
धन्य होलू वो भाई सदेऊ,
धन्य भाई-बैंण की वा पीरीत,
जु हमन गीत मा गाई,
सदेई का घर जनो होए मंगल,
होयान तुमकू भी दिशा-धियाण्यों।

जीवन में सर्वगुण सम्पन्न वर-वधू की मनोकामना के लिए अविवाहित युवक-युवतियों द्वारा झालीमाली, ज्वालपा, ज्वाला देवी को विशेष रूप में पूजने की प्रथा भी है।
(डॉ. गोविंद चातक-1990)।

इसी तरह सुयोग्य संतान प्राप्ति के लिए भी झालीमाली, ज्वाला और ज्वालपा का स्मरण विशेष फलदाई माना गया है। सामान्य रूप में झालीमाली को सौम्य एवं परिपूर्णता की देवी माना जाता है परन्तु तेजस्वी रूप में झालीमाली मां काली स्वरूप है। उदाहरण के लिए किवदन्ती है कि मुण्डनेश्वर (पौड़ी गढ़वाल) मंदिर परिसर में विराजमान मां काली की मूर्ति मूलतः झालीमाली ही है।
(पंडित भवानंद 'नैनवाल, नैनवाल वंश भास्कर')

उत्तराखंड में ममगांई, कैन्तुरा, गुंसाई, बडोनी, खुगशाल, मधवाल, कुकरेती, चमोला, बडोला, चमोली, रतूड़ी, नैनवाल, सती, महर, तड़ियाल, रावत, नौटियाल, पयाल, बिष्ट, जोशी, बौंठियाल आदि जातियों की किन्हीं क्षेत्र विशेष में कुलदेवी झालीमाली है।

उत्तराखंड में झालीमाली के प्राचीन एवं प्रसिद्व देवस्थल हैं- प्रथम- चम्पावत के पास फुंगर गांव की चोटी।
द्वितीय- जोशीमठ में नरसिंह मंदिर परिसर।
(वर्तमान में मूर्ति विद्यमान नहीं है)
तृतीय- बैजनाथ की रणचूला की चोटी में कोट भ्रामरी मंदिर। चतुर्थ- पौड़ी के समीप कंडारा गांव।
पंचम- गौचर (चमोली) के निकट झालीमठ गांव।
षष्ट- खुगशा गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल।
सप्तम-नैल गांव, असवालस्यूं, पौड़ी गढ़वाल

उक्त देवस्थलों के अलावा गढ़वाल में पौड़ी जनपद के डंगी, धमेली (असवालस्यूं), नवन मल्ला (सितोनस्यूं), सिराला (सबदरखाल), कठूड (कोटद्वार), कंडी (रावतस्यूं), मज्याणीसैंण, घीड़ी (रिखणीखाल), बैंग्वाड़ी (बारहजूला), मडाऊं (मौदाड़स्यूं), बरसूड़ी एवं जसपुर (द्वारीखाल), मन्दोली (खिर्सू), काण्डाई (पौड़ी), कुलासू, कठुली, डोबल एवं नाव (ऐकेश्वर), बादकोट (देवीखाल), चमोली जनपद में सणकोट (थराली) एवं टिहरी जनपद में खतवाड (लोस्तु बडियार), बांसकाटल (दोगी पट्टी), पौंसाड़ (हिण्डोलाखाल), बनगढ़ जरौला (खास पट्टी), खोन (देवप्रयाग) रुद्रप्रयाग जनपद में कोरछुला गांव, झाली गांव, खल्याण बांगर (जखोली), मंवाण गांव (तिलवाडा) में झालीमाली के मंदिर हैं।

दिव्यधाम झालीमाली मंदिर, खुगशा-
असवालस्यूं, पौड़ी (गढ़वाल) के खुगशा, कंडार और किनगोड़ीखाल गांव के समीवर्ती धार पर मां झालीमाली का प्रसिद्ध मंदिर है। झालीमाली की मूर्ति यहां किस काल में आयी और कैसे-कितने वर्षों तक जमीन के अंदर दबी रही यह सब इतिहास के गर्भ में अभी तक अज्ञात है। परन्तु यह कहा जाता है कि सन् 1906 में यहां पर स्थानीय लोगों द्वारा झालीमाली मंदिर का निर्माण किया गया था। इसके बारे में एक घटना प्रचलित है। बात सन् 1906 की है। खुगशा गांव निवासी पंडित रूप राम खुगशाल के 12 वर्षीय पुत्र तारा दत्त खुगशाल अपनी ननिहाल नैल गांव में रह रहे थे। एक रात्रि को नैल गांव के झालीमाली मंदिर में देवी अनुष्ठान के दौरान तारा दत्त जी पर मां झालीमाली अवतरित हुई। बालक तारादत्त उसी समय रात को ही नाचते-नाचते नैल गांव से सीधे खुगशा गांव की धार की ओर चल दिए। वर्तमान मंदिर परिसर में प्रातःकालीन समय में नैल और नजदीकी गांवों के कई सयाने लोग भी उनके साथ-साथ यहां पहुंचे थे। तारादत्त जी ने वर्तमान देवी स्थल पर एक जोरदार प्रहार किया था। उनके कहने पर उसी स्थल पर अन्य लोगों द्वारा खुदाई करने पर मां झालीमाली देवी की अष्टधातु मूर्ति, चांदी का अर्कपात्र और एक खड्ग मिला। उसी समय वहां उपस्थित लोगों ने वहीं पर मां झालीमाली मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना आरंभ कर दी। तब से प्रमुखतया खुगशाल लोग नियमित रूप में इस मंदिर में पूजा-पाठ करने लगे हैं। वर्तमान में यह मंदिर एक भव्य सिद्धपीठ स्वरूप देश-दुनिया में झालीमाली देवी के प्रसिद्ध मंदिरों में प्रतिष्ठापित है।
संदर्भ- 'हिमालय की लोकदेवी झालीमाली'
समय साक्ष्य प्रकाशन, 15 फालतू लेन, देहरादून।

डाॅ. अरुण कुकसाल

सस्नेह आमत्रंण
श्रीझालीमाली मंदिर, खुगशा में आने-जाने के सड़क मार्ग-
1. कोटद्वार-गुमखाल-सतपुली-बौसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-75 किमी.
2. ऋषिकेश-देवप्रयाग-व्यासघाट-सतपुली-बौसाल- कंडारपानी-झालीमाली मंदिर खुगशा। दूरी-175 किमी.
3. पौड़ी-ज्वाल्पा देवी-पाटीसैंण-बौसाल-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-60 किमी.
4. पौड़ी-अदवानी-कल्जीखाल-मुडंनेश्वर-भेटी-कंडारपानी-झालीमाली मंदिर, खुगशा। दूरी-55 किमी.

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