माता श्यामसुन्दरी Mata Shyamsundri - Devidanda

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Devi Danda is a beautiful religious place of Hindus, situated in the Sivalik series of Himalaya, At the hill top of village Rikhera-Banchuri (Yamkeshwar, Pauri Garhwal, Uttarakhand).

01/06/2023
 #नवरात्रि_नवम_दिवस #माँ_सिद्धिदात्रीमाँ दुर्गा की शक्ति का नौंवा रूपमाँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं...
04/10/2022

#नवरात्रि_नवम_दिवस
#माँ_सिद्धिदात्री
माँ दुर्गा की शक्ति का नौंवा रूप

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

#श्लोक

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

#सिद्धियां

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं-

माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।

माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।

प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

#नवदुर्गाओं_में
नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

#स्तुति

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

पाताल भुवनेश्वर- यह एक प्राचीन पौराणिक गुफा है जो पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट कस्बे से चौदह किलोमीटर दूर समुद्र सतह से 13...
03/10/2022

पाताल भुवनेश्वर- यह एक प्राचीन पौराणिक गुफा है जो पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट कस्बे से चौदह किलोमीटर दूर समुद्र सतह से 1350 मीटर की ऊँचाई पर प्रकृति के बीच मनोरम स्थल पर स्थित है। यह एक रहस्यमयी दुनिया को अपने में समेटे हुए है। गुफा में पहुंचने पर एक अलग ही अनुभूति होती है जैसे कि आप किसी पौराणिक लोक में पहुंच गए हों। गुफा में उतरते ही सबसे पहले गुफा के बाईं तरफ शेषनाग की एक विशाल आकृति दिखाई देती है। इसके ऊपर एक विशालकाय अर्द्धगोलाकार चट्टान है जिसके बारे में कहा जाता है कि शेषनाग ने इसी स्थान पर पृथ्वी को अपने फन पर धारण किया था।

स्कंद पुराण के मानस खंड के एक सौ तीन वें अध्याय में इस गुफा के विषय में कहा गया है कि इसमें भगवान महादेव शिव का निवास है। माना जाता है कि देवता इस गुफा में आकर भगवान शिव की पूजा करते थे। एक संकरे रास्ते से जमीन के नीचे आठ से दस फिट अंदर जाने पर गुफा की दीवारों पर शेषनाग सहित विभिन्न देवी-देवताओं की आकृति नज़र आती है। मान्यता है कि द्वापर युग में पाण्डवों ने इस गुफा की खोज करके यहां तपस्या की। उन्होंने इस स्थान पर किरात वेश धारी शिव के साथ चौपड़ भी खेला। 822 ईसवी सन में जगत गुरु आदि शंकराचार्य इस गुफा में आए और उन्होंने यहां एक तांबे के शिव लिंग की स्थापना की।

गुफा में चार पाषाण स्तम्भ हैं जो चार युगों अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शाते हैं। पहले तीन में अब कोई परिवर्तन नही होता। जबकि कलियुग का स्तम्भ लम्बाई में अधिक है और इसके ऊपर छत से एक स्तम्भ नीचे लटक रहा है। मान्यता है कि 7 करोड़ वर्षों में यह दोनों स्तम्भ एक दूसरे की तरफ 1 इंच बढ़ जाते हैं। जिस दिन यह दोनों स्तम्भ आपस में मिल जायेगे उस दिन कलियुग समाप्त होगा और पुनः सतयुग का प्रारंभ होगा एवं मृगशिरा(ओरियन) तारामंडल के सत्यलोक में रहने वाले परग्रही देवों का पुनः पृथ्वी लोक में आगमन होगा।

पौराणिक साक्षों की मानें तो इस गुफा को त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले देखा। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफा के विषय मे जाना और आज यहाँ देश विदेश से सैलानी आते हैं एवं गुफा के स्थापत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। मान्यताएं चाहे कुछ भी हो पर एकबारगी गुफा में बनी आकृतियों को देख लेने के बाद उनसे जुड़ी किंवदंतियों पर भरोसा किये बिना नहीं रहा जाता। यहां एक छोटा सा हवन कुंड भी है।

कहा जाता है कि पांडु पुत्र अर्जुन के पौत्र अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित द्वापर युग के अंत में कलियुग के आरंभ में जब एक बार वन में शिकार के लिए गए तो कलि युग अदृश्य रूप में उनके स्वर्ण मुकुट में बैठा था। मार्ग भटककर भूख प्यास से व्याकुल होकर वे शमीक ऋषि के आश्रम जा पहुंचे। ऋषि ध्यानस्थ थे। राजन ने ऋषि से जल मांगा। जब गहन ध्यानावस्था के कारण ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया तो कलि युग के प्रभाव से राजा ने क्रोधित होकर एक मृत सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया। जब शमीक ऋषि के परम तेजस्वी क्रोधी स्वभाव वाले पुत्र ऋषि शृंगी ने यह दृश्य देखा तो राजा को श्राप दिया कि सात दिन के भीतर तुझे एक सर्प डसेगा और तेरी मृत्यु हो जाएगी।

सात दिन बाद तक्षक नाग ने उनके पिता परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया। पूर्व काल में जब लाक्षागृह को दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए जलाया तो पांडव गुप्त मार्ग से बाहर निकल गए लेकिन तक्षक की याचना के बावजूद उन्होंने वहां निवासरत तक्षक नाग के परिवार को बचाया नहीं। उस अग्नि में तक्षक नाग का परिवार जल कर भस्म हो गया। तभी तक्षक ने पांडु वंश से बदला लेने की प्रतिज्ञा ली थी। बाद में परीक्षित पुत्र राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए सर्प दाह यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में संसार के समस्त सर्पों का आह्वान किया। बारी बारी से सर्प यज्ञ की अग्नि में जलकर भस्म होने लगे।

जब महादेव पुत्री नागों की देवी मनसा देवी और ऋषि जरत्कारु के पुत्र महर्षि आस्तीक को यह पता चला तो उन्होंने नाग वंश की रक्षा के लिए जन्मेजय को समझा बुझाकर यज्ञ स्थगित करवा दिया। हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है। आगे चलते हुए महसूस होता है कि हम किसी की हड्डियों पर चल रहे हैं। सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है। कुछ आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखायी देता है।

माना जाता है कि शिवजी ने इस कुण्ड का निर्माण अपने नागों के पानी पीने के लिये देव शिल्पी विश्वकर्मा जी से करवाया था। इसकी देखरेख गरुड़ के हाथ में थी। लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन मरोड़ दी। कुछ आगे जाकर ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना दिखाई देती है। आगे दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है। कहा जाता है कि ये द्वार धर्म द्वार और मोक्ष द्वार हैं। आगे आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित तांबे का शिवलिंग है। गुफा से कई गुप्त भूमिगत मार्ग जुड़े हैं। जिन्हें बंद कर दिया गया है।

माना जाता है कि इस गुफा से होकर प्राचीन काल में पाताल लोक, काशी, कैलाश तथा रामेश्वर जाया जा सकता था। गुफा में एक मनोकामना कुण्ड भी है। मान्यता है कि इसके बीच बने छेद से धातु की कोई चीज पार करने पर मनोकामना पूरी होती है। आश्चर्य है कि जमीन के इतने भीतर होने के बावजूद यहां आक्सीजन की कोई कमी नहीं है। यहां आकर आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है। देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमान्च से सराबोर पाताल भुवनेश्वर की गुफा की सैलानियों और भक्तों के बीच आज एक अलग पहचान है। कुछ श्रद्धा से, कुछ रोमान्च के अनुभव के लिये, और कुछ शीतलता और शान्ति की तलाश में यहां आते हैं।

नवदुर्गा का अष्टम  शक्ति स्वरुप हैं देवी महागौरी --एवं इसी निमित्त नवरात्री के अष्टम दिवस हम भक्तजन देवी महागौरी की पूजा...
03/10/2022

नवदुर्गा का अष्टम शक्ति स्वरुप हैं देवी महागौरी --एवं इसी निमित्त नवरात्री के अष्टम दिवस हम भक्तजन देवी महागौरी की पूजा --आराधना में तल्लीन होकर जीवन का आध्यात्मिक मर्म समझने का सार्थक प्रयास करते हैं --मनुष्यत्व से देवत्व के निकट सम्बन्ध की आत्मिक अनुभूति करते हैं |यथा नाम तथा रूप --देवी महागौरी उज्जवल गौरवर्ण की हैं,श्वेतवसना है --जिसकी तुलना शास्त्रों में कुंद के पुष्प और शंख से की गयी है | सौम्यरूप चारभुजाधारी देवी महागौरी अपने वाहन वृषभ पर विराजित हैं --और इस दिव्यरूप के दर्शनमात्र से भक्तजनों के मन व ह्रदय में एक अनुपम शीतलता का भाव जाग्रत होता है --और स्वत: हम नतमस्तक होकर देवी से आशीष की प्रार्थना करते हैं |माता का एक हाथ वर देने की मुद्रा में ,द्वितीय हाथ अभयदान की मुद्रा में है --अन्य दो हाथों में माता ने क्रमश: डमरू और त्रिशूल धारण किया हुआ है | समवेत स्वर में भक्तजन नवदुर्गा प्रार्थना करते हैं --

"श्वेत बैल है वाहन जिनका ,तन पर श्वेताम्बर माला |

यही महागौरी देवी हैं ,सबकी जगदम्बा माता || "

अमोघ शक्तिसंपन्न अपने समस्त निष्ठावान भक्तों पर आशीर्वाद रूपी अमृत वर्षा करती हैं --उनके संताप व पाप हर लेती हैं ,और संचित पुण्य में वृद्धि सुनिश्चित करती हैं--साथ ही अनेकानेक प्रकार के सिद्धिद्वार भी खुलवा देती हैं --जिनसे भक्त के जीवन में तत्क्षण सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं |
धर्मशास्त्रों में सुन्दर वर्णन है कि महादेव को पति रूप में पाने हेतु देवी महागौरी ने वर्षों तक घनघोर तपस्या की तथा अंतत: उनकी तपस्या से प्रसन्न महादेव ने उन्हें पत्नीरूप में स्वीकार किया | तभी तो नवरात्रि में अष्टमी के दिवस सुहागन नारी अपने सुहाग की दीर्घायु की कामना करते हुए देवी महागौरी को चुनरी चढ़ाकर विधि -विधान से पूजा -अर्चना करती हैं- विशेष रूप से इस अमोघ महामंत्र का उच्चारण करते हुए --

"श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुची |

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ||"


हिन्दू धर्मशास्त्रों में देवी महागौरी की अनुपम महिमा का सर्वाधिक वृत्तान्त पुराणों में विद्यमान है | सत का संरक्षण और असत का विध्वंस --यही देवी महागौरी का मूलमंत्र सदैव रहा है| पुण्यभूमि भारत के हम सनातनधर्मी नर --नारी यह अनुभव करते हैं कि इस कलयुग में सत पर असत हावी होता जा रहा है --देश ,समाज में नियम पालक कम और नियम तोड़ने वाले अधिक हैं , निस्वार्थ राष्ट्रभक्त कम होते जा रहे है और राष्ट्र के शत्रुओं की सहायता कर राष्ट्र विनाश को तत्पर तत्व अनेकानेक हैं ,सभ्य नागरिकों पर दुराचारी ,अत्याचारी व आतंकित करने वाले तत्वों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है| ऐसे संक्रमणकाल में देवी के हम निष्णात भक्तजन मौन न रहकर मुखर हों -तथा अपराधियों और आतंकियों के रूप में राक्षसों और दानवों के कलयुगी अवतारों से राष्ट्र को मुक्त करने का प्रण करें ,शक्ति का केवल चिंतन न कर प्रयोग करें और मानवाधिकार दानवों के लिए नही बल्कि मानवों के लिए ही है --यह परम सत्य स्थापित कर उन तत्वों का प्रतिकार करें जो केवल दानव में ही मानव दर्शन करने में सक्षम हैं --तभी हम यथार्थ रूप में देवी महागौरी के भक्त कहलायेंगे और गर्व के साथ जीवन पथ पर अग्रसर होते हुए इस महामंत्र का सस्वर पाठ करने के अधिकारी होंगे --

"ॐ देवी महागौर्ये नम: | "

वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्र...
08/10/2021

वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता ॥

जय माता श्यामसुंदरी 🚩🚩🙏🙏🙏

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।सौभाग्य...
07/10/2021

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥

जय माता श्यामसुंदरी 🚩🚩🚩🙏🙏

माता श्यामसुंदरी के सभी भक्तों को नवरात्रि की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं💐💐

26/06/2021

बद्रिकाश्रम के रक्षपाल भगवान घन्टाकर्ण की वसुधारा जल प्रपात की दिवारा यात्रा। बर्फ के बीच प्रपात पर स्नान करते पश्वा दैवीय शक्तियों का दिला रहे अहसास।
जय देवभूमि उत्तराखंड!!

10/05/2021

या देवी सर्व भूतेषु माँ रूपेण संस्थिता ।
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ।
या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता ।
या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै। नमस्तस्यै।
नमस्तस्यै। नमो नमः।।

।। जय माता श्यामसुंदरी 🙏।।

18/01/2021

बाबा केदारनाथ के पूज्य पण्डित जी द्वारा भोलेनाथ की प्रार्थना...

जय बाबा भोलेनाथ
जय मां अम्बा शक्ति....

जय मां भगवती श्याम सुंदरी बाल कुंवारी देवी, देवी डांडा 🌹🙏🌷
17/11/2020

जय मां भगवती श्याम सुंदरी बाल कुंवारी देवी, देवी डांडा 🌹🙏🌷

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