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घर-परिवार की 100% सुरक्षा की गारंटी: काल भैरव का शक्तिशाली शाबर मंत्र विधान (सरल व सटीक नियम)काल भैरव आत्मरक्षा एवं सर्व...
31/08/2026

घर-परिवार की 100% सुरक्षा की गारंटी: काल भैरव का शक्तिशाली शाबर मंत्र विधान (सरल व सटीक नियम)

काल भैरव आत्मरक्षा एवं सर्व-परिवार रक्षा शाबर मंत्र :

​"ॐ गुरुजी काला भैरुं कपिला केश, काना कुंडल भगवा भेष।

तीर चलावे काल भैरुं, बाण करे चकचूर।

मेरे और मेरे परिवार की काया की रक्षा करे,

भूत-प्रेत, डाकिनी, शाकिनी, नजर-टोना दूर भगावे।

मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।"

​(नोट: जब स्वयं के लिए सुरक्षा चक्र बनाना हो, तो जल या भभूत हाथ में लेकर 7 बार मंत्र पढ़कर चारों तरफ छिड़कें।)

​अनुष्ठान की सटीक विधि-विधान

​शुभ मुहूर्त: किसी भी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी), रविवार, मंगलवार या भैरव जयंती से रात्रि 10:00 बजे के बाद शुरू करें।

​दिशा: दक्षिण (South) या पश्चिम (West) दिशा की ओर मुख करके बैठें।

​आसन: लाल या काले रंग का ऊनी कंबल/आसन।

​दीपक: चौमुखा दीपक (मिट्टी या तांबे का पात्र) लें और उसमें सरसों या तिल का तेल डालकर चार बत्तियां जलाएं।

​माला: रुद्राक्ष माला (108 दानों की) या काले हकीक की माला।

​भोग सामग्री: गुड़ की रेवड़ी, भुने हुए चने, उड़द के पकोड़े या इमरती। साथ में 1 पान का पत्ता, 2 लौंग और 1 बताशा रखें।

​दैनिक जप संख्या: प्रतिदिन 11 माला (1188 बार मंत्र जप)।

​अनुष्ठान अवधि: यह अनुष्ठान लगातार 11 दिन या 21 दिन तक पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ करना होता है।

​दैनिक पूजन क्रम:

​लकड़ी की चौकी पर लाल या काला कपड़ा बिछाएं और भगवान शिव तथा काल भैरव का चित्र/यंत्र स्थापित करें।

​सबसे पहले गुरु मंत्र (या ॐ नमः शिवाय) की 1 माला जपें।

​भैरव जी को सिंदूर, अक्षत, काले तिल और सरसों का तेल अर्पित करें।

​संकल्प लें कि आप आत्मरक्षा और परिवार की सुरक्षा हेतु यह जप कर रहे हैं।

​11 माला का शांत व एकाग्र मन से जप करें। जप समाप्ति पर भोग अर्पित करें और रक्षा हेतु प्रार्थना करें।

​अंतिम दिन अनुष्ठान पूर्ण होने पर थोड़े से काले उड़द और तिल से 108 आहुतियां दें (अग्नि में) तथा प्रसाद किसी काले श्वान (कुत्ते) को खिलाएं।

​अनिवार्य नियम एवं परहेज

​पूर्ण ब्रह्मचर्य: अनुष्ठान के सभी दिनों में शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का अनिवार्य पालन करें।

​आहार संयम: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और बाहर के तामसिक भोजन से पूर्णतः दूर रहें।

​भूमि शयन: बिस्तर के बजाय जमीन पर कंबल या चटाई बिछाकर सोएं।

​मौन व क्रोध नियंत्रण: अनावश्यक बातचीत, झूठ, क्रोध और किसी की निंदा करने से बचें।

​अनुष्ठान की गोपनीयता: मंत्र साधना की चर्चा किसी बाहरी व्यक्ति से न करें।

​ **raSadhana

तिलोत्तमा अप्सरा शाबर मंत्र एवं पूर्ण अनुष्ठान विधि​तिलोत्तमा अप्सरा साधना को शाबर तंत्र में रूप, यौवन, प्रबल वशीकरण और ...
30/08/2026

तिलोत्तमा अप्सरा शाबर मंत्र एवं पूर्ण अनुष्ठान विधि

​तिलोत्तमा अप्सरा साधना को शाबर तंत्र में रूप, यौवन, प्रबल वशीकरण और कलात्मक निपुणता प्रदान करने वाली अत्यंत गोपनीय साधना माना जाता है। शाबर मंत्र आदिनाथ भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ की ऊर्जा से बंधे होने के कारण स्वतः जाग्रत होते हैं। यदि किसी योग्य भौतिक गुरु का मार्गदर्शन न मिले, तो देवाधिदेव महादेव को जगतगुरु मानकर यह साधना पूरी निष्ठा से संपन्न की जा सकती है।

​अनुष्ठान सामग्री एवं आवश्यक नियम

​दिशा: उत्तर दिशा (या पूर्व दिशा)

​आसन व वस्त्र: गुलाबी या लाल रंग के शुद्ध रेशमी/ऊनी वस्त्र और आसन

​दीपक: गाय के शुद्ध घी अथवा चमेली के तेल का बड़ा दीपक

​माला: स्फटिक माला अथवा रक्त चंदन की माला (108 मनके)

​भोग/नैवेद्य: दूध से बनी खीर, बताशे, ताजे मीठे फल और 2 मीठे पान (लौंग-इलायची युक्त)

​पूजन सामग्री: चौकी पर गुलाबी वस्त्र, तिलोत्तमा अप्सरा यंत्र/चित्र (अथवा ताम्र पत्र/सुपारी), गुलाब व चमेली के ताजे पुष्प, कस्तूरी या गुलाब का शुद्ध इत्र, धूपबत्ती, रोली, अक्षत और तांबे के लोटे में जल।

​शाबर मंत्र

​"ॐ नमो आदेश गुरु को, तिलोत्तमा अप्सरा रूपवंती, इंद्र लोक से उतरंती, मम अंग-अंग में रूप समावंती, मोहन-वशीकरण सिद्धि करावंती, जो न करे तो आदिनाथ शिव की दुहाई, गोरखनाथ की आन। ॐ ह्रीं तिलोत्तमे स्वाहा।"

​अनुष्ठान विधि एवं समयावधि

​अवधि: 21 दिन अथवा 41 दिन का दृढ़ संकल्प।

​समय: मध्यरात्रि (11:00 PM से 2:30 AM के मध्य)।

​जप संख्या: प्रतिदिन 11 माला (1188 जप) या न्यूनतम 7 माला।

​दैनिक क्रम:

​स्नान करके गुलाबी वस्त्र धारण करें और उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

​चौकी पर गुलाबी कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ का ध्यान करें और मानसिक रूप से सफलता की आज्ञा लें।

​यंत्र/सुपारी पर इत्र छिड़कें और ताजे लाल/गुलाबी पुष्प अर्पित करें।

​दीपक व धूप प्रज्वलित कर संकल्प लें और स्थिर चित्त से तिलोत्तमा शाबर मंत्र का जप पूर्ण करें।

​जप के पश्चात खीर और मीठे पान का भोग लगाएं। साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, मौन और पवित्रता अनिवार्य है।

​साधना के लाभ

​तेजस्वी आभा व सम्मोहन: साधक के चेहरे पर विशेष तेज और चुंबकीय आकर्षण उत्पन्न होता है।

​सृजनात्मक व कलात्मक सिद्धि: कला, साहित्य, नृत्य, अभिनय और रचनात्मक कार्यों में असाधारण सफलता प्राप्त होती है।

​आत्मविश्वास में वृद्धि: भय, झिझक और हीनभावना समाप्त होकर वाणी में ओज आता है।

​मानसिक शांति: चित्त सदैव प्रफुल्लित और तनावमुक्त रहता है।

​ **raVidya

👁️ तंत्र जगत का अनसुलझा रहस्य: 'मुंज देव' की उत्पत्ति, लाभ और साधना का पूरा विधान 📖​जय श्री महाकाल दोस्तों! तंत्र और ग्र...
30/08/2026

👁️ तंत्र जगत का अनसुलझा रहस्य: 'मुंज देव' की उत्पत्ति, लाभ और साधना का पूरा विधान 📖

​जय श्री महाकाल दोस्तों! तंत्र और ग्रामीण लोक-परंपरा में कई ऐसी प्रत्यक्ष और तीव्र साधनाएं हैं जिनके बारे में लोग कम जानते हैं। इन्हीं में से एक बेहद शक्तिशाली और रहस्यमयी साधना है — मुंज साधना।

​कौन हैं मुंज और कैसे बनते हैं?

शास्त्रों और लोक-मान्यताओं के अनुसार, जब किसी ब्राह्मण बालक का जनेऊ (उपनयन संस्कार) हो चुका हो, लेकिन विवाह से पूर्व ही अल्पायु में उसकी मृत्यु हो जाए, तो उसकी आत्मा 'मुंज' (या मुंजिया) स्वरूप में वास करती है। मुंज को बाल-स्वरूप, अत्यंत चंचल, तेज और असीम ऊर्जावान माना जाता है। इनका वास आमतौर पर पीपल के वृक्ष या एकांत जलाशयों के पास होता है।

​मुंज का कार्य और साधना के लाभ:

​भूत-भविष्य की जानकारी: सिद्ध होने पर मुंज साधक को गुप्त बातों और आने वाले संकटों का पूर्वाभास कराते हैं।

​शत्रु बाधा व सुरक्षा: साधक को तांत्रिक दुष्प्रभावों, नजर दोष और शत्रुओं से कवच प्रदान करते हैं।

​कार्य सिद्धि: रुके हुए काम और कठिन परिस्थितियों में साधक का मार्गदर्शन करते हैं।

​साधना के नियम और सावधानियां:

​ब्रह्मचर्य: साधना के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन अनिवार्य है।

​डर पर नियंत्रण: मुंज साधक की परीक्षा लेने के लिए डरावने अनुभव या चंचल हरकतें करते हैं; साधक का मानसिक रूप से मजबूत होना जरूरी है।

​रक्षा विधान: बिना रक्षा रेखा (सुरक्षा घेरा) खींचे यह साधना कभी न करें।

​मुंज साधना विधि-विधान:

​समय व स्थान: यह साधना शनिवार या अमावस्या की रात्रि 10 बजे के बाद, किसी पुराने पीपल के वृक्ष के नीचे या एकांत साधना कक्ष में की जाती है।

​भोग सामग्री: मिट्टी के कुल्हड़ में ताजा दूध, बताशे, जनेऊ, सफेद मिठाई, मीठा पान, इत्र और चमेली के तेल का दीपक।

​दिशा व वस्त्र: दक्षिण या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल या पीले वस्त्र धारण करें और कुश के आसन पर बैठें।

​प्रामाणिक मंत्र विधान:

​1. वैदिक/पौराणिक मंत्र (शांति व तृप्ति हेतु):

​"ॐ मुंजाय नमः।"

अथवा

"ॐ ब्रह्मरूपाय मुंजदेवाय नमः स्वाहा।"

(रुद्राक्ष या तुलसी की माला से नित्य 11 माला जप, 21 दिनों तक)

​2. पारंपरिक शाबर मंत्र:

​"ॐ नमो आदेश गुरु को। पीपल के पात पर मुंज विराजे, हाथ में जनेऊ कांधे साजे। आवो मुंज, बैठो पास, मेरा कारज करो रास। गुरु गोरखनाथ की दुहाई, शब्द सांचा पिंड कांचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।"

(प्रतिदिन 7 या 21 माला जप कर भोग अर्पित करें)

​⚠️ अति आवश्यक चेतावनी (Disclaimer):

मुंज साधना एक प्रत्यक्ष और उग्र तामसिक/तांत्रिक श्रेणी की साधना है। बिना किसी योग्य, सिद्ध तांत्रिक गुरु के मार्गदर्शन, बिना सुरक्षा घेरा और गुरु रक्षा मंत्र के इसे करने की चेष्टा कदापि न करें। मानसिक असंतुलन या गलत विधि से साधक को भारी नुकसान हो सकता है। इसे केवल ज्ञान और शोध की दृष्टि से समझें।



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💰 कंगाली को जड़ से मिटाने वाली गुप्त "धनदा यक्षिणी" शाबर साधना 💰​नमस्कार मित्रों,​अक्सर लोग धन प्राप्ति के लिए दर-दर भटकत...
30/08/2026

💰 कंगाली को जड़ से मिटाने वाली गुप्त "धनदा यक्षिणी" शाबर साधना 💰

​नमस्कार मित्रों,

​अक्सर लोग धन प्राप्ति के लिए दर-दर भटकते हैं, लेकिन हमारे प्राचीन शाबर तंत्र में ऐसे गुप्त और सटीक प्रयोग मौजूद हैं जो जीवन से दरिद्रता को हमेशा के लिए मिटा सकते हैं। यक्षिणियों में 'धनदा यक्षिणी' को साक्षात धन, ऐश्वर्य और वैभव देने वाली शक्ति माना गया है।

​अगर आप भी आर्थिक तंगी, कर्ज या व्यापार में रुकावट से परेशान हैं, तो यह प्रामाणिक शाबर साधना आपके जीवन की दिशा बदल सकती है।

​✨ प्रामाणिक धनदा यक्षिणी शाबर मंत्र:

​"ॐ नमो आदेश गुरु को।

धनदा यक्षिणी, धन की रानी।

हाथ सुवर्ण कलश, मुख अमृत बानी।

आओ बैठो मेरे पास, पूरी करो मेरी आस।

धन दे, दौलत दे, रिद्धि-सिद्धि भंडार भरे।

मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति।

फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।।"

​📌 साधना की आवश्यक सामग्री और नियम:

​दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा (North / East)।

​आसन और वस्त्र: पीला आसन और बिना सिला हुआ पीला वस्त्र।

​माला: स्फटिक माला या कमल गट्टे की माला।

​दीपक व धूप: शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित गुग्गल या लोबान की धूप।

​नैवेद्य (भोग): शुद्ध खोवे की मिठाई, पीले पेड़े या खीर और 2 मीठे इलायची वाले पान।

​समय: रात्रि 10 बजे के बाद (साधना हमेशा एकांत कमरे में करें)।

​🧭 संपूर्ण साधना विधि:

​यह साधना किसी भी शुक्ल पक्ष के शुक्रवार, धनतेरस, या रवि-पुष्य योग से शुरू करें। यह कुल 21 दिनों का अनुष्ठान है।

​उत्तर दिशा की ओर मुख करके पीले आसन पर बैठें। सामने चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर धनदा यक्षिणी का चित्र या यंत्र स्थापित करें।

​सबसे पहले गणेश जी और अपने गुरुदेव का ध्यान व संक्षिप्त पूजन करें। इसके बाद यक्षिणी को 'माता' या 'मित्र' भाव मानकर अक्षत, पीले फूल, इत्र, धूप, दीप और मिठाई अर्पित करें।

​संकल्प लेकर प्रतिदिन निश्चित समय पर 11 माला का जाप करें।

​21वें दिन जाप पूर्ण होने पर मंत्र का 108 बार दशांश हवन (खीर और घी से) करें और कन्याओं को मीठा भोजन कराएं।

​🚫 साधना के कड़े परहेज (सावधानी):

​साधना काल के 21 दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

​तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) का स्पर्श भी न करें।

​साधना की चर्चा किसी भी बाहरी व्यक्ति या परिवार के अन्य सदस्यों से न करें।

​यक्षिणी को केवल माता, बहन या मित्र भाव से ही सिद्ध करें; कभी भी वासना या प्रेमिका भाव न रखें।

​🌟 ज्योतिषीय विश्लेषण: किन लोगों को मिलती है तुरंत सफलता?

​अनुकूल राशियां: वृषभ (Ta**us), कर्क (Cancer), कन्या (Virgo), तुला (Libra) और धनु (Sagittarius) राशि के जातकों को इसमें सबसे तीव्र सफलता मिलती है।

​शुभ नक्षत्र: रोहिणी, पुष्य, हस्त, अनुराधा, उत्तराफाल्गुनी और श्रवण नक्षत्र में जन्मे साधक इसे जल्दी सिद्ध कर लेते हैं।

​दशा और अंतर्दशा: यदि कुंडली में शुक्र (Venus), बुध (Mercury) या बृहस्पति (Jupiter) की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो, तो साधना बिना किसी रुकावट के सिद्ध होती है।

​कुंडली के शुभ योग: लग्न या दशम भाव मजबूत हो, 2nd (धन भाव) और 11th (लाभ भाव) के स्वामियों में युति या दृष्टि संबंध हो, अथवा कुंडली में 'लक्ष्मी योग', 'गजकेसरी योग' या 'धन योग' मौजूद हो, तो यक्षिणी की कृपा से अकूत धन लाभ होता है।

​💎 इस अनुष्ठान के चमत्कारी लाभ:

​रुका हुआ या डूबा हुआ पैसा वापस मिलने के मार्ग खुलते हैं।

​व्यापार और नौकरी में अप्रत्याशित तरक्की होती है।

​अचानक धन लाभ (शेयर, भूमि, पैतृक संपत्ति) के योग बनते हैं।

​घर में स्थायी लक्ष्मी का वास होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है।

​यदि आप इस साधना को शुरू करने का विचार कर रहे हैं, तो क्या आप अपनी कुंडली के ग्रह योग या किसी विशिष्ट नियम के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?

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रतिप्रिया यक्षिणी साधना: तांत्रिक व ज्योतिषीय विधान​रतिप्रिया यक्षिणी साधना तंत्र शास्त्र में आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम-सुख...
30/08/2026

रतिप्रिया यक्षिणी साधना: तांत्रिक व ज्योतिषीय विधान

​रतिप्रिया यक्षिणी साधना तंत्र शास्त्र में आकर्षण, सौंदर्य, प्रेम-सुख और भौतिक विलास की प्राप्ति के लिए प्रमुख मानी जाती है। शाबर परंपरा में इसे तीव्र और शीघ्र फलदायी माना गया है।

​1. साधना सामग्री एवं आवश्यक नियम

​दिशा: उत्तर (North) अथवा उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)।

​समय: रात्रि काल (विशेषकर 10:00 PM से 2:00 AM के बीच)।

​आसन व वस्त्र: गुलाबी अथवा लाल रंग का ऊनी आसन और बिना सिला हुआ वस्त्र।

​दीपक: गाय के शुद्ध घी अथवा चमेली/तिल के तेल का अखंड या साधना कालीन दीपक।

​धूप/अगरबत्ती: गुलाब, चमेली या हीना (प्राकृतिक इत्र युक्त) की सुगंधित धूप।

​माला: स्फटिक माला अथवा लाल चंदन/कमलगट्टे की माला (प्राण-प्रतिष्ठित)।

​भोग (प्रसाद): सफेद मावे की मिठाई, खीर, मीठा पान (बीड़ा), चमेली का इत्र और ताजे लाल/गुलाबी पुष्प।

​जप संख्या व अवधि: प्रतिदिन 11 या 21 माला का जप, कुल 21 अथवा 41 दिनों का अनुष्ठान।

​2. मंत्र

​"ॐ ह्रीं रतिप्रिया यक्षिणी आगच्छ आगच्छ, मम मनोकामना पूर्णं कुरु कुरु स्वाहा।"

​(नोट: शाबर मंत्रों का जप बिना गुरु आज्ञा एवं रक्षा-विधान/कवच पाठ के नहीं करना चाहिए।)

​3. साधना के लाभ

​साधक के व्यक्तित्व में तीव्र सम्मोहन और आकर्षण शक्ति का विकास।

​दांपत्य जीवन व प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता और मधुरता।

​जीवन में भौतिक सुख-साधनों, कला और सौंदर्य बोध की वृद्धि।

​मानसिक अवसाद व हीनभावना से मुक्ति।

​4. आवश्यक परहेज और सावधानियां

​साधना काल के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

​तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज) का पूर्ण त्याग।

​साधना कक्ष में अन्य किसी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित रखें।

​अनुभव या आभास को किसी से साझा न करें (गोपनीयता सबसे बड़ा नियम है)।

​5. ज्योतिषीय अनुकूलता: राशियां, नक्षत्र, दशा और योग

​अनुकूल राशियां: शुक्र और बुध के प्रभाव वाली राशियां—वृषभ (Ta**us), तुला (Libra), मिथुन (Gemini), और कन्या (Virgo)।

​अनुकूल नक्षत्र: रोहिणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, चित्रा और रेवती (शुक्र और चंद्र प्रधान नक्षत्र)।

​शुभ दशा/अंतर्दशा: शुक्र की महादशा में चंद्र या बुध की अंतर्दशा, अथवा चंद्र की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा।

​सफलता दायक कुंडली योग:

​लग्न, पंचम या नवम भाव में बलवान शुक्र-चंद्र युति (कला व आकर्षण योग)।

​केंद्र या त्रिकोण में शुक्र का मालव्य पंचमहापुरुष योग।

​अष्टम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि, जो गुप्त विद्याओं और तंत्र साधना में सिद्धि देती है।



​ **raMantra

✨ बिना 1 रुपये खर्च किए करें गुप्त 'मंजूघोष उच्छिष्ट साधना' — न कोई कठिन नियम, न कोई बड़ा अनुष्ठान! ✨अगर आप जीवन में धन,...
29/08/2026

✨ बिना 1 रुपये खर्च किए करें गुप्त 'मंजूघोष उच्छिष्ट साधना' — न कोई कठिन नियम, न कोई बड़ा अनुष्ठान! ✨

अगर आप जीवन में धन, आकर्षण, बुद्धि और अटके हुए कामों को पूरा करने के लिए कोई सरल उपाय ढूंढ रहे हैं, तो तंत्र शास्त्र की यह उच्छिष्ट मंजूघोष साधना आपके लिए सबसे सटीक है।

अक्सर लोग सोचते हैं कि साधना के लिए श्मशान, जंगल या महंगे अनुष्ठान सामग्री की जरूरत होती है। लेकिन इस साधना में आपका एक भी रुपया खर्च नहीं होगा, न ही कोई विशेष माला, दीपक या सामग्री चाहिए। यह पूरी तरह उच्छिष्ट (जूठन) पर आधारित एक सरल गुप्त साधना है—बस आपका मन साफ और विश्वास पक्का होना चाहिए।

साधना की संपूर्ण और व्यावहारिक विधि:

समय और स्थान: इसे आप रोज़ दोपहर या रात को भोजन करने के तुरंत बाद अपने ही घर में कर सकते हैं।

डमरू निर्माण: भोजन समाप्त करने के बाद थाली को सामने ही रखें। थाली में बचे हुए अन्न/जूठन को दाहिने हाथ की तर्जनी (index finger) से लेकर थाली के बीचों-बीच एक डमरू का आकार बनाएं।

मंत्र लेखन: उसी उंगली से डमरू के ऊपरी और निचले हिस्से में यह गुप्त मंत्र लिखें:

"अ र व च ल धीं"

जप नियम: ध्यान रहे, आपको भोजन के बाद हाथ नहीं धोना है और न ही कुल्ला करना है (उच्छिष्ट मुख और हाथ के साथ ही जप करना है)।

जप संख्या: थाली में मंत्र लिखने के बाद वहीं बैठकर शांत मन से इस मंत्र का 108 बार (मानसिक या हल्के स्वर में) जप करें।

समापन: 108 बार जप पूरा होने के बाद ही उठें, थाली हटाएं और हाथ-मुंह धोएं।

इस साधना के प्रमुख फायदे:

बुद्धि और आकर्षण शक्ति: वाणी में प्रभाव बढ़ता है और लोग आपकी बात सुनने लगते हैं।

रुके हुए कार्यों में गति: कोर्ट-कचहरी, व्यापार या नौकरी में आ रही रुकावटें दूर होती हैं।

आर्थिक तंगी से मुक्ति: आय के नए स्रोत बनते हैं और दरिद्रता का नाश होता है।

मानसिक शांति व एकाग्रता: निरंतर अभ्यास से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है।

यह उपाय कितने दिन तक करना चाहिए?
इस साधना का पूरा लाभ पाने के लिए इसे लगातार 21 दिन या 41 दिन तक नियमपूर्वक करें। इसे बीच में खंडित न करें और मन में सकारात्मक भाव रखें।

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मेनका अप्सरा शाबर मंत्र एवं संपूर्ण प्रामाणिक अनुष्ठान विधि​नाथ संप्रदाय में मेनका अप्सरा साधना को रूप-लावण्य, अद्वितीय ...
29/08/2026

मेनका अप्सरा शाबर मंत्र एवं संपूर्ण प्रामाणिक अनुष्ठान विधि

​नाथ संप्रदाय में मेनका अप्सरा साधना को रूप-लावण्य, अद्वितीय आकर्षण, मानसिक शांति और कलात्मक प्रतिभा को जाग्रत करने वाली उच्च कोटि की साधना माना गया है। शाबर मंत्र गुरु परंपरा में स्वयं-सिद्ध और कीलन-मुक्त होते हैं। यदि किसी के पास प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं, तो आदिनाथ भगवान शिव को मानसिक गुरु मानकर यह अनुष्ठान निर्भय होकर शुरू किया जा सकता है।

​अनुष्ठान सामग्री एवं आवश्यक नियम

​दिशा: उत्तर (North) या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)

​आसन व वस्त्र: गुलाबी (Pink) या हल्के पीले रंग के शुद्ध सूती/ऊनी वस्त्र और आसन

​दीपक: गाय के शुद्ध घी अथवा चमेली के तेल का अखंड/जप काल तक जलने वाला दीपक

​माला: स्फटिक की माला, सफेद हकीक या लाल चंदन की माला (108 मनके)

​भोग/नैवेद्य: केसरिया खीर, मिश्री-मखाना, मावे की सफेद मिठाई और ताजे मीठे फल

​संपूर्ण पूजन सामग्री: मेनका अप्सरा का चित्र/यंत्र (अथवा ताम्बे की प्लेट पर कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर उस पर एक सुपारी स्थापित करें), गुलाब/केवड़े का शुद्ध इत्र, लाल और गुलाबी ताजे फूल, अगरबत्ती, तांबे का जलपात्र, अक्षत और सिंदूर।

​प्रामाणिक मेनका अप्सरा शाबर मंत्र

​"ॐ नमो आदेश गुरु को, मेनका अप्सरा इंद्रलोक की वासिनी, रूप-तेज प्रकाशिनी, हाजिर हो मम कारज साधे, मोहूँ जग सारा, मोहिनी रूप दिखावे, ॐ ह्रीं क्लीं मेनका आगच्छ आगच्छ स्वाहा, शब्द सांचा पिंड कांचा, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।"

​अनुष्ठान विधि एवं समयावधि

​साधना अवधि: 11 या 21 दिन का संकल्प।

​समय: रात्रि 10:00 बजे से मध्यरात्रि 1:30 बजे के बीच का समय सर्वश्रेष्ठ है।

​जप संख्या: प्रतिदिन 11 माला (1188 जप) निश्चित समय पर।

​दैनिक प्रक्रिया:

​रात्रि में स्नान कर स्वच्छ गुलाबी/पीले वस्त्र धारण करें और एकांत, सुगंधित कमरे में बैठें।

​भगवान शिव (गुरु रूप) और गुरु गोरखनाथ का ध्यान कर आज्ञा लें।

​सामने चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर यंत्र/सुपारी पर इत्र लगाएं और ताजे गुलाब के फूल चढ़ाएं।

​दीपक प्रज्वलित कर संकल्प लें और एकाग्र चित्त से 11 माला मंत्र जप पूर्ण करें।

​जप पूर्ण होने के बाद मिष्ठान का भोग अर्पित करें। साधना काल में ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार अनिवार्य है।

​मेनका अप्सरा साधना के प्रमुख लाभ

​आकर्षण और तेज: साधक के चेहरे पर स्वाभाविक तेज, चमक और सम्मोहन शक्ति का विकास होता है।

​व्यक्तित्व में निखार: बातचीत की शैली और सामाजिक प्रभाव में जबरदस्त सुधार होता है।

​कला और सृजनशीलता: संगीत, नृत्य, अभिनय, काव्य और लेखन से जुड़े साधकों को अप्रत्याशित सफलता और नवीन विचार प्राप्त होते हैं।

​सकारात्मक ऊर्जा: जीवन से नकारात्मकता, मानसिक अवसाद और हीनभावना समाप्त होती है।

​ **raSadhana

फंसा हुआ धन वापस पाने का संपूर्ण शाबर मंत्र अनुष्ठान​अगर आपकी मेहनत की कमाई कहीं फंस गई है या कोई उधार लेकर पैसे वापस नह...
29/08/2026

फंसा हुआ धन वापस पाने का संपूर्ण शाबर मंत्र अनुष्ठान

​अगर आपकी मेहनत की कमाई कहीं फंस गई है या कोई उधार लेकर पैसे वापस नहीं कर रहा है, तो शाबर परंपरा में माता लूना चमारी की दुहाई वाला यह प्रयोग अत्यंत तीक्ष्ण और फलदायी माना जाता है।

​सिद्ध शाबर मंत्र:

​ॐ नमो आदेश गुरु को।

​कालिका माई, लूना चमारी की दुहाई।

​अमुक (व्यक्ति का नाम) का चित्त डोले,

​मेरा दिया धन तुरन्त लौटाए।

​जो न लौटाए, तो गुरु गोरखनाथ की धूनी में जल मरे।

​शब्द साँचा, पिण्ड काँचा, फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।

​(नोट: जहाँ 'अमुक' लिखा है, वहाँ कर्जदार का नाम बोलें। यदि धन किसी कंपनी या जगह फंसा है, तो 'मेरा फंसा हुआ धन' बोलें।)

​अनुष्ठान का पूर्ण विधि-विधान:

​कब शुरू करें: यह अनुष्ठान किसी भी शनिवार, मंगलवार, अमावस्या या ग्रहण काल की रात्रि से शुरू करना सबसे उत्तम होता है।

​अनुष्ठान की अवधि: यह अनुष्ठान पूरे 11 दिन तक चलता है।

​दिशा: जप के समय साधक का मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।

​समय: रात्रि में 10:00 बजे के बाद ही यह जप करें।

​आसन व वस्त्र: लाल या काले रंग का स्वच्छ ऊनी आसन प्रयोग करें और उसी रंग के वस्त्र पहनें।

​दीपक व धूप: एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं। साथ में शुद्ध लोबान या गुग्गल की धूनी दें।

​माला: प्राण-प्रतिष्ठित रुद्राक्ष की माला (108 दाने) से जप करें।

​भोग सामग्री: 5 लौंग, 5 बताशे और 1 मीठा बीड़ा (पान)।

​दैनिक जप विधि:

​चौकी पर दीपक और धूप प्रज्वलित करके बैठें।

​हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें कि अमुक व्यक्ति से मेरा धन मुझे बिना विवाद के शीघ्र प्राप्त हो।

​सबसे पहले गुरु मंत्र या ॐ शिव गोरक्षाय नमः की 1 माला का जप करें।

​इसके बाद उक्त शाबर मंत्र का प्रतिदिन 11 माला (1188 बार) जप करें। यह क्रम पूरे 11 दिनों तक चलेगा।

​जप समाप्ति पर प्रतिदिन 2 लौंग दीपक में डालें।

​11वें दिन जप पूरा होने पर मीठा पान, 5 बताशे और 5 लौंग किसी एकांत स्थान या पीपल के पेड़ की जड़ के पास रखकर पीछे मुड़े बिना सीधे घर आ जाएं।

​कड़े नियम एवं परहेज:

​अनुष्ठान के सभी 11 दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

​तामसिक भोजन (मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज) का पूर्ण त्याग रखें।

​साधना को पूरी तरह गोपनीय रखें, किसी भी बाहरी व्यक्ति से इसका जिक्र न करें।

​जप के दौरान मन में केवल अपने न्यायपूर्ण धन की वापसी की भावना रखें, किसी का अहित न सोचें।

​इस अनुष्ठान के फायदे:

​कर्जदार के मन में धन लौटाने की तीव्र प्रेरणा उत्पन्न होती है।

​लंबे समय से अटकी हुई राशि बिना किसी कानूनी या शारीरिक विवाद के वापस मिल जाती है।

​आर्थिक रुकावटें दूर होती हैं और व्यापार में डूबी हुई पूंजी वापस निकलने लगती है।

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रंभा अप्सरा शाबर मंत्र एवं पूर्ण अनुष्ठान विधि​शाबर मंत्र परंपरा में रंभा अप्सरा साधना को सौंदर्य, आकर्षण, सम्मोहन और कल...
29/08/2026

रंभा अप्सरा शाबर मंत्र एवं पूर्ण अनुष्ठान विधि

​शाबर मंत्र परंपरा में रंभा अप्सरा साधना को सौंदर्य, आकर्षण, सम्मोहन और कलात्मक सिद्धि के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। शाबर मंत्र गुरु गोरखनाथ एवं नवनाथ परंपरा द्वारा जन-कल्याण हेतु कीलित रहित (स्वयंसिद्ध) बनाए गए हैं। यदि भौतिक गुरु उपलब्ध न हों, तो भगवान शिव (आदिनाथ) को गुरु मानकर मानसिक आज्ञा लेकर यह अनुष्ठान आरंभ किया जा सकता है।

​अनुष्ठान सामग्री एवं सामान्य नियम

​दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा

​आसन व वस्त्र: श्वेत (सफेद) या गुलाबी रंग के शुद्ध वस्त्र और ऊनी आसन

​दीपक: गाय के शुद्ध घी का अखंड या साधना काल तक जलने वाला दीपक

​माला: स्फटिक की माला अथवा सफेद चंदन की माला (108 मनकों वाली)

​भोग/नैवेद्य: सफेद मिष्ठान (मिश्री, खीर, रसगुल्ला या मावे के पेड़े) और ताजे फल

​पूजन सामग्री: रंभा अप्सरा यंत्र/चित्र (या सुपारी पर आवाहन), चमेली/गुलाब का शुद्ध इत्र, गुलाब के ताजे फूल, अगरबत्ती, जल पात्र, अक्षत और कुमकुम।

​शाबर मंत्र

​"ॐ ह्रीं रंभा अप्सरे प्रत्यक्षं सिद्धये ह्रीं फट् स्वाहा।"

(लोक शाबर रूप: "ॐ नमो आदेश गुरु को, रंभा अप्सरा काम-रूपिणी, रूप-रंग मोहिनी, आवहु प्रत्यक्ष मम कार्य सिद्ध कुरु कुरु स्वाहा, आदेश गुरु गोरखनाथ को।")

​अनुष्ठान विधि एवं समयावधि

​अवधि: 21 दिन का नियमित अनुष्ठान।

​समय: रात्रि काल (विशेषकर 10:00 PM से 2:00 AM के मध्य) सर्वोत्तम है।

​जप संख्या: प्रतिदिन 11 माला (1188 बार) का जप।

​दैनिक क्रम:

​स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और एकांत कक्ष में बैठें।

​भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ का ध्यान कर सफलता की प्रार्थना करें।

​यंत्र या सुपारी पर गुलाब के फूल और इत्र अर्पित करें।

​घी का दीपक जलाकर स्थिर मन से मंत्र जप पूर्ण करें।

​जप समाप्ति के बाद सफेद मिष्ठान का भोग लगाएं और साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

​साधना के लाभ

​आकर्षण व व्यक्तित्व विकास: साधक के चेहरे पर तेज, आकर्षण और वाक्-सिद्धि में वृद्धि होती है।

​कला व सौंदर्य में उन्नति: संगीत, अभिनय, लेखन और कला के क्षेत्र से जुड़े जातकों को विशेष रचनात्मक ऊर्जा मिलती है।

​मानसिक तनाव से मुक्ति: मन शांत, एकाग्र और आनंदित रहता है।

​सम्मोहन प्रभाव: साधक के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले लोग सहज रूप से प्रभावित होते हैं।

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🔥 कंगाली मिटाने और सोई किस्मत चमकाने का महा-रहस्य: जानिए 'ब्रह्मकमल' के गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान! 🌸✨​क्या आप जानते हैं कि...
29/08/2026

🔥 कंगाली मिटाने और सोई किस्मत चमकाने का महा-रहस्य: जानिए 'ब्रह्मकमल' के गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान! 🌸✨

​क्या आप जानते हैं कि हिमालय की पवित्र वादियों में खिलने वाला 'ब्रह्मकमल' कोई साधारण फूल नहीं, बल्कि साक्षात देवताओं का आशीर्वाद है?

​पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसका नाम सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के नाम पर रखा गया है और यह भगवान शिव तथा माता महालक्ष्मी का सबसे प्रिय पुष्प है। इस फूल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साल में केवल एक बार, जुलाई से सितंबर के बीच, आधी रात को कुछ ही घंटों के लिए खिलता है और सुबह होते ही मुरझा जाता है।

​तंत्र शास्त्र और ज्योतिष में ब्रह्मकमल को 'सर्वसिद्धिदायक पुष्प' कहा गया है। इसके खिलने का समय तंत्र साधना और दुर्लभ अनुष्ठान के लिए सबसे शक्तिशाली माना जाता है।

​🌿 ब्रह्मकमल के 4 सबसे शक्तिशाली तांत्रिक अनुष्ठान और उनके फायदे:

​1. कुबेर-लक्ष्मी महाधन प्राप्ति अनुष्ठान 💰

​किस काम आता है: व्यापार में घाटा, अटका हुआ धन, भारी कर्ज और आर्थिक तंगी दूर करने के लिए।

​अनुष्ठान विधि: जिस रात ब्रह्मकमल पूरी तरह खिले, उसे पूजा स्थान पर रखकर माँ लक्ष्मी और भगवान कुबेर का ध्यान करें। फूल के सामने गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः" मंत्र की 5 माला (540 बार) जप करें। अगले दिन इस फूल को धूप-छांव में सुखाकर एक चांदी के सिक्के के साथ लाल रेशमी वस्त्र में बांध लें और अपनी तिजोरी या गल्ले में स्थापित करें।

​फायदा: घर में धन का निरंतर आगमन शुरू होता है और तिजोरी कभी खाली नहीं रहती।

​2. सर्व बाधा एवं तीव्र वास्तु दोष नाशक प्रयोग 🛡️

​किस काम आता है: घर में नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, प्रेत बाधा या गृह-क्लेश को समाप्त करने के लिए।

​अनुष्ठान विधि: ब्रह्मकमल की ताजी पंखुड़ियों को तांबे के पात्र में रखे गंगाजल में रात भर रखें। अगले दिन सुबह पूर्व दिशा की ओर मुख करके "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" बोलते हुए इस जल को आम के पत्तों की मदद से पूरे घर, मुख्य द्वार और व्यापार स्थल पर छिड़कें।

​फायदा: घर की सभी नकारात्मक और तामसिक शक्तियां तुरंत नष्ट होती हैं तथा घर में सुख-शांति आती है।

​3. महामनोकामना सिद्धि संकल्प अनुष्ठान 🎯

​किस काम आता है: वर्षों से रुका काम, नौकरी-प्रमोशन या किसी विशेष कार्य में शत-प्रतिशत सफलता के लिए।

​अनुष्ठान विधि: फूल खिलने के समय (रात 10 से 12 बजे के बीच) एक असली भोजपत्र पर अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही से अपनी मनोकामना लिखें। उस पर्ची को ब्रह्मकमल के नीचे दबा दें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें।

​फायदा: इस दुर्लभ समय में किया गया संकल्प सीधे देवलोक तक पहुंचता है और कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाता है।

​4. असाध्य रोग निवारण और लंबी आयु का प्रयोग 🩺

​किस काम आता है: बार-बार बीमार पड़ना, दवाइयों का असर न होना या अज्ञात भय से मुक्ति के लिए।

​अनुष्ठान विधि: यह फूल भगवान शिव को समर्पित करके महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें। इसके बाद उस फूल की 1 सूखी पंखुड़ी को किसी तांबे के ताबीज में भरकर रोगी के गले या दाहिने हाथ में धारण करवाएं।

​फायदा: मानसिक तनाव, गंभीर रोग के कष्ट और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

​⚠️ विशेष सावधानी: ब्रह्मकमल के सभी तांत्रिक उपाय केवल सात्विक, पवित्र और जनकल्याणकारी उद्देश्य से किए जाते हैं। किसी का बुरा या अहित करने की नीयत से यह प्रयोग कभी न करें।

​अगर आपको यह जानकारी ज्ञानवर्धक और दिव्य लगी हो, तो इसे अपने परिजनों और मित्रों के साथ जरूर Share करें! 🔄

​👇 कमेंट बॉक्स में अपनी मनोकामना के साथ लिखें "ॐ नमः शिवाय" या "जय माँ लक्ष्मी"! 🙏✨

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