13/06/2024
इल्म-क्यों ज़रूरी है !
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बिस्मिल्लाह,
शुरू उस अल्लाह के नाम से जो बड़ा ही रहमान और रहीम है। वो ही आलमीन का पालने वाला है। उसी के क़ब्ज़े ए कुदरत में मेरी जान और सबकी जान है। वो जिसे चाहता है इज़्ज़त से नवाज़ता है और जिसे चाहे अपने इल्म के ख़ज़ाने से मालामाल कर दे। वो ही रोज़े जज़ा का मालिक है, कि जिस दिन हर कोई परेशान और बेचैन खड़ा होगा मगर वो के जिसने दुनिया में अच्छे काम किये और अल्लाह की नाफरमानी से बचा रहा। उसी ने इंसान की हिदायत के लिए अपने खास बन्दों में से अंम्बिया व रसूल बनाए और आखिर में अपने हबीब मौहम्मद ए मुस्तफा (स०अ०व०) को इस दुनिया में भेजा। जिन्होंने अपने हुस्ने अख़लाक़ और किरदार की बिना पर सब को अपना शैदाई बना लिया।
परवरदिगार ए आलम ने नबी ए करीम (स०अ०व०) को अपने खास इल्म के ख़ज़ाने से नवाज़ा। रसूल ए खुदा (स०अ०व०) ने अपने इस इल्म का वारिस अपने भाई और अपने वसी इमाम अली इब्ने अबुतालिब (अ०स०) को बनाया और फ़रमाया के "या अली मैं शहर ए इल्म हूँ और आप उस शहर के दरवाज़ा हो"। बस साबित हो गया की जिसको भी इल्म की रौशनी चाहिए तो उसे हज़रत अली (अ० स०) की चौखट पर ही आना पड़ेगा। अगर कोई चाहे की इमाम अली (अ०स०) को छोड़ कर इल्म हासिल करे तो ये इल्म उसके लिए ऐसे ही होगा जैसे शैतान के पास था और ऐसा इल्म इंसान के लिए हलाकत का सबब बनता है, जो इंसान में गरूर और तकब्बुर पैदा कर देता है, जैसा कि शैतान में गरूर पैदा हुआ और वो इस गरूर कि वजह से अल्लाह का नाफरमान बन बैठा और क़यामत तक की लिए लानत का मुस्तहक़ बना।
क्या कोई ये समझता है कि बिना अहलेबैत (अ०स०) के अपनी जिंदगी को कामयाब और कामरान बना सकता है, अगर कोई ऐसा सोचता है तो वो बड़ी गुमराही में है। अहलेबैत (अ०स०) की सारी जिंदगी लोगो के लिए नमूना ए अमल रही है। जब एक आदमी अहलेबैत (अ०स०) के बताये और सिखाये हुए रास्ते पर गामज़न रहता है तो दुनिया की कोई भी फरेब देने वाली और हसीन दिखने वाली शे उसको गुमराह नहीं कर सकती है। शैतान हर चंद यही चाहता है कि जितना भी हो सके लोगो को बहकाये और उनको जहन्नुम की और ले जाये। जो भी अहलेबैत (अ०स०) के बताये हुए अहकाम से हट जाता है और अपने नफ़्स की पैरवी करने लगता है, वो गुमराह हो जाता है और आखिर में ऐसे लोगो के लिए ही परवरदिगार ने जहन्नुम को बनाया है। इससे बचने का सिर्फ एक ही रास्ता होता है कि आदमी सही और गलत को जाने और समझे की जो फ़ैल वो अंजाम दे रहा है वो ग़लत है और कही ऐसा तो नहीं कि शैतान ने उसके दिल में इस काम को करने के लिए वस्वसा पैदा किया हो। ये तभी मुमकिन हो सकता है कि जब आदमी अहलेबैत (अ०स०) के बताये हुए रास्ते पर चलते हुए इल्म हासिल करे और मारेफ़त हासिल करे।
इल्म ही सिखाता है कि क्या हक़ है और क्या बातिल। जिहालत इंसान के अंदर बुग़ज़ ओ हसद और शैतानियत पैदा कर देती है और जाहिल इंसान अपने सामने सबको हक़ीर और पस्त समझता है। ऐसा इंसान किसी का हक़ ग़स्ब करने से भी नहीं घबराता और चाहता है कि उसके इस फ़ैल को माशरे में सही माना जाये। इसी जिहालत कि वजह से पहले खलीफा ने जनाबे ए ज़ेहरा (स०अ०) के हक़ बाग़े फिदक़ पर क़ब्ज़ा किया और जब जनाबे ज़ेहरा (स०अ०) अपना हक़ (बाग़े फिदक़) माँगने दरबार में गयी तो उनका ये हक़ उनको ना दिया गया और दरबार में उनकी दिखाई गयी तहरीर को भी फाड़ दिया गया (अल्लाह की लानत हो गासबीन और ज़ालमीन पर)। हर दौर में बहुत से लोग ऐसे हुए है जो अपने को इमाम का सच्चा और पक्का मुहिब और शिया बताते हैं, लेकिन दुसरो का हक़ मार लेते है और अपने इस फ़ैल पर ज़रा भी नहीं पछताते हैं। अपने को शिया और मौला का चाहने वाला बोलने वाले लोग ज़रा खुद सोचे कि क्या वो ग़ासिब हो कर इमाम (अ०स०) की चाहने वाले (मुहिब) या शियाने अली हो सकते हैं, हरगिज़ नहीं। क्या ये लोग इमाम अली (अ०स०) या जनाबे ज़ेहरा (स०अ०) की रोज़े महशर शिफ़ात हासिल कर पाएंगे? सिर्फ ज़बान से बोल देना काफी नहीं है, कि हम इमाम अली (अ०स०) के चाहने वाले है। हमारे किरदार और अमल से भी ये ज़ाहिर होना चाहिए।
इस चंद रोज़ की ज़िन्दगी के लिए आदमी कितने झूठ और फरेब करता है, जबकि वो ये भूल जाता है कि उसको आखिर एक दिन अपने परवरदिगार कि बारगाह में लौट कर जाना है। इंसान हमेशा से ही इस सच्चाई से ग़ाफ़िल रहा है, मगर जब वो बिस्तरे मर्ग पर अपनी ज़िन्दगी के आखरी लम्हात में होता है तो उसकी आंखें खुल जाती है, कि उसने ज़िन्दगी भर जो मॅक्रो फरेब किया उसने उसे आज क्या दिया, हक़ीक़तन कुछ नही। बा-रोज़े हश्र, हर इंसान अपने किये को देखेगा यहाँ तक की छोटे से छोटा किया हुआ अमल भी। इसी अमल के हिसाब से सजा और जज़ा का मुस्तहक़ होगा। तब ये इंसान ख्वाहिस करेगा कि काश हमारा रब हमें दुनिया में एक बार फिर से भेज दे ताकि हम अच्छे-अच्छे काम अंजाम दे और और अपने रब के फर्माबरदार बन्दे बन कर उसकी बारगाह में लौटे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। रोज़े महशर इंसान के बदन का हर एक जुज़ उसके खिलाफ गवाही देगा। अगर इंसान को रोज़े महशर की इस शर्मिंदगी से बचना है तो इल्म हासिल करे और नबी ओ इमाम (अ०स०) की बताई हुई नसीहतों पर अमल करे, अगर ऐसा करेगा तो वो कभी किसी का हक़ नहीं छिनेगा, ना ही किसी पर ज़ुल्म करेगा। रोज़े महशर सुर्ख रूह होगा और अपने नामाये आमाल को अपने दाये हाथ में लिए होगा। इमाम अली (अ०स०) ऐसे ही लोगो की शिफ़ात भी करेंगे क्यूंकि इन्होने इमाम अली (अ०स०) को ही नहीं माना बल्कि इमाम अली (अ०स०) की भी मानी।
अपनी बात को ख़त्म करते हुए अल्लाह से दुआ करता हूँ कि परवरदिगार ए आलम हम सबको शैतान के वसवसों से महफूज़ रखे और ज़्यादा से ज़्यादा इल्म हासिल करने की तौफ़ीक़ दे ताकि हम हक़ीक़ी दीन (दीन ए इस्लाम) को बेहतर तरीके से समझे और इस पर अमल करे और नबी ओ इमाम (अ०स०) के बताये हुए रास्ते पर चल कर फ़लाह पाए और रोज़े महशर अपने इमाम (अ०स०) की शिफ़ात के मुस्तहिक़ बने।
इल्तेमास ए दुआ 🤲🏻!
✍️मौहम्मद काज़िम