स्वामी सत्यानंद Sahil Singh Suryavanshi

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स्वामी सत्यानंद Sahil Singh Suryavanshi साक्षात् भोलेनाथ के आज्ञा से संकल्प ले कर,
धर्म-राष्ट्र-समाज को जीवन समर्पित कर चुका साधु

12/05/2026

परम् आदरणीय श्रद्धेय स्वामी सत्यानंद जी महाराज गुरुजी के लिखे को पढ़ने हेतु ! कृपया यहाँ ⬇️ भी पधारें.

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✍️ ज्योति नीलमेल्लाउरवार

महादेव-गण-शेर-महाराज पर सवार, दिव्य सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत, संपूर्ण सृष्टि की जगत् जननी माता का, वहाँ प्रकटीकरण हो ...
18/04/2026

महादेव-गण-शेर-महाराज पर सवार, दिव्य सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत, संपूर्ण सृष्टि की जगत् जननी माता का, वहाँ प्रकटीकरण हो चुका था. माँ के प्रकट होने के साथ ही, उनके वाहन शेर महाराज ! अंदर जंगल में प्रविष्ट होने की, पदयात्रा आरंभ कर दिये.

माता पार्वती मैया के मुखमण्डल के पूरे परिधि में, गोलाकार दायरा बनाते हुये, प्रस्फुटित हो रहे प्रकाश के, औरे की आभा से……… विस्मित ! प्रभावित ! आकर्षित ! उस अकिंचन युवा भगवाधारी के नंगे पाँव ! उनके पीछे-पीछे स्वतः ही, चलते-चले जा रहे थे.

_____________________
तिथि :
शिवशक्ति संवत् ३३०२
05 नवम्बर 2023 ; रविवार
कार्तिक माह, कृष्ण पक्ष, अंधियारी रात.

स्थान :
मध्य भारत का, एक बेहद घना जंगल. अचानक से वार करके मार देने वाले बाघों का घर ! अचानकमार वन्य भूमि, मैकल पर्वत श्रृंखला, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती क्षेत्र, मार्गदर्शिका खंड (भारत).

जबलपुर में जब उस तपस्वी ने, काले सांड की उस भाव-भंगिमा को देखा ! जिसका आशय यह निकल रहा था कि, वह सांड ! तपस्वी को अपनी पीठ पर, सवार होने के लिये कह रहा हो. तभी उस युवा भगवाधारी के मस्तिष्क में, यह विचार कौंधा कि……… ‘हो ना हो ! यह कोई अलौकिक शक्तियों वाला सांड हो.’

इस विचार से वशीभूत ! चाय विक्रेता के ठेले-टपरी-खोमचे पर खड़े तपस्वी ने, तत्काल सांड महाराज का अभिवादन किया. परंतु जब सांड महाराज ने, आशीर्वाद देने जैसा, कोई भाव प्रकट नहीं किया ! तब युवा साधु ने सोचा………..

‘अवश्य ही यह कोई, महादेव-दूतों द्वारा नियुक्त ! पूर्वश्रेणी सातवें चरण की आत्मा है. जो अभी वाहन दायित्व निर्वहन काज के लिए आदेशित है. तथा इसे जो आज्ञा प्राप्त हुई है, उसके पालन हेतु ! अभी यहाँ उपस्थित है. तभी तो, यह मूल श्रेणी के आत्मा प्रतिनिधि द्वारा ! धारण वस्त्र के प्रणाम करने पर, आशीर्वाद देने हेतु ! अपने आप को, सुपात्र नहीं मान रहा है.’

यह विचार आते ही, वह युवा साधु ! तत्काल उस बड़े आकर वाले काले सांड के, पीठ के ऊपर बैठ गया. तथा गर्दन के ऊपरले भाग (हम्प) को, कस कर पकड़ लिया. उसके ऐसा करते ही, सांड महाराज ने, दौड़ना आरंभ कर दिया.

पूर्व श्रेणी के सातवें चरण वाले, उस काले सांड के दौड़ने की गति ! क्षण-प्रति-क्षण बढ़ती जा रही थी. जब गति बहुत अधिक बढ़ गयी, तब वह युवा भगवाधारी ! अपने आप को, गिरने से बचाने के लिए, सांड की पीठ पर, पेट के बल लेट गया. तथा हम्प के अगल-बगल की स्किन को, और भी भींच कर पकड़ लिया.

जब सांड के दौड़ने की, बढ़ती हुयी गति कुछ स्थिर हुयी. तब तपस्वी युवक ने, अपनी सिद्धियों का प्रयोग करके, गति को मापा. रिजल्ट आया ! लगभग आठ सौ किलोमीटर प्रति घंटा. रिजल्ट ने उसको कंप-कंपा दिया. संपूर्ण शरीर में, डर की सिहरन दौड़ गयी.

उस डर पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से, उसने आँखे खोल कर, बाहर देखने का निश्चय किया. उस घनी अंधियारी रात में, स्पष्टता से तो, कुछ भी नहीं दिखा. परंतु इतना समझ आ गया कि, सांड के पाँव ! भूमि पर तो, कम से कम नहीं ही पड़ रहे हैं. वह जमीन से कई मीटर ऊँचें, पेड़ों की सबसे उपरली पत्ती से भी, कुछ फिट ऊपर, हवा में ताबड़तोड़ चल रहे थे.

लगभग बीस मिनट की सीधी यात्रा में, दो-ढाई सौ किलोमीटर की यात्रा के पश्चात् ! जहाँ उस काले सांड ने, उस भगवाधारी युवा को, अपनी पीठ से नीचे उतारा. वहाँ बिल्कुल सन्नाटा ! व घुप्प अंधेरा था. बगल से कोई सड़क गुजर रही थी. जिस पर यदा-कदा ! कुछ-कुछ मिनट पर, कोई ना कोई वाहन आ - जा रहे थे. उनकी रोशनी में, उसे यह समझ आया कि, वह और सांड ! जहाँ खड़े हैं, वह कोई कृषि-भूमि है.

दूर बिजली के बल्बों की रोशनी से, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि, वहाँ कोई छोटा सा शहर या कस्बा है ! यानि मानवी आबादी है. परंतु उन बल्बों के प्रकाश का, कैसा भी असर, उस भूखंड पर नहीं था ! जहाँ अभी वह तपस्वी खड़ा था. वहाँ घनघोर अँधेरा था. परंतु वह अंधेरा ! बहुत अधिक अवधि तक नहीं रहा. क्योंकि कुछ ही समय पश्चात् ! वातावरण धीमे-धीमे प्रकाशमान होने लगा.

………और इसी के साथ ! अलौकिक माध्यम से, वहाँ एक-एक करके, महादेव-दूत परमात्मा माता सेविकाओं का आगमन होने लगा. जो माता के पधारने का संकेत था. युवा भगवाधारी तपस्वी साधु के हाथ ! प्रमुदित होकर करबद्ध मुद्रा को प्राप्त हो गये. कुछ ही समय उपरांत ! वहाँ प्रकाशित प्रकाश में, दिव्यता का स्तर बहुत बढ़ गया.

महादेव-गण-शेर-महाराज पर सवार, दिव्य सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत, महादेव की अर्धांगिनी ! शक्ति स्वरूपा माँ ! संपूर्ण सृष्टि की जगत् जननी माता ! का वहाँ प्रकटीकरण हो चुका था. माँ के प्रकट होने के साथ ही, उनके वाहन शेर महाराज ! बिना किसी देरी के, सड़क के विपरीत दिशा की ओर, पदयात्रा आरंभ कर दिये.

पर्याप्त से भी अधिक रोशनी के कारण……… शेर महाराज व उन पर सवार माँ दुर्गा मैया ! तथा महादेव-दूत माता सेविकाओं के, बढ़ने वाली दिशा में, कुछ दूरी पर, पहाड़ व जंगल जैसा ! कुछ आभास हो रहा था. जिसके अंदर संभवतः प्रविष्ट होने की, पदयात्रा आरंभ हो चुकी थी.

माता पार्वती मैया के, मुखमण्डल के पूरे परिधि में, गोलाकार दायरा बनाते हुये, प्रस्फुटित हो रहे प्रकाश के, औरे की आभा से……… विस्मित ! प्रभावित ! आकर्षित ! उस अकिंचन युवा भगवाधारी के नंगे पाँव ! उनके पीछे-पीछे स्वतः ही, चलते चले जा रहे थे.

पूर्व श्रेणी के सातवें चरण वाले, उस सिद्ध काले सांड का दायित्व ! सम्भवतः समाप्त हो चुका था. तभी तो वह सांड महाशय ! वहीं बैठे रह गये थे. या फिर उस कृषि भूमि पर उपजे हुये, घास का आनंद लेने में, जुट गये थे.

इधर युवा साधु ! अपने चलने की धीमी लौकिक गति के कारण, क्षण-प्रतिक्षण पिछड़ता जा रहा था. तभी उसको ‘अलौकिक संदेश वाहक सांकेतिक प्रणाली’ के माध्यम से, संकेत प्राप्त होने की, सजगता-सतर्कता प्राप्त हुयी.

यह जो संकेत था ! वह उसके एक पूर्वजन्म के बड़े भाई (मूल श्रेणी के प्रथम मूल जन्म में लौकिक बड़े भाई) का था. जो अब अपनी आत्मा-यात्रा को पूर्ण करके, परमात्मा यानि महादेव-दूत बन चुके थे.

उस तपस्वी युवक द्वारा ! संकेत को प्राप्त करने की, इच्छा प्रकटीकरण प्रणाली को, सक्रिय करते ही, उसके कानों में, महादेव-दूत विक्रांत महाराज के, डाँट भरे स्वर सुनायी पड़े :

“श्वेतभानु ! मूर्खों जैसे आचरण क्यों कर रहे हो ? सत्रहवें चरण में पहुँच गये हो ! परंतु ढंग अभी भी पन्द्रहवें चरण का अपनाये हुये हो. शीघ्रतापूर्वक पदयात्रा की गति को, सिद्ध-संचार-साधन हेतु अभ्युत्थान करो ! नहीं तो माता के सानिध्य व मार्गदर्शन से, वंचित रह जाओगे.”

युवा साधु को, तत्काल अपनी त्रुटि का एहसास हुआ. उसने अलौकिक माध्यम से, परमात्मा विक्रांत महाराज का, आभार प्रकट किया. फिर अपनी पदयात्रा की गति को, सिद्ध-संचार-साधन स्तर पर, अपग्रेड कर लिया. तत्काल से ही, सुखद परिणाम प्राप्त हुये. अब उसके डगों द्वारा ! प्रत्येक कदम पर, भूमि मापने की क्षमता, बहुत बढ़ गयी. जिसके फलस्वरूप ! अब उसका पिछड़ना थम गया. अब वह उचित वेग से, अनुसरण कर पाने में, सक्षम हो गया था.

पदयात्रा निरंतर जारी रही. फिर कुछ मिनटों बाद, चलते-चलते पानी का एक स्रोत आया. वह शायद कोई जलाशय या नदी का किनारा था. माता आदि शक्ति माँ के वाहन ! महादेव-गण शेर महाराज ! वहीं एक स्थान पर रुक गये.

तत्काल ही आश्चर्यजनक ढंग से, हवा का एक वेग आया. जिसके परिणामस्वरूप ! वहाँ के कुछ क्षेत्र की भूमि ! बिल्कुल साफ-सुथरी हो गयी. और साथ ही, ना जाने कहाँ से, अलग-अलग प्रजाति के, बीसियों प्राणी ! वहाँ इकट्ठे हो गये.

तत्काल वही गिरे हुये, एक पेड़ की मोटी शाखाओं पर, माता का आसन प्रकट हुआ. माता अपने स्थान पर विराजमान हुयीं. माता द्वारा स्थान ग्रहण करने के पश्चात् ! जैसे ही उन्होंने आशीर्वाद मुद्रा में, अपने हाथ की एक हथेली उठायी.

सभी प्राणी ! जहाँ-जहाँ भी खड़े थे, वहीं बैठ गये. साथ ही बैठ गया ! वह युवा भगवाधारी भी. परंतु महादेव-दूत परमात्मा माता-सेविकाओं ने, बैठने का कोई उपक्रम नहीं किया. वह अपने-अपने सुनिश्चित स्थान पर, माता के पीछे व आस-पास खड़ी हो गयीं.

माँ के मुख से दिव्य वाणी निकली :
“अब आगे की क्या योजना है पुत्र ?”

माता का बालक ! युवा भगवाधारी बोला :
“जैसी आपकी आज्ञा माँ !”

माँ पार्वती मैया ने कहा :
“१११११११११ में से, अब तक तुम ३३३३ द्वार से अधिक जा चुके हो. अब अगले आदेश तक के लिये, भिक्षाटन स्थगित कर दो. तथा कुछ चयनित शिवांशों की, गुप्त-परीक्षा आरम्भ करो.”

“……………एवं परीक्षार्थी शिवांशों के, उत्तीर्ण होने की अवस्था बनती देख कर, तुम यह मान सकते हो कि, महादेव के आज्ञा वाले, 4ॐ वर्ग के, प्रथम स्थान पर, निर्माण-काज को, आरंभ करने का, मुहर्त आ गया है.”

युवा बालक बोला :
“परंतु माँ ! स्थान तो अभी तय ही नहीं है. ना ही स्थान का, कोई स्पष्ट संकेत प्राप्त हुआ है. हे माँ ! आप कृपा करके स्थान बता दें. तथा मुझे आशीर्वाद व आज्ञा दें. मैं अभी प्रस्थान करता हूँ.”

माँ की आशीर्वादमयी वाणी :

“महादेव के आज्ञा व संकेत से, जिन स्थानों को तुमने, अभी तक देख रखा है. उन्हीं स्थानों में से, किसी एक स्थान का, अगले कुछ दिवस या मास में, तुम्हें स्पष्ट संकेत प्राप्त होंगे. तुम उन सभी स्थानों की दिशा में, यात्रा आरंभ करो. तुम्हें शीघ्र ही संकेत प्राप्त होंगे. उन संकेतों का अनुसरण करते हुये, तुम एक-एक करके, वर्तमान के चयनित अठारह स्थानों तक पहुँचोगे.”

“मेरे नाथ भोलेनाथ महादेव के कार्य हेतु ! तुम समर्पित शिवांशों का दल तैयार करोगे. उस दल के आपसी समन्वय से, तुम उन अठारह स्थानों में से, अभी निर्माण कार्य आरंभ करने हेतु ! किसी एक स्थान का चयन करोगे. एवं शीघ्रातिशीघ्र उस समर्पित-समूह-दल के कर्म-समर्पण से, उस एक स्थान को, तुम्हें उस स्तर तक पहुँचाना होगा. जिस स्तर पर, वैसे स्थान को, दिव्यता प्रदान करने का प्रावधान है.”

“यदि उन अठारह स्थानों में से, किसी एक स्थान हेतु भी, समर्पित शिवांश दल का, समन्वय नहीं बन पाता है. तब उस अवस्था में, तुम्हारे पास तीन और अतिरिक्त विकल्प होंगे. प्रथम विकल्प ! कनखल से प्रयागराज के मध्य का एक भूखंड है. जिसके लिये एक विधवा वृद्ध स्त्री को, निमित्त बनाने की योजना है. उस भूखंड पर कार्य का क्रियान्वयन होना ! उस स्त्री के कर्म पर निर्भर होगा.”

“यदि वह विधवा वृद्ध स्त्री ! अपने कुत्सित विचारों के प्रभाव में आकर, इस दिव्य अवसर को गवाँ देती है. तब तुम्हें ! मरुभूमि क्षेत्र के, एक समर्पित दंपत्ति को, यह अवसर प्रदान करना है. उसमें से जो स्त्री है ! वह पहले से ही, अपने इस वर्तमान जन्म में, अच्छी गति से सदकर्म बटोर रही है. यदि उसका पति भी, तुमसे प्रश्नोत्तरी के माध्यम से, व देशाटन सानिध्य के माध्यम से, अपनी शंकाओं का निवारण करके…….. अपने भटकाव प्रवृति पर अंकुश लगा कर, महादेव-काज में जुट जाये. तब कदाचित् वहीं दोनों, तुम्हारे ९९९९ वाले वरदान के, आरंभिक प्रथम व द्वितीय लाभार्थी शिवांश बन जाएँगे.”

“यदि वह दंपत्ति भी, इस पुण्यमयी अवसर को चूक जाते हैं. तब भी तुम्हारे पास, अतिरिक्त तीन विकल्पों में का, एक अंतिम विकल्प शेष बचा रहेगा. परंतु वह उस मरु क्षेत्र से, पांच सौ कोस दूर होगा. परंतु अभी जहाँ तुम बैठे हो, इससे केवल पंद्रह कोस दूर होगा. वह वहीं स्थान है ! जहाँ तुम्हारा आज रात्रि का वाहन, अभी विश्राम कर रहा है.”

“यदि, वह दंपत्ति भी, इस पुण्यमयी अवसर को चूक जाते हैं. तब तुम कोई भी प्रयास करने के स्थान पर, धौलागिरि आ जाना. वहाँ ! माँ के सानिध्य में बैठ कर, अवसर गँवाने वाले शिवांशों के ऊपर, पिता के क्रोध का प्रकोप देखना. वैसे इसकी संभावना अत्यंत कम है ! क्योंकि मुझे ऐसा विश्वास है कि, तुम इन इक्कीस स्थानों में से, किसी एक स्थान हेतु ! सफलता अवश्य प्राप्त कर लोगे.”

“मैं तुम्हें एक-एक करके, वह सभी इक्कीस स्थान दिखा दूँगी. जैसे आज स्थान क्रमांक इक्कीस ! अभी कुछ समय पूर्व दिखा चुकी हूँ. वैसे ही आगामी कुछ दिवस-रात्रि में, शेष बीस स्थान भी दिखा दूँगी.”

भाग 02

क्रमशः

✍️ लेखक :
श्रद्धेय साहिल सिंह सूर्यवंशी गुरुजी

संलग्न तस्वीर क्रेडिट :
शिवशक्तियन श्री विकास गिरी जी

प्रस्तुतकर्त्री : ज्योति नीलमेल्लाउरवार (परम् आदरणीय श्रद्धेय स्वामी सत्यानंद जी महाराज गुरुजी की कृपापात्र ! तथा SDP दायित्वधारी शिष्य-मंडली में से, सोशल मीडिया हैंडलर दल की, एक समर्पित शिवांश) सम्पर्क हेतु ! शिवशक्तिशिवालय धर्मपुनर्स्थापनकाज पुण्यप्रकल्प (SDP) का व्हॉटसअप नंबर है +91 9313 246 190

॥ जय शिवशक्ति ॥

Whatsapp number 093132 46190

तपस्वी को आभास हुआ कि, अब आँखे खोलने का समय आ चुका है.  उसने धीमे-धीमे अपनी आँखे खोली.  तपस्वी का रोम-रोम पुलकित एवं हर्...
17/04/2026

तपस्वी को आभास हुआ कि, अब आँखे खोलने का समय आ चुका है. उसने धीमे-धीमे अपनी आँखे खोली. तपस्वी का रोम-रोम पुलकित एवं हर्षित हो उठा. उसने, अपने आप को, माँ नर्मदा मैया के वाहन ! मगरमच्छ महाराज महाराज के समक्ष पाया. मगरमच्छ महाराज का, आधा शरीर पानी में, तथा आगे का आधा देह, धरातल पर डूबते सूरज की, रोशनी में दमक रहा था.

उस तपस्वी साधु ने, हाथ जोड़ कर, वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज से कहा : “प्रणाम महाराज ! मैया कहाँ हैं ? क्या आज उनके दर्शन का सौभाग्य ! मुझे प्राप्त होगा ?”

वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज ! उत्तर में कुछ बोल पाते, उसके पहले ही, उनके ऊपर खड़ी रेवा माँ ! प्रकट हो कर बोलीं : “मैं भी यही हूँ सत्यमार्गी !”

कुछ ही क्षणों में, उस तपस्वी साधु के शरीर का अग्र भाग, मगरमच्छ महाराज के पीठ पर, पेट के बल लेटा हुआ था. …..और उसका शीश, नर्मदा मैया के चरणों में था. उस युवा संत के देह का शेष आधा हिस्सा ! पानी एवं भू-तट के मध्य में पड़ा था. वह ऐसे ही लेटा रहा ! और माँ नर्मदा मैया की अमृतमयी वाणी ! उसके कानो में आती रही.

माँ रेवा मैया की दैवीय वाणी : “सत्यमार्गी ! आज की रात्रि में, अधिक चैतन्य अवस्था में रहना. आज रात्रि में, मेरी माँ ! माता पार्वती माँ ! तुम्हें पुनः दर्शन देंगी. …..एवं आगे के शुभ-काजों हेतु ! आज्ञा भी देंगी.”

मैया रेवा माँ ! आज्ञा देने के पश्चात् अंतर्ध्यान हो चुकी थीं. कुछ ही क्षणों के उपरांत ! उनके वाहन वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज भी, मेकलसुता की बहती धारा में, समा चुके थे. माँ नर्मदा मैया का, परम् दिव्य सानिध्य पा कर प्रफुल्लित ! वह भगवाधारी युवा भी, माँ के तट से, अब ऊपर आ कर, कार स्टार्ट कर चुका था.

__________________
कार्तिक मास,
शिवशक्ति संवत् ३३०२
05 नवम्बर 2023 ; रविवार.

वह युवा भगवाधारी साधु ! मध्य प्रदेश स्थित नर्मदापुरम के, आदरणीय शिवशक्तियन श्री राजेश मालवीय जी के घर से, भिक्षाटन करके निकल चुका था.

शहर के अंदर में ही, नर्मदा मैया के दक्षिणी तट वाले, एक घाट पर पहुँच कर, उसने कुछ समय बिताया. उसके पश्चात् ! वह पुनः ड्राइविंग सीट पर था. कुछ किलोमीटर, मैया के बहाव की विपरीत दिशा में, दक्षिणी किनारे पर, गाड़ी चलाने के बाद, अब वह पुल पार करके, मैया के उत्तरी तट पर ! ट्रैफ़िक नियम द्वारा निर्धारित अधिकतम गति पर ! कार को निर्विघ्न, ड्राइव किये जा रहा था.

उसका अगला पड़ाव जबलपुर था. पेड़ों व खेतों के, अंतहीन श्रृंखलाओं के मध्य बने, पक्की सड़क पर, काली कार के, चारों काले पहिये, डेढ़-दो हजार आरपीएम पर, अपने संतुलित परफार्मेंस का, नजारा पेश कर रहे थे.

तभी !

अलौकिक संदेश वाहक सिग्नल के, एक्टिवेट होने की ऊष्मा को, भगवाधारी युवक के तन ने महसूस किया. वर्षों से विकसित हो चुके स्वचलित लय ने, उसके मनोमस्तिष्क को चौकन्ना किया. संकेत प्राप्त होने आरंभ हुये…….

उसे ऐसा लगा कि…………..
……….……मैया बुला रही हैं.

आदेश का तत्क्षण पालन आरंभ हुआ. तत्काल पार्किंग हेतु ! उपयुक्त स्थान देख कर, गाड़ी पार्क कर दी गयी. उस युवक ने, बगल की सीट पर बैठी, अपनी धर्मपत्नी ! गुरु माता सत्यवती को देखा. संक्षिप्त मूक वार्तालाप के पश्चात् ! युवक कार से नीचे उतर चुका था.

वह स्थान ! नर्मदा मैया के उत्तरी तट का, बांद्राभान घाट था. वह मैया की ओर पैदल चलते हुये, माँ के गोद में जाने हेतु व्याकुल था. सूरज भगवान अस्त होने की, प्रारंभिक तैयारी शुरू कर चुके थे. मैया के सामने वाले, दक्षिणी तट पर, विकराल विशाल तवा नदी ! बिल्कुल शांतिपूर्वक, अपने आप को, नर्मदा मैया में, समाहित कर रही थी.

एक क्षण हेतु ! उस युवा साधु के मन को, अपने भूतकाल में बिताये गये, तवा नदी यात्रा के, लोमहर्षक घटनाक्रमों का, स्मरण हो आया. उसने पाया कि, उसके रंगोटे खड़े हो गये हैं. उसने, अपने माथे को झटका ! ताकि धाराप्रवाह आ रहे, उन घन-घोर-रोमांचक विचारों से, अपने आप को बाहर निकाल सके. जब तक उसे, सफलता प्राप्त हुयी ! तब तक वह पदयात्रा करते हुये, माँ के तट पर पहुँच चुका था.

वह माँ नर्मदा मैया की गोद में, एकांत निर्जन स्थान पर बैठा रहा. कुछ गौ माताओं व गौवंशों का दल, मैया की अमृतमयी जल धारा से, अपनी प्यास बुझाने आया था. उस युवा साधु ने, माता का स्मरण करते हुये ध्यान लगाया.

कुछ अवधि के पश्चात् ! तपस्वी को आभास हुआ कि, अब आँखे खोलने का, समय आ चुका है. उसने धीमे-धीमे अपनी आँखे खोली. तपस्वी का रोम-रोम पुलकित एवं हर्षित हो उठा. उसने, अपने आप को, माँ नर्मदा मैया के वाहन ! मगरमच्छ महाराज के समक्ष पाया. मगरमच्छ महाराज का, आधा शरीर पानी में, तथा आगे का आधा देह, धरातल पर डूबते सूरज की, रोशनी में दमक रहा था.

उस तपस्वी साधु ने, हाथ जोड़ कर, वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज से कहा : “प्रणाम महाराज ! मैया कहाँ हैं ? क्या आज उनके दर्शन का सौभाग्य ! मुझे प्राप्त होगा ?”

वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज ! उत्तर में कुछ बोल पाते, उसके पहले ही, उनके ऊपर खड़ी रेवा माँ ! प्रकट हो कर बोलीं : “मैं भी यही हूँ सत्यमार्गी !”

कुछ ही क्षणों में, उस तपस्वी साधु के शरीर का अग्र भाग, मगरमच्छ महाराज के पीठ पर, पेट के बल लेटा हुआ था. …..और उसका शीश, नर्मदा मैया के चरणों में था. उस युवा संत के देह का शेष आधा हिस्सा ! पानी एवं भू-तट के मध्य में पड़ा था. वह ऐसे ही लेटा रहा ! और माँ नर्मदा मैया की अमृतमयी वाणी ! उसके कानो में आती रही.

माँ रेवा मैया की दैवीय वाणी : “सत्यमार्गी ! आज की रात्रि में, अधिक चैतन्य अवस्था में रहना. आज रात्रि में, मेरी माँ ! माता पार्वती माँ ! तुम्हें पुनः दर्शन देंगी. …..एवं आगे के शुभ-काजों हेतु ! आज्ञा भी देंगी.”

मैया रेवा माँ ! आज्ञा देने के पश्चात् अंतर्ध्यान हो चुकी थीं. कुछ ही क्षणों के उपरांत ! उनके वाहन वरिष्ठ महादेव-दूत मगरमच्छ महाराज भी, मेकलसुता की बहती धारा में, समा चुके थे. माँ नर्मदा मैया का, परम् दिव्य सानिध्य पा कर प्रफुल्लित ! वह भगवाधारी युवा भी, माँ के तट से, अब ऊपर आ कर, कार स्टार्ट कर चुका था.

गाड़ी अपने अगले गंतव्य ! जबलपुर की ओर, बढ़ी जा रही थी. मध्य प्रदेश में चुनावी आचार संहिता के कारण ! जगह-जगह पुलिसकर्मीयों ने, चेक-पोस्ट बना रखे थे. सभी स्थानों पर, कार की चेकिंग कराते, एवं अपना तथा अपने कार का, विवरण दर्ज कराते हुये, वह भगवाधारी युवा ! देर रात्रि में, जबलपुर पहुँचा. ठहरने के स्थान पर जा कर, अभी बिछावन पर लेटा ही था कि, उसे नींद आने लगी.

अभी उसकी आँख लगी ही थी कि…………… उसे जागने व बिस्तर छोड़ कर, बाहर निकलने का, संकेत प्राप्त हुआ. वह तत्काल बाहर निकला. सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था. कुछ-कुछ समय के अंतराल पर, कोई-कोई गाड़ी ! व बाइक ! आ-जा रही थी.

तभी ! उसे सड़क पर, एक काला सांड दिखा. जो उस समय तक तो शांत था. परंतु उस युवा भगवाधारी से दृष्टि मिलते ही, अपने नथुने फुला कर, उसकी ओर फुँफकारता हुआ दौड़ा. बचने के उद्देश्य से, वह युवक भागा. परंतु सांड की गति व फुर्ती, अवर्णनीय रूप से तीव्र थी. उसने बचने हेतु ! भागने के बजाये, किसी ऊँचे स्थान पर चढ़ने का, तत्वरित निर्णय किया.

परिणामस्वरूप ! पास के ही, एक चाय या नाश्ता बेचने वाले के, टेबलनुमा खोमचे पर, वह चढ़ गया. परंतु उसकी ऊँचाई अपर्याप्त थी. सांड बहुत ही आसानी से, वहाँ वार कर सकता था. लेकिन सांड उसके पास पहुँच कर, बिल्कुल शांत हो गया. और उस टेबल से, ऐसे चिपक कर खड़ा हो गया. जैसे उस भगवाधारी को, अपने ऊपर सवार होने का, निमंत्रण दे रहा हो.

भाग 01

क्रमशः

✍️ लेखक :
श्रद्धेय साहिल सिंह सूर्यवंशी गुरुजी

संलग्न तस्वीर क्रेडिट :
शिवशक्तियन श्री विकास गिरी जी

प्रस्तुतकर्त्री : ज्योति नीलमेल्लाउरवार (परम् आदरणीय श्रद्धेय स्वामी सत्यानंद जी महाराज गुरुजी की कृपापात्र ! तथा SDP दायित्वधारी शिष्य-मंडली में से, सोशल मीडिया हैंडलर दल की, एक समर्पित शिवांश) सम्पर्क हेतु ! शिवशक्तिशिवालय धर्मपुनर्स्थापनकाज पुण्यप्रकल्प (SDP) का व्हॉटसअप नंबर है +91 9313 246 190

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अधिकतर वह चीजें छलावा साबित होती आयीं हैं !  या होती हैं.  जिनको पाने के  लिये, मानव अत्यधिक व्याकुल होता है. अत्यंत अनम...
07/12/2025

अधिकतर वह चीजें छलावा साबित होती आयीं हैं ! या होती हैं. जिनको पाने के लिये, मानव अत्यधिक व्याकुल होता है. अत्यंत अनमोल चीजें तो, सहजता से ही मिल जाया करती है.

पर इसका यह अर्थ ! कदापि ना लगायें कि, जो छलावा साबित होगी. उसको पाने का प्रयास क्यों करना ?

प्रयास तो इसलिये करना चाहिये. क्योंकि हमारे द्वारा, किया गया प्रयास, ही हमारी अचीवमेंट या सिद्धि है. सबसे अनमोल “प्रयास का करना” ही है.

यानि जब हम कुछ पाने का प्रयास करते हैं. तथा उसको पा लेते हैं. तो उस “पाये-हुये” को अचीवमेंट मानते हैं.

जबकि असली अचीवमेंट तो, वो प्रयास है ! जो उस “पाये-हुये” को, पाने के लिये किया गया.

और उस “किये-हुये-प्रयास” की संतुष्टि ! तो आपको हर हाल में मिलेगी. चाहे आप तथाकथित सफल हों ! या नहीं हों.

॥ जय शिवशक्ति ॥

✍️ स्वामी सत्यानंद शाश्वत
+91 9313 246 190

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Whatsapp number 093132 46190

21/08/2025

आदत ! लत ! स्वभाव ! प्रकृति ! प्रवृत्ति ! अभ्यास !
………..प्राणी इसका पराधीन होता है. अतः सद्कर्मों का अभ्यासी होना ! अथवा सद्कर्म करने का ही आदत बना लेना ! सबसे उचित कृत्य है. : स्वामी सत्यानंद

21/08/2025

डर ! पाप चढ़ने का.
उस पाप के, पाप-दंड को भोगने का.
धर्म-दंड के प्रहार का.
धर्म-दल से निष्कासित होने का.

21/08/2025

प्रोत्साहन ! धर्म का.
आश्वासन ! SDP का.
संरक्षण ! कौटुंबिक सुरक्षा का.
पुरस्कार ! तुम्हारा व तुम्हारे परिवार का.

 ुरुजी_रिलेटेड_प्रश्नोत्तरी प्रश्न :~  “SDP क्या है ?  तथा संक्षेप में बतायें !  इसका उद्देश्य क्या है ?”परम् आदरणीय श्र...
16/08/2025

ुरुजी_रिलेटेड_प्रश्नोत्तरी
प्रश्न :~ “SDP क्या है ? तथा संक्षेप में बतायें ! इसका उद्देश्य क्या है ?”

परम् आदरणीय
श्रद्धेय स्वामी सत्यानंद जी महाराज
गुरुजी द्वारा ! दिये गये उत्तर का अंश :~

“SDP एक शॉर्टफॉर्म है ! जिसके मुख्य रूप से, दो फुलफॉर्म हैं. विस्तृत फुलफॉर्म है……… SDP : शिवशक्तिशिवालय धर्मपुनर्स्थापनकाज पुण्यप्रकल्प. तथा संक्षेप फुलफॉर्म है……… SDP : शिवशक्ति धर्म प्रकल्प.”

“संक्षेप में इसका उद्देश्य बताना तो,
अत्यंत दुरूह कार्य है.
परंतु फिर भी, प्रयास करके देखता हूँ.”

“एक तो जैसा इसके शुभ-नाम से प्रतीत होता है ! धर्म को पुनः स्थापित करने वाला, पुण्यमयी मुहिम वाला प्रोजेक्ट. यानि अधर्म को समाप्त करने वाला प्रकल्प.”

“क्योंकि SDP का, यह स्ट्रॉंग स्टैंड है कि, सम्पूर्ण सृष्टि के, समस्त अधम स्थानम् की भाँति, स्थानम् पृथ्वी के भी, समस्त समस्याओं ! एवं यहाँ के मनुष्यों सहित, सभी प्राणियों के, समस्त कष्टों / दुःखों का कारण ! इस ग्रह के चैतन्य मनोमस्तिष्कधारी प्राणियों, यानि मानवों का, धर्म से विमुख होना है. उन्हें धर्म सम्मत तरीके से, धर्म-मार्ग पर लाना ही, इसका एकमात्र उपाय है.”

क्रमशः

यह इस प्रश्नोत्तरी श्रृंखला का, भाग-१ है. आगामी भाग हेतु ! कृपया अगली पोस्ट पढ़ें. आप सभी पाठकगण का, बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार.

🙏 ॥ जय शिवशक्ति ॥ 🙇‍♂️

✍️ परम् आदरणीय श्रद्धेय स्वामी सत्यानंद जी महाराज गुरुजी के कृपापात्र ! दायित्वधारी शिष्य-मंडली का, एक अदना सा समर्पित शिवांश पवन अग्रवाल (मू.श्रे.तृ.च.)

06/08/2025

अगर तुम यह बोलते हो कि, *भगवान जी* तुम्हारे प्राथमिकता में हैं. परंतु तीर्थाटन तुम तब करते हो, जब रुपये छापने के, लायक़ नहीं रह जाते. तो इसका अर्थ है कि, तुम उन्हें मूर्ख बनाने की, चेष्टा कर रहे हो, जिन्हे मूर्ख बनाने वाला, कोई पैदा ही नहीं हुआ है.

05/08/2025

जीवन में आने वाली आपदाओं-विपदाओं से निपटने का, दमखम विकसित कीजिये. क्योंकि समस्याओं का आना-जाना तो, लगा ही रहेगा. हाँ ! आप चाहें तो, दमखम विकसित करने में, शिवशक्तिशिवालय पुण्यप्रकल्प से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं

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