Shreenathji Nity darshan

Shreenathji Nity darshan Unique details of Rag, Bhog, Shringaar and Festival’s in Shrinathji Temple, Nathdwara

श्रीनाथजी नित्य दर्शन
Unique details of Rag, Bhog, Shringaar and Festival’s in Shrinathji Temple, Nathdwara

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)Tuesday, 25 August 2026पवित्रा द्वादशीआज पवित्रा द्वादशी है.श्रावण शुक्ल ए...
24/08/2026

व्रज -विस २०८३ श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)
Tuesday, 25 August 2026

पवित्रा द्वादशी

आज पवित्रा द्वादशी है.
श्रावण शुक्ल एकादशी की मध्यरात्रि को स्वयं ठाकुरजी ने प्रकट होकर श्री महाप्रभुजी को दैवीजीवों को ब्रह्म-सम्बन्ध देने की आज्ञा दी.
इस प्रकार श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन श्रीवल्लभ ने सब से प्रथम ब्रह्म-सम्बन्ध वैष्णव दामोदर दास हरसानी को दिया. तब से एकादशी का दिन सभी वैष्णवों में पुष्टिमार्ग की स्थापना दिवस-समर्पण दिवस के रूप में मनाया जाता है.

श्री महाप्रभुजी को स्वयं श्रीजी ने ब्रह्म-सम्बन्ध देने की आज्ञा प्रदान की इस कारण सभी वैष्णवों को वल्लभ कुल के बालकों से ही ब्रह्म-सम्बन्ध लेना चाहिए, किसी अन्य साधु-संत आदि से नहीं लिया जाना चाहिए.
वल्लभ कुल के बालक श्री महाप्रभुजी की ओर से ब्रह्म-सम्बन्ध देते हैं अतः पुष्टिमार्ग के गुरु श्री महाप्रभुजी हैं.

जिस प्रकार हिन्दू धर्म के अन्य सम्प्रदायों में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) को गुरु का पूजन किया जाता है उसी प्रकार पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय में आज के दिन गुरु का पूजन किया जाता है.

सभी वैष्णव आज के दिन श्री ठाकुरजी को पवित्रा धराये पश्चात अपने ब्रह्म-सम्बन्ध देने वाले गुरु को पवित्रा, यथाशक्ति भेंट आदि धरें एवं दंडवत करें इसके पश्चात वैष्णवों को परस्पर प्रसादी मिश्री देकर ‘जय श्री कृष्ण’ कहें.

यदि गुरु किसी अन्य स्थान पर हों अर्थात उनके साक्षात् चरणस्पर्श दंडवत संभव न हों तो उन्हें पवित्रा व भेंट किसी भी रीती (पोस्ट से, कुरियर से अथवा किसी व्यक्ति के साथ) भेजें. भेंट भी भविष्य में साक्षात् होने पर उनके सम्मुख रखें.

यदि गुरु नित्यलीलास्थ हो गए हों तो ही उनके चित्र पर पवित्रा धराकर कर दंडवत करें, भेंट धरें और उपरांत उनके पुत्र को, उनके परिवार के किन्ही अन्य सदस्य को अथवा किसी अन्य गोस्वामी बालक जिनके आप संपर्क में हों उनको भेंट कर दें.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

सब ग्वाल नाचे गोपी गावे l प्रेम मगन कछु कहत न आवे ll 1 ll
हमारे राय घर ढोटा जायो l सुनि सब लोक बधाये आयो ll 2 ll
दूध दधि घृत कांवरि ढोरी l तंदुल डूब अलंकृत रोरी ll 3 ll
हरद दूध दधि छिरकत अंगा l लसत पीत पट बसन सुरंगा ll 4 ll
ताल पखावज दुंदुभि ढोला l हसत परस्पर करत कलोला ll 5 ll
अजिर पंक गुलफन चढि आये l रपटत फिरत पग न ठहराये ll 6 ll
वारि वारि पटभूषन दीने l लटकत फिरत महारस भीने ll 7 ll
सुधि न परे को काकी नारी l हसि हसि देत परस्पर तारी ll 8 ll
सुर विमान सब कौतिक भूले l मुदित त्रिलोक विमोहित फूले ll 9 ll

साज – आज श्रीजी में सफेद रंग की मलमल की धोरेवाली (थोड़े-थोड़े अंतर से रुपहली ज़री लगायी हुई) सुनहरी ज़री की हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है. पिछवाई में सात स्वरूप श्री महाप्रभुजी श्रीजी को पवित्रा धरा रहे हैं एवं श्री गुसाई जी मोरछल की सेवा कर रहे हैं ऐसा सुन्दर चित्रांकन किया गया है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र – श्रीजी को आज गुलाबी मलमल का रुपहली किनारी से सुसज्जित पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र हरे रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज छोटा (मध्य से दो अंगुल ऊपर) हल्का श्रृंगार धराया जाता है.
पन्ना एवं सोने के आभरण धराये जाते हैं. एक कली की माला धरायी जाती है.
श्रीमस्तक पर पतंगी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, पन्ना वाली चमकनी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्रीकर्ण में पन्ना के चार कर्णफूल धराये जाते हैं.
श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थाग वाली दो मालजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, पन्ना के वेणुजी एवं दो वैत्रजी (एक पन्ना व एक सोने के) धराये जाते हैं.
पट गुलाबी, गोटी छोटी सोने की आती है.
आरसी शृंगार में लाल मख़मल की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.








व्रज - श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)Tuesday, 25 August 2026                    पवित्रा द्वादशी                    मंगल...
24/08/2026

व्रज - श्रावण शुक्ल द्वादशी (द्वितीया)
Tuesday, 25 August 2026

पवित्रा द्वादशी

मंगला दर्शन

(मंगला समय सुबह 5:45 बजे)

उपरना गुलाबी मलमल का

कीर्तन –मंगला दर्शन (राग : खट )

यह नित नेम जसोदा जु मेरो तिहारो हि लाल लड़ावन को

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24/08/2026
व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशीMonday, 24 August 2026पवित्रा पहेरत राजकुमार ।तीन्यो लोक पवित्र कीये है श्रीविट्ठल गि...
23/08/2026

व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशी
Monday, 24 August 2026

पवित्रा पहेरत राजकुमार ।
तीन्यो लोक पवित्र कीये है श्रीविट्ठल गिरिधार ।।१।।
आती ही पवित्र प्रिया बहु विलसत निरख मगन भयों मार ।
परमानंद पवित्रा की माला गोकुल की ब्रजनार ।।२।।

पुत्रदा एकादशी (पवित्रा एकादशी)

आज प्रभु को नियम का सफेद मलमल का केशर की कोर का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल की सुनहरी किनारी की कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धरायी जाती है.
आज से पूनम तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल डली का भोग अरोगाया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को मनमनोहर (केशर-इलायची बूंदी), मेवाबाटी (सूखे मेवे से भरा खस्ता ठोड़) एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता, सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा दोहरा अरोगाये जाते हैं.

आज उत्थापन के समय पवित्रा का अधिवासन होगा, धूप, दीप, शंखोदक किये जाएंगे और कुछ समय उपरांत पंखे का टेरा लेकर श्रीजी को पवित्रा धराये जायेंगे.

पवित्रा धराये उपरांत उत्सव भोग धरे जायेंगे जिसमें विशेष रूप से मिश्री की गोल डलियाँ (सफ़ेद व केसरयुक्त), छुट्टी बूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी (मलाई-पूड़ी), केशर-युक्त बासोंदी, जीरा-युक्त दही, घी में तला बीज-चालनी के सूखे मेवे, विविध प्रकार के संदाना (आचार), विविध प्रकार के फलफूल, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.
आज प्रभु को उत्सव भोग में सभी गृहों से पधारी मिश्री भी अरोगायी जाती है.

भोग समय फीका के स्थान पर घी में तला बीज-चालनी का सूखा मेवा आरोगाया जाता है.

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कल पवित्रा द्वादशी है.
श्रावण शुक्ल एकादशी की मध्यरात्रि को स्वयं ठाकुरजी ने प्रकट होकर श्री महाप्रभु जी को दैवीजीवों को ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा दी.
इस प्रकार श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन श्रीवल्लभ ने सब से प्रथम ब्रह्म-सम्बन्ध वैष्णव दामोदर दासजी हरसानी को दिया.
तब से आज का दिन सभी वैष्णवों में पुष्टिमार्ग की स्थापना दिवस-समर्पण दिवस के रूप में मनाया जाता है.
पुष्टिमार्ग में गुरु का पूजन कल अर्थात श्रावण शुक्ल द्वादशी को किया जाता है.
कल के दिन श्री ठाकुरजी को पवित्रा धराये पश्चात अपने ब्रह्म-सम्बन्ध देने वाले गुरु को पवित्रा, यथाशक्ति भेंट आदि धरें एवं दंडवत करें इसके पश्चात वैष्णवों को परस्पर पवित्रा धर के ‘जय श्री कृष्ण’ कहें. परस्पर प्रसादी मिश्री का प्रसाद लेवें.
श्री महाप्रभुजी को स्वयं श्रीजी ने ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा प्रदान की इस कारण सभी वैष्णवों को श्री वल्लभ कुल के बालकों से ही ब्रह्म सम्बन्ध लेना चाहिए, किसी अन्य साधु-संत आदि से नहीं लिया जाना चाहिए.
श्री वल्लभ कुल के बालक श्री महाप्रभुजी की ओर से ब्रह्म सम्बन्ध देते हैं. पुष्टिमार्ग के गुरु श्री महाप्रभुजी हैं.

राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

हेरि है आज नंदराय के आनंद भयो l
नाचत गोपी करत कुलाहल मंगल चार ठयो ll 1 ll
राती पीरी चोली पहेरे नौतन झुमक सारी l
चोवा चंदन अंग लगावे सेंदुर मांग संवारी ll 2 ll
माखन दूध दह्यो भरिभाजन सकल ग्वाल ले आये l
बाजत बेनु पखावज महुवरि गावति गीत सुहाये ll 3 ll
हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आँगन बाढ़ी कीच l
हसत परस्पर प्रेम मुदित मन लाग लाग भुज बीच ll 4 ll
चहुँ वेद ध्वनि करत महामुनि पंचशब्द ढ़म ढ़ोल l
‘परमानंद’ बढ्यो गोकुलमे आनंद हृदय कलोल ll 5 ll

साज – श्रीजी में आज सफेद डोरिया के वस्त्र पर धोरे (थोड़े-थोड़े अंतर से सुनहरी ज़री के धोरा वाली), सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

चित्र में पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा द्रश्य है.

वस्त्र – श्रीजी को आज सफेद केसर की किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के होते हैं.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द से दो अंगुल ऊंचा) उत्सव का भारी श्रृंगार धराया जाता है.
मिलवा हीरे की प्रधानता के मोती, माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर सफेद कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्रीकर्ण में हीरे के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चित्र में रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में द्रश्य हैं.
नीचे पाँच पदक ऊपर हीरा, पन्ना, माणक, मोती के हार व दुलडा धराया जाता हैं.कली की मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट उत्सव का, गोटी सोने की जाली की आती है.
आरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.












व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशीMonday, 24 August 2026                पवित्रा एकादशी                    मंगला दर्शन  ...
23/08/2026

व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशी
Monday, 24 August 2026

पवित्रा एकादशी

मंगला दर्शन

(मंगला समय सुबह 5:30 बजे)

विशेष – आज पुत्रदा एकादशी है. पुष्टिमार्ग में इसे पवित्रा एकादशी कहा जाता है.

श्रीजी को शुभमुहूर्त से पवित्रा कभी प्रातः श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धराये जाते हैं.

इस वर्ष पवित्रा श्रृंगार के दर्शन में धराये जायेंगे.

360 तार के सूत्र का पवित्रा, सादा रेशमी पवित्रा, फोंदना वाला रेशमी पवित्रा, रुपहली और सुनहरी तार वाला पवित्रा आदि अनेक प्रकार के पवित्रा श्री ठाकुरजी को धराये जाते हैं. पवित्रा धराये उपरान्त प्रभु को यथाशक्ति भेंट अवश्य धरी जाती है और उत्सव भोग अरोगाया जाता है.
प्रभु को पवित्रा धराये पश्चात पिछवाई और पीठिका के ऊपर भी पवित्रा धराये जाते हैं.

विक्रम संवत 2023 में आज के दिन नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री गोविन्दलालजी महाराज ने सात स्वरूपों को पधराकर पवित्रा धराये थे आज उसका भी उत्सव श्रीजी में मनाया जाता है.

सभी वैष्णवों को भी अपने घर के सेव्य ठाकुर जी को पवित्रा धरने चाहिए.

वैष्णव अपने घर में ठाकुरजी सेवा हो वे( श्रीजी को धराने के उपरांत ) अपने सेव्य ठाकुरजी को पवित्रा धरा सकते हैं.

पवित्रा एकादशी से रक्षाबंधन तक पांच दिन श्रृंगार पश्चात् पवित्रा धराये जाते हैं. किसी कारणवश इन पांच दिवस में पवित्रा नहीं धरे जाएँ तो जन्माष्टमी तक पवित्रा धराये जा सकते हैं और यदि जन्माष्टमी तक भी पवित्रा नहीं धराये जा सकें तो देव प्रबोधिनी तक भी धराये जाने का सदाचार है परन्तु सभी वैष्णवों को अपने ठाकुरजी को पवित्रा धरना अवश्य ही चाहिए अन्यथा सारे वर्ष की सेवा सफल नहीं मानी जाती है.

पवित्रा धराये पश्चात् आज से जन्माष्टमी की नौबत (एक प्रकार का वाध्य) की बधाई बैठती है.

इसका कारण यह है कि जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्य जी ने दैवीजीवों के उद्धार हेतु आज के दिन ही डंका बजा कर घोषणा की थी.

श्रीजी का सेवाक्रम - उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

दिनभर झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. चारों समां (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) में आरती थाली में की जाती है.
गेंद, चौगान, दीवला सभी सोने के आते हैं.
मूढ़ढा, पेटी और दीवालगिरी आदि पर कशीदा का साज चढ़ता है.

मंगला के पश्चात ठाकुरजी को चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है.

उपरना श्वेत मलमल का

कीर्तन –मंगला दर्शन (राग : मल्हार )

आज बड़ो दरबार देख्यो नंदराय तेरो, भयो सुख सबै भाँति दुख गयो मेरो

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व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशीMonday, 24 August 2026                  पवित्रा एकादशीआज श्रीजी को पवित्रा धराये जाते...
23/08/2026

व्रज – विस २०८३ श्रावण शुक्ल एकादशी
Monday, 24 August 2026

पवित्रा एकादशी

आज श्रीजी को पवित्रा धराये जाते हैं.

“या कृता वार्षिकी सेवा सा मूल फलदामता |
प्रत्यहं सूत्ररूपेण सैकीभूतानुभावनात् |”

श्रीगोपीनाथ प्रभुचरण के अनुसार उक्त पवित्रा का भाव यह है कि यह पवित्रा वैष्णवों द्वारा की गयी वर्षभर की सेवा का प्रतीक है इस लिए यह 360 तारों का होता है.
इस पवित्रा के 360 सूत के सूत्र एक वर्ष के अन्तर्गत 360 दिनों के प्रतीक है जो मानसी सेवा जैसे मूल फल को देने वाला है.

शास्त्र आज्ञा करते हैं -
“न करोति विधानेन पवित्रारोपणं तु यः |
तस्य सांवत्सरी पूजा निष्फला मुनि सत्तम |”

अर्थात : हे मुनि श्रेष्ठ. जो मनुष्य विधान पूर्वक (श्री प्रभु को) पवित्रा नहीं धराता है तो उसकी वार्षिकी सेवा निष्फल हो जाती है.

पवित्रा बनाने के जो विधान शास्त्र में कहे गए हैं उसमें भी अनेक मत हैं. तीन सौ साठ तारों का पवित्रा उत्तम है, दो सौ सत्तर तारों पवित्रा मध्यम है और एक सौ अस्सी तारों का पवित्रा कनिष्ठ है.

कुछ आचार्य पवित्रा में लगायी जाने वाली गाँठों के विषय में उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ का प्रकार बतातें हैं जिनमें 24, 12 व 8 गाँठें क्रमशः उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ मानी गयी हैं.

हमारे प्रभु तो उत्तम वस्तु के ही भोक्ता हैं अतः उन्हें उत्तम पवित्रा ही धरायें.

पवित्रा का उत्तम होने के साथ शोभायमान होना भी अत्यावश्यक है.
उसकी ग्रंथियाँ सुन्दर लम्बी गोलाई वाली हों जो प्रभु को चुभें नहीं. पवित्रा सुन्दर उत्तम और सुगन्धित केसर से रंगा होना चाहिए.

पवित्रा धरने का फल शास्त्र ने यह बतलाया है -
“पवित्रारोपणं विष्णोः भक्तिरत्नप्रदायकम् |
स्त्रीपुंकीर्तिप्रदं पुण्यं सुख सम्पद्दनावहम् ||”

अर्थात यह पवित्रा समर्पण प्रभु के भक्ति रत्न को देता है, स्त्रियों और पुरुषों को कीर्ति और पुण्य जनक है तथा सुख संपत्ति और धन देता है.
(हमें पवित्रा का फल, लौकिक सुख संपत्ति अथवा धनादि नहीं चाहिए, पुष्टिभक्त को तो केवल प्रभु के भक्ति रत्न से ही संतुष्टि मिलती है अतः प्रभु की प्रेमलक्षणा भक्ति की सिद्धि के लिए ही पवित्रा धरायें न कि कोई अन्य लौकिक फल की आकांक्षा से)

- चिरंजीवी गोस्वामी श्री विशालबावा की वर्ष २०१४ की post से साभार



व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)Sunday, 23 August 2026पवित्रा एकादशी के आगम का श्रृंगारकल ...
22/08/2026

व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)
Sunday, 23 August 2026

पवित्रा एकादशी के आगम का श्रृंगार

कल पवित्रा एकादशी का उत्सव है अतः आज श्रीजी को उत्सव के एक दिन पूर्व धराया जाने वाला आगम का हल्का श्रृंगार धराया जाता है.

सामान्य तौर पर प्रत्येक बड़े उत्सव के एक दिन पूर्व लाल वस्त्र, पीले ठाड़े वस्त्र एवं पाग-चन्द्रिका का श्रृंगार धराया जाता है.
यह श्रृंगार अनुराग के भाव से धराया जाता है. इस श्रृंगार के लाल वस्त्र विविध ऋतुओं के उत्सवों के अनुरूप होते हैं अर्थात ऊष्णकाल में जब गहरे रंग वर्जित हों तब कुछ हल्के और शुभ रंग के गुलाबी वस्त्र धराये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : धनाश्री)

यशोदारानी जायो है सुत नीको l
आनंदभयो सकल गोकुलमे गोपवधू लाई टीको ll 1 ll
अक्षत दूब रोचन बंदन नंदे तिलक दही को l
अंचल बारि बारि मुख निरखत कमल नैन प्यारो जीकौ ll 2 ll
अपने अपने भवन से निकसी पहेरे चीर कसुम्भी को l
'यादवेन्द्र' व्रजकुल प्रति पालक कंस काल भय भीकौ ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की मलमल का सुनहरी किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के होते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना एवं सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर लाल रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
श्रीकर्ण में पन्ना के कर्णफूल के दो जोड़ी धराये जाते हैं.
आज कमल माला धरायी जाती हैं.
श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, हरे मीना के वेणुजी एवं वेत्रजी (एक स्वर्ण का) धराये जाते हैं.
पट लाल, गोटी छोटी सोने की व आरसी श्रृंगार में सोना की आती है.





व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)Sunday, 23 August 2026                    मंगला दर्शन     ...
22/08/2026

व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी व्रत कल द्वादशी को)
Sunday, 23 August 2026

मंगला दर्शन

(मंगला समय सुबह 5:45 बजे)

उपरना लाल मलमल का

कीर्तन –मंगला दर्शन (राग : मल्हार )

आज बड़ो दरबार देख्यो नंदराय तेरो, भयो सुख सबै भाँति दुख गयो मेरो

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व्रज -विस 2083 श्रावण शुक्ल दशमीSaturday, 22 August 2026आज के हिंडोलना के दर्शन पान का हिंडोलासंध्या-आरती में श्री मदनमो...
22/08/2026

व्रज -विस 2083 श्रावण शुक्ल दशमी
Saturday, 22 August 2026

आज के हिंडोलना के दर्शन

पान का हिंडोला

संध्या-आरती में श्री मदनमोहन जी वस्त्र एवं ज़री के हिंडोलने में झूलते हैं. उनके सभी वस्त्र श्रृंगार श्रीजी के जैसे ही होते हैं. आज श्री बालकृष्णलाल जी भी उनकी गोदी में विराजित हो झूलते हैं.

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कीर्तन हिंडोला– (राग-कल्याण)

झुलत श्याम पियासंग रंग हिंडोरना ।
वरण वरण अंबर तन पहेरे व्रजयुवतीजन गावत कल गीतन चित चोरना ।।१।।
तेसीये ऋतु सावन मन भावन हरियारी भूमि मंदमद गरजत घनघोरना ।
अेसेइ पिक चातक वन बोलत अति आनंद भर केकी कीर कुलाहल को ओरना ।।२।।
सहचरी चहूं औरतें झूलवत अति आनंदभर पटतर द्धुति दामिनी घन घोरना ।
पिय बिहारी लाल ललित दंपती आनंदभर प्रेमविवश जानत न निश भोरना ।।३।।






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