अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच

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💐🎂    💐🎂हमारी बड़ी दीदी, #राष्ट्रीय_महिला_अध्यक्षा अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच   #श्रीमती_विजयलक्ष्मी_श्रीवास्तव जी ( क...
04/05/2026

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हमारी बड़ी दीदी, #राष्ट्रीय_महिला_अध्यक्षा अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच #श्रीमती_विजयलक्ष्मी_श्रीवास्तव जी ( कॉमर्शियल टैक्स ऑफिसर-वाणिज्यकर विभाग ) को #जन्मदिवस के शुभावसर पर हमारे व पूरे #अखिल_भारतीय_कायस्थ_जागृति_मंच परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई। 💐💐🎂🎂
श्री चित्रगुप्त भगवान की असीम कृपादृष्टि आप पर सदा बनी रहे।
आपका:-
#सचिन_श्रीवास्तव #सच
#राष्ट्रीय_अध्यक्ष
अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच ( पंजीकृत )
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  अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच  इस प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम उन सभी मीडिया कर्मियों का हार्दिक अभिनंदन करते हैं जो लग...
03/05/2026


अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच इस प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम उन सभी मीडिया कर्मियों का हार्दिक अभिनंदन करते हैं जो लगातार इस वैश्विक महामारी में भी दुनिया भर की घटनाओं एवं समाचारों से हमें अवगत कराते रहते हैं। मीडिया लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ है और पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास रहा है।

अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच
पंजीकरण संख्या:- S/RS/SW-NG/168/2020

 #चित्रगुप्त_जी_की_वास्तविकता1. हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं- उस इच्छा या भावना से ही हमारे पाप-पुण्य क...
30/04/2026

#चित्रगुप्त_जी_की_वास्तविकता

1. हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं- उस इच्छा या भावना से ही हमारे पाप-पुण्य का नाप होता है। जीव जितना ही ईश्वरीय नियमों पर चलता है अथवा उन्हें तोड़ता है, उतनी ही तोल के अनुसार उसे अच्छा या बुरा कर्मफल मिलता है। इसलिए ईश्वर में और उसके न्याय में विश्वास रखना मनुष्य और समाज के लिए परम कल्याणकारी है।

2. गरूड़ पुराण में वर्णित अलंकारिक विवरण 'यमलोक में चित्रगुप्त नामक देवता' प्रत्येक प्राणी के भले-बुरे कर्मों का विवरण प्रत्येक समय लिखते रहते हैं। मृत्यु के बाद प्राणी को इसी के आधार पर शुभ कर्मों के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिए नर्क प्रदान किया जाता है।

3. उक्त वर्णन वास्तविक स्थिति का एक सांकेतिक सारांश मात्र है। जिसे जन - सामान्य सरलता से समझ कर तदनुसार दुष्कर्मों से दूर रहने का प्रयास कर सकें।

4. अब यह सर्वविदित वैज्ञानिक तथ्य है कि जो भी भले-बुरे कार्य ज्ञान वान प्राणियों द्वारा किए जाते हैं- उनका सूक्ष्म चित्रण अन्तःचेतना में होता रहता है। भले-बुरे कर्मों का "ग्रे मैटर" के परमाणुओं पर यह चित्रण पौराणिक चित्रगुप्त की वास्तविकता को सिद्ध कर देता है।

5. गुप्त चित्र, गुप्त मन, अन्तःचेतना, सूक्ष्म मन आदि शब्दों के भावार्थ को ही चित्रगुप्त शब्द प्रकट करता हुआ जान पड़ता है।

6. यह चित्रगुप्त निःसन्देह हर प्राणी के हर कार्य को हर समय विना विश्राम किए अपनी बही में लिखता रहता है। सबका अलग-अलग चित्रगुप्त होता है। जितने प्राणी हैं- उतने ही चित्रगुप्त हैं।

7. स्थूल शरीर के कार्यों की सुव्यवस्थित जानकारी सूक्ष्म चेतना में अंकित होती रहे तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

8. जैसे बगीचे की वायु, गन्दे नाले की वायु आदि स्थान भेद के कारण अनेक नाम वाली होते हुए भी मूलतः विश्व व्यापक वायु तत्व एक ही है- वैसे ही अलग-अलग शरीरों में रहकर भी अलग-अलग काम करने वाला चित्रगुप्त देवता भी एक ही तत्व है।

9. हमारे पाप-पुण्य का निर्णय काम के बाहरी रूप से नहीं वरन् कर्ता की इच्छा और भावना के अनुरूप होता है। हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं- उस इच्छा या भावना से ही हमारे पाप-पुण्य का नाप होता है।

10. यह इच्छा जितनी तीव्र होगी उतना ही पाप-पुण्य भी अधिक एवं बलवान होगा। हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कानून व्यवस्था होती है।

11. अशिक्षित, अज्ञानी, असभ्य व्यक्तियों को कम पाप लगता है। ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ भला-बुरा समझने की योग्यता बढ़ती जाती है, विवेक प्रबल हो जाता है। ज्ञान वान, विचार वान और भावना शील ह्रदय वाले व्यक्ति जब दुष्कर्म करते हैं - तो उनका चित्रगुप्त उस करतूत को 'बहुत भारी पाप' की श्रेणी में दर्ज कर देता है।

्री_चित्रगुप्त

हार्दिक बधाई तनय, आपकी इस उपलब्धि पर हम सभी चित्रांश बंधु गौरवान्वित है ।
16/04/2026

हार्दिक बधाई तनय, आपकी इस उपलब्धि पर हम सभी चित्रांश बंधु गौरवान्वित है ।

💥 ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः 💥🏘घर घर श्री चित्रगुप्त-हर घर श्री चित्रगुप्त🏘      🚩🚩जय जय श्री चित्रगुप्त🚩🚩🕉🕉  #शुभ_श्री_चित...
16/04/2026

💥 ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः 💥
🏘घर घर श्री चित्रगुप्त-हर घर श्री चित्रगुप्त🏘
🚩🚩जय जय श्री चित्रगुप्त🚩🚩
🕉🕉 #शुभ_श्री_चित्रगुप्तवार 🕉🕉

#ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुये भगवान #श्री_चित्रगुप्त जी आदिदेव है। श्री चित्रगुप्त भगवान की पूजा, अर्चना व आरती प्रतिदिन करने से सुख, शांति, वैभव की प्राप्ति होती है।
श्री चित्रगुप्त पूजन दिवस #चित्रगुप्तवार ( व्हस्पतिवार ) को श्री चित्रगुप्त भगवान की पूजा-अर्चना, व्रत आदि सहित सामूहिक पूजन करने से सभी मनोकामना पूरी होती है, घर-परिवार मे सभी दुखों से मुक्ति मिल परम सुख, शन्ति, समृद्धि आती है। बुद्धि, विवेक, पराक्रम के साथ साथ रोजगार एवं व्यवसाय मे वृद्धि के लिये लगातार ग्यारह (11) चित्रगुप्तवार ( व्हस्पतिवार ) अपने घर या कार्यस्थल पर श्री चित्रगुप्त पूजन, विधि विधान पूर्वक करना चाहिये।
्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त_एक_धार्मिक_अभियान_______
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 #कायस्थ_पतन_से_होंगे_मुक्त्त, िलकर_बोलेंगे_जय_श्री_चित्रगुप्त ्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त ्री_चित्रगुप्त #अखिल...
09/04/2026

#कायस्थ_पतन_से_होंगे_मुक्त्त,
िलकर_बोलेंगे_जय_श्री_चित्रगुप्त
्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त
्री_चित्रगुप्त
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27/03/2026

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10/03/2026

#आदिदेव_श्री_चित्रगुप्त_परिचय

बात तब कि है जब आदि शक्ति के आदेशानुसार ब्रह्म विष्णु महेश ने सृष्टि निर्माण का कार्य शुरु किया। सृष्टि निर्माण के पश्चात सभी जीवों की अच्छार्इ बुरार्इ का निर्णय कौन करे ? इस बात का उत्तर तो ब्रह्मा जी जो कि स्वयं भी कर्ता और भोक्ता हैं उनके के पास भी नहीं था। अत: ब्रह्मा जी ने दस हजार वर्ष की दीर्घ तपस्या की। समाधि खुलते ही देखा, एक दिव्य पुरुष सामने उपसिथत है। वे आश्चर्य में भरकर पूछने लगे – आप कौन हैं ? कहा से आये हैं ? इसी तथ्य को वेदों में कहा -

‘चित्रम उदगाद’ विचित्र देव प्रगट हुए, ब्रह्मा जी के मुख से निकल पड़ा ‘चित्रम’, आप महान आश्चर्य हैं, विचित्र हैं आप। मैं नहीं जानता आप ही बताइये आप कौन हैं ? मेरी सोच से आप परे हैं। आप सम्पूर्ण प्रकृति से पार हैं। मेरी इस श्रेष्ठ कृति (प्रकृति) में आपकी गिनती नहीं है। आप प्रकृति से परे हैं। देवानाम आप सभी देवताओं से दिव्य हैं। दिव्यताओं के स्रोत हैं। सौन्दर्य के भी सौन्दर्य हैं। प्रकाशों के भी प्रकाश। सूर्य का प्रकाश आपके सामने निरस्त है, जैसे तारे सूर्य के सामने नहीं चमकते वैसे सूर्य आपके समक्ष निस्तेज है।

न चन्दमा ही आपके सामने चमकता न तारक मण्डल। विद्युत की दीपित आपके सामने तेज रहित है, इस अग्नि की तो कोर्इ गिनती ही नहीं। वस्तुत: आपके प्रकाश से ही ये सब प्रकाशित है। इनमें अपना प्रकाश नहीं है। इन सबके प्रकाशक आप हैं।
श्री चित्रगुप्त बोले – मैं एकदेशीय नहीं हू कि कहीं बैकुण्ठ कैलास, काशी, मथुरा, अयोध्या आदि में रहू, मैं तो इन सबमें सर्व व्यापक हू, सर्वत्र हू - इस धरती के कण-कण में इसके ऊपर सम्पूर्ण अन्तरिक्ष में, जहा सूर्यादि ग्रह घूम रहे हैं, इन ग्रहों से भी परे धौ लोक में, सर्वत्र मैं विराजमान हू। मैं सब के हृदय में निवास करता हू, घट-घट में समाया हू प्रकृति में देश काल दिशा विदिशा में व्याप्त हू और इनसे परे भी हू।

वेद बताते हैं -श्री चित्रगुप्त कथा में कहा है वह कायस्थ है। काया में सिथत है। उसे शरीर से बाहर वास्तविक रुप में कोर्इ नहीं देख सकता। बाहर तो उसका मायिक रुप दिखार्इ देता है। अवतरित रुप दिखता है। जब वह भक्तों के पुकारने पर साकार बनता है। सगुण बनता है तब अपने धारित रुप में दिखता है।उसका माया रहित स्वरुप तो कायस्थ है। हृदयस्थ है, आत्मस्थ है। काया देह और शरीर का वास्तविक अर्थ एक ही नहीं है। शरीर तो वह है जो जीर्ण शीर्ण होता रहता है। देह वह है जिसका दहन किया जाता है। किन्तु काया इनसे दिव्य है।
विधाता बोले – आप कायस्थ हैं। चित्रगुप्त हैं। हमारे पास चौदह इनिद्रयां हैं। पाच कर्मेनिद्रयां और चार अन्त: इनिद्रयां, जिसको अन्त: करण चतुष्टय कहा है। अन्त: करण में मन बु़िद्व चित्त और अहंकार चार विभाग हैं।

चित्त वह अनुभाग है जो हमारे प्रत्येक अनुभव, विचार, कार्य और संवेदनाओं के चित्र खींच लेता है। चित्रगुप्त वे दिव्य देवता हैं जो इन चित्रों का गोपन करते हैं, संरक्षण करते हैं। जो इन चित्रों के स्वामी हैं, चित्रगुप्त हैं। इन चित्रमय खातों को देखकर ही प्राणी के कर्मां को पढ़ते हैं तथा निर्णय करते हैं, दु:ख-सुख प्रदान करते हैं। इस प्रकार इस वेद मंत्र में भगवान चित्रगुप्त के दिव्य स्वरुप का शाबिदक चित्र किया है।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि चित्रगप्त स्वंय पर ब्रह्रा परमेश्वर हैं। ब्रह्मा जी के भी घ्यातव्य हैं, उपास्य हैं, आराध्य हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र नहीं, उनके र्इश्वर हैं, उनमें व्यापक हैं। भगवान चित्रगुप्त पुकारने पर अवतरित होते हैं। कर्म फलों के दाता हैं, अच्छे बुरे कर्मों के निर्णायक हैं। देव, दानव, यक्ष, किन्नर, ब्रह्मा , विष्णु, महेश सभी उनके न्याय क्षेत्र में आते हैं।

रामावतार के समय बाली को छिप कर मारा तो कृष्णावतार में भील का बाण खाकर बदला चुकाना पड़ा। तुलसी के शाप से सालग्राम को पत्थर बनना पड़ा। नारद के शाप से नाभी विरह में भटकना पड़ा। सभी को भगवान चित्रगुप्त की न्याय तुला पर खरा उतरना पड़ता है। आइए, हम सभी कायस्थ अपने कुलदेव भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर अनन्त पुण्य प्राप्त करें।

्री_चित्रगुप्त

्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त_एक_धार्मिक_अभियान
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Non-Governmental Organization (NGO)

समस्त कायस्थ समाज का पूर्ण समर्थन।बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं सहेगा सवर्ण समाज।जय हिंद 👍
28/01/2026

समस्त कायस्थ समाज का पूर्ण समर्थन।
बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं सहेगा सवर्ण समाज।
जय हिंद 👍

🏡🏡  ्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त 🏡🏡🙏🙏 ्री_चित्रगुप्त_भगवान 🙏🙏अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच ( पंजीकृत )  #परिवार_...
14/01/2026

🏡🏡 ्री_चित्रगुप्त_हर_घर_श्री_चित्रगुप्त 🏡🏡
🙏🙏 ्री_चित्रगुप्त_भगवान 🙏🙏
अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच ( पंजीकृत )
#परिवार_की_ओर_से_समस्त_देशवासियों_को ंक्रांति_खिचड़ी_के_पावन_पर्व_पर_हार्दिक_शुभकामनाएं_व_बधाई

ंक्रांति: ैज्ञानिक_दृष्टिकोण।
भारत पर्वों एवं त्योहारों का देश है। यहाँ कोई भी महीना ऐसा नहीं हैं, जिसमें कोई न कोई त्यौहार न पड़ता हो, इसीलिए अपने देश में यह उक्ति प्रसिद्ध है कि 'सदा दीवाली साल भर, सातों बार त्यौहार'। इन्हीं त्यौहारों में मकर संक्रांति भी है, जिसकी अपनी एक अलग ही विशेषता है एवं वैज्ञानिक आधार है।

हम लोगों में से बहुत कम लोग जानते है कि मकर संक्रांति का पर्व क्यों मनाया जाता है और वह भी प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही क्यों? हम जानते हैं कि ग्रहों एवं नक्षत्रों का प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। इन ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति आकाशमंडल में सदैव एक समान नहीं रहती है। हमारी पृथ्वी भी सदैव अपना स्थान बदलती रहती है। यहाँ स्थान परिवर्तन से तात्पर्य पृथ्वी का अपने अक्ष एवं कक्ष-पथ पर भ्रमण से है। पृथ्वी की गोलाकार आकृति एवं अक्ष पर भ्रमण के कारण दिन-रात होते है। पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सम्मुख पड़ता है वहाँ दिन होता है एवं जो भाग सूर्य के सम्मुख नहीं पड़ता है, वहाँ रात होती है। पृथ्वी की यह गति दैनिक गति कहलाती है।

किंतु पृथ्वी की वार्षिक गति भी होती है और यह एक वर्ष में सूर्य की एक बार परिक्रमा करती है। पृथ्वी की इस वार्षिक गति के कारण इसके विभिन्न भागों में विभिन्न समयों पर विभिन्न ऋतुएँ होती है जिसे ऋतु परिवर्तन कहते हैं। पृथ्वी की इस वार्षिक गति के सहारे ही गणना करके वर्ष और मास आदि की गणना की जाती है। इस काल गणना में एक गणना 'अयन' के संबंध में भी की जाती है। इस क्रम में सूर्य की स्थिति भी उत्तरायण एवं दक्षिणायन होती रहती है। जब सूर्य की गति दक्षिण से उत्तर होती है तो उसे उत्तरायण एवं जब उत्तर से दक्षिण होती है तो उसे दक्षिणायण कहा जाता है।

#संक्रमणकाल_और_मकर_संक्रांति:
इस प्रकार पूरा वर्ष उत्तरायण एवं दक्षिणायन दो भागों में बराबर-बराबर बँटा होता है। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है, उसे संक्रमण काल कहा जाता है। चूँकि १४ जनवरी को ही सूर्य प्रतिवर्ष अपनी कक्षा परिवर्तित कर दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है, अत: मकर संक्रांति प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही मनायी जाती है। चूँकि हमारी पृथ्वी का अधिकांश भाग भूमध्य रेखा के उत्तर में यानी उत्तरी गोलार्द्ध में ही आता है, अत: मकर संक्रांति को ही विशेष महत्व दिया गया।

भारतीय ज्योतिष पद्धति में मकर राशि का प्रतीक घड़ियाल को माना गया है जिसका सिर एक हिरण जैसा होता है, किंतु पाश्चात्य ज्योतिषी मकर राशि का प्रतीक बकरे को मानते हैं। हिंदू धर्म में मकर (घड़ियाल) को एक पवित्र माना जाता है।

चूँकि हिंदुओं में अधिकांश देवताओं का पदार्पण उत्तरी गोलार्द्ध में ही हुआ है, इसलिए सूर्य की उत्तरायण स्थिति को ये लोग शुभ मानते हैं। मकर संक्रांति के दिन सूर्य की कक्षा में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर हुआ परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति से दिन में वृद्धि होती है और रात का समय कम हो जाता है। इस प्रकार प्रकाश में वृद्धि होती है और अंधकार में कमी होती है। चूँकि सूर्य ऊर्जा का स्रोत है, अत: इस दिन से दिन में वृद्धि हो जाती है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को पर्व के रूप में मनाने की व्यवस्था हमारे भारतीय मनीषियों द्वारा की गई है।

#प्रगति_का_पर्व:
गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भी सूर्य के उत्तरायण का महत्व स्पष्ट किया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'हे भरतश्रेष्ठ! ऐसे लोग जिन्हें ब्रह्म का बोध हो गया हो, अग्निमय ज्योति देवता के प्रभाव से जब छह माह सूर्य उत्तरायण होता है, दिन के प्रकाश में अपना शरीर त्यागते हैं, पुन: जन्म नहीं लेना पड़ता है। जो योगी रात के अंधेरे में, कृष्ण पक्ष में, धूम्र देवता के प्रभाव से दक्षिणायन में अपने शरीर का त्याग करते हैं, वे चंद्रलोक में जाकर पुन: जन्म लेते हैं। वेदशास्त्रों के अनुसार, प्रकाश में अपना शरीर छोड़नेवाला व्यक्ति पुन: जन्म नहीं लेता, जबकि अंधकार में मृत्यु प्राप्त होनेवाला व्यक्ति पुन: जन्म लेता है। यहाँ प्रकाश एवं अंधकार से तात्पर्य क्रमश: सूर्य की उत्तरायण एवं दक्षिणायन स्थिति से ही है। संभवत: सूर्य के उत्तरायण के इस महत्व के कारण ही भीष्म ने अपना प्राण तब तक नहीं छोड़ा, जब तक मकर संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायण स्थिति नहीं आ गई। सूर्य के उत्तरायण का महत्व छांदोग्य उपनिषद में भी किया गया है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि सूर्य की उत्तरायण स्थिति का बहुत ही अधिक महत्व है। सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़ा होने से मनुष्य की कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है जिससे मानव प्रगति की ओर अग्रसर होता है। प्रकाश में वृद्धि के कारण मनुष्य की शक्ति में भी वृद्धि होती है और सूर्य की यह उत्तरायण स्थिति चूँकि मकर संक्रांति से ही प्रारंभ होती है, यही कारण है कि मकर संक्रांति को पर्व के रूप में मनाने का प्रावधान हमारे भारतीय मनीषियों द्वारा किया गया और इसे प्रगति तथा ओजस्विता का पर्व माना गया जो कि सूर्योत्सव का द्योतक है।
एक बार पुनः आप सभी को अखिल भारतीय कायस्थ जागृति मंच की ओर से मकर संक्रांति ( खिचड़ी ) के पावनपर्व पर सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई।
#सचिन_श्रीवास्तव #सच
#अखिल_भारतीय_कायस्थ_जागृति_मंच
ाजस्थान

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