26/06/2026
🏡🏡 घर घर श्री चित्रगुप्त-हर घर श्री चित्रगुप्त🏡🏡
🙏🙏 जय जय श्री चित्रगुप्त 🙏🙏
हिंदू धर्म की मान्यता है कि कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त जी की संतान हैं तथा देवता कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों वर्णों को धारण करने का अधिकार प्राप्त है।
वेदों के अनुसार कायस्थ का उद्गम ब्रह्मा जी ही हैं। उन्हें ब्रह्मा जी ने अपनी काया की सम्पूर्ण अस्थियों से बनाया था, तभी इनका नाम काया+अस्थि = कायस्थ हुआ।
#यम #संहिता
धर्मराज ने जिन्हें पापियों को दण्ड देने का अधिकार मिला है, श्री ब्रह्राा जी की सेवा में जाकर निवेदन किया है कि ऐसा भारी काम मुझसे नहीं चल सकता। ब्रह्राा जी ने कहा- ‘अच्छा, मैं तुम्हारी सहायता करुगा’ धर्मराज को विदा करके ब्रह्राा जी ध्यान में लग गये। देवताओं के हजार वर्ष तक तप करने पर उन्होंने आख खोली, तो देखा कि पुरुष श्यामवर्ण, कमल नयन, सुराहीदार गर्दन वाला , हाथ में कलम दवात और पाटी लिये आगे खड़े हैं। ब्रह्राा जी ने उनसे कहा कि ‘तुम मेरी काया से उत्पन्न हुए और काया में स्थित थे, इसी से तुम्हारा नाम कायस्थ रखा गया और यह चित्र वाक से हमने गुप्त रखा था, इसलिये पंडित तुम्हें चित्रगुप्त कहेंगे।
फिर चित्रगुप्त कोटिनगर में जाकर देवी की आराधना में लगे और परमेश्वरी का उन्होंने व्रत किया और स्तुति की। उन्होंने प्रसन्न होकर तीन वर दिये कि परोपकार हो और अपने अधिकार पर स्थिर रहो और चिरायु हो।
”एक समय द्विजों में श्रेष्ठ देवशर्मा ने सन्तान के लिए श्री ब्रह्राा जी की आराधना की। ब्रह्राा के प्रसन्न होने पर उनके यहाँ इरावती नाम की कन्या उत्पन्न हुर्इ। देवशर्मा ने उस का चित्रगुप्त जी के साथ विवाह कर दिया, और चित्रगुप्त जी से उससे आठ पुत्र हुए चारु सुचारु चित्र मतिमान हिमवान चित्रचारू अरुण जितेनिद्रय दूसरी मनु की कन्या दक्षिणा, जो चित्रगुप्त के साथ ब्याही गर्इ, उससे यह चार पुत्र हुए। भानु विभानु विश्वभानु और वीर्यवान।
वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से श्रीवास्तव, सक्सेना, निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं। वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं।
हिन्दुओं के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ के अनुसार कायस्थों के पूर्व पुरुष श्री चित्रगुप्त एक शकितशाली क्षत्रिय थे। वह राजा कहलाते हैं। ‘कृष्ण यजुर्वेद’ की ‘मैत्रायनी संहिता’ में उनको एक आश्चर्य जनक शासक के रुप में दर्शाया गया है।
वह ब्रह्राा के पुत्र थे तथा इन्द्र से भी अधिक शकितशाली थे। समय के साथ इन्द्र परिवर्तित होते रहे हैं जबकि चित्रगुप्त स्थायी हैं।
ऋग्वेद के अस्वालयन गृह सूत्र में मंत्र का उल्लेख जिसका उच्चारण बलि देते समय चित्रगुप्त के आवहान हेतु किया जाता है -
‘मैं श्री चित्रगुप्त का आव्हान करता हू जो सरस्वती नदी के उत्तर-पशिचम (यहां अल्तार्इ पर्वत से संकेत है जहा यम की राजधानी थी) में रहने वाले लोगों की वेशभूषा धारण करते हैं, जो देखने में सुन्दर, कागज कलम धारी दो हाथों वाले हैं, जिनकी विरोधी देवी केतु है।’
“प्राचीन काल में क्षत्रिय जाति में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में स्थित है उसका पुत्र चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”
आदि शंकराचार्य के भाष्य में “चित्ररथ” सम्बन्धी श्लोक की व्याख्या संस्कृत भाषा में इस प्रकार की है।
“कपि गोत्र में उत्पन्न महर्षिगण कापेय कहलाते हैं- इन कापेय महर्षि ने दो रात्रियों के विधान का चित्ररथ नामक राजा को यज्ञ कराया जिससे चित्रवंश में उत्पन्न प्रथम पुत्र अत्यन्त शौर्यवान क्षत्रपति राजा हुआ और अन्य उसके अनुचर कहलाये। राजा चित्ररथ द्वारा अनुष्ठान किय जाने के कारण से ही द्विरात्री यज्ञ का कार्य चैत्ररथ अभिप्राय से विख्यात हुआ।”
अर्थवेद 06-106-32-33-35 में भी ‘चित्र’ को जीवनदाता महान देव समान तेजस्वी विजयी मित्र वरुण सूर्य और आत्मा आदि विशषज्ञों से वर्णित किया गया है।
ऋग्वेद मंडल 8 अनुवाक 3 सूत्र 21 के मंत्र में राजा चित्र के दान की प्रशंसा सायणाचार्य के द्वारा निम्न प्रकार की गर्इ है-
“चित्र नामक राजा ने सरस्वती नदी के तट पर इन्द्र के लिये यज्ञ किया उस यज्ञ में अत्यधिक धन और दान मिलने पर मंत्रदृष्टा ऋषि विकल्प करता है कि क्या इतना धन इन्द्र ने दिया या सरस्वती ने अथवा हे राजन! चित्र आपने हमें इतना धन और द्रव्य प्रदान किया है। अन्य मंत्र में ऋषि निशिचत करते हैं कि यह अनन्त धन राशि सहस्त्र की संख्या में राजाओं के राजा ‘चित्र ने हमें प्रदान किया है क्योंकि सरस्वती तट पर सिथत अन्य जो छोटे छोटे राजा है उन सभी को भी तो राजा चित्र ने ही धन धान्य से परिपूर्ण किया। उसकी तुलना मंत्र में इस प्रकार की गर्इ है कि जिस प्रका मेघ की वर्षा से पृथ्वी सिंचित होकर सभी प्राणियों के लिए जीवनदायी होती है, उसी प्रकार राजा चित्र का धन भी सभी प्राणियों के लिए जीवन दायक होता है।”
पù पुराण, सुषिट खण्ड:
”सृषिट के आदि में भले-बुरे कामों का निर्णय करने के लिए ब्रह्राा ने क्षण भर घ्यान किया। उनकी सर्व काया में से एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ। उनका नाम चित्रगुप्त हुआ। वह धर्मराज के पास भले बुरे कामों के लिखने पर नियुक्त हुआ और बड़ा ज्ञानी, देवताओं का अग्रगण्य और यज्ञ में भोजन पाने वाला हुआ। इस कारण द्विज उसे भोजन की आहुति देते हैं। ब्रह्राा की काया से उसकी उत्पत्ति हुर्इ उससे जाति कायस्थ कहलार्इ उसकी सन्तान में अनेक गोत्र के कायस्थ पृथ्वी पर हैं।
#भविष्य_पुराण:
श्री ब्रह्राा जी बोले की ”तुम हमारी काया से उत्पन्न हुए इसलिए तुम्हारा नाम ‘कायस्थ हुआ। पृथ्वी पर चित्रगुप्त के नाम से प्रसिद्ध हो। भले बुरे की पहचान के लिए, हे पुत्र, तुम हमारी आज्ञा से सदा धर्मराज के पुर में सिथत रहो। क्षत्रिय वर्ण के लिए जो उचित है, उसे पालन करते हुए पृथ्वी पर सन्तान उत्पन्न करो।
#गरुण_पुराण
श्री कृष्ण जी बोले कि ”हे गरुड़, सुनो, मैं कहता हूं। धर्मराज का नगर अति सुन्दर है। वहां नारद आदि जा सकते हैं और वह बड़े पुण्य से मिलता है। यमकोण और नैऋत्य कोण के बीच में जो वैवस्वत का नगर है, उसी में चित्रगुप्त का एक सुन्दर घर बना हुआ है, और पचीस योजन उसका विस्तार है। वह घर बहुत ही सुन्दर है। उसकी दीवारें लोहे की हैं और उनमें सौ द्वार हैं ध्वज पताका लगी हुर्इ है। और वहां कायस्थ पाप-पुण्य देखते है।
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