बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों तक हिन्दुओं का अलग से कोई राजनीतिक दल नहीं था। ब्रिटिश सरकार तथा तत्कालीन मुस्लिम नेता भी कांग्रेस को "हिन्दुओं का संगठन" कहते थे। एक-दो अपवाद को छोड़कर प्राय: सभी क्रांतिकारी भी हिन्दू थे। धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में हिन्दुओं की अनेक संस्थाएँ भी कार्य कर रही थीं।
हिन्दू महासभा के उद्देश्य[1] निम्नलिखित थे-
अखंड हिन्दुस्तान की स्थापना।
भारत की संस्कृति तथा प
रंपरा के आधार पर भारत में विशुद्ध हिन्दू लोक राज का निर्माण।
विभिन्न जातियों तथा उपजातियो को एक अविछिन्न समाज में संगठित करना।
एक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण, जिसमे राष्ट्र के सब घटकों के सामान कर्तव्य तथा अधिकार होंगे।
राष्ट्र के घटकों का मनुष्य के गुणों के आधार पर विश्वास दिला कर विचार-प्रचार और पूजा को पूर्ण राष्ट्र धर्मं के अनुकूल स्वतंत्रता का प्रबंध।
सादा जीवन और उच्च विचार तथा भारतीय नारीत्व के उदात्त प्राचीन आदर्शों की उन्नति करना। स्त्रियों और बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना।
हिन्दुस्तान को सैनिक, राजनितिक, भौतिक तथा आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाना।
सभी प्रकार की सामाजिक असमानता को दूर करना।
धन के वितरण में प्रचलित अस्वाभाविक असमानता को दूर करना।
देश का जल्द से जल्द औद्योगीकरण करना।
भारत के जिन लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़ दिया है, उनका तथा अन्य लोगों का हिन्दू समाज में स्वागत करना।
गाय की रक्षा करना तथा गौ-वध को पूर्णत: बंद करना।
हिन्दी को राष्ट्र की भाषा तथा देवनागरी को राष्ट्र लिपि बनाना।
अन्तराष्ट्रीय शांति तथा उन्नति के लिए हिन्दुस्तान के हितों को प्राथमिकता देकर अन्य देशों से मैत्री सम्बन्ध बढ़ाना।
भारत को सामाजिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से विश्व शांति के रूप में प्रतिस्थापित करना।