27/08/2026
₹22,000 करोड़ का लोन... और वसूली सिर्फ ₹6.5 करोड़?! 🤯
कॉर्पोरेट जगत का एक ऐसा खेल, जिसने पूरे बैंकिंग सिस्टम और आम जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है! आइए समझते हैं एस्सेल/जी (Zee) ग्रुप और सुभाष चंद्रा के इस "पर्सनल गारंटी सेटलमेंट" का पूरा गणित:
📌 1. 99.97% का भारी-भरकम 'हेयरकट'
बैंकों का कुल दावा ₹22,006 करोड़ से अधिक का था, लेकिन NCLT ने सुभाष चंद्रा के सिर्फ ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी। यानी लेंडर्स को लगभग 100% का नुकसान!
📌 2. ₹40,000 करोड़ से सीधे ₹31 करोड़ पर? (एसेट सिफोनिंग या बिजनेस लॉस?)
2017-18 में जिस प्रमोटर की व्यक्तिगत संपत्ति ₹40,000 करोड़ दिखाई गई थी, दिवालिया प्रक्रिया के दौरान उनके नाम पर सिर्फ ₹31-39 करोड़ की संपत्ति निकली।
👉 बड़ा सवाल: क्या यह सिर्फ शेयर टूटने का नतीजा है, या कागजों के पीछे Asset Siphoning (संपत्तियों को ठिकाने लगाना) और ट्रिपलिंग-ट्रस्ट स्ट्रक्चर का सोची-समझी रणनीति के तहत इस्तेमाल?
📌 3. लूपहोल का स्मार्ट इस्तेमाल
कानून कहता है कि "पर्सनल गारंटी" केवल उस संपत्ति पर लागू होगी जो सीधे व्यक्ति के नाम पर है। प्रमोटर्स अपनी बड़ी संपत्तियां पारिवारिक ट्रस्टों, शेल कंपनियों और होल्डिंग फर्मों में ट्रांसफर कर लेते हैं। नतीजा? दिवालिया होते ही कानूनी तौर पर उनके हाथ खाली दिखते हैं।
📌 4. मूल कंपनियों की क्या स्थिति है?
दावा किया जा रहा है कि मूल कंपनियों ने एसेट्स बेचकर ₹43,000 करोड़ चुकाए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि Zee Entertainment और Dish TV जैसी बड़ी कंपनियों में प्रमोटर की हिस्सेदारी अब घटकर 4% से भी कम रह गई है।
📌 5. बैंक और आम जनता का क्या?
जहाँ एक आम आदमी का छोटा सा होम लोन या पर्सनल लोन डिफॉल्ट होने पर बैंक घर की कड़की कर देते हैं, वहीं इतने बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्ट पर 80% लेंडर्स का ₹6.5 करोड़ में मान जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
LIC हाउसिंग, HDFC और एक्सिस बैंक जैसे कई लेंडर्स अब इस फैसले को NCLAT और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में हैं। SEBI की जांच भी जारी है।
क्या आपको लगता है कि यह सिर्फ एक बिजनेस फेलियर है, या फिर भारतीय बैंकिंग इतिहास का एक बड़ा लीगल लूपहोल?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं! 👇 ~PC MONSS Awakening India 🇮🇳