15/09/2026
हनुमान जी को पंच मुख
रूप क्यों धारण करना पड़ा !
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हनुमान जी को जीवन में
एकबार असाधारण एसा रूप धारण करना पडा, की सारे के सारे देवता अचंभित हो गये.
ये उस समय की बात है, जब राम रावण युद्ध चालू था।
जब रावण को युद्ध में पराजित होने के लक्षण दिखने लगे तो, उसने अपना खास दांव लगाने की सोंच कर पाताल लोग के राजा, जो दशानन को बहोत मानते थे, उनके अच्छे मित्र भी थे। अहिरावण को बुलवा लिया। अहिरावण वो राजा था, जिसके पास मायावी, तांत्रिक शक्तियां थी, जिससे उस समय सभी भगवान उनसे डरते थे। रावण ने अहिरावण को युद्ध में भेजा, तो अहिरावण जान गए कि राम लक्ष्मण को इस युद्ध में सीधे हराना मुश्किल हो सकता है, तभी अहिरावण ने अपनी मायावी शक्ति से एक रात, राम लक्ष्मण सहित सभी सैनिकों को मुर्शित याने बेहोश कर दिया। और मायावी जाल में फांस कर श्री राम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया।
सबेरे उठते ही राम जी के पूरे शिबीर में, हड़कंप मच गया कि प्रभु राम और लक्ष्मण अपने तम्बू में नहीं है। सब जगह हा हा कार मच गया,
सारे के सारे चिंतित हो गए।
तभी रावण के छोटे भाई विभीषण जो रावण को छोड़ कर, श्री राम जी के
शिबीर में शामिल हुवे थे ने बताया कि, अहिरावण पाताल के राजा, श्री राम और लक्ष्मण को पाताल में लेकर गए होंगे।जहां जाना भी असंभव होता है। तभी ये बात सुनकर हनुमान जी बोले कि मै पाताल में जाता हूं। और फौरन पाताल लोक की तरफ बढ़ गए। पाताल लोक की तरफ बढ़ते बढ़ते उन्हें कई मायावी योद्धाओं से युद्ध करके आगे बढ़ना पड़ रहा था। पाताल लोक के मुख्य द्वार पर उनका सामना, पाताल लोक के महान योद्धा सेनापति मकरध्वज से हुआ। मकरध्वज ने कहा कि तुम जहां से आए हो चले जाओ, वरना तुम मुझ से याने मै हनुमान पुत्र मकरध्वज से मारे जाओगे। ये सुनकर खुद हनुमानजी अचंभे में पड़ गए कि ये मकरध्वज मेरा पुत्र कैसे हुआ ? हनुमानजी ने मकरध्वज से ही पूछा कि तुम हनुमान के पुत्र कैसे हो ? तुम्हारी माताजी कौन है ?
तभी मकरध्वज ने बताया कि मैं "सागरिका" मछलीरानी का पुत्र हूं। श्री लंका दहन के बाद जब हनुमान ने समुद्र में जलती पूंछ को बुझाने के लिए छलांग लगाई थी, तब उनके बदन का पसीना मेरी माताजी सागरिका के मुख से पेट में चला गया, और मेरा जनम हुआ। मै अहिरावण का सेनापति हूं, अहिरावण की रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य है, तुम अंदर नहीं जा सकते।
जहां से आए हो चले जाओ।
मकरध्वज को पता ही नहीं चला कि सामने जो खड़े है वोह उनके ही पिताजी है, जो महान शक्तिशाली है हनुमान जी है।।
हनुमानजी ने मकरध्वज को धक्का देकर अंदर महल में जाना चाहा, पर मकरध्वज ने उन्हें रोकर अपना पाताल लोक का कर्तव्य निभाने की वजह से हनुमान से वही पर युद्ध शुरू किया। युद्ध काफी देर दोनों में चलता रहा, हनुमान जी भी सोंच में पड़ गए कि, ये मेरा बेटा कितना बड़ा महान योद्धा है कि इसको परास्त करने में मुझे इतना समय लग रहा है। आखिरकार हनुमानजी ने मकरध्वज के सर पर गदा मारकर बेहोश कर दिया, और वें अंदर महल में घुस गए।
महल के अंदर देखते ही उनके होश उड़ गए, की श्री राम और लक्ष्मण को मोटी लोहे की सांखली से बांधकर बलि देने की तैयारी चल रही है। हनुमान जी ने अंतर्ध्यान से ये भी देखा कि पाताल लोक के राजा अहिरावण के सिंहासन के आजु बाजू 5 कोने में 5 दिए हर हमेशा 24 सो घंटे जलते रहते है, और राजा अहिरावण का "प्राण" इन्हीं दियो के जलते रहने में जीवित रहता है।
हनुमानजी ने अपने अंतर्ध्यान से ये देखा कि, ये पांचो दिये एक साथ बुझा देने पर ही आहिरवन की मृत्यू होगी, अगर एक एक कर के दिये बुझाने पर,अहिरावणं अपने मायावी तंत्र से सामने वाले को भस्म कर देता है। ये पांचों दिए एक साथ ही बुझाने पड़ेंगे।
यही सोचकर हनुमानजी ने फौरन अपने इंद्रियों को जागृत कर अपनी पांचो शक्तियों को क्रियान्वित किया, जिसमे वें खुद,के साथ, गरुड़, नरसिंह, वराह, तथा हयग्रीव को उर्जित कर पंच हनुमान हो गए। तथा पांचों ने एकसाथ वें पांचों दिए बुझा दिए, और इस तरह महान तंत्र मंत्रों का शक्तिशाली मायावी राजा अहिरावण की सारी मायावी शक्तियां खतम हो कर उसकी मृत्यु हो गई, जिनसे सारे भगवान उनके सामने आने को डरते थे।
बादमें हनुमानजी श्रीराम और लक्ष्मण को लोखंड के सांखली से मुक्त कर साथ में लेकर चले गए।
मायावी अहिरावण से पाताल लोक से श्रीराम और लक्ष्मण को छुड़ाने की बात सुनकर लंकाधि पति रावण पूरा घबरा गया कि अहिरावण को कोई मार नहीं सकता था, क्यों कि उसकी जान उन 5 जलते दियो में थी, जो पाताललोक के महल में पांच दिशाओं में जलते थे, जिन्हें पाताल लोक में जाकर कोई भी बुझा नहीं सकता था।
उस समय श्रीराम लक्ष्मण को बचाने के लिए हनुमानजी को अपना खुद का "पंच मुखी" रूप धारण करना पड़ा।
गुरुजी वासुदेवाय,
साईबाबा - आश्रम,
मलाड - वेस्ट, मुम्बई..