Kanha ki deewani

Kanha ki deewani Banke Bihari lal ki jai

जिन नैनन मे  बिहारी जी बसै दूजो कौन समायै.. धागा हो तो तोङ दूं प्रीत न तोडी जायै.!!🙏🌹 जय बिहारी जी की🙏🌹
23/04/2022

जिन नैनन मे बिहारी जी बसै दूजो कौन समायै.. धागा हो तो तोङ दूं प्रीत न तोडी जायै.!!🙏🌹 जय बिहारी जी की🙏🌹

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺गहरे अहसास जो दिल को छू जाएँ ..कुछ सच्ची और अनमोल बातें .……..🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺द्वापरयुगीन प्राचीन दिव्य मंदिर " श्री पूंछ...
22/04/2022

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गहरे अहसास जो दिल को छू जाएँ ..कुछ सच्ची और अनमोल बातें .……..
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द्वापरयुगीन प्राचीन दिव्य मंदिर
" श्री पूंछरी का लौठा "
गिरिराज परिक्रमा , श्रीधाम गोवर्धन के आज के दिव्य दर्शन ।
श्रीकृष्ण के श्रीलौठा जी नाम के एक मित्र थे । प्रभु श्रीकृष्ण ने द्वारिका जाते समय श्रीलौठा जी को अपने साथ चलने का अनुरोध किया । इसपर लौठाजी बोले- हे प्रिय मित्र ! मुझे ब्रज त्यागने की कोई इच्छा नहीं हैं । परन्तु तुम्हारे ब्रज त्यागने का मुझे अत्यन्त दु:ख हैं। अत: तुम्हारे पुन: ब्रजागमन होने तक मैं अन्न-जल छोड़कर प्राणों का त्याग यही कर दूंगा । जब तू यहाँ लौट आवेगा, तब मेरा नाम लौठा सार्थक होगा ।
श्रीकृष्ण ने कहा- सखा ! ठीक है मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि बिना अन्न-जल के तुम स्वस्थ और जीवित रहोगे। तभी से श्रीलौठाजी पूंछरी गांव में बिना खाये-पिये तपस्या कर रहे हैं ।
धनि-धनि पूंछरी के लौठा ,,
अन्न खाय न पानी पीवै ऐसेई पड़ौ सिलौठा ||
उन्हें विश्वास है कि श्रीकृष्णजी अवश्य यहाँ लौट कर आवेंगे । क्योंकि श्रीकृष्णजी स्वयं वचन दे गये हैं । इसलिये इस स्थान पर श्रीलौठाजी का मन्दिर प्रतिष्ठित है । श्री गोवर्धन का आकार एक मोर के सदृश है। श्रीराधाकुंड उनके जिहवा एवं कृष्ण कुण्ड चिवुक हैं । ललिता कुण्ड ललाट है । पूंछरी नाचते हुए मोर के पंखों-पूंछ के स्थान पर हैं । इसलिये इस गांव का नाम पूछँरी प्रसिद्ध हैं ।
इसका दूसरा कारण यह है, कि श्रीगिरिराजजी की आकृति गौरुप है । आकृति में भी श्रीराधाकुण्ड उनके जिहवा एवं ललिताकुण्ड ललाट हैं एवं पूंछ पूंछरी में हैं । इस कारण से भी इस गांव का नाम पूँछरी कहते हैं । इस स्थान पर श्रीगिरिराजजी के चरण विराजित हैं । पूंछरी के लौठा की ऐसी भी एक पौराणिक मान्यता है कि जब सभी गोप गोपियाँ गोवर्धन की परिक्रमा नाचते गाते कर रहे थे , तभी एक मोटे तगडे गोप वही गिर गए , तभी पीछे से एक सखी ने कहा ... अरे सखी पूछ री कौ लौठा , अर्थात “कौन लुढक गया” इसलिए भी इसे पूंछरी का लौठा कहते है।
बृज की पौराणिक मान्यता है कि पूंछरी के लौठा के दर्शन किए बिना श्री गिरिराज जी की परिक्रमा का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होता । अतः श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते समय श्री पूंछरी के लौठा के दर्शन भी अवश्य ही करने चाहिए
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🌹 राधे राधे 🌹*पिता का आशीर्वाद!*एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत...
17/04/2022

🌹 राधे राधे 🌹
*पिता का आशीर्वाद!*

एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि..
बेटा मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।
तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।
बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।
अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।
धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।
क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था।
और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।
एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?
धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।
इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद!
धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।
ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता।
एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।
तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।
मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।
तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।
जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं।
भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।
परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।
नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।
जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को।
उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।
उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?
उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।
सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं।
सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने ल

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है।
उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।
सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई।
अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।
धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।
सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।
मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।
इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।
धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!
सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।
जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?
धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं।
मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।
सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?
धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें।
उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।
ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..
धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।
अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।

पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।

बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।
🌹 जय बिहारी जी की 🌹
अपने बुजुर्गों का एबम अपने गुरुजनो का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है..!!
*🙏🏻🙏🙏🏾जय जय श्री राधे*🙏🏼🙏🏿🙏🏽

❤️ जय बिहारी जी की!!! ❤️💠 कान्हा तेरी चौखट से हर वरदान कोबंटते देखा है••बड़े बड़े तूफानों को भी , राह बदलतेदेखा है••💠 जो...
15/04/2022

❤️ जय बिहारी जी की!!! ❤️

💠 कान्हा तेरी चौखट से हर वरदान को
बंटते देखा है••
बड़े बड़े तूफानों को भी , राह बदलते
देखा है••

💠 जो अकड़ अकड़ कर चलते है , उन्हे
नाक रगड़ते देखा है••
कान्हा के दिए हुए टुकड़ों पर संसार को
चलते देखा है••

💠 होकर के जग से त्रस्त कोई , दरबार
में इनके आता है••
ऐसे दुखियारो का , दुर्भाग्य पलटते
देखा है••

❤️श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास!!! ❤️

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺गहरे अहसास जो दिल को छू जाएँ ..कुछ सच्ची और अनमोल बातें ...🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺काया शुद्ध होत जब ब्रज रज उड़ि अंग लगे।माया शु...
10/04/2022

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गहरे अहसास जो दिल को छू जाएँ ..कुछ सच्ची और अनमोल बातें ...
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काया शुद्ध होत जब ब्रज रज उड़ि अंग लगे।
माया शुद्ध होत कृष्ण सेवा पे लुटाये ते।।
शुद्ध होत कान कथा कीर्तन के श्रवण किये।
नैंन शुद्ध होत दर्श युगल छवि पाये ते।।
हाथ शुद्ध होत श्री ठाकुर की सेवा किये।
पावं शुद्ध होत श्री वृन्दावन जाये ते।।
मस्तक शुद्ध होत श्री बिहारीजी के चरण परे।
रसना शुद्ध होत श्यामा-श्याम गुण गाये ते।।
-जय श्री राधेश्याम 🌹🌹
★★★। । प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर । ।
★एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया।
दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है।
मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं। घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे।
गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में ये चिट्ठी मेरे एक भक्त को देते जाना।
वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 2 साल के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना।
उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 2 साल तक अन्दर गुरु के बताएं अनुसार नियमपूर्वक साधना करता रहा..
परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ होगा, बच्चों का क्या हुआ होगा ?
उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे। तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया।
खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला।
उसने ईमानदारी से वह मटका खेत के मालिक को दे दिया।
उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदाद भी दे दी।
अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी।
जब वह शिष्य 2 साल बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया।
मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा..
करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं।
वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया।
गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है।
मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा..
मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है।
वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है..
प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर
तुलसी चिंता क्या करे भज ले तू रघुबीर
मनुष्य जब माता के गर्भ में आता है, उसी समय से ही उसका प्रारब्ध निर्धारित हो जाता है। प्रारब्ध कर्म इस जन्म के भोगों का निर्धारण करते हैं। उसका शरीर बाद में बनता है . इसलिए सब चिंता छोड़कर श्री राम जी का स्मरण करना चाहिए !
शिष्य को अपनी गलती का अहसास हुआ और सद्गुरु के आश्रम में रहते हुए गुरु के बताए साधना मार्ग अनुसार अपने जीवन परम कल्याण परमार्थ प्राप्ति में लगा दिय़ा..
!!!सीताराम सीताराम सीताराम !!!

*⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️*               *!! ज्ञान का घमण्ड !!* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~                   बात उस सम...
09/04/2022

*⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️*

*!! ज्ञान का घमण्ड !!*
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बात उस समय की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने लोकप्रिय शिकागो धर्म सम्मेलन के भाषण के बाद भारत वापस आ गये थे। अब उनकी चर्चा विश्व के हर देश में हो रही थी। सब लोग उन्हें जानने लगे थे।

स्वामी जी भारत वापस आकर अपने स्वभाव अनुरूप भ्रमण कर रहे थे। इस समय वे हिमालय और इसके आसपास के क्षेत्रों में थे। एक दिन वो घूमते-घूमते एक नदी के किनारे आ गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक नाव है पर वह किनारा छोड़ चुकी है। तब वे नाव के वापस आने के इंतजार में वहीं किनारे पर बैठ गए।

एक साधु वहाँ से गुजर रहा था। साधु ने स्वामी जी को वहाँ अकेला बैठा देखा तो वह स्वामी जी के पास गया और उनसे पूछा, तुम यहाँ क्यों बैठे हुए हो?

स्वामी जी ने उत्तर दिया, मैं यहां नाव की प्रतीक्षा कर रहा हूंँ।

साधु ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है?

स्वामी जी ने कहा, मैं विवेकानंद हूंँ।

साधु ने स्वामी जी का उपहास उड़ाते हुए उनसे कहा, अच्छा! तो तुम वो सुप्रसिद्ध विवेकानंद हो जिसको लगता है कि विदेश में जाकर भाषण दे देने से तुम बहुत बड़े महात्मा साधु बन सकते हो।

स्वामी जी ने साधु को कोई उत्तर नहीं दिया।

फिर साधु ने बहुत ही घमण्ड के साथ, नदी के पानी के ऊपर चल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।

कुछ दूर तक चलने के बाद साधु ने स्वामी जी से कहा, क्या तुम मेरी तरह पानी पर पैदल चल कर इस नदी को पार कर सकते हो?

स्वामी जी ने बहुत ही आदर और विनम्रता के साथ साधु से कहा, इस बात में कोई शंका नहीं कि आपके पास बहुत ही अद्भुत शक्ति है। लेकिन क्या आप मुझे यह बता सकते हो, कि आपको यह असाधारण शक्ति प्राप्त करने में कितना समय लगा। बहुत ही अभिमान के साथ साधु ने उत्तर दिया, यह बहुत ही कठिन कार्य था। मैंने बीस वर्षों की कठिन तपस्या और साधना के बाद यह महान शक्ति प्राप्त की है।

साधु का यह बताने का अंदाज बहुत ही अहंकार भरा था।

यह देख कर स्वामी जी बहुत ही शान्त स्वर में बोले, आपने अपने जीवन के बीस वर्ष ऐसी विद्या को सीखने में नष्ट कर दिए, जो काम एक नाव पांच मिनिट में कर सकती है। आप ये बीस वर्ष निर्धन, अभावग्रस्त, गरीबों की सेवा में लगा सकते थे। या अपने ज्ञान और शक्ति का प्रयोग देश और देशवासियों की प्रगति में लगा सकते थे। लेकिन आपने अपने बीस वर्ष केवल पांच मिनट बचाने के लिए व्यर्थ कर दिए, ये कोई बुद्धिमानी नहीं है।

साधु सिर झुकाए खड़े रह गये और स्वामी जी नाव में बैठ कर नदी के दूसरी किनारे चले गए।
🌹 जय बिहारी जी की 🌹
*शिक्षा:-*
ज्ञान और शक्ति का सही प्रयोग आवश्यक है। लेकिन किसी शक्ति को प्राप्त कर के यदि हम उस पर घमण्ड करते है तो यह मूर्खता है। शक्ति का सही स्थान पर सही उपयोग करना ही वास्तविकता में बुद्धिमानी है।

09/04/2022
चार लड्डू ...............*पुरानी बात है। वृन्दावन में बांके बिहारी जी के मंदिर में रोज गोसाईं जी बड़े भाव से सेवा करते थ...
07/04/2022

चार लड्डू ...............
*
पुरानी बात है। वृन्दावन में बांके बिहारी जी के मंदिर में रोज गोसाईं जी बड़े भाव से सेवा करते थे। वे रोज बिहारी जी की आरती करते, भोग लगाते और उन्हे शयन कराते। फिर अंत में रोज चार लड्डू भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे।
उनका ये भाव था कि यदि रात मे बिहारी जी को भूख लगेगी तो वे उठकर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट (किवाड़) खोलते थे तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था! इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे। और आज भी इसी भाव से बिहारी जी की सेवा की जाती है।
एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद वे चार लड्डू रखना भूल गये, उन्होने पट बंद किया और अपने घर चले गये।
रात में करीबलगभग एक-दो बजे, जिस दुकान से वे बुंदी के लड्डू आते थे उन बाबा की दुकान खुली थी। वे घर जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक आया जिसकी मोटी-मोटी कजरारी आँखे हैं और घुँघरारे बाल है, सुंदर श्याम वर्ण है। वो बालक कहता है- बाबा ओ बाबा! तू मोको बुंदी के लड्डू दे।
बाबा ने कहा – लाला! लड्डू तो सारे खत्म हो गये अब तो मे दुकान बंद करने जा रहा हूँ। तू कल आ जाना, जितने कहेगा उतने लड्डू तेरे को दूंगा।
बालक बोला- बाबा एक बार आप अंदर जाकर देखो ना, आपके पास चार लड्डू रखे है।
उसकी हठ करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हे वे चार लड्डू मिल गये क्योकि वे आज मंदिर नहीहीं गये थे और बिहारी जी के लिए ही वो लड्डू बना कर रखे थे। बाबा ने उसे लड्डू दिए और कहा- बालक! पैसे दो।
बालक ने कहा- मेरे पास पैसे तो है नही है। आप ये मेरा सोने का कंगन रख लो सुबह मेरे बाबा आपसे कंगन ले लेंगे और पैसे दे देंगे।
बाबा ने कहा- लाला पैसे नही है तो कोई बात नहीं मैं कल तुम्हारे बाबा से पैसे ले लूंगा।
पर वह बालक नही माना उसने लड्डू लिए और कंगन दुकान मे फ़ेककर भाग गया।
सुबह जब पुजारी जी ने पट खोलातो उन्होने देखा की बिहारी जी के हाथ मे कंगन नही है। सोचते है की ऐसा लगता है बिहारी जी के कंगन चोरी हो गए हैं। फिर देखते हैं की यहाँ बूंदी के लड्डू कैसे कैसे बिखरे पड़े हैं। मैं तो लड्डू रखना ही भूल गया था। थोडी देर बाद ये बात सारे मंदिर मे फैल गई की बिहारी जी के कंगन चोरी हो गए।
सारे वृन्दावन में हल्ला हो गया बांके बिहारी के कंगन चोरी कर लिए गए हैं।
जब उस दुकान वाले को इस बात का पता चला तो तुरंत उन गोसाईं जी के पास आया और कहा की- भैया! क्या ये ही कंगन है ?
गोसाईं जी ने तुरंत पहचान लिया हाँ, हाँ भैया यही कंगन है तुम्हारे पास कैसे आये?
दुकानदार बोला की कल रात आप बिहारी जी के शयन (सोने) के समय बूंदी के लड्डू रखना भूल गए थे ना?
गोसाईं जी ने कहा- हाँ भाई! मैं भूल गया था। पर बात क्या है आप बताइये ना?
दुकानदार ने कहा की एक छोटा सा बालक मेरी दुकान पर रात में आया और बूंदी के लड्डू लिए और कंगन फेंककर चला गया।
जैसे ही गोसाईं जी ने ये बात सुनी तो उनकी आँखों से आंसू आने लगे। बोले बिहारी जी खुद आपके पास लड्डू लेने के लिए आये। आप धन्य हैं।
और खुद के मन में आया हाय! हाय! मैं कैसे लड्डू रखने भूल गया। मैंने इतना स्वार्थी कैसे हो गया।
फिर दुकानदार से कहते हैं भैया! जो बालक आपकी दुकान पर लड्डू लेने आया था वो और कोई नही अपना संवरा सलोना बांके बिहारी कृष्ण जी ही हैं।
इस तरह से भगवान आज भी वृन्दावन में रोज लीला करते हैं। और भगवान कहते हैं यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो मैं उसे खुद पूरा कर लेते है।🙏🙏🙏🙏🙏🌹 जय बिहारी जी की 🙏 🌹

Jai Shree Radhey 🙏🏻🙏🏻
06/04/2022

Jai Shree Radhey 🙏🏻🙏🏻

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