25/01/2026
"शास्त्र सम्मत धर्म,समाज और मान्य आचार्यपीठों के प्रति षडयंत्र"
इस कलिकाल में वेदविरोधी सत्ता,व्यवस्था,विधान,प्रावधान,विचार सहित विचारकों का समूलनाश करने वाली दैदीप्यमान सतत संघर्षशील परम्परा का नाम ही शांकर परम्परा है।भगवान आदिशंकराचार्य ५०७ ईसा पूर्व केरल के कालटी ग्राम में वेदनिष्ठ नंबूदरी ब्राह्मणश्रेष्ठ शिवगुरु के यहाँ माता आर्यांबा के द्वारा प्रकट हुए थे।भगवान आदि शंकराचार्य के काल में सत्ता और समाज में नास्तिकता,भौतिकवाद और पाखण्ड के कारण अराजकता छाई हुई थी।भगवान आदि शंकराचार्य ने नास्तिकता,भौतिकवाद और पाखण्ड का पूर्णतः खंडन करके मान्य सनातन संप्रदायों का शोधन करके सत्य सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म के यथारूप को पुनर्स्थापित किया।संपूर्ण भारत को वैदिक सूत्र में बांधकर आध्यात्मिक और राजनैतिक दृष्टि से भी एक किया। युधिष्ठिर के वंशज महाराज सुधन्वा को भारत का सम्राट घोषित किया।सत्य सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म के सैद्धांतिक रक्षण तथा मठ मंदिरों की आर्ष परंपरा के संरक्षण के लिये चार दिशाओं में चार आचार्य पीठ की स्थापना की।भगवान आदिशंकराचार्य ये सब महत्तकार्य मात्र ३२ वर्ष की आयु में पूर्णकर ब्रह्मलीन हो गए।भगवान आदिशंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार मान्य पीठों पर अधिष्ठित आचार्य भगवान आदिशंकराचार्य के अनुरूप पूज्य शंकराचार्य कहे गए।भगवान आदि शंकराचार्य के शिवसायुज्य प्राप्त करने के पश्चात अनुवर्ती आचार्यों ने भारत में सत्य सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म की सैद्धांतिक रक्षण के लिए सततरूप से कार्य किया।भारत वर्ष में जब राजतंत्र ही नास्तिकता की भेंट चढ़ने लगा तब इन्हीं मान्य आचार्यों ने धर्म और धार्मिक मान बिंदुओं के रक्षणार्थ नागा संन्यासियों की परंपरा का सृजन किया।मध्यकाल में पूज्य विद्यारण्य स्वामी ने हरिहर बुक्काराय की म्लेच्छ मत से घर वापसी कराकर पुनः सनातनी घोषित कर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कराई।समर्थ रामदास जब बद्रीविशाल में तपस्या करने गए तो तत्कालीन ज्योतिष पीठ के आचार्य ने उन्हें धर्म रक्षणार्थ अभियान चलाने के लिए प्रेरित किया,परिणाम स्वरूप समर्थगुरु रामदास जी ने शिवा जी को तैयार किया जब शिवा जी को आगरा में औरंगज़ेब ने कैद कर लिया तब अपने पूर्वाश्रम के भाई कवि कलश को भेजकर शिवाजी को बंधन मुक्त करने की योजना की,अनेक मठ मंदिरों और हिंदू राजाओं के रक्षणार्थ नागा संन्यासियों को युद्ध के लिए भेजा(देश की स्वतंत्रता के पश्चात १९५४ में षडयंत्र पूर्वक नेहरू द्वारा अखाड़ा परिषद बनाकर पूज्य शंकराचार्य के सैनिक नागाओं को उनसे अलग कर दिया गया),अंग्रेजों के शासन में अनेक विद्रोह किए,ब्रिटिश राजा को विष्णु न घोषित करने पर तत्कालीन पुरी शंकराचार्य को कारावास दिया गया।देश और धर्म के रक्षणार्थ शांकर परम्परा के अनेक आचार्य जेल गए।ये सब होते हुए हिंदू समाज में ब्राह्मण और ब्राह्मणों से अधिक संतों और संतों में भी आचार्यों के प्रति और उनमें भी पूज्य मान्य शंकराचार्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा को देखते हुए; ईसाइयत को भारत में थोपने और ईसाई सत्ता को भारतीयों द्वारा स्वीकार करने में ईसाई शासन तंत्र को सर्वाधिक रोड़ा हिंदू समाज का ब्राह्मणों,संतों,आचार्यों पर दृढ़ निष्ठा ही लगी।इसलिए अंग्रेजों ने षड्यंत्र पूर्वक कृत्रिम धार्मिक मत और पंथ खड़ा करना प्रारंभ किया और उनके द्वारा हिंदू समाज में ब्राह्मणों, संतों और मान्य आचार्यों के प्रति वैमनस्यता उत्पन्न कराई जाने लगी। सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म के पारम्परिक ढांचे को विरूपित करके समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया जाने लगा,जो कुछ हिंदू समाज के धर्मनिष्ठ बने रहने के लिए सुरक्षाकवच था उन पर आघात कराया जाने लगा।इस दिशा में सतीप्रथा,देवदासी प्रथा,शूद्रों के साथ शोषण की कहानियाँ मनमाने ढंग से गढ़ी जाने लगी।जबकि अंग्रेजों के आने के पूर्व इस भारत ने राणा प्रताप और शिवाजी जैसे हिंदू मान बिंदुओं पर अधिष्ठित शासन को देखा था किंतु उनको धत्त बुलाकर हिंदू मान बिंदुओं पर अधिष्ठित शासन को अत्याचारी, अन्यायी,शोषणकारी सिद्ध किया जाने लगा।भारत की शिक्षा प्रणाली अपने लक्ष्य और दृष्टि के अनुरूप गढ़ी गई,भारत में काले अंग्रेज तैयार किए गए।परिणामतः भारत में धर्मशास्त्रों पर विश्वास न करने वाले विधर्मी हिंदू खड़े होने लगे जिनकी परिणिति आगे चलकर ईसाई,मुस्लिम,कम्युनिस्ट अथवा नास्तिक और छद्म हिंदू हो जाने में हुई।इन अंग्रेजों के द्वारा भारत की प्रत्येक विधा और व्यवस्था में धर्मशास्त्र,देव,गौ,ब्राह्मण,संत द्रोही लोग स्थापित किए गए।धर्मजगत में अनेकानेक नवीन मत उभरकर आए, प्रशस्त राजतंत्र को विकृतकर म्लेच्छ मानसिकता पर राजनैतिक,सांस्कृतिक,सामाजिक संस्थाएं और तथाकथित धार्मिक दल तैयार किए गए।इन अंग्रेजों ने भारत के मनोविज्ञान के भी सुरक्षाकवच को भेदकर वहाँ नास्तिकता और म्लेच्छता का बीज बो दिया।भारत से जब अंग्रेज जाने लगे तो भारत की प्राचीन प्रशस्त राजनैतिक विधा को नाशकर भारत को उन्मादतंत्र रूपी भेड़तंत्र के अधीन कर दिया।इस भेड़तंत्र का संचालन अंग्रेजों के ही मानसिक गुलामों ने ही किया। स्वतंत्र भारत में अंग्रेजों के मानसिक गुलामों ने सत्ता तो पा ली किंतु उन्हें सार्वभौम विष्णु स्वरूप शासक मानने में भारत में वही समस्या दिखी जो अंग्रेजों को दिखी थी।अतः इन मानसिक गुलामों ने भी वेद,ब्राह्मण,संत और मान्य आचार्यों की गरिमा को नष्ट करने की ठान ली। स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक अनेक दलों ने शासन किया,अनेक तंत्र भारत में कार्य कर रहे हैं किंतु इनमें सभी राजनीतिक दल,सामाजिक दल और तथाकथित धार्मिक दलों के मूल में अंग्रेजों का वेद,देव,गौ,ब्राह्मण और आचार्य विरोधी वायरस ही है।वर्तमान समाजिक संस्थाएं और शासन तंत्र ने भारत के लगभग मान्य सम्प्रदायों को अपने अनुगत बना लिया है।वर्तमान में लगभग सभी मान्य सम्प्रदायों के आचार्य सत्ता के द्वारा सृजित और पोषित अधर्म का प्रशस्त विरोध नहीं कर रहे हैं और समय समय पर सत्ता की प्रशंसा भी करते रहते हैं किंतु इस समय भी शांकर परम्परा इस धारा के विपरीत धर्मशास्त्र,देव,गौ,ब्राह्मण और मान्य आचार्यों के साथ खड़ी है।वर्तमान म्लेच्छ और नास्तिकता से पोषित संस्था और तंत्र ने पहले तो शांकर पीठों को भी अपने अनुगत करने का पूरा प्रयास किया असफल होने पर उन्हें विकृतकर उन पर अपने अनुगत लोगों को स्थापित करने का भी प्रयास किया,इसमें भी असफल होने पर मान्य आचार्य पीठों को अप्रासंगिक सिद्ध करने के प्रयास में लग गई हैं।वर्तमान समय में अपनी कुल परम्परा,कुलाचार,गोत्र,शिखा,संस्कार और संस्कृति से भ्रष्ट धर्मशास्त्रों के परम्परागत ज्ञान से सर्वथा हीन और ईसाई शिक्षापद्धति में निर्मित मानस से युक्त छद्म हिन्दुओं का बहुतायत है।ये छद्महिंदू कलि पोषित और ग्रसित संस्था और पार्टी के चंगुल में फंसकर अपने ही जड़ पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं।आज ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है कि जो शिखा,तिलक,स्नान, सूर्यार्घ्य, पितृ और देवोपासना,आहार,विहार,आचार,विचार और संस्कार(ये सब शास्त्रीय पद्धति अनुसार,कुछ म्लेच्छप्राय लोग भी शिखा रखाए और तिलक लगाए दिखते हैं किंतु शास्त्र प्रमाण नहीं मानते हैं) से विहीन है,ऐसे तथाकथित हिंदू उद्घोषणा कर रहे हैं कि हम इन्हें आचार्य नहीं मानते हैं,हम उन्हें आचार्य नहीं मानते हैं तो वास्तव में इन म्लेच्छप्राय प्राणियों के लिए धर्मशास्त्र युक्त आचार्य हैं भी नहीं अपितु इनके लिए कलिनेमाचार्य लोग अपनी दुकान खोले बैठे हैं,इनके वास्तविक आचार्य तो वहीं हैं,जो जिस भी अधर्म को लेकर उनकी शरण में जाए,उसे ही ये कलिनेमाचार्य जी लोग धर्म घोषित करने वाले हैं।किंतु ऐसे संक्रमणकाल में धर्मनिष्ठ सनातनी वैदिक आर्य हिंदू को सजग होने की आवश्यकता है,अपने मान्य आचार्यों को पहचानने और उनसे धर्मबोध प्राप्त कर अपने जीवन को धर्मयुक्त बनाने की आवश्यकता है।आज किसी भी पार्टी और संस्था का व्यामोह छोड़कर प्रामाणिक आचार्यों की शरण में जो पहुँच जायेगा,वही और उसके वंशज सनातनी बचे रह सकते हैं नहीं तो अन्यत्र पहले दिन से ही म्लेच्छता और नास्तिकता प्रविष्ट होने लगती है।
धर्म और धर्मनिष्ठ जनों की श्रीमाननारायण सर्वविध रक्षा करें।
..............रामबाबू पाण्डेय