07/08/2026
बहुत समय पहले एक घने जंगल में एक भील (शिकारी) रहता था। उसका नाम था कन्नप्प। वह पढ़ा-लिखा नहीं था और उसे पूजा-पाठ की विधियाँ भी नहीं आती थीं, लेकिन उसके हृदय में भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम था।
एक दिन जंगल में शिकार करते हुए उसे एक शिवलिंग दिखाई दिया। उस स्थान पर कोई मंदिर नहीं था और न ही कोई पुजारी। कन्नप्प को लगा कि भगवान अकेले हैं और उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं है।
अगले दिन वह अपने साथ शिकार का उत्तम मांस और पीने का पानी लेकर आया। उसके पास कोई पात्र नहीं था, इसलिए वह अपने मुँह में पानी भरकर लाया। उसने पहले अपने पैरों से शिवलिंग के आसपास की गंदगी हटाई और फिर अपने मुँह से पानी निकालकर शिवलिंग को धोया। जहाँ उसे धूल या पत्ते दिखाई देते, उन्हें अपने हाथों से हटाता और आवश्यकता पड़ने पर अपने मुँह की नमी (थूक सहित निकले जल) से भी शिवलिंग को साफ कर देता। उसके लिए यह अपमान नहीं, बल्कि अपने प्रिय भगवान की सेवा का सबसे सहज और स्नेहपूर्ण तरीका था।
इसके बाद वह भगवान को प्रेमपूर्वक मांस का भोग चढ़ाता और पूरी श्रद्धा से प्रणाम करता।
उसी स्थान पर प्रतिदिन एक ब्राह्मण पुजारी भी वैदिक विधि से पूजा करते थे। जब वे आते तो शिवलिंग पर मांस और अन्य वस्तुएँ देखकर दुखी हो जाते और पुनः विधिपूर्वक पूजा करते। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा।
एक दिन भगवान शिव ने पुजारी को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "जिसे तुम अशुद्ध समझ रहे हो, वह मेरा परम भक्त है। उसकी भक्ति निष्कपट और प्रेम से भरी है।"
भगवान ने दोनों भक्तों की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
अगले दिन कन्नप्प ने देखा कि शिवलिंग की एक आँख से रक्त बह रहा है। उसे लगा कि उसके भगवान घायल हो गए हैं। उसने बिना देर किए अपनी एक आँख निकालकर शिवलिंग पर लगा दी। उसी क्षण रक्त बहना बंद हो गया।
लेकिन तभी शिवलिंग की दूसरी आँख से भी रक्त बहने लगा। कन्नप्प ने निश्चय किया कि वह अपनी दूसरी आँख भी भगवान को अर्पित कर देगा। क्योंकि दूसरी आँख निकालने के बाद वह देख नहीं पाएगा, इसलिए उसने अपना एक पैर शिवलिंग की दूसरी आँख के स्थान पर रख दिया, ताकि सही स्थान पहचान सके।
जैसे ही वह अपनी दूसरी आँख निकालने लगा, उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हो गए। उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा—
"वत्स! बस करो। तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने मुझे अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। तुम मेरे सच्चे भक्त हो।"
भगवान शिव ने कन्नप्प की दोनों आँखें वापस लौटा दीं और उसे अपने परम भक्तों में स्थान दिया। तभी से वह कन्नप्प नयनार के नाम से प्रसिद्ध हुए। #शिवभक्त #शिवपार्वती