13/02/2025
मुहम्मद बिन अल-हसन अल-अस्करी की विलादत 15 शाबान 255 हिजरी, सन 869 ईसवी को समर्रा में हुई। जिन्हें इमाम अल-महदी (अ) के नाम से भी जाना जाता है। हदीसों में बारहवें इमाम (अ) के मुहम्मद, अहमद और अब्दुल्ला जैसे नामों से का भी ज़िक्र है। कई हदीसें हैं जिनके मुताबिक बारहवें इमाम (अ) के असली नाम का ज़िक्र करना मना है। यही वजह है कि शियों के बीच उन्हें अल-महदी के नाम से जाना जाता है जो उनकी उपाधियों में से एक है।
आपको साहिब अल-ज़मान, अल-मुंतसार, बाक़ियात अल्लाह, अल-मुंतक़िम, अल-मौउद, ख़तम अल-औसिया, अल-ग़ैब, अल-मा'मुल और अल-मुअर्र के नाम से भी पुकारा जाता है।
आपकी मां का नाम नरजिस था जो एक रोमन राजकुमारी थीं। (रिफ्रेंस- सादिक, कमाल अल-दीन वा तमाम अल-निमा , 1390 AH, जिल्द 2, पेज 424) नरजिस को कुछ जगह सुसान, सकील या सैकल, हदीथा, हकीमा, मलिका, रेहाना और खमत के नाम से भी संबोधित किया गया है।
इमाम अल-महदी (अ) अपने वालिद इमाम अल-हसन अल-अस्करी (अ) की शहादत के बाद वर्ष 260 हिजरी /सन् 874 ईस्वी में इमाम बने उस वक्त उनकी उम्र पांच साल थी।
इमाम बनने के बाद से लेकर 329 हिजरी /सन् 941 इस्वी तक इमाम मेहदी अपने चार नायबों के ज़रिये अपने मानने वालों और शियाने अली को हिदायत और पैग़ामात देते रहे। उसके बाद उनकी तवील ग़ैबत शुरू हुयी। ग़ैबत के दौरान इमाम (अ.स.) के साथ राबिता और उनसे मुलाक़ात के लिये कई दुआओं और नमाज़ का ज़िक्र मिलता है। जैसे कि दुआ एह्द , दुआ नदबा , जियारत आले यासीन और नमाज इमाम उम्र (अ.स. )। कुछ हदीसों के मुताबिक़ इमाम (अ.स.) से ग़ैबत के दौरान मुलाक़ात मुमकिन है। कुछ शिया आलिमों ने अपनी किताबों में लोगों की उनसे मुलाकात का ज़िक्र भी किया है। यहां तक कि मुलाक़ात होने के इलाक़ों का भी ज़िक्र है जिनमें सामरा में सरदाब अल-ग़िबात, कूफ़ा में साहला मस्जिद, क़ुम में जामकरन मस्जिद वग़ैरह।
इमाम मेहदी (अ) के ज़हूर को लेकर शियों के साथ सुन्नी मुसलमानों का एक बड़ा धड़ा भी यक़ीन रखता है। सुन्नी मौलवियों इब्री शफीई, अब्दुल हक दहलवी, सकारिनी और शौकानी ने इमाम मेहदी (अ) के बारे में लिखा है कि दुनिया के आख़री वक्त में आएंगे और हज़रत ईसा भी उनके साथ होंगे।