Shia History

Shia History This page is on Shia History.

Which is mentioned in Hadith and Quran.
यह फेसबुक पेज शिया इतिहास पर है। जिसका ज़िक्र हदीस और क़ुरान में है।
یہ چینل شیعہ تاریخ پر ہے۔ جس کا تذکرہ حدیث اور قرآن میں ہے۔

14/03/2025

कहाँ का शिर्क, कहाँ की बिदअत
जनाब अली नक़ी नक़वी साहब किब्ला नक़्क़न साहब

दक़यानूस और असहाब अल कहफ़सन 201 से 251 तक  रोमन में एक बादशाह हुआ जिसका नाम दक़यानूस था।इसी दौरान असहाब अल-कहफ़ हज़रत ईसा और...
06/03/2025

दक़यानूस और असहाब अल कहफ़

सन 201 से 251 तक रोमन में एक बादशाह हुआ जिसका नाम दक़यानूस था।

इसी दौरान असहाब अल-कहफ़ हज़रत ईसा और ख़ुदा पर ईमान लाए थे। अल-तबारी ने उनके नामों का ज़िक्र किया है जिनमें मैक्सिलमीना, मुहसिलमीना, यमलिखा, मारतूनस, कास्तुनस, विबोरस, विकार्नस और इयातबियोनस शामिल हैं।

बादशाह दक़यानूस को जब पता चला कि ये सब ख़ुदा पर ईमान लाए हैं तो उसने सज़ा का इरादा किया। बचने के लिए असहाब अल कहफ़ पहाड़ पर एक गुफा में छुप गए और गहरी नींद में चले गए जो लगभग 309 साल तक चली। उनके साथ एक कुत्ता भी था, जिसका नाम क़तमीर था। 309 साल बाद जब वह जागे तो उनमें से एक शहर की तरफ़ खाना लाने गया तो पता चला कि शहर और रहन सहन बदला है, बादशाह दक़यानूस की हुकूमत खत्म हो चुकी है। पुरानी मुद्रा बंद हो गई है। उसने वापस जाकर सब कुछ अपने साथियों को बताया।

कुरान में अल-कहफ़ नाम का एक सूरा है, जिसकी आयत 8 से 26 में इनका ज़िक्र है।
इमाम अल-सादिक (अ) ने कहा, "जब कायम अल मुहम्मद (अ) आएंगे, तो कुछ लोग काबा के पीछे से आएंगे , उनमें से गुफा के साथी भी हैं।"

क़ुरआन ने गुफ़ा के साथियों की संख्या का उल्लेख नहीं है। कुछ स्रोतों ने उन्हें अपने कुत्ते के साथ 4 माना, कुछ ने उन्हें 6 माना और कुछ अन्य ने उन्हें 8 माना है।

 ूसा के वालिद का नाम इमरान था।हज़रत मूसा के भाई हारून इब्ने इमरान थे। ूह अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम लेमेक था। कुरान के 2...
05/03/2025

ूसा के वालिद का नाम इमरान था।
हज़रत मूसा के भाई हारून इब्ने इमरान थे।
ूह अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम लेमेक था। कुरान के 28 सूरह में कुल 43 बार हज़रत नूह का नाम है। उनके बेटों के नाम शेम, हाम, येपेत, कनान थे।
कनान नूह और अल्लाह पर यकीन नहीं रखता था और नूह की कश्ती पर नहीं बैठा था।
ूनुस बिन मत्ता पैग़म्बर थे।
मत्ता का नाम उनके वालिद का है या माँ का, इस बारे में अलग अलग राय है। कुछ का मानना ​​है कि उनके पिता का नाम मत्ता था और कुछ इसे उनकी माँ का नाम मानते हैं और मानते हैं कि मरियम (अ) के बेटे हज़रत ईसा (अ) और मत्ता के बेटे यूनुस (अ) ही ऐसे पैगम्बर हैं जिन्हें उनकी माओं के नाम से पुकारा जाता है। कुरान के पाँच सूरों में, यूनुस (अ) का ज़िक्र है। उन्हें "ज़ु एल-नून" कहा गया है जिसका मतलब है "व्हेल का साथी"। क्योंकि वह मछली के पेट से सही सलामत बचकर निकले थे।

02/03/2025

*मारवान बिन हकम*

बनू उमय्या ख़ानदान से था और अहलेबैत के बड़े दुश्मनों में से था।

पैगंबर (स) ने मारवान और उसके पिता हकम बिन अबी अल-आस बिन उमय्या को ताइफ़ में शहर बदर कर दिया था। जिसे तीसरे खलीफा उसमान बिन अफ्फान ने वापस मदीना बुला कर हुकूमत में ओहदा दे दिया।

जमल और सिफ़्फ़िन की लड़ाई में मरवान इमाम अली (अ) के खिलाफ लड़ा ।
जमल में उसे हार के बाद क़ैद किया गया लेकिन हज़रत अली (अ) ने उसे माफ़ी दे दी और मरवान शाम भाग गया।

बाद में मुआविया ने उसे मदीना का गवर्नर बनाया,
मरवान ने पैगंबर (स) की कब्र के बगल में इमाम अल-हसन (अ) को दफनाने का विरोध किया ।
उसके बाद के सालों में मरवान बिन हकम, इमाम अल-हुसैन (अ) के खिलाफ़ रहा।

यज़ीद की मौत के बाद उसके बेटे मुआविया को तख़्त पर बैठाया गया लेकिन वो उससे दूर हो गया। जिसके बाद मरवान ने हुकूमत संभाली और लगभग दस महीने बाद, 3 रमज़ान 65 हिजरी सन 685 ईसवी में मरवान की बीवी उम्म ख़ालिद ने ज़हर दे कर उसे मार दिया ।
(उम्म ख़ालिद यज़ीद की बीवी थी जिससे मरवान ने यज़ीद की मौत के बाद निकाह किया था।)

मुहम्मद बिन अल-हसन अल-अस्करी की विलादत 15 शाबान 255 हिजरी, सन 869 ईसवी को समर्रा में हुई। जिन्हें इमाम अल-महदी (अ) के ना...
13/02/2025

मुहम्मद बिन अल-हसन अल-अस्करी की विलादत 15 शाबान 255 हिजरी, सन 869 ईसवी को समर्रा में हुई। जिन्हें इमाम अल-महदी (अ) के नाम से भी जाना जाता है। हदीसों में बारहवें इमाम (अ) के मुहम्मद, अहमद और अब्दुल्ला जैसे नामों से का भी ज़िक्र है। कई हदीसें हैं जिनके मुताबिक बारहवें इमाम (अ) के असली नाम का ज़िक्र करना मना है। यही वजह है कि शियों के बीच उन्हें अल-महदी के नाम से जाना जाता है जो उनकी उपाधियों में से एक है।

आपको साहिब अल-ज़मान, अल-मुंतसार, बाक़ियात अल्लाह, अल-मुंतक़िम, अल-मौउद, ख़तम अल-औसिया, अल-ग़ैब, अल-मा'मुल और अल-मुअर्र के नाम से भी पुकारा जाता है।

आपकी मां का नाम नरजिस था जो एक रोमन राजकुमारी थीं। (रिफ्रेंस- सादिक, कमाल अल-दीन वा तमाम अल-निमा , 1390 AH, जिल्द 2, पेज 424) नरजिस को कुछ जगह सुसान, सकील या सैकल, हदीथा, हकीमा, मलिका, रेहाना और खमत के नाम से भी संबोधित किया गया है।

इमाम अल-महदी (अ) अपने वालिद इमाम अल-हसन अल-अस्करी (अ) की शहादत के बाद वर्ष 260 हिजरी /सन् 874 ईस्वी में इमाम बने उस वक्त उनकी उम्र पांच साल थी।

इमाम बनने के बाद से लेकर 329 हिजरी /सन् 941 इस्वी तक इमाम मेहदी अपने चार नायबों के ज़रिये अपने मानने वालों और शियाने अली को हिदायत और पैग़ामात देते रहे। उसके बाद उनकी तवील ग़ैबत शुरू हुयी। ग़ैबत के दौरान इमाम (अ.स.) के साथ राबिता और उनसे मुलाक़ात के लिये कई दुआओं और नमाज़ का ज़िक्र मिलता है। जैसे कि दुआ एह्द , दुआ नदबा , जियारत आले यासीन और नमाज इमाम उम्र (अ.स. )। कुछ हदीसों के मुताबिक़ इमाम (अ.स.) से ग़ैबत के दौरान मुलाक़ात मुमकिन है। कुछ शिया आलिमों ने अपनी किताबों में लोगों की उनसे मुलाकात का ज़िक्र भी किया है। यहां तक कि मुलाक़ात होने के इलाक़ों का भी ज़िक्र है जिनमें सामरा में सरदाब अल-ग़िबात, कूफ़ा में साहला मस्जिद, क़ुम में जामकरन मस्जिद वग़ैरह।

इमाम मेहदी (अ) के ज़हूर को लेकर शियों के साथ सुन्नी मुसलमानों का एक बड़ा धड़ा भी यक़ीन रखता है। सुन्नी मौलवियों इब्री शफीई, अब्दुल हक दहलवी, सकारिनी और शौकानी ने इमाम मेहदी (अ) के बारे में लिखा है कि दुनिया के आख़री वक्त में आएंगे और हज़रत ईसा भी उनके साथ होंगे।

_*والدین اور بچے * ۔کئی بار لکھا ہے کہ صرف اپنی بیٹیوں کی نہیں بلکہ بیٹوں کی بھی فکر کریں ان پر نظر رکھیں بھرپور توجہ دی...
13/02/2025

_*والدین اور بچے * ۔

کئی بار لکھا ہے کہ صرف اپنی بیٹیوں کی نہیں بلکہ بیٹوں کی بھی فکر کریں ان پر نظر رکھیں بھرپور توجہ دیں کیوں کہ موجودہ دور میں صرف لڑکیوں کو " *ہراسمنٹ* " کا سامنا نہیں کرنا پڑتا بلکہ لڑکے بھی زد میں آتے ہیں۔۔
کل ایک والد کہہ رہا تھا کہ
" میں اپنے بیٹے کو سکول چھوڑ کر آتا ہوں واپس لینے بھی خود جاتا ہوں کیوں کہ کئی بار اسے اس کے فیلوز نے راستہ روک کر تنگ کیا کہ ہمارے ساتھ دوستی لگاؤ ورنہ تمہیں ماریں گے" ۔۔۔

کیا آپ والدین اس دوستی کا مطلب سمجھتے ہیں ؟ اگر نہیں ۔۔ تو پھر آپ لوگ ضرورت سے زیادہ معصوم ہیں۔ یہ وہی دوستی ہے جو جنسی تسکین کا باعث ہے اس دوستی کا اصل نام یہی ہے۔۔۔

آپ نے بچوں کو وہ خوراک دی ہے جس نے انہیں وقت سے پہلے ہی بالغ کر دیا ہے۔ آپ نے موبائل اور انٹرنیٹ بھی ان کی دسترس میں دے دیے ہیں۔ یہ وہاں سب کچھ دیکھ رہے ہیں لطف اندوز ہو رہے ہیں لیکن اس کے باوجود انہیں وہ لذت چاہیے جو اصل میں ملتی ہے۔ سکول جاتا بچہ آگ جیسا ہوتا ہے میں اسی لیے کہتا ہوں کہ کم عمر لڑکوں کو پڑھانے والی ٹیچرز کا لباس بہت زیادہ اہمیت کا حامل ہے یا پھر انہیں میل ٹیچرز کی سرپرستی میں ہونا چاہیے ۔۔۔

یہاں سے دو راستے ان کی نظر میں آتے ہیں ۔۔۔
کسی مخالف جنس کا انتخاب ۔۔۔۔
ویسے آج کل یہ بھی ناممکن نہیں ہے لیکن کسی حد تک مشکل ضرور ہے وہ بھی سکول لیول تک ۔۔۔ لہٰذا میری گفتگو اس وقت ان بچوں کے حوالے سے ہے جو ابھی سکول میں تعلیم حاصل کر رہے ہیں ۔۔۔
انہیں آسان راستہ اپنی ہی جنس کا انتخاب لگتا ہے تو وہ یہی راستہ منتخب کر لیتے ہیں۔۔ یہ فطرت نہیں ہے بلکہ بوقتِ ضرورت اسے اپنایا جاتا ہے۔ یہ قدرے آسان ہے کہ دو کزن دو فیلوز یا دو دوست ایک ہی جنس سے تعلق رکھتے ہوں تو ان کی تنہائی میں ملاقات زیادہ مشکوک نہیں لگتی ۔۔۔۔۔

لکھنے کے لیے مزید بہت کچھ ہے مگر لکھنا نہیں چاہتا ۔۔۔۔

آپ والدین کو دو مختلف زاویوں سے اپنی اولاد پر نظر رکھنے کی ضرورت ہے ۔۔۔۔
آپ کا لڑکا کسی کی جنسی تسکین کا سامان تو نہیں بن رہا ؟ یا اسے اس طرف لانے کی کوشش تو نہیں کی جا رہی ؟ ۔۔ اسے اپنے فیلوز ، کزنز وغیرہ کی طرف سے بلیک میل تو نہیں کیا جا رہا ؟ ۔۔۔۔۔۔

آپ کا لڑکا کسی کو تنگ تو نہیں کر رہا ؟
کسی کو اپنی تسکین کے لیے استعمال تو نہیں کر رہا ؟
کسی ایسی محفل کا حصہ تو نہیں جہاں یہ سب ہوتا ہے ؟
ایک اور تلخ مگر اہم سوال ۔۔۔۔
آپ کا لڑکا کسی بڑی عمر کی خاتون کے لیے راحت کا سامان تو نہیں بنا ہوا ؟
توجہ دیں ۔۔۔ ان سوالوں کا جواب تلاش کریں ۔۔۔۔

*بچوں کے ساتھ مضبوط بانڈنگ بنائیں* ۔۔۔
*گھر میں دستر خوان لگائیں* ۔۔۔
*بچوں کی روٹین سے واقف رہیں* ۔۔
*ان کے دوستوں کی فہرست اور ان کے کردار کو جاننے کی کوشش کریں ۔۔* ۔۔
دیر مت کریں اس سے پہلے کہ بہت دیر ہو جائے ۔۔۔۔

*ذہن نشین کر لیں*
" *اچھے والدین بننے کے لیے اچھے میاں بیوی ہونا پہلی شرط ہے اس کے بعد ہی آپ اپنی اولاد کی تربیت کر سکتے ہیں* "
Courtesy by
مصنف ۔سید حامد حسینی۔

09/02/2025

हज़रत अली अकबर का जन्म 11 शाबान को मदीना में हुआ था। उनके जन्म वर्ष को लेकर मतभेद हैं (अलग अलग रवायतों में ये 37 हिजरी से 43 हिजरी के बीच मिलता है, वैसे शहादत के वक़्त उनकी उम्र 18 वर्ष बताई गई है इस हिसाब से ये 43 हिजरी के आसपास होगा)

वह इमाम हुसैन के सबसे बड़े बेटे थे।ऐतिहासिक स्रोतों में उनका उपनाम अबू अल-हसन के रूप में वर्णित है ।

आपकी मां का नाम लैला
बिन्ते अबी मुर्रा बिन उरवा बिन मसूद अल-सकाफ़ी है। आपके नाना मुर्रा बिन उरवा, पैग़म्बर (स) के सहाबी थे।

लैला की वंशावली उनके पिता की ओर से सकिफ़ क़बीले और मां मैमुना की ओर से बनी उमैया तक जाती है । मैमुना अबू सुफ़ियान की बेटी थीं। (अबू एल-फराज अल-इस्फ़हानी, मकातिल अल-तालिबीन , पेज 86)

मैमुना अपने समय की सबसे प्रसिद्ध महिलाओं में से एक मानी जाती हैं।

अली अकबर (अ.) शक्ल और स्वभाव दोनों में पैगंबर (स.) जैसे थे। कर्बला की लड़ाई के दौरान , उन्होंने अविश्वसनीय बहादुरी का प्रदर्शन किया और शहीद हो गए। आशूरा के दिन , वह बनी हाशिम के पहले शहीद थे, उन्हें कर्बला में उनके पिता के बगल में दफनाया गया है ।

अली अकबर(अ.) को मुर्रा बिन मुनकीद अल-अब्दी ने शहीद किया, जो उमर बिन साद की सेना में था ।

मुर्रा बिन मुनकीद अल-अब्दी पर लानत बेशुमार।

06/02/2025

*क़ासिम इब्ने हसन* इमाम हसन (अ.) के बेटों में से एक थे जो कर्बला की घटना में शहीद हुए ।

शबे आशूर इमाम अल-हुसैन (अ) ने अपने साथियों को इकट्ठा किया और ख़ुत्बा दिया जिसमें बताया कि वे सभी अगले दिन शहीद हो जाएँगे। कासिम ने अपने चचा इमाम हुसैन (अ) से पूछा कि क्या वे आशूरा के दिन शहीद होंगे। इमाम ने जवाब दिया, "हाँ, आप कल शहीद हो जाएँगे।" इमाम ने उनसे पूछा कि वे मृत्यु के बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने उत्तर दिया, "शहद से भी अधिक मीठी।"

हज़रत क़ासिम को अम्र इब्न साद इब्न नुफैल अज़दी ने शहीद किया। मकतल अल-ख़्वारिज़्मी में लिखा गया है कि वह अपनी शहादत के समय यौवन तक नहीं पहुंचे थे। बेहाकी ने लबाब अल-अंसब में लिखा है कि शहादत के वक़्त क़ासिम की उम्र 16 वर्ष थी।

आपकी मां का नाम नुफ़ायला या रामलाह था। *(कुरैशी, ज़िंदगी इमाम अल-हसन इब्न अली, जिल्द 2, पेज 455)*

उनकी शहादत के बारे में लिखा है कि कर्बला के मैदान में एक नौजवान जिसका चेहरा चाँद की तरह था, युद्ध के मैदान में आया और जंग शुरू कर दी। इब्न फुदैल अल-अज़दी ने उसके सिर पर वार किया। उसका सिर ज़ख्मी हो गया, और वह गिरते हुए बोला, "ओ, मेरे चचा!" इमाम हुसैन (अ) बहुत तेजी से उसके पास आए और एक शेर की तरह दुश्मनों पर हमला किया। उन्होंने इब्न फुदैल पर हमला किया और उसकी कोहनी से उसका हाथ काट दिया।
लिखा है कि जब धूल छंटी तो देखा गया कि हुसैन उस बच्चे के शव के पास खड़े थे और क़ासिम अपने पैरों को रगड़ रहे थे।

हुसैन ने कहा, " अल्लाह उन लोगों पर लानत करे जिन्होंने तुम्हें मार डाला। तुम्हारे पिता और तुम्हारे दादा क़यामत के दिन तुम्हारा बदला लेंगे । अल्लाह की कसम! आज ऐसा दिन है कि तुम्हारे चचा के दुश्मन बहुत हैं और साथी कम।

हुसैन ने फिर उस नौजवान को दुलारा और उसे बनू हाशिम के शहीदों के साथ लिटा दिया ।

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ग़ीबत किसी इंसान के बारे में उसके पीठ पीछे कही गई सच्ची बात है जो उसे नाराज़ करती है। और अगर उस इंसान  के बारे में कही गई...
06/02/2025

ग़ीबत किसी इंसान के बारे में उसके पीठ पीछे कही गई सच्ची बात है जो उसे नाराज़ करती है। और अगर उस इंसान के बारे में कही गई वह बात झूठी है तो यह बुहतान (निंदा) होगी जो एक बड़ा गुनाह है - जो झूठ और ग़ीबत का मिश्रण है।`

पैगंबर (स) ने कहा: "जो मुसलमान चुगली करता है, अल्लाह उसकी दुआओं को 40 दिनों तक क़ुबूल नहीं करेगा, जब तक कि जिसकी ग़ीबत की है वह उसे माफ न कर दे" (मजलिसी, बिहार अल-अनवर , जिल्द 75, पेज 258)

इमाम अल-सादिक (अ) हसद को ग़ीबत की जड़ों में से एक मानते हैं और कहते हैं कि "ग़ीबत मुसलमान को अल्लाह की पनाह से निकालकर शैतान के नज़दीक ले जाती है।" (सादिक, अल-अमली , पेज 103)

मकारिम शीराज़ी ने तफ़सीर-ए निमना , जिल्द 22, पेज नं. 185 पर क़ुरान से लिखा है -
"ऐ इमान वालो! बहुत ज्यादा शक से बचो, बेशक कुछ शक गुनाह हैं। और एक दूसरे की जासूसी न करो और न चुगली, न ग़ीबत करो। क्या तुम्हें अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद होगा ? अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह रहम करने वाला, मेहरबान है।"

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03/02/2025

3 शाबान को यूं आया है जहरा का जिगर.....
4 शाबान को यूं आया है हैदर का पिसर...
जैसे क़ुरआन प क़ुरआन उतर आया है.....

शब्बीर अगर गुल है तो अब्बास कली है....
वो फूल... ये ख़ुशबू... वो ख़फ़ी.. ये जली है....
किरदार में है एक नबी, एक वसी है.... शब्बीर मोहम्मद है तो अब्बास अली है....

आज इमाम हुसैन (अ) की तारीख़ ए विलादत है। आज ही के दिन 3 शाबान 3 हिजरी को उनकी विलादत हुई थी।आशूर के दिन 10 मोहर्रम 61 हिज...
02/02/2025

आज इमाम हुसैन (अ) की तारीख़ ए विलादत है। आज ही के दिन 3 शाबान 3 हिजरी को उनकी विलादत हुई थी।

आशूर के दिन 10 मोहर्रम 61 हिजरी में सुनसान रेगिस्तान में, तपती हुई रेत, जहां यज़ीद और उसके साथियों ने हज़ारों सैनिकों के साथ सोचा था कि हुसैन नाम के एक शख्स और उनके कुनबे का खून बहाकर आले रसूल का क़िस्सा हमेशा के लिए ख़त्म कर देंगे । लेकिन वह लहू,आम लहू नही था,ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एक पूरी दास्तान था।

उस ख़ून को तपती रेत ने अपनी नसों में पेवस्त कर लिया, रेत तो फिर रेत थी । उड़कर जहाँ जहाँ पहुँच सकती थी पहुंची, और आशूर की वो दर्द भरी दास्तान खोलती चली गई, सारा आलम जान गया कि एक थी "कर्बला" और एक थे हुसैन (अ)।
हुसैन का वह लहू ज़माने की ऐसी तारीख़ बनकर ज़िन्दा हुआ कि हर दौर उससे रोशनी पाने लगा ।

तारीख़ ए विलादत की मुबारकबाद।

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