धम्मलिपि पालि प्राकृत - Leadership Workshop

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धम्मलिपि  पालि  प्राकृत - Leadership Workshop Emperor Ashoka the Great has issued political, administrative, social and public welfare orders in accordance with Dhamma in his inscriptions in pali.

Discover authentic knowledge, explore history and connect with the roots of our intellectual heritage 🙏

22/08/2026

प्राचीन बौद्ध मूर्तियाँ महामाया (भगवान तथागत बुद्ध की माँ) को हिंदुओं ने महालक्ष्मी के रूप में अपनाया।

ये प्राचीन बौद्ध मूर्तियाँ महामाया (भगवान तथागत बुद्ध की माँ) की है जिनको हिंदुओं ने महालक्ष्मी के रूप में अपनाया।कर्नाट...
22/08/2026

ये प्राचीन बौद्ध मूर्तियाँ महामाया (भगवान तथागत बुद्ध की माँ) की है जिनको हिंदुओं ने महालक्ष्मी के रूप में अपनाया।
कर्नाटक इतिहास अकादमी ने रिसर्च किया है कि कर्नाटक के कुछ भागों में बुद्ध की माँ की पूजा Bananthi Kallu के रूप में होती है....

जिस परिवार जब किसी बच्चे का जन्म होना होता है, तब गजलक्ष्मी के रूप में पूजित बुद्ध की माँ की मूर्ति चेहरा नीचे कर रखी जाती है....

फिर जब बच्चे का जन्म सफलतापूर्वक हो जाता है, तब पुनः मूर्ति को अपने मूल स्वरूप में रख दिया जाता है....

आप जो सोचते हैं कि बुद्धिज्म की परंपरा मिट गई है तो सही नहीं है, अनेक बुद्धिज्म की परंपराएँ सतह के नीचे आज भी जारी हैं....

आज सतह के नीचे प्रवाहित बुद्धिज्म की परंपरा को पकड़ने की जरूरत है, पकड़ना आसान तो नहीं है, मगर पकड़ी जा सकती है....

-राजेंद्र प्रसाद सिंघ
#बुद्ध #धम्म

21/08/2026

तथागत बुद्ध के वचन ♨️

न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कदाचन।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥
भावार्थ:🔻
इस संसार में वैर (दुश्मनी) से वैर कभी शांत नहीं होता।वैर केवल अवैर (प्रेम, मैत्री और क्षमा) से ही शांत होता है। यही शाश्वत और सनातन धम्म/नियम है। यह जीवन पर्यन्त रहेगा।

🌸 जेम्स प्रिंसेप महोदय का जन्मदिवस विशेष — 20 अगस्त 🌸“जेम्स प्रिंसेप की करुणा में पाषाण खंड भी डूब गए,आपकी प्रज्ञा-शील स...
20/08/2026

🌸 जेम्स प्रिंसेप महोदय का जन्मदिवस विशेष — 20 अगस्त 🌸
“जेम्स प्रिंसेप की करुणा में पाषाण खंड भी डूब गए,
आपकी प्रज्ञा-शील से शिला-लेख भी यह बोल पड़े…”
आज 20 अगस्त के पावन अवसर पर महान विद्वान एवं पुरातत्त्वविद् जेम्स प्रिंसेप महोदय को सादर स्मरण एवं नमन।
यदि जेम्स प्रिंसेप महोदय ने प्राचीन ब्राह्मी लिपि और शिलालेखों को पढ़ने का महान कार्य न किया होता, तो संसार के सामने सम्राट अशोक के धम्म, उनके लोककल्याणकारी विचारों और उस महान धम्म परंपरा का इतिहास इतनी स्पष्टता से सामने नहीं आ पाता।
आपकी विद्वत्ता ने उन शिलाओं को वाणी दी, जिनमें तथागत गौतम बुद्ध के धम्म, सम्राट अशोक की धम्मनीति, सत्य, अहिंसा, करुणा, मैत्री और मानव कल्याण का संदेश अंकित था।
आपके प्रयासों से यह ज्ञात हुआ कि कभी जम्बूद्वीप धम्म की गूंज से गुंजायमान था, जहाँ प्रियदर्शी सम्राट अशोक महान ने अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान मानकर लोकहित और धम्म के मार्ग को आगे बढ़ाया।
नालन्दा और तक्षशिला जैसे ज्ञान-केंद्रों की गौरवशाली परंपरा तथा प्राचीन भारत की ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति की अनेक स्मृतियाँ पुनः इतिहास के पन्नों से निकलकर हमारे सामने आईं।
जेम्स प्रिंसेप की विद्वत्ता और बाद के पुरातात्त्विक अनुसंधानों ने बुद्ध और अशोक की उस महान विरासत को दुनिया के सामने पुनः उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे समय की धूल ने ढक दिया था।
आज उनके जन्मदिवस पर हम सभी उन्हें दो पुष्प अर्पित करते हुए उनके महान कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
उनकी ज्ञान-साधना और इतिहास को समझने के लिए किए गए अथक प्रयासों को शत-शत नमन।
🌸 साधु! साधु! साधु! 🌸
🌿 भवतु सब्ब मंगलं। 🌿
20 अगस्त — जेम्स प्रिंसेप जन्मदिवस विशेष
दिनांक — 20/08/2026

18/08/2026
18/08/2026

धम्मलिपि, पालि भाषा 🔻

𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀢𑀻𑀢𑀸 𑀘, 𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀦𑀸𑀕𑀢𑀸 𑁇
𑀧𑀘𑀼𑀧𑀦𑁆𑀦𑀸 𑀘 𑀬𑁂 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸, 𑀅𑀳𑀁 𑀯𑀦𑁆𑀤𑀸𑀫𑀺 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀤𑀸 𑁈

यह पालि भासा की प्रसिद्ध बुद्ध-वन्दना गाथा है।

देवनागरी रूप: 🔻

ये च बुद्धा अतीता च, ये च बुद्धा अनागता।
पच्चुप्पन्ना च ये बुद्धा, अहं वन्दामि सब्बदा॥

शब्दार्थ: 🔻

ये च बुद्धा अतीता — जो बुद्ध अतीत में हुए
ये च बुद्धा अनागता — जो बुद्ध भविष्य में होंगे
पच्चुप्पन्ना च ये बुद्धा — और जो बुद्ध वर्तमान में हैं
अहं वन्दामि सब्बदा — मैं उन सभी को सदा वन्दना करता हूँ।

भावार्थ: 🔻

अतीत में हुए सभी बुद्धों, भविष्य में होने वाले सभी बुद्धों तथा वर्तमान में विद्यमान सभी बुद्धों को मैं सदा श्रद्धापूर्वक वन्दना करता हूँ।
यह वन्दना केवल किसी इस काल या एक बुद्ध तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त बुद्धों के प्रति सार्वभौमिक श्रद्धा को व्यक्त करती है।
#बुद्ध #धम्म

धम्मलिपि, पालि भाषा 🔻𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀢𑀻𑀢𑀸 𑀘, 𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀦𑀸𑀕𑀢𑀸 𑁇𑀧𑀘𑀼𑀧𑀦𑁆𑀦𑀸 𑀘 𑀬𑁂 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸, 𑀅𑀳𑀁 𑀯𑀦𑁆𑀤𑀸𑀫𑀺 𑀲𑀩𑁆𑀩𑀤𑀸 𑁈यह पालि भासा की ...
18/08/2026

धम्मलिपि, पालि भाषा 🔻

𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀢𑀻𑀢𑀸 𑀘, 𑀬𑁂 𑀘 𑀩𑀼𑀤𑁆𑀥𑀸 𑀅𑀦𑀸𑀕𑀢𑀸 𑁇
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यह पालि भासा की प्रसिद्ध बुद्ध-वन्दना गाथा है।

देवनागरी रूप: 🔻

ये च बुद्धा अतीता च, ये च बुद्धा अनागता।
पच्चुप्पन्ना च ये बुद्धा, अहं वन्दामि सब्बदा॥

शब्दार्थ: 🔻

ये च बुद्धा अतीता — जो बुद्ध अतीत में हुए
ये च बुद्धा अनागता — जो बुद्ध भविष्य में होंगे
पच्चुप्पन्ना च ये बुद्धा — और जो बुद्ध वर्तमान में हैं
अहं वन्दामि सब्बदा — मैं उन सभी को सदा वन्दना करता हूँ।

भावार्थ: 🔻

अतीत में हुए सभी बुद्धों, भविष्य में होने वाले सभी बुद्धों तथा वर्तमान में विद्यमान सभी बुद्धों को मैं सदा श्रद्धापूर्वक वन्दना करता हूँ।
यह वन्दना केवल किसी इस काल या एक बुद्ध तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त बुद्धों के प्रति सार्वभौमिक श्रद्धा को व्यक्त करती है।

क्या भगवान बुद्ध ने मूर्ति पूजा से मना किया था?तो फिर पुरातत्व साक्ष्य में भगवान बुद्ध की लाखों मूर्तियाँ क्यों हैं?सबसे...
17/08/2026

क्या भगवान बुद्ध ने मूर्ति पूजा से मना किया था?
तो
फिर पुरातत्व साक्ष्य में भगवान बुद्ध की लाखों मूर्तियाँ क्यों हैं?

सबसे पहले एक जरूरी तथ्य: 🔻
प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों में ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं मिलता जिसमें भगवान बुद्ध ने कहा हो कि उनकी मूर्ति न बनाई जाए या मूर्ति के सामने श्रद्धा व्यक्त न की जाए।
हाँ, शुरुआती बौद्ध कला में भगवान बुद्ध को मानव रूप में दिखाने के बजाय उनके जीवन और ज्ञान से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल अधिक किया गया था।

“भगवान बुद्ध ने मूर्ति पूजा से मना किया था” और “बुद्ध की मूर्तियाँ बाद में बनीं” — इन दोनों बातों को एक ही अर्थ में समझना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

भगवान बुद्ध के जीवनकाल और उनके महापरिनिर्वाण के बाद शुरुआती सदियों की बौद्ध कला में खाली सिंहासन, बोधिवृक्ष, धम्म चक्र, भगवान बुद्ध के पदचिह्न और स्तूप जैसे अनेकों हजारों पूज्यनीय प्रतीक प्रमुख दिखाई देते हैं।
बुद्ध विरोधी मानसिकता के लोगों के प्रचार के कारण लंबे समय तक कला-इतिहास में इसे “Aniconism” कहा गया—अर्थात बुद्ध को मानव आकृति में प्रस्तुत न करना।
लेकिन इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि बुद्ध की प्रतिमा बनाना धार्मिक रूप से प्रतिबंधित था। यह एक myth मात्र है। भगवान बुद्ध के लिए ऐसे myth और गलत प्रचार हजारों और लाखों की संख्या में उनके विरोधियों ने समाज में फैलाए हैं। जिसमें वह सफल भी साबित हुए हैं। और आज भगवान बुद्ध के स्थान पर या उन्हें परिवर्तित करके दूसरे रूपों में पूजने की होड़ लग गई है और नए देवताओं की प्रतिमा बनने लगी है।

Susan L. Huntington जैसे कला-इतिहासकारों ने पुरानी “जानबूझकर बुद्ध की तस्वीर न बनाने” वाली व्याख्या/मानसिकता को चुनौती दी है। उनके अनुसार पुरानी बौद्ध कला को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि भगवान ने मूर्ति पूजा से मन किया है।
आज भगवान बुद्ध को बदनाम और उनकी ख्याति को धूमिल करने उनके धम्म को चोरी करने या उसे परिवर्तित करने के क्रम में बाद के लेखकों और दूषित मानसिकता के लोगों ने हरसंभव प्रयास किये।
उदाहरण के तौर पर भगवान बुद्ध के लिए हजारों नकारात्मक बातें आज भी समाज में विद्यमान है और लिखी भी गई है।
पुरातात्विक और अभिलेखीय प्रमाण इस धारणा को अधिक जटिल बनाते हैं।

फिर बुद्ध की प्रतिमाएँ कब दिखाई देने लगीं?
मानवीय आकार की मूर्ति की बात की जाए तो ऐसा माना जाता है कि विश्व में पहली प्रतिमा भगवान बुद्ध की ही बनी ।
प्रारंभिक तौर पर यह काम बहुत जटिल था परंतु बाद में लगभग पहली–दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास बौद्ध कला में महारत हासिल कर ली और एक बड़ा बदलाव दिखाई दिया। मथुरा और गांधार जैसे प्रमुख कला-केंद्रों में बुद्ध की सुंदर मानवाकार प्रतिमाएँ बनने लगीं।
मथुरा से मिली दूसरी शताब्दी की बुद्ध प्रतिमाएँ इस विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
इसी समय गांधार क्षेत्र में भी बुद्ध की ऐसी प्रतिमाएँ बनाई गईं जिनमें भारतीय धार्मिक विषयों के साथ स्थानीय और Greco-Roman कला की विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
गांधार की मूर्तियों में बुद्ध के चेहरे, बालों और वस्त्रों को जिस प्राकृतिक शैली में बनाया गया, वह उस समय की कला परंपराओं के बीच हुए सांस्कृतिक संपर्क को दिखाती है।

लेकिन यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है—
बौद्ध परंपरा में बुद्ध की प्रतिमा कई तरह से समझी गई। यह बुद्ध के जीवन की याद दिलाने वाली वस्तु हो सकती है, उनके उपदेशों का प्रतीक हो सकती है या ध्यान और श्रद्धा का माध्यम हो सकती है।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों और उनसे जुड़े स्तूपों को भी श्रद्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया गया। यानी बौद्ध समुदाय में बुद्ध की स्मृति को सम्मान देने की परंपरा बहुत पुरानी है। मानवाकार बुद्ध प्रतिमा बाद में इसी व्यापक धार्मिक और कलात्मक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अलग-अलग बौद्ध परंपराओं में प्रतिमाओं का महत्व एक जैसा नहीं रहा। थेरवाद, महायान और वज्रयान की परंपराओं में बुद्ध और अन्य बौद्ध आकृतियों की कला तथा धार्मिक उपयोग के अलग-अलग रूप विकसित हुए।
बुद्ध विरोधी मानसिकता ने इसलिए “बुद्ध ने मूर्ति पूजा से मना किया था” कहना प्रारंभ कर दिया जिससे उनकी ख्याति और पूज्यनीयता धूमिल हो सके।
उपलब्ध प्रमाण एक ज्यादा जटिल तस्वीर दिखाते हैं—पहले प्रतीकात्मक कला, फिर मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं का विकास और उसके बाद एशिया के अलग-अलग हिस्सों में बुद्ध की प्रतिमा-कला की असाधारण विविधता।
आज भारत से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं। कहीं वे ध्यान में बैठे हैं, कहीं पृथ्वी को साक्षी बना रहे हैं और कहीं धम्म का चक्र चला रहे हैं।
षड्यंत्रकारियों ने हर संभव प्रयास लगाकर भगवान बुद्ध को बदनाम करने की कोशिश की है इसके लिए उन्होंने भगवान बुद्ध से संबंधित हर वस्तु, घटना और हर सत्य को नकारात्मक दिखाने का या परिवर्तित करने का प्रयास किया है। भगवान बुद्ध मूर्ति पूजा के विरोधी थे यह बात भी पूरी तरह से असत्य है
इस पूरी परंपरा को केवल “मूर्ति पूजा” कहकर समझना अधूरा होगा। भगवान बुद्ध की प्रतिमा दरअसल लगभग दो हजार वर्षों से चल रही एक विशाल कला और स्मृति-परंपरा का हिस्सा है—जिसमें इतिहास, दर्शन, श्रद्धा और स्थानीय संस्कृति सभी एक साथ दिखाई देते हैं।

लुम्बिनी (नेपाल) से उत्तर-पूर्व में तिलोत्तमा राष्ट्रीय उद्यान के द्वीप उद्यान में बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुँचाने क...
16/08/2026

लुम्बिनी (नेपाल) से उत्तर-पूर्व में तिलोत्तमा राष्ट्रीय उद्यान के द्वीप उद्यान में बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुँचाने की यह घटना बहुत दुखद है।
विश्व सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों की इस तरह तोड़फोड़ किया जा रहा है। सरकार को दोषियों की तुरंत पहचान करनी चाहिए। उन्हें कानून के अनुसार कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
भारत और नेपाल में ऐसी घटनाएं आम बात हो गई हैं
जहां भी भगवान बुद्ध की संस्कृति पहचान और विरासत है वहां पर विरोधी मानसिकता के लोगों का ऐसा कृत देखना आम बात हो गई है।
घटना मुख्य स्थान: तिलोत्तमा राष्ट्रीय उद्यान, द्वीप उद्यान (लुम्बिनी से 27 किमी उत्तर-पूर्व में), नेपाल।

घटना: अज्ञात समूह द्वारा भगवान बुद्ध की प्रतिमा को क्षति पहुँचाना।

माँग: शामिल लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

♨️  सम्राट असोक महान का 14वाँ शिलालेख - संपूर्ण  ♨️ये प्रमुख शिलालेख है। इसमें प्रियदर्शी राजा सम्राट असोक महान खुद बतात...
16/08/2026

♨️ सम्राट असोक महान का 14वाँ शिलालेख - संपूर्ण ♨️

ये प्रमुख शिलालेख है। इसमें प्रियदर्शी राजा सम्राट असोक महान खुद बताते हैं कि उन्होंने ये लेख क्यों और कैसे लिखवाए गए है।
गिरनार संस्करण सबसे पूर्ण है।

मूल धम्मलिपि पाठ - गिरनार 🔻

𑀅𑀬𑀁 𑀥𑀁𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁂𑀦 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺𑀦𑀸 𑀭𑀸𑀜𑁂 𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸। 𑀇𑀫𑀸𑀫𑀺 𑀓𑀺𑀙𑀺 𑀲𑀁𑀔𑀺𑀢𑁂𑀦 𑀓𑀺𑀙𑀺 𑀫𑀚𑁆𑀛𑀺𑀫𑁂𑀦 𑀓𑀺𑀙𑀺 𑀯𑀺𑀣𑀸𑀭𑁂𑀦 𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸। 𑀲𑀯𑁂𑀦 𑀲𑀯𑀁 𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀁 𑀦 𑀳𑀺 𑀲𑀯𑀁 𑀲𑀯𑀢 𑀲𑀼𑀔𑀁 𑀲𑀺𑀬𑀸। 𑀮𑁂𑀔𑀦𑀁 𑀘 𑀤𑀼𑀯𑀮𑀺𑀬𑁂 𑀇𑀫𑀸𑀫𑀺 𑀘 𑀧𑀼𑀦 𑀧𑀼𑀦 𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀁 𑀓𑀺𑀁𑀢𑀺 𑀚𑀦𑁄 𑀇𑀫𑀁 𑀅𑀦𑀼𑀯𑀢𑁂𑀢𑀺। 𑀅𑀧𑀺 𑀘 𑀓𑀦𑀺𑀓𑀁 𑀅𑀢𑀺𑀭𑁂𑀓𑁂𑀦 𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀁।
अयं धंमलिपि देवानंपियेन पियदसिना राञे लेखापिता। इमामि किछि संखितेन किछि मज्झिमेन किछि विथारेन लेखापिता। सवेन सवं लेखापितं न हि सवं सवत सुखं सिया। लेखनं च दुवलिये इमामि च पुन पुन लेखापितं किंति जनो इमं अनुवतेति। अपि च कनिकं अतिरेकेन लेखापितं।

हिंदी अनुवाद 🔻

देवानमप्रिय प्रियदर्शी राजा ने यह धम्मलिपि लिखवाई है।
इस धम्मलिपि में कहीं बात संक्षेप में कही गई है, कहीं मध्यम रूप से कही गई है, और कहीं विस्तार से कही गई है।
सारी बात सब जगह नहीं लिखी गई है, क्योंकि राज्य बड़ा है और बहुत कुछ लिखा गया है।
और ऐसा न हो कि लोग इसे सुख से, सही से न समझ पाएँ।
लेखन में कठिनाई भी है। इसीलिए इसे बार-बार लिखवाया गया है, ताकि लोग इसका अनुसरण करें।
और कहीं-कहीं बात को विशेष रूप से बढ़ाकर भी लिखवाया गया है।

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