श्री कल्याण वैदिकम्

श्री कल्याण वैदिकम् Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from श्री कल्याण वैदिकम्, Religious Center, Lucknow.
(1)

🔱 सनातन वांग्मय के आलोक में लोक-कल्याण का संकल्प।
ज्योतिषीय विमर्श, प्रामाणिक आयुर्वेद, रुद्राक्ष विज्ञान, योग-ध्यान, मंत्र-साधना, धार्मिक यात्रा, देवभाषा संस्कृत एवं शास्त्रीय पूजा-पद्धति के माध्यम से आत्मिक एवं भौतिक अभ्युदय का प्रामाणिक केंद्र।

09/08/2026
✴॥  श्री नन्दिकेश्वरस्तोत्रम् ॥✴🌿भवेशं भवेशानमीड्यं सुरेशं विभुं विश्वनाथं भवानीसमाद्यम् ।शरच्चन्द्रगात्रं सुधापूर्णनेत्...
09/08/2026

✴॥ श्री नन्दिकेश्वरस्तोत्रम् ॥✴

🌿भवेशं भवेशानमीड्यं सुरेशं विभुं विश्वनाथं भवानीसमाद्यम् ।
शरच्चन्द्रगात्रं सुधापूर्णनेत्रं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥१॥🌿

🌿हिमाद्रौ निवासं स्फुरच्चन्द्रचूडं विभूतिं दधानं महानीलकण्ठम् ।
प्रभुं दिग्भुजं शूलटङ्कायुधाढ्यं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥२॥🌿

🌿भवेशं गजेशं प्रपन्नार्तिनाशं विभास्वत्समुद्यत्प्रभाकान्तिपूरम् ।
भवानीयुतार्धाङ्गशोभाभिरामं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥३॥🌿

🌿मृगाङ्कायुतप्रक्षदीप्तिप्रकाशं ज्वलद्वह्निकेशं शशाङ्कार्धभालम् ।
सदा भक्तचित्ते स्फुरन्मोदरूपं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥४॥🌿

🌿वराभीतिहस्तं कुठारेशपाणिं जटाजूटगङ्गोल्लसद्वारिधारम् ।
विषाशं महोक्षाधिरूढं मदारिं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥५॥🌿

🌿जगत्या विभूषं मृगेन्द्राजिनधृत् षडाम्नायमन्त्रप्रसिद्धार्थमूलम् ।
प्रसादादि मन्त्रस्फुरज्ज्ञानहेतुं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥६॥🌿

🌿भवानीपदाम्भोजहृत्पद्मसंस्थं सुरेन्द्रादि देवैः सदा सेव्यमानम् ।
नगेन्द्रात्मजाप्राणनाथं शरण्यं भजे नन्दिकेशं दरिद्रार्तिनाशम् ॥७॥🌿

🌿भवे नन्दीशानं सकलमनुसिद्ध्यैककरणं वसुश्लोकैरेभिः प्रतिदिनमपि स्तौति नित्यम् ।🌿
🌿तदैवेशप्रीत्या निखिलसुखभागीह जगति परं मोक्षं चान्ते परमपदमाप्नोति सहसा ॥८॥🌿

✴॥ इति नन्दिकेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥✴

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼

🔶️हिन्दी अर्थ🔶️

🌸१. भवेश, भवानी-सम पूज्य, देवाधिदेव, विश्वनाथ, शरत्-चन्द्र सम गात्रवर्ण, अमृतपूर्ण नेत्रों वाले, दरिद्रों की पीड़ा हरने वाले नन्दिकेश का मैं भजन करता हूँ।🌸

🌸२. हिमालयवासी, चमकते चन्द्र-मुकुटधारी, विभूतिधारी, नीलकण्ठ, दिशाओं तक फैली भुजाओं वाले, त्रिशूल-परशुधारी प्रभु नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸३. भवेश, गजासुर-संहारक, शरणागतों की पीड़ा हरने वाले, उदित सूर्य-सम कान्तिवान्, पार्वती-सहित अर्धांग-शोभा से सुशोभित नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸४. असंख्य चन्द्रमाओं-सी दीप्ति, अग्नि-सम जटा, अर्धचन्द्र-भाल, सदा भक्तों के चित्त में आनन्दरूप से स्फुरित नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸५. वर-अभय मुद्रा वाले, परशुधारी, जटाजूट में गंगाजल-धारी, विषपायी, महावृषभारूढ़, कामदेव के शत्रु नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸६. जगत् के भूषणस्वरूप, व्याघ्रचर्मधारी, षडाम्नाय-मन्त्रों के अर्थ-मूल, प्रसादादि मन्त्रों से ज्ञान-स्फुरण के हेतु नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸७. हृदय-कमल में भवानी के चरणकमल धारण करने वाले, इन्द्रादि देवों द्वारा सदा सेवित, पार्वती के प्राणनाथ, शरणागत-वत्सल नन्दिकेश का भजन करता हूँ।🌸

🌸८. (फलश्रुति)🌸

🌸जो इन आठ श्लोकों से नित्य मन्त्रसिद्धिदाता नन्दिकेश की स्तुति करता है, वह ईश्वर की प्रसन्नता से इस जगत् में समस्त सुख भोगकर अन्ततः शीघ्र मोक्षरूपी परमपद प्राप्त करता है।🌸

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼

श्री कल्याण वैदिकम्

🌼🍂॥श्री पशुपतिनाथाष्टकम्॥🍂🌼🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🙏ध्यानम्:🙏🌸ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसंरत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं...
08/08/2026

🌼🍂॥श्री पशुपतिनाथाष्टकम्॥🍂🌼

🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂

🙏ध्यानम्:🙏

🌸ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।🌸

🌸पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥🌸

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

✴स्तोत्रम्:✴

🌿पशुपतिं द्युपतिं धरणिपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥१॥🌿

🌿न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥२॥🌿

🌿मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम् ।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥३॥🌿

🌿शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् ।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥४॥🌿

🌿नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् ।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥५॥🌿

🌿मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम् ।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥६॥🌿

🌿मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम् ।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥७॥🌿

🌿हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् ।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥८॥🌿

🌺पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा ।
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥९॥🌺

🌸॥ इति पृथ्वीपतिसूरिविरचितं पशुपतिनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ॥🌸

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼

🌺अर्थ🌺

🍂ध्यान:🍂

🌼नित्य महेश का ध्यान करें — रजत-पर्वत सम श्वेत, सुन्दर चन्द्र-मुकुटधारी, रत्नाभूषणों से उज्ज्वल, हाथों में परशु-मृग-वरद-अभय मुद्रा लिए प्रसन्नमुख, पद्मासनस्थ, देवगणों द्वारा स्तुत, व्याघ्रचर्मधारी, विश्व के आदिकारण-बीजस्वरूप, समस्त भयनाशक, पंचमुख त्रिनेत्रधारी।🌼

🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂

🌿१. हे मनुष्यों! स्वर्ग, पृथ्वी व नागलोक के स्वामी, शरणागत भक्तों की पीड़ा हरने वाले पार्वतीपति पशुपतिनाथ का भजन करिये।🌿

🌿२. काल के वश हुए जीव को माता, पिता, भाई, पुत्र, बल या कुल — कोई नहीं बचा सकता; अतः गिरिजापति का भजन करिये।🌿

🌿३. मृदंग-डमरू बजाने में निपुण, मधुर पंचम स्वर में कुशल, प्रमथगणों से सेवित शिव का भजन करिये।🌿

🌿४. शरण, सुख व अभय देने वाले, करुणा के सागर, जिन्हें मनुष्य "शिव-शिव" कहकर नमन करते हैं, उनका भजन करिये।🌿

🌿५. नरमुण्ड-कुण्डलधारी, सर्पहार से प्रसन्न, चिताभस्म-रञ्जित शरीर वाले वृषभध्वज शिव का भजन करिये।🌿

🌿६. दक्षयज्ञ-विनाशक, चन्द्रशेखर, यज्ञकर्ताओं को फलदाता, प्रलयकाल में सुर-असुर-मानव को दग्ध करने वाले शिव का भजन करिये।🌿

🌿७. जन्म-मरण-जरा से पीड़ित, भयाकुल इस जगत को देखकर, हृदय का अहंकार त्यागकर शिव का भजन करिये।🌿

🌿८. ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र से पूजित, यम-कुबेर से नमस्कृत, त्रिनेत्रधारी त्रिभुवनाधिपति शिव का भजन करिये।🌿

🌿९. पृथ्वीपतिसूरि द्वारा रचित इस अद्भुत अष्टक को जो नित्य पढ़ता या सुनता है, वह शिवपुरी में निवास कर आनन्द प्राप्त करता है।🌿

🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️🔶️

#पशुपति #शिव #शंकर #महादेव #भोलेनाथ #महाकाल #श्री_कल्याण_ज्योतिष

श्री कल्याण वैदिकम्

श्री कल्याण ज्योतिष

✴🌺वैदिक ज्योतिष एवं आयुर्वेद🌺✴🌺भाग – ६🌺🌺पञ्चमहाभूत — सृष्टि से शरीर तक पाँच तत्त्वों की शास्त्रीय यात्रा🌺💠भूमिका💠पिछले भ...
08/08/2026

✴🌺वैदिक ज्योतिष एवं आयुर्वेद🌺✴

🌺भाग – ६🌺

🌺पञ्चमहाभूत — सृष्टि से शरीर तक पाँच तत्त्वों की शास्त्रीय यात्रा🌺

💠भूमिका💠

पिछले भाग में हमने यह समझने का प्रयास किया कि लोक और पुरुष के मध्य साम्य क्यों माना गया। अब उसी विचार से एक स्वाभाविक प्रश्न जन्म लेता है—

यदि बाह्य जगत् और मानव-शरीर में तात्त्विक साम्य है, तो दोनों की रचना किन मूल तत्त्वों से मानी गई है?

🔸️आयुर्वेद का उत्तर है—पञ्चमहाभूत।🔸️

आकाश, वायु, अग्नि, आप और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत आयुर्वेद की तत्त्वमीमांसा के आधारभूत स्तम्भ हैं। महर्षि चरक के अनुसार समस्त द्रव्य पाञ्चभौतिक हैं। इसका आशय यह नहीं कि संसार में केवल पाँच स्थूल पदार्थ हैं, बल्कि यह कि प्रत्येक द्रव्य में इन पाँच तत्त्वों की सहभागिता किसी न किसी रूप में विद्यमान है।

यहीं से पञ्चमहाभूतों की वास्तविक समझ आरम्भ होती है।

आयुर्वेद में पृथ्वी केवल मिट्टी नहीं है, जल केवल तरल पदार्थ नहीं और अग्नि केवल दिखाई देने वाली ज्वाला नहीं। इनके पीछे पदार्थ के स्वरूप, गुण और कार्य को समझने की एक सूक्ष्म तात्त्विक दृष्टि है।

अतः पञ्चमहाभूतों को समझना पाँच नाम स्मरण कर लेना भर नहीं है। यह उस दृष्टि को समझना है जिसके द्वारा हमारे आचार्यों ने सृष्टि और शरीर को एक ही तात्त्विक धरातल पर देखा।

---

🔳पञ्चमहाभूतों का शास्त्रीय स्वरूप🔳

महर्षि चरक ने चरकसंहिता, शारीरस्थान में पाँच महाभूतों का क्रम दिया है—

आकाश, वायु, अग्नि, आप और पृथ्वी।

इन्हीं के साथ क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को उनके विशिष्ट गुणों के रूप में बताया गया है।

यहाँ 'गुण' शब्द को सामान्य अर्थ में लेना पर्याप्त नहीं होगा। ये गुण उस महाभूत की विशिष्ट पहचान और उसकी अनुभूति को समझने का माध्यम हैं।

आकाश का विशेष सम्बन्ध शब्द से,
वायु का स्पर्श से,
अग्नि का रूप से,
आप का रस से,
और पृथ्वी का गन्ध से माना गया है।

यह क्रम हमें एक महत्त्वपूर्ण बात सिखाता है—ऋषियों ने प्रकृति को केवल उसके स्थूल रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसके गुण और अनुभूति को भी तत्त्व-विचार का आधार बनाया।

इसीलिए पञ्चमहाभूतों की चर्चा वस्तुतः प्रकृति को देखने की एक विशिष्ट भारतीय पद्धति है।

---

🔘आकाश — जहाँ से अवकाश का आरम्भ होता है🔘

सबसे पहले है आकाश।

आकाश को केवल ऊपर दिखाई देने वाले नभ के रूप में समझना उसके शास्त्रीय अर्थ को सीमित कर देना होगा। आकाश का मूल भाव है—अवकाश, अर्थात् वह स्थान जिसमें किसी वस्तु या क्रिया के लिए सम्भावना उत्पन्न हो सके।

जहाँ अवकाश नहीं, वहाँ गति कहाँ होगी?
जहाँ स्थान नहीं, वहाँ किसी वस्तु का अस्तित्व किस प्रकार व्यक्त होगा?

शरीर में भी अनेक प्रकार के मार्ग, गुहाएँ और सूक्ष्म स्थान हैं। श्वास का मार्ग हो, भोजन के संचरण का पथ हो अथवा शरीर के भीतर स्थित विभिन्न अवकाश—इनकी कल्पना आकाश-तत्त्व के बिना पूर्ण नहीं होती।

इस दृष्टि से आकाश केवल रिक्तता नहीं है।

वह वह आधार है जिसमें अन्य तत्त्वों की अभिव्यक्ति सम्भव होती है।

यही कारण है कि आकाश को समझे बिना आगे आने वाले वायु-तत्त्व को भी पूर्णतः समझना कठिन है।

---

🍂वायु — गति का तत्त्व🍂

जहाँ आकाश अवकाश देता है, वहाँ वायु गति का बोध कराती है।

वायु को केवल बाहर बहने वाली हवा समझना भी उसी प्रकार सीमित दृष्टि होगी। आयुर्वेद में वायु का सम्बन्ध गति, चलन और परिवर्तनशीलता से है।

शरीर में श्वास-प्रश्वास, विभिन्न प्रकार की गतियाँ, आकुंचन-प्रसारण तथा अनेक शारीरिक क्रियाओं को समझने में वायु-तत्त्व का विचार महत्त्वपूर्ण है।

यहाँ एक सूक्ष्म सम्बन्ध दिखाई देता है—

आकाश सम्भावना देता है और वायु उस सम्भावना को गति प्रदान करती है।

इस प्रकार पञ्चमहाभूतों का अध्ययन केवल बाह्य प्रकृति का अध्ययन नहीं रह जाता। वही सिद्धान्त शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को समझने की दिशा में भी प्रयुक्त होता है।

---

🔷️अग्नि — परिवर्तन की शक्ति🔷️

अब आता है अग्नि।

अग्नि का नाम सुनते ही लौ का स्मरण होता है, परन्तु आयुर्वेद की अग्नि इससे कहीं व्यापक अवधारणा है।

जहाँ परिवर्तन है, वहाँ अग्नि के सिद्धान्त की चर्चा होती है।

अन्न का पाचन हो, किसी पदार्थ का स्वरूप बदलना हो अथवा शरीर में उष्णता और रूपान्तरण की प्रक्रिया—इन सबको समझने में अग्नि की संकल्पना महत्त्वपूर्ण है।

इसलिए अग्नि को केवल ताप के रूप में देखना पर्याप्त नहीं।

अग्नि वह शक्ति है जिसके द्वारा एक अवस्था दूसरी अवस्था में परिवर्तित होती है।

यहीं से आगे आयुर्वेद में पाचन और अग्नि का सम्बन्ध अधिक स्पष्ट होता है। परन्तु अग्नि का सम्पूर्ण विवेचन अभी हमारा विषय नहीं; वह आगे शरीर की पोषण-प्रक्रिया और धातु-परिपोषण के प्रसंग में अधिक अर्थपूर्ण होगा।

---

🔳आप — स्नेह और द्रवता का आधार🔳

अग्नि के पश्चात् आता है आप महाभूत।

आप अर्थात् जल। किन्तु यहाँ भी केवल दिखाई देने वाले जल तक अर्थ सीमित नहीं है।

आप-तत्त्व का सम्बन्ध द्रवता, स्निग्धता, शीतलता और संयोग जैसे भावों से है। शरीर की अनेक संरचनाओं और क्रियाओं में द्रवता और स्नेह की आवश्यकता होती है। शरीर के भीतर विभिन्न द्रव पदार्थों के अस्तित्व को समझने में आप-तत्त्व की संकल्पना अपना स्थान रखती है।

यदि अग्नि परिवर्तन की शक्ति है, तो आप उस परिवर्तनशील व्यवस्था में स्नेह और द्रवता का आधार प्रदान करता है।

प्रकृति में भी यही दिखाई देता है—अत्यधिक शुष्कता जीवन के लिए अनुकूल नहीं और केवल द्रवता भी पर्याप्त नहीं। जीवन को धारण करने के लिए विभिन्न तत्त्वों का समुचित सामंजस्य आवश्यक है।

---

💠पृथ्वी — धारण और स्थैर्य💠

पञ्चमहाभूतों में अन्तिम है पृथ्वी।

पृथ्वी का मूल भाव है—धारण, स्थैर्य और घनत्व।

शरीर की स्थूल संरचना, दृढ़ता और धारण-शक्ति को समझने में पृथ्वी-तत्त्व की प्रधानता मानी जाती है।

हमारे शरीर में जो कुछ हमें स्थिरता और आधार प्रदान करता है, उसे पृथ्वी-तत्त्व के सिद्धान्त से समझा जाता है।

इस प्रकार पाँचों महाभूतों को केवल पाँच अलग-अलग वस्तुओं के रूप में देखने के स्थान पर उनके मूल भाव को समझें तो एक सुन्दर क्रम सामने आता है—

आकाश — अवकाश
वायु — गति
अग्नि — रूपान्तरण
आप — द्रवता और स्नेह
पृथ्वी — धारण और स्थैर्य

यही क्रम पञ्चमहाभूतों को समझने का एक सरल प्रवेश-द्वार है।

---

🔶️क्या शरीर भी पञ्चभौतिक है?🔶️

अब वह प्रश्न आता है जो हमारे इस पूरे विवेचन को शरीर से जोड़ता है—

क्या मानव-शरीर में भी यही पाँच महाभूत विद्यमान माने गए हैं?

आयुर्वेद का उत्तर स्पष्ट है—हाँ।

शरीर सहित समस्त द्रव्यों को पाञ्चभौतिक माना गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर के किसी एक अंग में केवल एक महाभूत है। पाँचों महाभूत द्रव्यों में सम्मिलित रहते हैं, किन्तु उनकी प्रधानता और गुणात्मक अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न हो सकती है।

इसी कारण शरीर के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप को समझने में पञ्चमहाभूतों का विचार किया जाता है।

आहार भी इसी व्यवस्था का अंग है। जो अन्न हम ग्रहण करते हैं, वह बाह्य जगत् से आया हुआ पाञ्चभौतिक द्रव्य है। पाचन के पश्चात् वही शरीर के पोषण में सहभागी बनता है।

यहीं भाग–५ का लोक–पुरुष साम्य सिद्धान्त एक नये स्तर पर स्पष्ट होता है।

बाह्य जगत् और शरीर में साम्य केवल विचार की बात नहीं रह जाता; दोनों की पाञ्चभौतिकता के कारण उनके बीच एक तात्त्विक सम्बन्ध स्थापित होता है।

मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ा हुआ कोई पृथक् अस्तित्व नहीं है। वह उसी प्रकृति का एक सजीव और चेतन अभिव्यक्त रूप है।

---

⚛पञ्चमहाभूत से आगे की यात्रा⚛

यहाँ एक और महत्त्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।

पञ्चमहाभूतों का अध्ययन कर लेने से आयुर्वेद के शरीर-विज्ञान की यात्रा समाप्त नहीं होती। वास्तव में यहीं से शरीर के अधिक सूक्ष्म संगठन को समझने का मार्ग खुलता है।

पाँच महाभूतों से निर्मित यह शरीर कैसे पोषित होता है?
उसके विभिन्न ऊतक और संरचनाएँ किस क्रम से धारण होती हैं?
भोजन शरीर में जाकर किस प्रकार क्रमशः पोषण का आधार बनता है?

इन प्रश्नों का उत्तर हमें सप्तधातु के अध्ययन में प्राप्त होगा।

इसीलिए हमारी निर्धारित यात्रा में अभी त्रिदोष का प्रवेश नहीं होगा।

पहले पञ्चमहाभूत, फिर—

रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।

और उसके पश्चात् हम त्रिदोष की ओर बढ़ेंगे।

यह क्रम केवल विषयों की सुविधा के लिए नहीं है। मूल तत्त्वों को समझे बिना धातुओं और धातुओं को समझे बिना दोषों की वास्तविक भूमिका को समझना कठिन होगा।

अतः पञ्चमहाभूत हमारे लिए अन्तिम पड़ाव नहीं, बल्कि शरीर-विज्ञान की अगली यात्रा का द्वार हैं।

---

🌺उपसंहार🌺

पञ्चमहाभूतों की संकल्पना हमें सृष्टि और शरीर को देखने की एक ऐसी दृष्टि देती है जिसमें दोनों के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं रह जाता।

आकाश में अवकाश है, वायु में गति, अग्नि में रूपान्तरण, आप में स्नेह और द्रवता तथा पृथ्वी में धारण और स्थैर्य।

इन तत्त्वों को केवल बाह्य पदार्थ मान लेना इनके शास्त्रीय स्वरूप को छोटा कर देना होगा। आयुर्वेद ने इनके माध्यम से प्रकृति के गुणात्मक स्वरूप और शरीर की संरचना के बीच सम्बन्ध को समझने का प्रयास किया है।

पिछले भाग में हमने लोक और पुरुष के साम्य को समझा था। इस भाग में उसी साम्य का तात्त्विक आधार—पञ्चमहाभूत—हमारे सामने आया।

अब अगला प्रश्न स्वाभाविक है—

इन पञ्चभूतों से निर्मित शरीर का पोषण किस क्रम से होता है?

यहीं से हमारी अगली यात्रा आरम्भ होगी—

पञ्चमहाभूत से सप्तधातु तक।

---

🌸शास्त्रीय सन्दर्भ🌸

चरकसंहिता — शारीरस्थान, अध्याय १; सूत्रस्थान, अध्याय २६।
सुश्रुतसंहिता — शारीरस्थान, सर्वभूतचिन्ताशारीर तथा सम्बन्धित पञ्चमहाभूत-विवेचन।

चरकसंहिता के शारीरस्थान में आकाश, वायु, अग्नि, आप और पृथ्वी के साथ उनके विशिष्ट गुणों का क्रम मिलता है तथा सूत्रस्थान में द्रव्यों की पाञ्चभौतिकता का प्रतिपादन किया गया है। सुश्रुतसंहिता में भी पुरुष की पाञ्चभौतिकता तथा महाभूतों के शरीरगत स्वरूप का विवेचन मिलता है।

---

🙏विशेष निवेदन🙏

यह ज्ञान-शृंखला श्री कल्याण वैदिकम् द्वारा अध्ययन, शास्त्रीय मनन एवं मौलिक प्रस्तुति का परिणाम है।

आपसे विनम्र निवेदन है कि इस लेख को यथावत् अथवा आंशिक रूप से अपने नाम से प्रकाशित न करें। ज्ञान का प्रसार अवश्य करें, किन्तु मूल लेखक एवं स्रोत का सम्मान करते हुए "श्री कल्याण वैदिकम्" का स्पष्ट उल्लेख करें अथवा मूल आलेख साझा करें।

ज्ञान का प्रसार हो, किन्तु मौलिक श्रम का सम्मान भी बना रहे। 🌺

© श्री कल्याण वैदिकम्
शास्त्र • प्रमाण • परम्परा

-------------------

#श्री_कल्याण_वैदिकम्
#वैदिक_ज्योतिष_एवं_आयुर्वेद
#चिकित्सा_ज्योतिष
#आयुर्वेद
#पञ्चमहाभूत
#भारतीय_ज्ञान_परम्परा
#चरकसंहिता
#सुश्रुतसंहिता
#शास्त्र_प्रमाण_परम्परा

श्री कल्याण ज्योतिष

✴॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥✴🔶️प्रथमोऽध्यायः🔶️✴अर्जुनविषादयोगः✴🔳❖ भाग ५ • श्लोकौ ९–१० ❖🔳---⚛श्लोक ९⚛🔶️अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे ...
07/08/2026

✴॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥✴

🔶️प्रथमोऽध्यायः🔶️

✴अर्जुनविषादयोगः✴

🔳❖ भाग ५ • श्लोकौ ९–१० ❖🔳

---

⚛श्लोक ९⚛

🔶️अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥🔶️

⚛सरल हिन्दी भावार्थ⚛

💠इसके अतिरिक्त भी अनेक ऐसे पराक्रमी वीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों का भी त्याग करने का निश्चय कर लिया है। वे विविध प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित तथा युद्धकला में अत्यन्त निपुण हैं।💠

---

⚛श्लोक १०⚛

🔷️अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१०॥🔷️

💠सरल हिन्दी भावार्थ💠

🔶️पितामह भीष्म द्वारा संरक्षित हमारी सेना असीम और प्रबल है; जबकि भीम द्वारा संरक्षित पाण्डवों की सेना तुलनात्मक रूप से सीमित प्रतीत होती है।🔶️

---

॥ श्री कल्याण वैदिकम् ॥

🙏कल्याणप्रार्थना🙏🍂हे आशुतोष हे शम्भो हे कैलाशनिवासक।कल्याणं सर्वजीवानां त्वत्तः कामयते जनः॥१॥🍂🍂दारिद्र्यं ते कृपादृष्ट्य...
06/08/2026

🙏कल्याणप्रार्थना🙏

🍂हे आशुतोष हे शम्भो हे कैलाशनिवासक।
कल्याणं सर्वजीवानां त्वत्तः कामयते जनः॥१॥🍂

🍂दारिद्र्यं ते कृपादृष्ट्या नश्यतां सर्वदेहिनाम्।
समृद्धिं देहि सर्वेषां कुटुम्बेष्वपि सम्पदम्॥२॥🍂

🍂आयुर्दीर्घं प्रयच्छ त्वं देहमारोग्यमेव च।
सुबुद्धिं देहि चित्तेषु सन्मार्गे गतिमेव च॥३॥🍂

🍂विवेकं देहि लोकानां भ्रममोहौ हरस्व च।
करुणां वर्धयाशेषे लोभलिप्से विनाशय॥४॥🍂

🍂सद्गुणान् वर्धयाद्य त्वं दुर्व्यसनानि नाशय।
सत्सङ्गं प्रापयास्माकं कुसङ्गं दूरतः कुरु॥५॥🍂

🍂क्रोधं शमय सर्वेषां सौहार्दं वर्धयाखिलम्।
वैमनस्यं विवादं च क्लेशं चापि निवारय॥६॥🍂

🍂अधर्मं नाशयाशेषं धर्मे स्थैर्यं प्रयच्छ नः।
अपराधाद्दुष्प्रवृत्तेर्मुक्तिं देहि जनाय ते॥७॥🍂

🍂सदिच्छाः पूरयाद्यत्वं शान्तिं सौख्यं तथैव च।
इति श्रीकल्याणवैदिकं त्वां शम्भो प्रार्थयते सदा॥८॥🍂

🛐ॐ नमः शिवाय।🛐

🙏श्री कल्याण वैदिकम्🙏

-----------------------------------

**🙏कल्याण-प्रार्थना🙏**

🍂हे आशुतोष! हे भोलेनाथ! हे कैलाशनिवासी शम्भो! श्री कल्याण वैदिकम् आपसे समस्त प्राणियों के कल्याण की सविनय प्रार्थना करता है।🍂

🍂हे महादेव! अपनी कृपादृष्टि से सबके कुटुम्बों का सर्वांगीण कल्याण करें। दारिद्र्य व दीनता का समूल नाश करें, प्रत्येक गृह में समृद्धि व सम्पन्नता प्रदान करें। सबको दीर्घायु, निरामय देह व सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रदान करें।🍂

🍂हे शिव! सबके चित्त में सुबुद्धि जाग्रत करें, जीवन को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, विचारों में सुविचार व विवेक भरें तथा समस्त भ्रम व मिथ्याग्रह हर लें। हृदयों में करुणा व सहानुभूति बढ़ाएँ, बुद्धि को सम्यक् ज्ञान से आलोकित करें। लोभ, मोह व लिप्सा का नाश करें, सद्गुणों को सहज बढ़ाएँ तथा दुर्व्यसन व कुसंस्कारों से मुक्ति प्रदान करें।🍂

🍂हे त्रिपुरारि! सबके दुःख, क्लेश व सन्ताप हर लें, क्रोध को शान्त करें, चित्त को प्रसन्न रखें। सम्बन्धों में माधुर्य व सौहार्द बनाए रखें, वैमनस्य, विवाद व कलह सदा के लिए दूर करें, कुसंगति से दूरी बनाए रखें तथा सत्संगति प्रदान करें। अधर्म का नाश करें, धर्माचरण में स्थिरता दें, अपराध व दुष्प्रवृत्तियों से मुक्ति प्रदान करें।🍂

🍂हे महादेव! सबकी सदिच्छाएँ व सत्कामनाएँ पूर्ण करें तथा जीवन में स्थायी सुख, शान्ति व समृद्धि प्रदान करें — यही श्री कल्याण वैदिकम् की आपसे सविनय प्रार्थना है।🍂

**🙏ॐ नमः शिवाय।🙏**

— 🙏श्री कल्याण वैदिकम्🙏

Address

Lucknow
226011

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when श्री कल्याण वैदिकम् posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share