02/09/2024
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आप बिना माँगे खेले और ऐसा खेले, वाह! क्या गज़ब खेले कि हीरे-मोती लुटाये जा रहे हैं आप पर। और आप पर हीरे-मोती लुटाये जा रहे हैं, तो आप ऐसे खड़े हो जैसे कुछ मिला ही नहीं। आप कह रहे हो, ‘ये जो भी कर रहे हो ये कार्यक्रम जल्दी कर लो। और ये सब जो है, फैला दिया है; बढ़िया है! अच्छा लग रहा है, चमक रहा है, धन्यवाद। अब ज़रा इसको जल्दी समेट भी लो।’ क्यों? ‘हमें खेलना है, हमें खेलना है।’
ऐसे में जिसने हीरे-मोती लुटाये भी होते हैं न, वो भी धन्य हो जाता है। वो कहता है, ‘बिलकुल सही चुनाव करा मैंने, बिलकुल सही व्यक्ति पर जीवन की सम्पदा लुटायी है। अगर इसको मैं देता और लेते वक्त उत्साह से और आह्लाद से इसके हाथ काँप रहे होते, तो सिद्ध हो जाता कि मैंने गलत व्यक्ति को दे दिया है। ये जो इसकी उपेक्षा है, ये जो इसकी बेपरवाही है, वही साबित कर रही है कि यही हकदार था सब सम्पदा का।’
और ये जीवन का बड़ा विचित्र नियम है। आप इसको जितना समझ लें जल्दी और गहराई से उतना अच्छा है — नहीं माँगोगे, जीवन आप पर सबकुछ न्यौछावर कर देगा और भिखारी की तरह कटोरा लेकर कलपोगे, तो आपका कटोरा भी छीन लेगा। सबसे ज़्यादा व्यर्थ जीवन उस व्यक्ति का है जिसके चेहरे पर हमेशा दीनता का भाव रहता है। दीनता — ‘मैं कमज़ोर हूँ, मैं छोटा हूँ, मैं कायर हूँ, मैं बीमार हूँ’। और ये बहुत बड़े दुर्भाग्य की इसलिए भी है क्योंकि ये भाव आपकी विवशता नहीं होता, आपका चुनाव होता है।
~ आचार्य प्रशांत