Kaivalya Siddhi Dham

Kaivalya Siddhi Dham Ethical, Moral and Spiritual

मल्लिकार्जुन ........पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों पुत्रों - गणेश और कार्तिकेय के ब...
13/08/2026

मल्लिकार्जुन ........
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों पुत्रों - गणेश और कार्तिकेय के बीच इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा छिड़ गई कि दोनों में से किसका विवाह पहले होगा।

इस विवाद को सुलझाने के लिए महादेव और माता पार्वती ने एक शर्त रखी कि "तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, उसी का विवाह प्रथम संपन्न किया जाएगा।"

कार्तिकेय जी का प्रयास: कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े।
गणेश जी की बुद्धिमत्ता: गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) था, जिससे पृथ्वी की परिक्रमा करना कठिन था। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का उपयोग किया और अपने माता-पिता (शिव- पार्वती) को ही साक्षात ब्रह्मांड मानकर उनके चारों ओर सात बार परिक्रमा कर ली।
शास्त्रों के अनुसार, माता-पिता की परिक्रमा करना पृथ्वी की परिक्रमा करने के समान माना जाता है। इस कारण गणेश जी को विजेता घोषित कर दिया गया और उनका विवाह रिद्धि और सिद्धि के साथ कर दिया गया।

जब कार्तिकेय जी पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे,तो उन्होंने देखा कि गणेश जी का विवाह पहले ही हो चुका है। इस बात से वे अत्यंत दुखी और रुष्ट (क्रोधित) हो गए। उन्हें लगा कि उनके साथ अन्याय हुआ है, जिसके कारण उन्होंने कैलाश त्यागने का निर्णय लिया।

कार्तिकेय जी कैलाश छोड़कर दक्षिण भारत की ओर क्रौंच पर्वत पर चले गए। माता पार्वती और भगवान शिव अपने पुत्र के वियोग से अत्यंत व्याकुल हो उठे।

माता-पिता का आगमन: अपने पुत्र को मनाने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती स्वयं क्रौंच पर्वत पर पहुँचे। जब कार्तिकेय जी को पता चला कि उनके माता-पिता आ रहे हैं, तो वे मर्यादावश वहां से और दूर चले गए। अपने पुत्र के प्रति स्नेह और उसकी प्रतीक्षा में भगवान शिव और माता पार्वती उसी पर्वत पर ज्योति के रूप में स्थापित हो गए।
इस स्थान को 'मल्लिकार्जुन' कहा गया। यहाँ 'मल्लिका' माता पार्वती का नाम है और 'अर्जुन' भगवान शिव का।
मान्यता है कि पुत्र मोह के कारण भगवान शिव प्रत्येक अमावस्या को और माता पार्वती प्रत्येक पूर्णिमा को यहाँ स्वयं उपस्थित होते हैं। आंध्रप्रदेश के श्रीशैलम में स्थित यह मल्लिकार्जुन मंदिर भगवान शिव के 12ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे 'कैलाश' के समान ही पवित्र माना जाता है।

08/08/2026
शक्ति उपासकों की दृष्टि में भगवद् गीता का स्वरूपश्रीमद् देवी भागवत नामक ग्रंथ में भगवती कहती है जब-जब धर्म की हानि होती ...
19/07/2026

शक्ति उपासकों की दृष्टि में भगवद् गीता का स्वरूप
श्रीमद् देवी भागवत नामक ग्रंथ में भगवती कहती है

जब-जब धर्म की हानि होती है और धर्म की वृद्धि होती है तथा सज्जन लोगों को पीड़ा पहुंचाई जाती है तब मैं ही नाना विद रूपों में अवतार ग्रहण करती हूं|
भगवती एक और बात कहती है की मूल में ना तो मैं स्त्री हूं न पुरुष हूं और न षंड ही हु परिस्थिति के अनुसार जब जी शरीर की आवश्यकता होती है उसे स्वरूप को उदाहरण करके मैं संसार की रक्षा करती हूं कभी पुरुष कभी स्त्री और कभी पशु स्वरूप|

देवी पुराण में हिमालय को जब भगवती उपदेश करती है तब कहती है मैं ही राम कृष्ण आदि रूपों में अवतार धारण करके नाना विद लीलाएं करती हूं|

देवी पुराण में प्रसंग आता है जिसमें| वर्ण आता है कि भगवती काली ने ही कृष्ण रूप से अवतार ग्रहण किया तथा भगवान शिव ने श्री राधा रूप से अवतार ग्रहण किया|
इसीलिए शक्ति की आराधना करने वाले लोग भक्तजन कृष्ण जी को काली रूप में देखते हैं|
और उनके द्वारा कही गई गीता जी को काली गीता मानते हैं|

और यही स्वीकार करते हैं कि भगवती काली ही अर्जुन को उपदेश दे रही है|
इसलिए भागवत गीता का शक्ति उपासकों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान है जितना की अन्य लोगों के लिए|

|| श्री परमात्मने नम: ||--- :: x :: ---शरणागति                      --- :: x :: ---भगवान् के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, ...
19/07/2026

|| श्री परमात्मने नम: ||
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शरणागति

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भगवान् के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदि से भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीव का कल्याण करने वाला होता है | तात्पर्य यह हुआ कि का, भय, द्वेष आदि किसी तरह से भी जिनका भगवान् के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, पर जिन्होंने किसी तरह से भी भगवान् के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्ति से वंचित रह गये !
भगवान् के अनन्य भक्तों के लिये नारदजी ने कहा है –
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेद: |
(नारदभक्तिसूत्र ७२)
‘उन भक्तों में जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदि का भेद नही है |’
तात्पर्य यह है कि जो सर्वथा भगवान् के अर्पित हो गये हैं अर्थात जिन्होंने भगवान् के साथ आत्मीयता, परायणता, अनन्यता आदि वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है तो स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर को लेकर सांसारिक जितने भी जाति, विद्या आदि भेद हो सकते हैं, वे सब उन पर लागू नहीं होते | कारण कि वे अच्युत भगवान् के ही हैं –
‘यतस्तदीया:’ (नारदभक्तिसूत्र ७३), संसार के नहीं | अच्युत भगवान् के होने से वे ‘अच्युत गोत्र’ के ही कहलाते हैं |
शरणागति का रहस्य --- शरणागति का रहस्य क्या है ? इसको वास्तव में भगवान् ही जानते हैं | फिर भी अपनी समझ में आयी बात कहने की चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धि का परिचय देता है | पाठकों से प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातों का उल्टा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्राय: लोग किसी तात्विक, रहस्य वाली बात को गहराई से समझे बिना उल्टा अर्थ ले लेते हैं | इस वास्ते ऐसी बात को कहने-सुनने के पात्र बहुत कम होते हैं |
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श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की पुस्तक *शरणागति* पुस्तक कोड ४३४ द्वारा प्रकाशित गीताप्रेस, गोरखपुर से |
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01...🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम्🌷       (स्कन्द पुराणोक्त --हिन्दी अर्थ सहित )02..🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम् (२)🌷    ...
16/07/2026

01...🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम्🌷
(स्कन्द पुराणोक्त --हिन्दी अर्थ सहित )
02..🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम् (२)🌷
(स्कन्द पुराणोक्त -- हिन्दी अर्थ सहित)
03..🌷ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रम् (३)🌷
( ब्रहम पुराणोक्त --हिन्दी अर्थ सहित)
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01...🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम्🌷
(स्कन्द पुराणोक्त --हिन्दी अर्थ सहित )

यह ब्रह्मकृत जगन्नाथ स्तोत्र (प्रथम) स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्डान्तर्गत पुरुषोत्तम माहात्म्य के 27वें में अध्याय से लिया गया है।

🍁​ब्रह्मोवाच—
​नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमो नमः।
अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ १५॥
अर्थ: (ब्रह्माजी बोले) आपको नमस्कार है, मुझे नमस्कार है, फिर आपको और मुझे बारंबार नमस्कार है। आप ही मैं हूँ और मैं ही आप हूँ; यह समस्त चराचर जगत आप ही हैं।
🍁
​महदादि जगत्सर्वं मायाविलसितं तव।
अध्यस्तं त्वयि विश्वात्मंस्त्वयैव परिणामितम् ॥ १६॥
अर्थ: महत्तत्त्व आदि यह संपूर्ण जगत आपकी ही माया का विलास है। हे विश्वात्मन्! यह सब आप पर ही अध्यस्त (आरोपित) है और आप ही के द्वारा यह परिणाम (सृष्टि रूप में) प्राप्त हुआ है।
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​यदेतदखिलाभासं तत्त्वदज्ञानसम्भवम्।
ज्ञाते त्वयि विलीयेत रज्जुसर्पादिबोधवत् ॥ १७॥
अर्थ: यह जो कुछ भी जगत दिखाई देता है, वह आपके अज्ञान से उत्पन्न है। आपको (वास्तविकता को) जान लेने पर यह उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे रस्सी में सांप का भ्रम ज्ञान होने पर मिट जाता है।
🍁
​अनिर्वक्तव्यमेवेदं सत्त्वात्सत्त्वविवेकतः।
अद्वितीय जगद्भास स्वप्रकाश नमोऽस्तु ते ॥ १८॥
अर्थ: यह जगत अनिर्वचनीय (जिसका वर्णन संभव नहीं) है, इसे सत्-असत् के विवेक से ही समझा जा सकता है। आप अद्वितीय हैं, यह जगत आपका ही आभास है। हे स्वप्रकाश (स्वयं प्रकाशित होने वाले)! आपको नमस्कार है।
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​विषयानन्दमखिलं सहजानन्दरूपिणः।
अंशं तवोपजीवन्ति येन जीवन्ति जन्तवः ॥ १९॥
अर्थ: समस्त संसार में जो विषय-आनंद दिखाई देता है, वह आपके सहजानंद स्वरूप का ही एक अंश है, जिस पर आश्रित होकर ही जीव जीवित रहते हैं।
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​निष्प्रपञ्च निराकार निर्विकार निराश्रय।
स्थूलसूक्ष्माणुमहिमन्स्थौल्यसूक्ष्मविवर्जित ॥ २०॥
अर्थ: आप प्रपञ्चरहित, निराकार, निर्विकार और निराश्रय हैं। आप स्थूल, सूक्ष्म और अणु से भी महान हैं, तथा स्थूलता और सूक्ष्मता दोनों से परे हैं।
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​गुणातीत गुणाधार त्रिगुणात्मन्नमोऽस्तु ते ॥ २१॥
अर्थ: आप गुणों से परे हैं, आप ही गुणों के आधार हैं और आप ही त्रिगुणात्मक हैं। आपको नमस्कार है।
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​त्वन्मायया मोहितोऽहं सृष्टिमात्रपरायणः।
अद्यापि न लभे शर्म अन्तर्य्यामिन्नमोस्तु ते ॥ २२॥
अर्थ: मैं आपकी माया से मोहित होकर केवल सृष्टि कार्य में ही लगा हुआ हूँ। हे अन्तर्यामी! आज भी मैं शांति (शर्म) प्राप्त नहीं कर सका। आपको नमस्कार है।
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​त्वन्नाभिपङ्कजाज्जातो नित्यं तत्रैव संस्तुवन्।
नातिक्रमितुमीशोऽस्मि मायां ते कोऽन्य ईश्वरः ॥ २३॥
अर्थ: मैं आपके नाभि-कमल से उत्पन्न हुआ हूँ और नित्य वहीं आपकी स्तुति करता रहता हूँ। मैं आपकी माया का अतिक्रमण करने में समर्थ नहीं हूँ, तो दूसरा कौन (साधरण जीव) समर्थ हो सकता है?
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​अहं यथाण्डमध्येऽस्मिन् रचितः सृष्टिकर्मणि।
तथानुलोमकलिता ब्रह्माण्डे ब्रह्मकोटयः ॥ २४॥
अर्थ: जैसे मैं इस ब्रह्माण्ड के भीतर सृष्टि कार्य के लिए नियुक्त हूँ, वैसे ही बहुत से ब्रह्माण्डों में करोड़ों ब्रह्मा इसी प्रकार कार्य कर रहे हैं।
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​सार्द्धत्रिकोटिसङ्ख्यानां विरिञ्चीनामपि प्रभो।
नैकोऽपि तत्त्वतो वेत्ति यथाहं त्वत्पुरः स्थितः ॥ २५॥
अर्थ: हे प्रभो! साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माओं में से एक भी आपको (आपकी व्यापकता को) उस प्रकार नहीं जानता, जैसे कि मैं इस समय आपके सामने स्थित होकर (कुछ अंश तक) समझ रहा हूँ।
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​नमोऽचिन्त्यमहिम्ने ते चिद्रूपाय नमो नमः।
नमो देवाधिदेवाय देवदेवाय ते नमः ॥ २६॥
अर्थ: आपकी महिमा अचिन्त्य (सोच से परे) है, आपको बारंबार नमस्कार है। आप चिद्रूप हैं, आपको नमस्कार है। आप देवताओं के अधिदेव हैं, देवों के देव हैं, आपको नमस्कार है।
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​दिव्यादिव्यस्वरूपाय दिव्यरूपाय ते नमः।
जरामृत्युविहीनाय मृत्युरूपाय ते नमः ॥ २७॥
अर्थ: आप दिव्यातिदिव्य स्वरूप वाले हैं, आपके दिव्य रूप को नमस्कार है। आप वृद्धावस्था और मृत्यु से रहित हैं, किंतु आप ही मृत्यु के रूप में भी स्थित हैं, आपको नमस्कार है।
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​ज्वलदग्निस्वरूपाय मृत्योरपि च मृत्यवे।
प्रपन्नमृत्युनाशाय सहजानन्दरूपिणे।
भक्तिप्रियाय जगतां मात्रे पित्रे नमो नमः ॥ २८॥
अर्थ: आप जलती हुई अग्नि के स्वरूप हैं, मृत्यु के भी मृत्यु हैं। शरणागतों की मृत्यु (मृत्यु तुल्य दुख) का नाश करने वाले, सहजानंद स्वरूप, भक्ति के प्रेमी, जगत के माता और पिता को बारंबार नमस्कार है।
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​प्रणतार्तिविनाशाय नित्योद्योगिन्नमोऽस्तु ते।
नमो नमस्ते दीनानां कृपासहजसिन्धवे ॥ २९॥
अर्थ: शरणागतों के दुखों का विनाश करने वाले, नित्य कर्मशील प्रभु! आपको नमस्कार है। दीनों पर कृपा करने वाले सहज-सिंधु! आपको बारंबार नमस्कार है।
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​पराय पररूपाय परम्पाराय ते नमः।
अपारपारभूताय ब्रह्मरूपाय ते नमः ॥ ३०॥
अर्थ: आप ही श्रेष्ठ हैं, आपका रूप ही परम रूप है। आप परंपराओं से परे हैं, आपको नमस्कार है। आप अपार संसार के पार कराने वाले और ब्रह्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।

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​परमार्थस्वरूपाय नमस्ते परहेतवे।
परम्परापरिव्याप्तपरतत्त्वपराय ते ॥ ३१॥
अर्थ: आप परमार्थ स्वरूप हैं, आप ही सभी शुभ कारणों के हेतु हैं। आप परंपराओं में व्याप्त और परमतत्त्व में परायण हैं, आपको नमस्कार है।
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​प्रणतार्तिविनाशाय नमः स्वात्मैकभानवे।
पुरा यत्प्रार्थितं स्वामिन्सृष्टिभारावतारणे ॥ ३२॥
अर्थ: शरणागतों के दुखों का नाश करने वाले और अपनी आत्मा में स्वयं प्रकाशित होने वाले सूर्य (ज्ञान स्वरूप) को नमस्कार है। हे स्वामी! आपने पूर्व में सृष्टि का भार उतारने के लिए जो प्रार्थना की थी...
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​तत्कुरुष्व जगन्नाथ सहजाक्तदरूपभाक्।
त्वयि प्रसन्ने किं नाथ दुर्लभं मयि विद्यते ॥ ३३॥
अर्थ: हे जगन्नाथ! आप सहज ही वह दिव्य रूप धारण करके उस कार्य को पूर्ण करें। हे नाथ! जब आप प्रसन्न हों, तो मेरे लिए क्या दुर्लभ है?
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​त्वयैवाहं पृथग्लीलाभेदाद्भिन्नः कृपाम्बुधे।
अज्ञानतिमिरच्छन्ने जगत्कारागृहान्तरे ॥ ३४॥
भ्राम्यन्न द्वारमाप्नोति त्वामृते मुक्तिहेतवे ॥ ३५॥
अर्थ: हे कृपासागर! लीला भेद के कारण मैं आपसे अलग प्रतीत होता हूँ। अज्ञान रूपी अंधकार से ढके हुए इस जगत रूपी कारागार में भटकता हुआ जीव, आपको छोड़कर मुक्ति का द्वार कहीं नहीं पाता है।

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​नमो नमस्ते जगदेकवन्द्य सुरासुराभ्यर्चितपादपद्म।
नमो नमस्तापहरैकचन्द्र नमो नमः शर्मसुबोधसान्द्र ॥ ३६॥
अर्थ: हे जगत के एकमात्र वंदनीय! आपके चरण-कमल देवता और असुरों द्वारा पूजित हैं, आपको नमस्कार है। आप दुखों को हरने वाले पूर्ण चंद्रमा के समान हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आप शांति और उत्तम ज्ञान से पूर्ण हैं, आपको नमस्कार है।
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​नमो नमः कल्पकदूरभूत दुष्प्राप्यकामप्रद कल्पवृक्ष।
दीनाशरण्यप्रणतैकदुःखसङ्घोद्धृतौ नित्यसुबद्धपक्ष ॥ ३७॥
अर्थ: आप कल्पवृक्ष के समान (दुर्लभ) कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आप दीनों के शरणदाता हैं और शरणागतों के दुखों के समूह को मिटाने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।
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​प्रसीद जगतां नाथ मग्नानां दुःखसागरे।
कटाक्षलीलापातेन त्रायस्व करुणाकर ॥ ३८॥
अर्थ: हे जगन्नाथ! हम दुःख रूपी सागर में डूबे हुए हैं, हम पर प्रसन्न होइए। हे करुणाकर! अपनी कृपा-दृष्टि (कटाक्ष) की एक झलक डालकर हमारी रक्षा कीजिए।
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02..🌷ब्रह्मकृतं जगन्नाथस्तोत्रम् (२)🌷
(स्कन्द पुराणोक्त -- हिन्दी अर्थ सहित)

यह स्तोत्र भी स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्डान्तर्गत पुरुषोत्तम माहात्म्य के 27वें अध्याय से उद्धृत है।
्यह छोटा सा स्तोत्र भगवान जगन्नाथ के 'दारुब्रह्म' स्वरूप (काष्ठ विग्रह) के प्रति अगाध भक्ति और शरणागति को प्रदर्शित करता है।
​🍁
​उपर्युपरि सन्तानवृष्टिषूत्पतितासु च ।
जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाऽघनाशन ॥ ८६॥
​अर्थ: (पुष्पों की निरंतर वर्षा के बीच ब्रह्माजी ने स्तुति की) हे कृष्ण! हे जगन्नाथ! आपकी जय हो। हे समस्त पापों का नाश करने वाले! आपकी जय हो।
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​जय लीलादारुतनो जय वाञ्छाफलप्रद ।
जय संसारसम्मग्नलीलोद्धार जयाव्यय ॥ ८७॥
​अर्थ: हे लीला के लिए दारु (काष्ठ/लकड़ी) का विग्रह धारण करने वाले! आपकी जय हो। हे भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले! आपकी जय हो। संसार रूपी सागर में डूबे हुए जीवों का लीलापूर्वक उद्धार करने वाले! आपकी जय हो। हे अविनाशी (अव्यय) प्रभु! आपकी सदा जय हो।
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​जयानुकम्पापाथोधे जय दीनपरायण ।
जयाच्युत जयानन्त जयेशान नमोऽस्तु ते ॥ ८८॥
​अर्थ: हे कृपा के सागर! आपकी जय हो। हे दीनों (दुखियों) के आश्रयदाता! आपकी जय हो। हे अच्युत (कभी पदच्युत न होने वाले)! आपकी जय हो। हे अनन्त! आपकी जय हो। हे जगदीश्वर! आपकी जय हो, आपको बारंबार नमस्कार है।
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03..🌷ब्रह्मणा प्रोक्तं जगन्नाथस्तोत्रम् (३)🌷
( ब्रहम पुराणोक्त --हिन्दी अर्थ सहित)

यह ब्रह्मपुराण के 57वें अध्याय से उद्धृत भगवान् जगन्नाथ की स्तुति है, जिसे स्वयं ब्रह्माजी ने कहा है।
इस स्तुति में भगवान् जगन्नाथ के शरणागत-वत्सल स्वरूप का वर्णन है।


🍁​ब्रह्मोवाच—
​जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन।
जय चाणूरकेशिघ्न जय कंसनिषूदन ॥ ३३॥
अर्थ: (ब्रह्माजी बोले) हे कृष्ण! हे जगन्नाथ! आपकी जय हो। हे समस्त पापों के विनाशक! आपकी जय हो। हे चाणूर और केशी का वध करने वाले! आपकी जय हो। हे कंस का नाश करने वाले! आपकी जय हो।।
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​जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर।
जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद ॥ ३४॥
अर्थ: हे कमल के समान नेत्रों वाले! आपकी जय हो। हे चक्र और गदा को धारण करने वाले! आपकी जय हो। हे नीले बादलों के समान श्याम वर्ण वाले! आपकी जय हो। हे समस्त सुखों को प्रदान करने वाले! आपकी जय हो।

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​जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन।
जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद ॥ ३५॥
अर्थ: हे देव! हे जगत् द्वारा पूज्य! आपकी जय हो। हे संसार के दुखों का नाश करने वाले! आपकी जय हो। हे तीनों लोकों के स्वामी और नाथ! आपकी जय हो। हे मनोवांछित फल देने वाले! आपकी जय हो।
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​संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले।
निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥ ३६॥
अर्थ: हे सुरश्रेष्ठ! यह संसार एक भयंकर सागर है, जो सारहीन है और दुखों रूपी झाग से भरा हुआ है। मैं इस संसार-सागर में डूब रहा हूँ, हे पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिए।

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​नानारोगोर्मिकलिले मोहावर्तसुदुस्तरे।
निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥ ३७॥
अर्थ: यह संसार-सागर अनेक रोगों रूपी लहरों से व्याप्त है और मोह रूपी भंवर के कारण जिसे पार करना अत्यंत कठिन है। मैं इसमें डूब रहा हूँ, हे सुरश्रेष्ठ! हे पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिए।
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🌷 श्रीब्रह्मकृत-जगन्नाथस्तोत्रत्रयम् 🌷
( परिचय, पाठ-विधि एवं माहात्म्य-लाभ)

🌹 संक्षिप्त परिचय
इस संग्रह में भगवान् श्रीजगन्नाथ की तीन प्रामाणिक स्तुतियाँ संकलित हैं, जिनमें दो स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्डान्तर्गत पुरुषोत्तम-माहात्म्य से तथा एक ब्रह्मपुराण से उद्धृत है। इन तीनों स्तोत्रों के वक्ता स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी हैं।
प्रथम स्तोत्र में ब्रह्माजी भगवान् जगन्नाथ को परब्रह्म, विश्वात्मा, मायापति, अद्वैतस्वरूप एवं समस्त सृष्टि के आधार के रूप में प्रणाम करते हैं। इसमें वेदांत का अत्यंत गूढ़ तत्त्वज्ञान भी निहित है।
द्वितीय स्तोत्र अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त भावपूर्ण है, जिसमें भगवान् के दारुब्रह्म (काष्ठ-विग्रह) स्वरूप, उनकी करुणा, भक्तवत्सलता तथा संसार-सागर से उद्धार करने वाली कृपा का गुणगान किया गया है।
तृतीय स्तोत्र ब्रह्मपुराण में वर्णित है। इसमें भगवान् श्रीकृष्ण-जगन्नाथ के अवतार-स्वरूप का स्मरण करते हुए ब्रह्माजी संसाररूपी दुःख-सागर से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। यह स्तोत्र विशेष रूप से शरणागति, भक्ति और मोक्षभाव का अद्भुत उदाहरण है।
इन तीनों स्तोत्रों का संयुक्त पाठ भगवान् जगन्नाथ के परब्रह्म, दारुब्रह्म तथा भक्तवत्सल—इन तीनों दिव्य स्वरूपों का ध्यान कराता है।

🌹 पाठ-विधि
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
भगवान् श्रीजगन्नाथ, श्रीमहालक्ष्मी तथा श्रीबलभद्र (यदि उपलब्ध हों) के समक्ष दीप एवं धूप प्रज्वलित करें।

"ॐ नमो भगवते जगन्नाथाय
ॐ जगन्नाथो कृष्णाय।
ॐ श्रीजगन्नाथाय आद्यकृष्णाय नीलमाधवाय नमः॥

" किसी भी मन्त्र का कम से कम ११ बार जप करें।
इसके पश्चात क्रमशः तीनों स्तोत्रों का श्रद्धा एवं एकाग्रता से पाठ करें।
पाठ के अंत में भगवान् से अपनी तथा समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
यदि संभव हो तो तुलसीदल, पुष्प अथवा केवल शुद्ध भाव से प्रणाम अर्पित करें।
एकादशी, पूर्णिमा, गुरुवार, शनिवार, रथयात्रा, स्नान-यात्रा, नीलाद्रि-बिजे तथा पुरुषोत्तम मास में इसका पाठ विशेष फलदायक माना जाता है।

🌹माहात्म्य एवं लाभ
शास्त्रानुसार भगवान् की स्तुति, नाम-स्मरण और शरणागति कभी निष्फल नहीं होती। श्रद्धापूर्वक इन स्तोत्रों का पाठ करने से—
भगवान् श्रीजगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पापों का क्षय होकर अन्तःकरण की शुद्धि होती है।
भय, शोक, मोह तथा मानसिक अशान्ति दूर होती है।
भक्ति, वैराग्य एवं आत्मज्ञान की वृद्धि होती है।
सांसारिक विघ्नों एवं कष्टों में धैर्य और ईश्वर-आश्रय प्राप्त होता है।
भगवान् के दारुब्रह्म एवं परब्रह्म स्वरूप का चिंतन दृढ़ होता है।
शरणागत की रक्षा कर भगवान् जीवन-पथ को मंगलमय बनाते हैं।
अंततः भगवान् श्रीजगन्नाथ के चरणों में दृढ़ भक्ति तथा परम कल्याण (मोक्ष) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

॥ श्रीजगन्नाथः सर्वलोकमङ्गलं करोतु ॥
॥ जय जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी ॥

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14/07/2026

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