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जगत में जो समस्त दीन दुखियों के कष्ट हरने वाले हैं, जो विग्रह स्वरूप में होने के बावजूद स्वयं पर्वत रूप में प्रकट है, जि...
19/08/2026

जगत में जो समस्त दीन दुखियों के कष्ट हरने वाले हैं, जो विग्रह स्वरूप में होने के बावजूद स्वयं पर्वत रूप में प्रकट है, जिनकी समस्त देव देवता प्रदक्षिणा करते रहते हैं। जो शास्त्रों के मूल में है। वेदों की ऋचाओं में उन्हीं के अराधना के मंत्र है। जिनकी महिमा का वर्णन तुलसीदास समेत अनेक संतों और महात्माओं ने बार बार किया है जो बङी से बङी विपत्ति में अपने भक्तों को नहीं छोड़ते। ऐसे भगवान कामतानाथ जो हम सब के स्वामी हैं उनके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूं।

सावन के तीसरे सोमवार करिए सोमनाथ चर में स्थित देवाधिदेव महादेव का दर्शन। इस मंदिर का निर्माण चंदेल और बघेल वंश के राजाओं...
17/08/2026

सावन के तीसरे सोमवार करिए सोमनाथ चर में स्थित देवाधिदेव महादेव का दर्शन। इस मंदिर का निर्माण चंदेल और बघेल वंश के राजाओं ने १० से १२ वी सदी के मध्य कराया। मूल रूप से मंदिर निर्माण का श्रेय राजा कीर्ति सिंह को जाता है जिन्होंने गुजरात के सोमनाथ मंदिर की यात्रा से प्रभावित होकर यहां पर सोमनाथ मंदिर बनवाने का निश्चय किया । सोमनाथ मंदिर की शैली और चंदेलकालीन शिल्प कला का अदभुत संगम है सोमनाथ चर का मंदिर। इस मंदिर ने मुगलों के कई हमले झेले विशेषकर आततायी औरंगजेब ने जब चित्रकूट पर हमला किया। तमाम बर्बरता और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया के बावजूद अडिग हिंदू आस्था ने मंदिरों को जोड़ा और फिर से उन्हें मजबूती से खड़ा किया। सोमनाथ चर ऐसी ही आस्था का प्रमाणीकरण है। किसी मुगल सेना में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो इस आस्था की एक ईंट भी हिला दे। चारों तरफ प्रकृति से घिरे इस मंदिर में कई शिवलिंग मौजूद हैं। इसके अलावा विष्णु नारायण, महेश पार्वती और देवताओं और अप्सराओं की खंडित मूर्तियां भी इस मंदिर में मौजूद हैं। हर सावन के सोमवार में यहां भक्त महादेव का जलाभिषेक करने दूर दूर से आते हैं।

1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाले चित्रकूट के पेशवा नारायण राव और माधव राव जिन्होंने गणेश बाग से अपनी सेना का नेतृत्व...
15/08/2026

1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाले चित्रकूट के पेशवा नारायण राव और माधव राव जिन्होंने गणेश बाग से अपनी सेना का नेतृत्व किया और स्थानीय लोगों के सहयोग से तरौंहा और कर्वी के युद्ध में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। ग्राम पिण्डरा के बहादुर ग्रामवासी जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र के लिए कुर्बान कर दिया ।६ जून १८४२ चित्रकूट जिले के मऊ क्षेत्र के वो बहादुर वीर जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ गौकशी आंदोलन किया और कई अंग्रेज अफसरों को नर्क का रास्ता दिखाया। मानिकपुर क्षेत्र के वो बहादुर जिन्होंने चुन चुनकर अंग्रेजो को मार गिराया बाद में या तो वीरगति को प्राप्त हुए या अंग्रेजो की फांसी से पुरस्कृत हुए। उन सभी महात्माओ को वीर हुतात्माओ को नमन । चित्रकूट वालों तुम गर्म खून वाले बहादुर योद्धा हो। अंग्रेजो की सेना ने १८५७ की क्रांति को एक साल के अंदर खत्म करने में सफल रहे सिवाय चित्रकूट के। यहां अंग्रेज भी हमसे दो साल तक पिटते रहे। हर पहाड़ तुम्हारे पुर्वजो की अमर गाथा गाता है। गर्व करों और इस विरासत को शेयर करों।

आज हम सब भौतिक युग में जी रहे हैं, क्या गृहस्थ क्या संत सब माया के पीछे भाग रहे हैं लेकिन चित्रकूट में एक संत ऐसे थे जिन...
12/08/2026

आज हम सब भौतिक युग में जी रहे हैं, क्या गृहस्थ क्या संत सब माया के पीछे भाग रहे हैं लेकिन चित्रकूट में एक संत ऐसे थे जिन्होंने आश्रम के समस्त संसाधनों को लोक कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। हम बात कर रहे हैं चित्रकूट में स्थित निर्मोही अखाड़ा के श्री महंत बैकुंठवासी श्री श्री १००८ राम आसरे दास जी महाराज की । महाराज श्री के मन में लोक कल्याण की भावना ऐसी थी आश्रम की रसोई सभी के लिए खुली रही क्या अपरिचित क्या परिचित? ये उस समय की बात है जब चित्रकूट में गिने चुने तीर्थ यात्री आया करते थे पूरा क्षेत्र दस्यु और डकैतों से प्रभावित था परन्तु यह महाराज श्री का प्रताप था कि चित्रकूट में उनके रहते कोई भूखा नहीं सोया ।परमसिद्ध संत भगवान दूसरों के कष्ट को स्वयं हर लेते थे न जाने कितनी पीङा उन्होंने अपने भक्तों की इसी तरह हर ली और उनकी जगह खुद उस कष्ट को भोगा। उनका प्रभाव ऐसा था कि चित्रकूट में उनकी बात को सभी ने सिर झुकाकर सुना और उनके आदेश का पालन किया। गरीब ब्राह्मणों को रहने के लिए घर उनके बच्चों को वेद वेदांत संस्कृत की निःशुल्क शिक्षा का प्रबंध उन्होंने हमेशा किया । परस्पर विरोधी मत वाले लोग भी उनके आश्रम में एक घाट का पानी पीते थे। जीवन भर चित्रकूट की भूमि को ही उन्होंने अपनी शय्या बनाया और उसी की गोद में सिर धरकर प्रभु के धाम को प्रस्थान किया। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने प्रभु नाम का स्मरण किया और अंत में राम राम कहते हुए शरीर को छोड़ा । ऐसे संतों के श्री चरणों में हम बार बार नमन करते हैं।

सावन के दूसरे सोमवार के दिन करिए मङफा महादेव के दर्शन। करीब ९०० वर्ष पुराने इस मंदिर का निर्माण चंदेल कालीन राजाओं ने कर...
10/08/2026

सावन के दूसरे सोमवार के दिन करिए मङफा महादेव के दर्शन। करीब ९०० वर्ष पुराने इस मंदिर का निर्माण चंदेल कालीन राजाओं ने कराया था। यह स्थान मंडूक (मांडव) ऋषि की तपस्थली के तौर पर भी जाना जाता है। ये वही पुन्य भूमि है जहां शकुंतला ने भरत को जन्म दिया। भरत की ये जन्मभूमि दर्शनीय योग्य है। आगे चलकर उन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ऐसी मान्यता है कि देवाधिदेव महादेव ने तांडव नृत्य भी सर्वप्रथम यही कर किया था। मांडव ऋषि के अलावा कण्व, चरक व महाआर्धवर्ण ऋषि की भी कर्मस्थली यही थी। करीब ५३७ सीढ़ी चढ़कर लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। यह भारत का एक मात्र मंदिर है जहां शिव पंचमुखी के साथ साथ नृत्य की मुद्रा में हैं।

जिनकी फोटो आप देख रहे हैं वो भगवान के अनंत भक्त स्वामी श्री श्री १००८ रणछोड़ दास जी महाराज की है। जानकी कुंड अस्पताल उन्...
07/08/2026

जिनकी फोटो आप देख रहे हैं वो भगवान के अनंत भक्त स्वामी श्री श्री १००८ रणछोड़ दास जी महाराज की है। जानकी कुंड अस्पताल उन्हीं की प्रेरणा का फल है। वो मानव सेवा को ईश्वर सेवा ही समझते थे। उनके गुजराती शिष्यों ने उनकी प्रेरणा से चित्रकूट में अस्पतालों का निर्माण कराया। अरविंद भाई मफतलाल उनमें से एक थे उनके जीवित रहते सदगुरु सेवा संघ और रघुवीर मंदिर ट्रस्ट का ध्येय और कार्य परमार्थ सेवा था। उनके जाने के बाद सेवा का प्रकल्प व्यावसायिक उद्देश्यो के साथ आगे बढ़ा चित्रकूट के गरीब और वंचितों के कल्याण की प्रेरणा कब की पीछे छूट गई। स्वामी श्री रणछोड़ दास अब मंदिरो के चित्रों में रह गये। मानव कल्याण के उनके काम को उद्योगपतियो ने हड़प लिया है जो अपने कर्मचारियों को मजदूरों से कम तनख्वाह देने में विश्वास करता है जिसके लिए मरीज पैसे हड़पने का एक जरिया है। अस्पताल में गंदगी सरकारी अस्पतालों जैसी रह गई है पर मोटी फीस वसुलने में ये किसी से कम नहीं है। स्वामी श्री रणछोड़ दास ऐसे अस्पताल प्रबंधको को बुद्धि दे। वो दूसरों के दुख दर्द को समझ सके। सिर्फ एक दो डाक्टरों के सहारे अस्पताल का संचालन न करें। चित्रकूट को रिफर जिला न बनायें। जाने और समझे कि श्री रणछोड़ दास जी महाराज का विजन और मिशन क्या था। नर सेवा नारायण सेवा।।

गुरुदेव का जब भी स्मरण करता हूं, मैं एक अलग दुनिया में होता हूं, ऐसे भजनानंदी संत का स्मरण भी आपकी बहुत सारी चिंताये हर ...
04/08/2026

गुरुदेव का जब भी स्मरण करता हूं, मैं एक अलग दुनिया में होता हूं, ऐसे भजनानंदी संत का स्मरण भी आपकी बहुत सारी चिंताये हर लेता है। वो एक सम्पूर्ण संत थे, न किसी से ईर्ष्या, न लोभ, न भय, न चिंता। ध्येय सिर्फ एक कि राम नाम जपना है । चौबीस घंटे प्रभु नाम सिमरन के अलावा कोई इच्छा नहीं थी। प्रभु लीलाओं में भावुक ऐसे हो जाता करते थे कि अश्रु रूकने का नाम नहीं लेते थे। ऐसे गुरूदेव के चरणों में कुछ देर बिताने का सौभाग्य मिलना जन्म जन्मांतर के सैकड़ों कष्ट हर लेता है। प्रभु कृपा से ही ऐसे संत मिलते हैं। आज वो इस भौतिक शरीर में नहीं है परन्तु जब भी उनकी छवि देखता हूं तो असीम आनंद की अनुभूति प्राप्त करता हूं। गुरुदेव के श्री चरणों में सादर नमन।

राजाधिराज मत्स्यगजेंद्र नाथ। सावन के शुभ सोमवार के अवसर पर करिए देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान श्री मत्स्यगजेंद्र ...
03/08/2026

राजाधिराज मत्स्यगजेंद्र नाथ। सावन के शुभ सोमवार के अवसर पर करिए देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान श्री मत्स्यगजेंद्र नाथ जी के दर्शन।

आज देश के हर कोने से खबर आती है कि फलां स्त्री ने अपने पति को मार दिया तो मन दुखी होता है, सीता सावित्री और अनुसूइया का ...
27/07/2026

आज देश के हर कोने से खबर आती है कि फलां स्त्री ने अपने पति को मार दिया तो मन दुखी होता है, सीता सावित्री और अनुसूइया का ये देश ऐसी खबरों से भरा पड़ा है जहां पति को जहर देकर मार देना, खाई से घिरा देना, डब्बे में गाढ़ देना । विवाहेत्तर संबंधो की वजह से पति को प्रेमी के साथ मिलकर मार देना ऐसी खबरें आम हो चली है। यही वो देश है जहां सावित्री यमराज से लङकर अपने पति को वापस ले आयी थी। वर्षों की ध्यान साधना के उपरांत जब अत्रि मुनि की आंख खुली तो उन्होंने अपनी पत्नी अनुसूइया से पीने के लिए जल मांगा, भीषण अकाल के समय अपने तपोबल से मंदाकिनी को प्रकट किया चित्रकूट की इस धरा में जब ब्रह्मा विष्णु महेश अपनी पत्नियों के दबाव के चलते मां अनुसूइया का सतीत्व खंडित करने पहुंचे और भिक्षा में स्वयं का दुग्धपान कराने के लिए कहा तब अनुसूइया मां ने कमंडल का जल निकालकर त्रिदेवों में छिड़क कर उन्हें अबोध बालक बना दिया और एक मां की भांति दुग्धपान भी करा दिया। ये शक्ति थी भारतीय नारी में। आप कहेंगे कपोल कल्पना है, कहानी है, तो कहानी के माध्यम से कौन से वैल्यू आप डाल रहे हैं उस पर आपका ध्यान नहीं। यही वो संस्कार थे जिसने भारत को अब तक बांधे रखा । परिवार को बनाया अतिथियों का सत्कार किया? आप बता सकते हैं तलाक का शाब्दिक हिंदी अर्थ क्योंकि होता ही नहीं था। पति परमेश्वर नहीं होता है परन्तु जब हम अपने बच्चियों को ऐसा सिखाते थे तब वो शादी के तुरंत बाद ही उन्हें खाई से गिराया नहीं करती थी, सेवा और समर्पण का भाव उनमें होता था और इसी सेवा सुश्रुषा के दम पर वो राज करती थी आज वो भाव नहीं है क्योंकि छद्म नारीवाद ने आपके संस्कारो को निगल लिया है पति पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं उनमें आपने जबरदस्ती बराबरी की प्रतिस्पर्धा कराई ? जो अनावश्यक थी? कौन बता सकता है सुई और धागा में कौन श्रेष्ठ है? देश में यदि खुशहाली चाहिए तो उसकी शुरुआत परिवार से होती है, परिवार बनता है स्त्री से, और संस्कारित स्त्री ही खुशहाल परिवार की नींव है। इसलिए अपनी बेटियों को सावित्री, सीता, अनुसूइया के बारे में बताइए। और संभव हो सके तो उन्हें ये पोस्ट शेयर करिए।

ये जो फोटो आप देख रहे हैं ये गुरु शिष्य परम्परा का वो समागम है जिसमें धर्म के प्रति निष्ठा है और उसके लिए बलिदान देने मे...
22/07/2026

ये जो फोटो आप देख रहे हैं ये गुरु शिष्य परम्परा का वो समागम है जिसमें धर्म के प्रति निष्ठा है और उसके लिए बलिदान देने में रत्ती भर संकोच न करने वाले आदर्श है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जो अपने शिष्य स्वामी सानंद को गले लगाये हुए हैं। स्वामी सानंद की ये फोटो उनके अनशन के दिनों की है। एक वैज्ञानिक जो चाहते तो विदेशों में बस सकते थे उन्होंने संन्यास को चुना बलिदान को चुना। लगातार ११२ दिनों तक भूख हड़ताल की अंत में पानी भी छोड़ दिया। उनके गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती गाय के लिए, सत्य के लिए सत्ता द्वारा अपमानित किये जाते हैं। सत्ता में बैठे घनानंद अपने अहंकार को समेटे बैठे हैं, उनके चाटूकार चमचें मां मंदाकिनी की धारा मोङकर होटल बनाने में लगे हैं। आरोग्य धाम और दीनदयाल शोध संस्थान के इस कार्य की कङे शब्दों में निन्दा की जानी चाहिए। ऋषिकेश और चित्रकूट में पेड़ काटे जा रहे हैं गंगा के किनारे पेड़ काटकर घाट के घाट बसाये जा रहे हैं। ये सत्ता का अंहकार ही है जो न सोनम वांगचुक के जीवन को महत्व देता है और न ही स्वामी सानंद के जीवन को । वो अटृहास कर रहा है हमारी और आपकी क्षमता को ललकार रहा है। देख लीजिए सोच लीजिए और उत्तर दीजिए।

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