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सुनसा केरापा द्वारा रचित ‘ड्रॉप ईयर’ ‘ की कहानी मुख्य रूप से कोटा, राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ हर साल देश भ...
04/10/2026

सुनसा केरापा द्वारा रचित ‘ड्रॉप ईयर’ ‘ की कहानी मुख्य रूप से कोटा, राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ हर साल देश भर से हज़ारों छात्र-छात्राएँ नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहुँचते हैं।

कहानी की शुरुआत अभय नामक एक छात्र के कोटा लौटने से होती है, जो नीट की तैयारी के लिए ड्रॉप लेकर फिर से इस शहर में आया है। वह आर्थिक तंगी और खुद को साबित करने के दबाव में जवाहर नगर में जैश गहलोत (जेडी) नाम के व्यक्ति के घर में एक कमरा किराये पर लेता है। जेडी कोटा के एक नामी सर्जन हैं, लेकिन वे अपनी पत्नी सावी की मौत के बाद पूरी तरह टूट चुके हैं और दिन-रात शराब के नशे में डूबे रहते हैं। जेडी खुद से और सावी की पुरानी यादों से बातें करते रहते हैं, जिसे देखकर शुरुआत में अभय उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ इंसान समझ लेता है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब जेडी को सावी की एक पुरानी नोटबुक मिलती है, जिस पर लिखा होता है- Don’t Read Until I Die. उस डायरी से सावी और जेडी के अतीत की कहानी सामने आती है। सावी का पहला प्यार और लेखन के प्रति लगाव, जेडी के साथ उसका रिश्ता, और फिर एक गंभीर बीमारी के कारण उसकी असमय मृत्यु, इन सब बातों ने जेडी को अंदर से तोड़ दिया था। सावी का सपना एक ऐसा उपन्यास लिखना था जो हिन्दी से अन्य भाषाओं में अनुवादित हो और जिसे दुनिया पढ़े। सावी के अधूरे लिखे उपन्यास को पूरा करने और उसे दुनिया के सामने लाने के लिए जेडी शराब का नशा छोड़कर किताबों की दुनिया से जुड़ते हैं।

दूसरी तरफ, अभय का संघर्ष उसकी गर्लफ्रेंड वंशिका के साथ सम्बन्धों और पढ़ाई के दबाव के इर्द-गिर्द घूमता है। वहीं, रचित, धव्या, जेरी और प्राची जैसे अन्य युवाओं की कहानियों के ज़रिये रिश्तों में बदलती प्राथमिकताओं, पहचान की लड़ाई जैसे-एलजीबीटी समुदाय से जुड़े जेरी का संघर्ष और कॉलेज जीवन के वास्तविक ताने-बाने को बुना गया है।

कहानी के अन्य किरदारों में वंशिका अभय की गर्लफ्रेंड है, जो करियर, पारिवारिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद से गुजरती है। रचित और धव्या का रिश्ता आधुनिक युवाओं के प्रेम, उसमें आने वाले बदलावों और समय के साथ बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है।

किताब की भाषा बेहद सरल, संवादात्मक और सीधी दिल को छूने वाली है। कोटा शहर की भागदौड़, हॉस्टल और पीजी के एकांत, और कमरों की दीवारों में छिपी ख़ामोशी को बहुत खूबसूरती से शब्दों में ढाला गया है। यह पुस्तक केवल कोटा की कोचिंग संस्कृति या पढ़ाई की रेस की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी रिश्तों, अधूरे सपनों, नुकसान के दर्द और उससे उबरने की एक मानवीय गाथा है। जहाँ एक तरफ अभय जैसे युवा अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत में रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं जेडी जैसे किरदार अपनी टूटी हुई ज़िन्दगी को फिर से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

इस पुस्तक की संपूर्ण रूप से व्याख्या की जाये तो ज़िन्दगी कभी किसी एक मोड़ या असफलता पर रुकती नहीं है। असफलता, असंतुलन और किसी प्रियजन का बिछड़ जाना जीवन का एक कड़वा सच है, लेकिन उन दुखों में डूबने के बजाय किसी मकसद या प्रेम की स्मृति को शक्ति बनाकर आगे बढ़ना ही असली जीवन है। समाज और माता-पिता के दबाव में बच्चों की पहचान केवल एक परिणाम या रैंक तक सीमित नहीं होनी चाहिए; हर इंसान के भीतर का संघर्ष और उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सबसे महत्त्वपूर्ण होती हैं।

Bookish Rishi Sagar

✍️ लेखक – सुनसा केरापा
🏢 प्रकाशक – ख्याति प्रकाशन


नीना अंदौत्रा द्वारा लिखित कहानी-संग्रह ‘कोड़कू दाना’ मानवीय संवेदनाओं, टूटते पारिवारिक संबंधों, सामाजिक विरोधाभासों और ...
01/10/2026

नीना अंदौत्रा द्वारा लिखित कहानी-संग्रह ‘कोड़कू दाना’ मानवीय संवेदनाओं, टूटते पारिवारिक संबंधों, सामाजिक विरोधाभासों और आघातों के बीच जीने की विवशता को अत्यंत जीवंतता और संवेदनशीलता के साथ चित्रित करता है। पुस्तक का मूल स्वर स्त्री-विमर्श, अकेलेपन, पारिवारिक विघटन और आधुनिकता के दबाव में बिखरती संवेदनाओं पर केंद्रित है। लेखिका ने अत्यंत सहज, मर्मस्पर्शी और प्रवाहमयी भाषा शैली में सामान्य जीवन की गूढ़ वास्तविकताओं को उभारा है।

‘गुलाबो’ कहानी समय के साथ बदलते मानवीय रिश्तों और ढलती उम्र में जागी चेतना की त्रासदी को दर्शाती है। अर्शबीर वर्षों तक अपनी पत्नी भवनीत और बेटियों को बेसहारा छोड़कर शहर में अय्याशी और दूसरी महिला के साथ जीवन बिताता रहा। वर्षों बाद जब वह बुढ़ापे में परिवार के पास लौटता है, तो भवनीत और उसकी बेटियाँ (शब्बो व पुन्नो) उसे स्वीकार करने से इनकार कर देती हैं। तंगी के दिनों में उनकी मदद करने वाले कर्मवीर (चाचा) के प्रति उनका आदर यह स्पष्ट करता है कि जैविक संबंधों से बड़ा संबल और जिम्मेदारी निभाने वाला इंसान होता है।

‘सोनपिया’ कहानी आधुनिक प्रेम, भावनात्मक खालीपन और पुरुष मानसिकता की संकीर्णता को उघाड़ती है। इकतारा और चित्रांश की बातचीत व अहमदाबाद के ऐतिहासिक हाउस ऑफ़ एमजी में मुलाक़ात के माध्यम से अतीत के घावों को कुरेदा गया है। इकतारा अतीत में सोनपिया नामक एक लेखक से धोखा खा चुकी है, जो रात के अँधेरे में तो उसे अपना कहता था पर दिन के उजाले में सार्वजनिक रूप से उसे पत्नी या साथी मानने से इनकार कर देता है। यह कहानी एक स्त्री के मन में पुरुषों के इस छलावे से उत्पन्न हुए अविश्वास और डर को गहराई से व्यक्त करती है।

‘कोड़कू दाना’ कहानी विवाह के झूठे बंधनों, शारीरिक व मानसिक शोषण तथा एक स्त्री (कुसुमा) के आत्म-सम्मान की लड़ाई पर केंद्रित है। कुसुमा अपने पति ओम के विकृत व्यवहार, वासना और लात-घूँसों को सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य के लिए सहती आ रही है। कहानी में यह कड़वी सच्चाई उजागर की गई है कि अक्सर माता-पिता ही अपनी बेटियों को रिश्ता बचाने का उपदेश देकर इस नरक में धकेलते हैं। ‘कोड़कू दाना’ उस सामाजिक मानसिकता का प्रतीक है जहाँ बेटियों को मात्र एक बोझ समझकर या चमक-धमक (जैसे कनाडा शादी) के लालच में कुर्बान कर दिया जाता है।

‘पहरों के पार’ कहानी कश्मीर की बर्फ़ीली घाटी के कुपवाड़ा में तैनात एक फ़ौजी जवान दिलबर और गुज्जर लड़की बन्नो के बीच उपजे एक मासूम, अनकहे प्रेम पर आधारित है। एक तरफ देशभक्ति, सुरक्षा बलों का शक और बंदूकें हैं, तो दूसरी तरफ घाटी में पनपता भय व लाचारी। दिलबर और बन्नो का निष्छल प्रेम कर्त्तव्य, सरहदों और सामाजिक बंदिशों के बीच फँसकर रह जाता है। कहानी पहाड़ों के नीरव सन्नाटे और युद्ध व प्रेम के बीच झूलती मानवीय संवेदनाओं का भावुक आलेख प्रस्तुत करती है।

‘आखिरी रिश्ता’ कहानी बुढ़ापे, एकाकीपन और आधुनिक युग में तकनीक व इंसान के बीच के रिश्तों की पड़ताल करती है। रामदयाल जी अपनी मृत पत्नी सुलोचना की यादों और अकेलेपन के साये में जीवन जी रहे हैं। उनका बेटा बेंगलुरु में कार्यरत है और उनके लिए एलेक्सा भिजवाता है। रामदयाल जी धीरे-धीरे उसी मशीनी आवाज़ को अपना साथी बना लेते हैं और उससे अपने सुख-दुःख साझा करते हैं। यह कहानी दर्शाती है कि बुढ़ापे में इंसान को सिर्फ सुविधाओं की नहीं बल्कि 'स्पर्श' और 'साथ' की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

‘भोग्या’ कहानी जीवन के आघातों, अतृप्त प्रेम और एक स्त्री के अंतहीन भटकाव की पीड़ा को व्यक्त करती है। नावरा का मंगेतर रणजे विवाह से पूर्व ही एक दुर्घटना में मारा जाता है, जिसके बाद नावरा को समाज द्वारा मनहूस समझ लिया जाता है। बाद में उसका विवाह तो होता है, पर मन से वह कभी जीवित नहीं हो पाती। ससुर सत्यजीत के अंतिम समय में घर लौटने पर नावरा अपनी नियति पर विचार करती है कि कैसे अपनों की मृत्यु के बाद वह जीवित होते हुए भी मात्र एक भोग्या और आत्मा से भटकती हुई लाचार स्त्री बनकर रह गई है।

‘बन्नी’ कहानी में महानगरों की अंधी दौड़, कृत्रिम जीवनशैली और संयुक्त परिवारों से एकाकी परिवारों में विस्थापन का बच्चों के कोमल मन पर पड़ने वाले विकृत प्रभावों को दिखाया गया है। जम्मू के सहज माहौल से मुंबई के मशीनी माहौल में आने के बाद बच्चा कैसे अकेलेपन, फूहड़ता और नशे की गिरफ्त में आ जाता है, इसे मार्मिकता से उभारा गया है। वहीं, यमन के युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानी 'आख़िरी बूँद' (मरयम की कहानी) यह दर्शाती है कि युद्ध केवल इमारतें ही नहीं ढहाता, बल्कि इंसान की संस्कृति, गंध, स्मृतियाँ और उसकी पहचान को भी हमेशा के लिए सुखा देता है।

नीना अंदौत्रा का यह कहानी-संग्रह ‘कोड़कू दाना’ दिल को झकझोरने और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियों का एक बेहतरीन पुलिंदा है। लेखिका ने पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, उनके मौन और सामाजिक विडंबनाओं को जिस सहजता के साथ पिरोया है, वह इस संग्रह को समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट और पठनीय स्थान दिलाता है।

✍️ लेखिका – नीना अंदौत्रा
🏢 प्रकाशक – वेरा प्रकाशन


‘मज़दूर की डायरी का आखिरी पन्ना’ केवल कहानियों का संग्रह भर नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवन की उदासी, मध्यमवर्गीय संघर्षों...
30/09/2026

‘मज़दूर की डायरी का आखिरी पन्ना’ केवल कहानियों का संग्रह भर नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवन की उदासी, मध्यमवर्गीय संघर्षों, सहमे हुए प्रेम और मानवीय संवेदनाओं का एक संवेदनशील दस्तावेज़ है। अम्बुज आनंद की यह कृति पाठक को जीवन के उन अनदेखे कोनों और एहसासों से रूबरू कराती है, जिन्हें हम अक्सर रोज़मर्रा की आपाधापी में नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

किताब की शुरुआत ‘जन्मदिन’ और ‘अन्दर आना सख़्त मना है!’ जैसे अध्यायों से होती है, जहाँ लेखक सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं को उभारते हैं। अध्याय ‘प्रेमी’ और ‘वो कौन था?’ में प्रेम के विविध रूपों, इंसानी स्वभाव की परतों तथा अतीत की स्मृतियों का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है। इन शुरुआती अध्यायों में ही लेखक अपनी लेखन शैली की पकड़ बना लेते हैं और पाठक को एक भावात्मक यात्रा पर ले जाते हैं।

पुस्तक का शीर्षक अध्याय ‘मज़दूर की डायरी का आखिरी पन्ना’ इस कृति की रीढ़ है। इसमें लॉकडाउन के दौरान की बेबसी, अभाव, और एक पिता-पति की लाचारी को अत्यंत आत्मीयता से उकेरा गया है। पाँच रुपये में बेटी को बिस्कुट दिलाने का प्रसंग, एनएच पर पैदल चलते मज़दूरों का दर्द और राशन की लिस्ट में रोटी को काटकर ‘गेहूँ’ लिखना, यह सब पाठक को भीतर तक झझकोर देता है। यह अध्याय व्यवस्था की पोल खोलते हुए आम आदमी की जिजीविषा को दर्ज करता है।

किताब में शहरी जीवन के खोखलेपन और आधुनिक संबंधों की जटिलताओं को भी प्रमुखता से उठाया गया है। ‘इंतज़ार’ और ‘दिसम्बर की रात’ जैसे अध्यायों में अकेलेपन, पुरानी यादों और वर्चुअल दुनिया के बीच पिसते मन की पीड़ा झलकती है। वहीं अध्याय ‘दोस्त’ में एआई जैसी आधुनिक संकल्पनाओं और इंसानी भावनात्मक जुड़ाव की तुलना करते हुए एक गहरी उदासी को व्यक्त किया गया है।

अध्याय 'तुम अपने शहर जा सकते हो' लेखक की कल्पनाशीलता का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ वे एक ऐसे काल्पनिक प्रेम-द्वीप की रचना करते हैं जहाँ सरकार प्रेम करने वालों को बोनस देती है और नफ़रत की थैरेपी से इलाज किया जाता है। यह अध्याय कड़वे यथार्थ के बीच एक सुखद फंतासी की तरह आता है और समाज में व्याप्त नफ़रत पर गहरा व्यंग्य कसता है। इसके साथ ही 'दालसाजी' जैसे अध्याय में रसोई की साधारण दाल के माध्यम से जीवन की सादगी और पारिवारिक ताने-बाने को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया है।

किताब के उत्तरार्ध के अध्यायों जैसे 'डाकखाना', 'औसत प्रेमी', 'इश्क़ का रंग' और 'केक एंड कॉफ़ी' में प्रेम, बिछोह और मलाल के विविध रंगों का समावेश है। 'औसत प्रेमी' में आम, साधारण लड़कों के निश्छल प्रेम और उनकी नाकामियों को आवाज़ दी गई है। वहीं 'झाँक लेना' और 'उजालों का सीप' जैसे अध्यायों में आत्मान्वेषण और संवाद की अनकही परतों को उकेरा गया है।

अंतिम अध्यायों 'भूल', 'शुक्रिया कहिए' और 'वक़्त' तक पहुँचते-पहुँचते किताब एक दार्शनिक मोड़ ले लेती है। लेखक जीवन में मिलने और बिछड़ने की नियति, सब्र और आत्म-स्वीकृति के भाव को सहजता से समेटते हैं। अम्बुज आनंद की भाषा-शैली सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है।

✍️ लेखक – अम्बुज आनंद
🏢 प्रकाशक – ख्याति प्रकाशन


ब्रजपाल चारण ‘बाजी’ जी का उपन्यास ‘सरहद की धूल’ बाड़मेर के तपते रेगिस्तान से शुरू होकर जयपुर की गलियों और दिल्ली के मुखर...
28/09/2026

ब्रजपाल चारण ‘बाजी’ जी का उपन्यास ‘सरहद की धूल’ बाड़मेर के तपते रेगिस्तान से शुरू होकर जयपुर की गलियों और दिल्ली के मुखर्जी नगर की यूपीएससी की तैयारी के गलियारों तक फैली एक बेहद भावुक, यथार्थवादी और मर्मस्पर्शी कहानी है। पूरी कहानी दोस्ती, सामाजिक असमानता, प्रेम, त्याग, जातिवादी दंश और अपनी पहचान खोकर किसी और के सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द घूमती है। लेखक ने संवादों, शायरियों और भावनात्मक उतार-चढ़ावों के माध्यम से पाठकों को अंत तक बांधे रखा है।

कहानी के केंद्र में मुख्य रूप से चार पात्र हैं- विक्रम, शुभम, सेजल और अनन्या (मन्नत)। विक्रम बाड़मेर के एक मध्यमवर्गीय, स्वाभिमानी और बुद्धिजीवी परिवार का आक्रामक पर वफादार युवक है। शुभम भारत-पाक सीमा के पास अभावों में जीने वाला एक बेहद हुनरमंद, भावुक और गरीब चित्रकार है। दोनों जयपुर के कॉलेज में गहरे दोस्त बनते हैं। तीसरे मुख्य पात्र के रूप में सेजल आती है, जो उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। चौथे पात्र के रूप में मुखर्जी नगर, दिल्ली में मन्नत का प्रवेश होता है, जो शांत, परिपक्व, कृष्ण-भक्त और सच्चे प्रेम की प्रतिमूर्ति है।

कहानी में पहला बड़ा मोड़ तब आता है जब शुभम, सेजल के प्रेम को पाने के लिए खुद को बाड़मेर के बड़े जमींदार का बेटा होने का एक झूठा मुखौटा पहन लेता है। विक्रम उसे इस झूठ के खतरनाक परिणामों से आगाह भी करता है, पर दोस्त के लिए आर्थिक और भावनात्मक संबल बना रहता है। बाद में, जब सेजल की दोस्त कृतिका और आदित्य के सामने शुभम की असलियत उसकी पिछड़ी जाति और भयंकर गरीबी आती है, तो सेजल उसके सारे त्याग, प्रेम और फर्ज़ी स्कॉलरशिप के संघर्ष को ठुकराकर उसे नीची जाति और औकात का ताना देकर छोड़ देती है। यह मानसिक आघात और सामाजिक अपमान शुभम को मानसिक रूप से तोड़ देता है और अंततः एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो जाती है।

शुभम की मृत्यु के बाद कहानी का सबसे भावनात्मक और नाटकीय चरण शुरू होता है। अस्पताल में आखिरी साँसें लेते हुए शुभम विक्रम से वादा लेता है कि वह उसका प्रतिबिंब बनकर जियेगा ताकि बाड़मेर की सरहद की धूल का वजूद न मिटे। विक्रम अपने जीवित वजूद और असली पहचान की चिता जलाकर खुद शुभम बन जाता है। वह शुभम की माँ के पास जाकर बेटा बनता है और फिर दिल्ली के मुखर्जी नगर जाकर शुभम के नाम से ही IAS की तैयारी में जुट जाता है। यहाँ उसकी मुलाकात मन्नत से होती है। मन्नत के साथ प्रेम पनपता है, लेकिन विक्रम हमेशा इस अपराधबोध में जीता है कि वह मन्नत से अपनी पहचान का सबसे बड़ा झूठ छिपा रहा है।

कहानी का क्लाइमेश तब आता है जब जयपुर का पुराना दोस्त रोहन दिल्ली में विक्रम को पहचान लेता है और मन्नत के सामने सच आ जाता है। मन्नत उसे धोखा देने पर दुखी होती है, लेकिन विक्रम के त्याग की गहराई को समझकर उसे मुखौटा उतारने और अपनी असली पहचान विक्रम के रूप में ही परीक्षा देने और लड़ने की सीख देती है। विक्रम अपनी गलती स्वीकारता है, अपनी असली पहचान के साथ UPSC परीक्षा देता है, हालाँकि पहली बार में असफल होता है। कहानी अंत में जातिगत सीमाओं के कारण मन्नत से शारीरिक अलगाव, लेकिन आत्मिक प्रेम की अमरता और जीवन के प्रति एक नए संकल्प के साथ समाप्त होती है।

किताब की कमियाँ: जहाँ एक ओर उपन्यास की भाषा और भावनाएँ पाठकों को गहराई से छूती हैं, वहीं इसमें कुछ प्रमुख कमियाँ भी स्पष्ट झलकती हैं। सबसे पहली कमी कहानी का अत्यधिक नाटकीय और अति-काल्पनिक होना है। किसी जीवित व्यक्ति का कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर पूरी तरह किसी मृत व्यक्ति की पहचान) अपनाकर प्रशासनिक सेवा की तैयारी करना व्यावहारिक जीवन में असंभव-सा लगता है। दूसरी कमी यह है कि सेजल के पात्र को बेहद एकतरफा और नकारात्मक दिखाया गया है, जहाँ उसका व्यवहार अचानक अत्यंत क्रूर और जातिवादी हो जाता है, जो थोड़ा अस्वाभाविक लगता है। इसके अलावा, कहानी में बार-बार वही भावनात्मक विचार, डायलॉग और शायरियाँ दोहराई गई हैं, जिससे बीच के कुछ अध्यायों में गति धीमी हो जाती है और मुख्य कथानक भटकता हुआ प्रतीत होता है।

✍️ लेखक – ब्रजपाल चारण ‘बाजी’
🏢 प्रकाशक – राजस्थानी ग्रंथागार


‘रास्तों में मिलती हैं परछाइयाँ’ पुस्तक में लेखक शत्रुघ्न जी ने इंजीनियरिंग कॉलेज जीवन, दोस्तों के आपसी रिश्तों, नागपुर ...
26/09/2026

‘रास्तों में मिलती हैं परछाइयाँ’ पुस्तक में लेखक शत्रुघ्न जी ने इंजीनियरिंग कॉलेज जीवन, दोस्तों के आपसी रिश्तों, नागपुर शहर में बिताये पलों और समय के साथ बदलती प्राथमिकताओं तथा परिपक्वता को बेहद संवेदनशीलता और यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कहानी जीवन के उस खूबसूरत और उतार-चढ़ाव भरे दौर की है, जहाँ अजनबी लोग एक-दूसरे से जुड़कर जीवनभर के लिए अपने हो जाते हैं। पूरी कथा हॉस्टल जीवन की छोटी-छोटी खुशियों, मिस-कम्युनिकेशन के कारण उपजी अनबन और फिर परिपक्व होकर एक-दूसरे को समझने व माफ करने के अनुभवों को परत-दर-परत उघाड़ती है।

कहानी का मुख्य पात्र एक सीधा और संवेदनशील नवयुवक है, जो बिहार के गाँव से निकलकर नागपुर कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने आता है। वह स्वभाव से शांत, आत्मचिंतन करने वाला और किताबों व सिनेमा का शौकीन है। उसका दोस्त अंकित बेहद व्यावहारिक, लक्ष्य-केंद्रित और योजना बनाकर चलने वाला व्यक्ति है, जिसका विजन देश के किसानों के लिए डिजिटल एप्लीकेशन विकसित करने जैसा दूरदर्शी है। सीनियर ‘चंदन भैया’ कहानी में एक स्तंभ और मार्गदर्शक की तरह उपस्थित होते हैं, वे बिंदास, घुमंतू, सिगरेट और चाय के शौकीन, लेकिन जूनियर्स को संकट में हमेशा संभालने वाले एक अभिभावक की भूमिका निभाते हैं।

अन्य प्रमुख पात्रों में सोनाली, संजय, अभिषेक और मनीष के जीवन की यात्रा बहुत रोचक और प्रभावशील है। सोनाली एक आत्मनिर्भर, प्रतिभाशाली और संवेदनशील कलाकार है, जो नायक के जीवन में एक जादुई उपस्थिति और सकारात्मक बदलाव लेकर आती है। वह अपने करियर और संगीत के प्रति समर्पित होने के साथ-साथ नायक को उसके सपनों को जीने का साहस देती है। संजय, जो शुरुआत में प्रेम में ईर्ष्या और आक्रामकता के कारण हिंसक रूप में दिखता है, बाद में आत्म-अवलोकन और परिपक्वता के दौर से गुजरकर अपनी गलतियाँ स्वीकारता है और एक बेहद सुधरे हुए इंसान के रूप में सामने आता है।

दूसरी ओर, कमरे के साथी अभिषेक और मनीष के बीच का सम्बंध दोस्ती के एक महत्त्वपूर्ण पहलू को उजागर करता है। मनीष, जो एक महत्त्वाकांक्षी और मेहनती आर्किटेक्चर छात्र है, अपने काम में इतना व्यस्त हो जाता है कि संवाद की कमी के कारण अभिषेक के साथ उसकी कहा-सुनी हो जाती है। अभिषेक संवेदनशील और आत्म-अभिमानी है, जो इस घुटन से बचने के लिए चुपचाप कमरा छोड़कर चला जाता है। हालाँकि, अंत में दोस्तों की जिद, शराब की एक रात और सच्चे दिल से माँगी गई माफी उनके ईगो को मिटाकर उन्हें फिर से एक सूत्र में बाँध देती है।

जमसावली की रात में की गई बाइक यात्रा और उसके रास्ते में घटी घटनाएँ जीवन को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर देती हैं। भोर के अंधेरे में एक बुजुर्ग को बचाते समय पैदा हुआ हास्य और डर, तथा उसके बाद का आत्मचिंतन यह सिखाता है कि हर घटना को देखने के अलग-अलग दृष्टिकोण होते हैं। नागपुर में बीतता समय, सेमेस्टर की भागदौड़, कैपस्टोन प्रोजेक्ट्स का दबाव और पास आउट होने के बाद विदाई के भावुक क्षण इस दौर की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं।

इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में सभी मित्र अपनी-अपनी दिशाओं में आगे बढ़ जाते हैं। अंकित और अभिषेक को बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अच्छी नौकरियों का चयन मिलता है, जबकि मनीष भारत सरकार के सहयोग से गाँव में भारत भवन से प्रेरित एक सांस्कृतिक और कला केंद्र खोलकर समाज-सेवा का मार्ग चुनता है। नायक, अपनी प्रेमिका सोनाली के प्रोत्साहन से, इंजीनियरिंग की पारंपरिक राह छोड़कर अपने जुनून को चुनता है और मुंबई आकर फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखता है।

यह पुस्तक केवल कॉलेज के दिनों की यादों (नॉस्टैल्जिया) का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह समय के साथ आने वाले बदलाव, माफ करने की कला और स्वयं को तलाशने की एक खूबसूरत यात्रा है। कहानी यह संदेश देती है कि जब हम अपने अहंकार को भूलकर बातचीत का रास्ता चुनते हैं, तो जटिल से जटिल रिश्ते भी सुलझ जाते हैं और अजनबी लोग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाते हैं।

✍️ लेखक – शत्रुघ्न
🏢 प्रकाशक – वेरा प्रकाशन


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