04/10/2026
सुनसा केरापा द्वारा रचित ‘ड्रॉप ईयर’ ‘ की कहानी मुख्य रूप से कोटा, राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ हर साल देश भर से हज़ारों छात्र-छात्राएँ नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहुँचते हैं।
कहानी की शुरुआत अभय नामक एक छात्र के कोटा लौटने से होती है, जो नीट की तैयारी के लिए ड्रॉप लेकर फिर से इस शहर में आया है। वह आर्थिक तंगी और खुद को साबित करने के दबाव में जवाहर नगर में जैश गहलोत (जेडी) नाम के व्यक्ति के घर में एक कमरा किराये पर लेता है। जेडी कोटा के एक नामी सर्जन हैं, लेकिन वे अपनी पत्नी सावी की मौत के बाद पूरी तरह टूट चुके हैं और दिन-रात शराब के नशे में डूबे रहते हैं। जेडी खुद से और सावी की पुरानी यादों से बातें करते रहते हैं, जिसे देखकर शुरुआत में अभय उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ इंसान समझ लेता है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब जेडी को सावी की एक पुरानी नोटबुक मिलती है, जिस पर लिखा होता है- Don’t Read Until I Die. उस डायरी से सावी और जेडी के अतीत की कहानी सामने आती है। सावी का पहला प्यार और लेखन के प्रति लगाव, जेडी के साथ उसका रिश्ता, और फिर एक गंभीर बीमारी के कारण उसकी असमय मृत्यु, इन सब बातों ने जेडी को अंदर से तोड़ दिया था। सावी का सपना एक ऐसा उपन्यास लिखना था जो हिन्दी से अन्य भाषाओं में अनुवादित हो और जिसे दुनिया पढ़े। सावी के अधूरे लिखे उपन्यास को पूरा करने और उसे दुनिया के सामने लाने के लिए जेडी शराब का नशा छोड़कर किताबों की दुनिया से जुड़ते हैं।
दूसरी तरफ, अभय का संघर्ष उसकी गर्लफ्रेंड वंशिका के साथ सम्बन्धों और पढ़ाई के दबाव के इर्द-गिर्द घूमता है। वहीं, रचित, धव्या, जेरी और प्राची जैसे अन्य युवाओं की कहानियों के ज़रिये रिश्तों में बदलती प्राथमिकताओं, पहचान की लड़ाई जैसे-एलजीबीटी समुदाय से जुड़े जेरी का संघर्ष और कॉलेज जीवन के वास्तविक ताने-बाने को बुना गया है।
कहानी के अन्य किरदारों में वंशिका अभय की गर्लफ्रेंड है, जो करियर, पारिवारिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद से गुजरती है। रचित और धव्या का रिश्ता आधुनिक युवाओं के प्रेम, उसमें आने वाले बदलावों और समय के साथ बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
किताब की भाषा बेहद सरल, संवादात्मक और सीधी दिल को छूने वाली है। कोटा शहर की भागदौड़, हॉस्टल और पीजी के एकांत, और कमरों की दीवारों में छिपी ख़ामोशी को बहुत खूबसूरती से शब्दों में ढाला गया है। यह पुस्तक केवल कोटा की कोचिंग संस्कृति या पढ़ाई की रेस की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी रिश्तों, अधूरे सपनों, नुकसान के दर्द और उससे उबरने की एक मानवीय गाथा है। जहाँ एक तरफ अभय जैसे युवा अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत में रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं जेडी जैसे किरदार अपनी टूटी हुई ज़िन्दगी को फिर से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
इस पुस्तक की संपूर्ण रूप से व्याख्या की जाये तो ज़िन्दगी कभी किसी एक मोड़ या असफलता पर रुकती नहीं है। असफलता, असंतुलन और किसी प्रियजन का बिछड़ जाना जीवन का एक कड़वा सच है, लेकिन उन दुखों में डूबने के बजाय किसी मकसद या प्रेम की स्मृति को शक्ति बनाकर आगे बढ़ना ही असली जीवन है। समाज और माता-पिता के दबाव में बच्चों की पहचान केवल एक परिणाम या रैंक तक सीमित नहीं होनी चाहिए; हर इंसान के भीतर का संघर्ष और उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सबसे महत्त्वपूर्ण होती हैं।
Bookish Rishi Sagar
✍️ लेखक – सुनसा केरापा
🏢 प्रकाशक – ख्याति प्रकाशन