I Love U Mom ღღღ•ılılı•٠·

I Love U Mom   ღღღ•ılılı•٠· Mother is the name for God in the lips and hearts of little children. plz like this page if u love ur mother. I Love U Mom ღღღ•ılılı•٠·

M-O-T-H-E-R
"M" is for the million things she gave me,
"O" means only that she's growing old,
"T" is for the tears she shed to save me,
"H" is for her heart of purest gold;
"E" is for her eyes, with love-light shining,
"R" means right, and right she'll always be,
Put them all together, they spell "MOTHER,"
A word that means the world to me.

मुस्कुराकर, दर्द भूलकररिश्तों में बंद थी दुनिया सारीहर पग को रोशन करने वालीवो शक्ति है एक नारीमहिला दिवस की शुभकामनाएं.
08/03/2018

मुस्कुराकर, दर्द भूलकर
रिश्तों में बंद थी दुनिया सारी
हर पग को रोशन करने वाली
वो शक्ति है एक नारी
महिला दिवस की शुभकामनाएं.

🌟 *मृत्युभोज से ऊर्जा नष्ट होती है।* 🌟*महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि .....*मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो...
24/03/2017

🌟 *मृत्युभोज से ऊर्जा नष्ट होती है।* 🌟

*महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि .....*
मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
*जिस परिवार में मृत्यु जैसी विपदा आई हो उसके साथ इस संकट की घड़ी में जरूर खडे़ हों और तन, मन, धन से सहयोग करें।*

लेकिन......बारहवीं या तेरहवीं पर मृतक भोज का पुरजोर बहिष्कार करें।

महाभारत का युद्ध होने को था, अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जा कर युद्ध न करने के लिए संधि करने का आग्रह किया।

दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्रीकृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े,
तो दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर कृष्ण ने कहा कि
🍁
*’’सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’*
अर्थात्

*"जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए।*
🍁
*लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।"*
🍁

*हिन्दू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए है,*

*जिसमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा 16वाँ संस्कार अन्त्येष्टि है।*

इस प्रकार जब सत्रहवाँ संस्कार बनाया ही नहीं गया तो-
सत्रहवाँ संस्कार *'तेरहवीं का भोज'*कहाँ से आ टपका।

*किसी भी धर्म ग्रन्थ में मृत्युभोज का विधान नहीं है।*

बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि

*मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।*

लेकिन हमारे समाज का तो ईश्वर ही मालिक है।

*जिस भोजन बनाने का कृत्य....रो रोकर हो रहा हो....*

जैसे लकड़ी फाड़ी जाती तो रोकर....
आटा गूँथा जाता तो रोकर....
एवं पूड़ी बनाई जाती है तो रो रोकर....
यानि हर कृत्य आँसुओं से भीगा हुआ।

*ऐसे आँसुओं से भीगे निकृष्ट भोजन अर्थात बारहवीं एवं तेरहवीं के भोज का पूर्ण रूपेण बहिष्कार कर समाज को एक सही दिशा दें।*

*जानवरों से भी सीखें,*
जिसका साथी बिछुड़ जाने पर वह उस दिन चारा नहीं खाता है।

*जबकि 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव, जवान आदमी की मृत्यु पर हलुवा पूड़ी पकवान खाकर शोक मनाने का ढ़ोंग रचता है।*

*इससे बढ़कर निन्दनीय कोई दूसरा कृत्य हो नहीं सकता।*

यदि आप इस बात से सहमत हों, तो -

*आप आज से संकल्प लें कि आप किसी के मृत्यु भोज को ग्रहण नहीं करेंगे और मृत्युभोज प्रथा को रोकने का हर संभव प्रयास करेंगे

हमारे पूर्वजो पर हुए अत्याचार1- मैं नहीं भूला उस कामपिपासु अलाउद्दिन खिलजी को, जिससे अपने सतीतव को बचाने के लिये रानी पद...
25/03/2016

हमारे पूर्वजो पर हुए अत्याचार
1- मैं नहीं भूला उस कामपिपासु अलाउद्दिन खिलजी को, जिससे अपने सतीतव को बचाने के लिये रानी पद्ममिनी 14000 महिलाओं के साथ जलते हुए अग्निकुंड में कूद गयी थीं।
2- मैं नहीं भूला उस जालिम औरंगजेब को, जिसने संभाजी महाराज को इस्लाम स्वीकारने से मना करने पर तडपा तडपा कर मारा था।
3- मैं नहीं भूला उस जिहादी टीपु सुल्तान को, जिसने एक एक दिन में लाखों हिंदुओ का नरसंहार किया था।
4- मैं नहीं भूला उस जल्लाद शाहजहाँ को, जिसने 14 बर्ष की एक ब्राह्मण बालिका के साथ अपने महल में जबरन बलात्कार किया
5- मैं नहीं भूला उस बर्बर बाबर को, जिसने मेरे श्री राम प्रभु का मंदिर तोड़ा और लाखों निर्दोष हिंदुओ का कत्ल किया था।
6- मैं नहीं भूला उस शैतान सिकन्दर लोदी को, जिसने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर की माँ दुर्गा की मूर्ति के टुकड़े कर उन्हें कसाइयों को मांस तोलने के लिये दे दिया था।
7- मैं नहीं भूला उस धूर्त ख्वाजा मोइन्निद्दिन चिस्ती को, जिसने संयोगीता को इस्लाम कबूल ना करने पर नग्न कर मुगल सैनिको के सामने फेंक दिया था।
8- मैं नहीं भूला उस निर्दयी बजीर खान को, जिसने गुरूगोविंद सिंह के दोनों मासूम बच्चों फतेहसिंह और जोरावार को मात्र 7 साल और 5 बर्ष की उम्र में इस्लाम ना मानने पर दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था।
9- मैं नहीं भूला उस जिहादी बजीर खान को, जिसने बन्दा बैरागी की चमडी को गर्म लोहे की सलाखों से तब तक जलाया जब तक उसकी हड्डियां ना दिखने लगी मगर उस बन्दा वैरागी ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया
10- मैं नहीं भूला उस कसाई औरंगजेब को, जिसने पहले संभाजी महाराज की आँखों मे गरम लोहे के सलिए घुसाए, बाद में उन्हीं गरम सलियों से पुरे शरीर की चमडी उधेडी, फिर भी संभाजी ने हिंदू धर्म नही छोड़ा था।
11- मैं नहीं भूला उस नापाक अकबर को, जिसने हेमू के 72 वर्षीय स्वाभिमानी बुजुर्ग पिता के इस्लाम कबूल ना करने पर उसके सिर को धड़ से अलग करवा दिया था।
12- मैं नहीं भूला उस वहशी दरिंदे औरंगजेब को, जिने धर्मवीर भाई मतिदास के इस्लाम कबूल न करने पर बीच चौराहे पर आरे से चिरवा दिया था।
हम हिंदुओ पर हुए अत्याचारो क.ो बताने के लिए शब्द और पन्ने कम हैं, यदि इस पोस्ट को पढ़कर मेरी तरह आपका खून भी खौला हो, तो पोस्ट को अपने मित्रों के साथ शेयर ज़रूर करें।

मैं लेटा हुआ था, मेरीपत्नी मेरा सिर सहलारही थी।मैं धीरे-धीरे सो गया।जागा तो वो गले परविक्स लगा रही थी।मेरी आंख खुली तो उ...
09/03/2016

मैं लेटा हुआ था, मेरी
पत्नी मेरा सिर सहला
रही थी।
मैं धीरे-धीरे सो गया।
जागा तो वो गले पर
विक्स लगा रही थी।
मेरी आंख खुली तो उसने पूंछा,कुछ आराम मिल रहा
है?
मैंने हां में सिर हिलाया। तो उसने पूंछा कि खाना
खाओगे ?
मुझे भूख लगी थी, मैंने कहा, "हां।"
उसने फटाफट रोटी,
सब्जी, दाल, चटनी,
सलाद
मेरे सामने परोस दिए, और
आधा लेटे- लेटे
मेरे मुंह में कौर डालती रही।
मैने चुपचाप खाना खाया,
और लेट गया।
पत्नी ने मुझे अपने हाथों से खिला कर खुद को
खुश महसूस किया और
रसोई में चली गई।
मैं चुपचाप लेटा रहा।
सोचता रहा कि पुरुष भी
कैसे होते हैं ?
कुछ दिन पहले मेरी पत्नी बीमार थी, मैंने कुछ नहीं किया था।
और तो और एक फोन करके
उसका हाल भी नही पूंछा
था।
उसने पूरे दिन कुछ नही खाया था, लेकिन मैंने उसे ब्रेड परोस कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर
रहा था।
मैंने ये देखने की कोशिश भी नही की कि उसे वाकई
कितना बुखार था।
मैंने ऐसा कुछ नही किया
कि उसे लगे कि बीमारी में
वो अकेली नही।
लेकिन मुझे सिर्फ जरा सी सर्दी हुई थी, और वो
मेरी मां बन गई थी।
मैं सोचता रहा कि क्या सचमुच महिलाओं को
भगवान एक अलग दिल देते
हैं ?
महिलाओं में जो करुणा और ममता होती है वो पुरुषों में नही होती क्या?
सोचता रहा,
जिस दिन मेरी पत्नी को बुखार था,उस दोपहर जब
उसे भूख लगी होगी और वो बिस्तर से उठ न पाई
होगी,
तो उसने भी चाहा होगा
कि काश उसका पति
उसके पास होता?
मैं चाहे जो सोचूं, लेकिन मुझे लगता है कि हर पुरुष
को एक जनम में औरत बन
कर ये समझने की कोशिश
करनी ही चाहिए कि
सचमुच कितना मुश्किल
होता है,
औरत को..... औरत होना।
मां होना,
बहन होना,
पत्नी होना
☺like if u respect women☺

29/02/2016

एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,
"चिट्ठी ले लीजिये।"
अंदर से एक बालिका की आवाज आई,
"आ रही हूँ।"
लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,
"अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो।"
लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ। "पोस्टमैन ने कहा,"नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।"
करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही लेकिन, दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया !! सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।
पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते,दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन लड़की ने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा।
दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।
एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे,उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।
दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ।
उसने दरवाजा खटखटाया।
अंदर से आवाज आई,
"कौन?
"पोस्टमैन, उत्तर मिला।
बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा, "अंकल,मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।
"पोस्टमैन ने कहा," तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो,
तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ? "कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।
"ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा, "अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना।
घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। उसकी आँखें भर आई।
अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।
पोस्टमास्टर ने कारण पूछा, तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और
रुंधे कंठ से कहा, "आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"
संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ ह
☺like if this real story touched ur heart☺

22/02/2016

काफी समय पहेली की बात है ।
उस समय जापान विकसित देशो में शामिल नही था ।
उस समय जापान मे ट्रेनो की हालात भी काफी खस्ता थी ।
एक भारतीय भी उस ट्रेन में सफर कर रहा था ।ट्रेन की सीट टूटी हुई थी ।
एक जापानी नागरिक भी उस ट्रेन में सफर कर रहा था ।जापानी नागरिक ने अपनी बैग में से सूई धागा निकाला और सीट की सिलाई करने लगा । भारतीय नागरिक ने पुछा क्या आप रेल्वे के कर्मचारी है ।
उसने कहा ना मैं एक शिक्षक हूं ।
मैं इस ट्रेन से हररोज अप डाउन करता हूं । इस सीट की खस्ता हालत देख बाजार से सुई धागा खरीद लाया हुं । सोचा हर रोज इस सीट को देखकर मुझे महसूस होता था कि अगर कोई विदेशी नागरिक इसे देखेगा तो मेरे देश की कितनी बेईज्जती होगी ऐसा सोच के सीट रिपेयर (सिलाई)कर रहा हूं ।
सलाम उस देश के शिक्षक को जो देश की इज्जत अपनी इज्जत समझता हो और थोड़ा सा काम करता हो । और वो ही जापान आज इतना विकसित हो गया है कि हम उससे बुलेट ट्रेन खरीद रहे है ।
बाकी ट्रक के पीछे "मेरा भारत महान" लिख देने से कोई देश महान नही बन जाता ।
उस देश की सोच और कर्म भी महान होनी चाहिए
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02/02/2016

----------पिज्जा------------
पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत
निकालना…
पति- क्यों??
उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं
आएगी…
पति- क्यों??
पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के
यहाँ जा रही है, बोली थी…
पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…
पत्नी- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ
उसे? त्यौहार का बोनस..
पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…
पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती
के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और
इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से # त्यौहार कैसे
मनाएगी बेचारी!!
पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो
जाती हो…
पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का
पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ…
खामख्वाहपाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के
उन आठ टुकड़ों के पीछे…
पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा
छीनकर बाई की थाली में??
तीन दिन बाद…
पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...
पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?
बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब…
दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का
बोनस..
पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती
से…?
बाई- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में 500 रूपए
खर्च कर दिए…
पति- अच्छा!! मतलब क्या किया 500 रूपए का??
बाई- नाती के लिए 150 रूपए का शर्ट,
40 रूपए की गुड़िया,
बेटी को 50 रूपए के पेढे लिए,
50 रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया,
60 रूपए किराए के लग गए..
25 रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए
और जमाई के लिए 50 रूपए का बेल्ट लिया अच्छा
सा…
बचे हुए 75 रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल
खरीदने के लिए…
झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर
रटा हुआ था…
पति- 500 रूपए में इतना कुछ???
वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...
उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा
सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग
में हथौड़ा मारने लगा…
अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली
बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा…
पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का,
दूसरा टुकड़ा पेढे का,
तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का,
पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का,
सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे
की कॉपी-पेन्सिल का..आज तक उसने हमेशा
पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर
नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता
है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की
दूसरी बाजू दिखा दी थी…
पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए
थे…
“ # जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए
जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ
गया…

24/01/2016

यह कहानी मेरे दिल के बहुत करीब है जरूर पढ़े और कमेंट्स भी लिखे

जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उस का पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़। दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था। जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है। टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।

"ये जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना। वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" कह टीसी आगे चला गया।

पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।

सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।

"साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते। हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे। बड़ी मेहरबानी होगी।"

टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।

"सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"

"आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब। नाती को देखने जा रहे हैं। गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अब कि बार पत्नी ने कहा।

"तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो। एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"

"ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।

"नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी। देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है। एक लाख करोड़ का खर्च है। कहाँ से आयेगा इतना पैसा? रसीद बना-बना कर ही तो जमा करना है। ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही। चलो, जल्दी चार सौ निकालो वरना स्टेशन आ रहा है, उतर कर जनरल बोगी में चले जाओ।" इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।

आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकाल कर दे रहा हो। पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे। "ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ?"

"बला नहीं जादू है जादू। बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए।
सुना है, "अच्छे दिन" इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं।"

उन की इन बातों पर आस पास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके सोग में जा रहे हो। कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा?

नहीं-नहीं।

आखिर में पति बोला- "सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा। मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"

"ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।"

पत्नी के कहा। "मगर मुन्ने के कम करना और पति की आँख छलक पड़ी।

"मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे।" कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली- "अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-" इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो। उसकी आँख फिर छलके पड़ी।

"अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत"

कहानी का नाम✏

#बुलेट_ट्रेन

13/12/2015

रतन टाटा का ट्वीट..
जर्मनी एक उच्च औद्योगिक देश है। अपने लोग वंहा आलीशान जिंदगी के बारे में सोचते हैं।
हमने वंहा खाना खाते हुए एक युवा जोड़े को देखा जो वहां भोजन कर रहा था। उनकी प्लेट में केवल दो व्यंजन और मेज पर juice के दो डिब्बे थे। क्या ऐसा साधारण भोजन रोमांटिक हो सकता है।
एक और टेबल पर कुछ बुढ़ी महिलाएं थी.. उनकी प्लेट में भी भोजन के १-२ बिट्स थे..
हम भूखे थे, तो हमने अधिक भोजन का आदेश दिया.. हमारे द्वारा भोजन कर लेने के बाद मेज पर भोजन का एक तिहाई हिस्सा अभी भी झुठा बच गया था..
जब हम रेस्तरां से जाने लगे तोे कुछ बुढ़ी महिलाओं ने हमसे अंग्रेजी में बात की, हम समझ गए थे कि वे हमें इतना भोजन बर्बाद कर देने के बारे में दुखी थे..
मेरे सहयोगी ने उन बुढ़ी महिलाओं को बताया, "हमने अपने भोजन के लिए भुगतान किया है, यह हम पर छोड़ दो कि हमें कितना खाना है ।
लेकिन बुढ़ी महिलाएं गुस्से में थी.. उनमें से एक ने तुरंत अपने हाथ में फोन लेकर और किसी को फोन किया। थोड़ी देर के बाद, सामाजिक सुरक्षा संगठन से वर्दी में एक आदमी आ गया । विवाद क्या था जानने पर, उसने हम पर 50 यूरो जुर्माना जारी कर दिया.. हम सब चुप रहे।
एक अधिकारी ने कठोर आवाज में हमें बताया, "आप जितना उपभोग कर सकते हैं उतना ओर्डर दिजीये , हालांकी पैसा तुम्हारा है लेकिन संसाधनों पर समाज का भी उतना ही हक जितना की आपका..
दुनिया में बहुत से लोग संसाधनों की कमी का सामना कर रहे है..
आप संसाधनों को इस तरह से बर्बाद नहीं कर सकते..
इस समृद्ध देश के लोगों की मानसिकता ने हम सबको शर्म में डाल दिया। हमें वास्तव में इस पर चिंतन करने की जरूरत है।
हमारा देश संसाधनों में बहुत अमीर नहीं है, अपनी शान दिखाने के लिए हम बड़ी मात्रा में ओर्डर दे देते हैं और कई लोगों का भोजन बर्बाद कर देते हैं यह सही है कि "पैसा तुम्हारा है लेकिन संसाधन समाज के लिए हैं और समाज का भी उतना ही अधिकार है " ।
** रतन टाटा के ट्वीट से कितने लोग सहमत हैं ?
** मैं सहमत हूँ ! क्या आप भी ?

12/12/2015

वो फुटपाथ पर चुंबक लेकर लेटे थे, खींच लिया भाई की कार को अपनी तरफ। गाड़ी भी टूट गयी थी, जज साब गाड़ी का मुआवज़ा भी दे दो भाई को।
हिरन ही शराब पीकर गाड़ी चला रहा था और उसने ही मज़दूरों को कुचला था। सज़ा होने के डर से ही उसने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।
शराब ने ड्राईवर को पी लिया जिस से सलमान को ज्यादा चढ़ गयी और गाडी के टायर होश खो बैठे और गरीब लोगो पर चढ़ गए..
RIP judiciary

01/12/2015

मैं एक भारतीय महिला मुसलमान बोल रही हूँ : डॉ. सोफिया रंगवाला
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मैं एक मुस्लिम महिला हूँ और पेशे से डॉक्टर हूँ। बंगलोर में मेरी एक हाइ एण्ड लेजर स्किन क्लिनिक है। मेरा परिवार कुवैत में रहता है। मैं भी कुवैत में पली बढ़ी हूँ लेकिन 18 साल की उम्र में डाक्टरी की पढ़ाई करने के लिए मैं भारत लौट आयी थी। पढ़ाई खत्म होने के बाद जहाँ मेरे ज्यादातर साथी अच्छे भविष्य के सपने के साथ बाहर चले गये मैंने भारत में ही रहने का निश्चय किया। आज तक मैंने एक बार भी कभी यह महसूस नहीं किया कि एक मुसलमान होने के कारण हमें कोई दिक्कत हुई हो। मुझे अपने देश से प्रेम था और मैंने भारत में ही रहने का निश्चय किया।
मैंने डॉक्टरी की पढ़ाई कर्नाटक के मणिपाल से किया। जैसे सब अकेले रहते थे, मैं भी अकेली रहती थी। मेरे सारे प्रोफेसर हिन्दू थे। आसपास जो लोग थे वे सभी हिन्दू थे। मैंने एक बार भी कभी यह महसूस नहीं किया कि मेरे साथ मुसलमान औरत होने के कारण भेदभाव हो रहा है। सब मेरे प्रति उदार रहते थे और कई बार तो वे यह अहसास दिलाने के लिए मैं उनके बीच का ही एक हिस्सा हूँ, ज्यादा प्रयास करते थे। मणिपाल में सबने मुझे जरूरत से ज्यादा सहूलियत देने की कोशिश की।
मणिपाल में पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं अपने पति के साथ बंगलौर में बस गयी। तब तक मेरी शादी हो चुकी थी और हमने तय किया कि हम बंगलौर में ही बसेंगे। ऐसा सोचने के पीछे एक कारण था। यहाँ मैं अपने पति के बारे में आपको बताना चाहूँगी। वे भी एक मुसलमान हैं। उनका पहला नाम इकबाल है। उन्होंने चेन्नई से एमटेक किया है और जर्मनी से पीएचडी। वे एयरोस्पेस इंजिनियर हैं। उनका काम ऐसा है कि वे भारत की सबसे सुरक्षित संस्थाओं जैसे डीआरडीओ, जीटीआरई, इसरो, आईआईएससी, भेल में आते जाते रहते हैं। लेकिन कहीं भी आने जाने में आज तक उन्हें मुसलमान होने के कारण कभी कोई परेशानी नहीं हुई। ऐसी अति सुरक्षित जगहों पर आज तक एक बार भी उनकी ऐसी तलाशी नहीं ली गयी जिसके लिए अमेरिका जैसे आधुनिक देश बदनाम हो चुके हैं। उन्हें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मुसलमान होने के कारण उनके साथ किसी तरह का भेदभाव किया गया हो। मोदी सरकार आने के बाद भी नहीं। बल्कि नई सरकार आने के बाद तो सरकारी संस्थानों में सुरक्षा के उपाय और भी अनुशासित हुए हैं।
मेरे पति बताते हैं कि अमेरिका में ऐसा नहीं है। वे जब भी अमेरिका जाते हैं तो सिर्फ मुसलमान होने के कारण उनके ऊपर नजर रखी जाती है। इकबाल जब भी अमेरिका जाते हैं तो उन्हें कपड़े उतारकर तलाशी देनी पड़ती है। जर्मनी में जिन दिनों वे पीएचडी कर रहे थे उस वक्त भी उन पर एक मुसलमान होने के कारण गुप्त रूप से नजर रखी जाती थी। एक बार तो बाकायदा चिट्ठी भेजकर हमें सूचित किया गया कि आप पर नजर रखने के दौरान हमें कोई संदिग्ध गतिविधि नजर नहीं आई, इसलिए अब हम किसी प्रकार के संदेह के घेरे में नहीं हैं। मेरे पति अपने सहयोगियों के बीच पूरा सम्मान, समर्थन और मुहब्बत पाते हैं। और उनके सहयोगियों में सभी हिन्दू हैं। सरकार बदलने के बाद भी हालात में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए असहिष्णुता एक ऐसा शब्द है जो हमारे लिए कोई मायने ही नहीं रखता।
मोदी सरकार के बनने से थोड़ा समय पहले ही पिछले साल मैंने अपना क्लिनिक खोला। मैं समय से अपना टैक्स भरती हूं और काम काज में कानूनों का पूरी तरह से पालन करती हूँ। मैं अपने काम-काज के दौरान ऐसा कुछ भी करने से बचती हूँ जिसके कारण मेंरे ऊपर कोई मुसीबत आ सकती है। मैं बहुत आराम से अपनी क्लिनिक चला रही हूँ। मेरे ज्यादातर पेशेन्ट्स हिन्दू हैं। क्लिनिक का मेरा पूरा स्टाफ हिन्दू है। और मेरा विश्वास करिए, क्लिनिक की देखभाल वे मुझसे ज्यादा अच्छी तरह से करते हैं। बीते बीस सालों में सरकारी गैर सरकारी बहुत सारी जगहों पर आना जाना हुआ है लेकिन मुझे आज तक कभी यह महसूस नहीं हुआ कि सिर्फ मुसलमान होने के कारण मेरे साथ कोई भेदभाव किया जा रहा है। शायद यही वह अपनापन है कि मैं अपने देश को नहीं छोड़ पा रही हूँ। मेरा पूरा परिवार बाहर रहता है और बाहर जाने के लिए मुझे कुछ नहीं करना है सिर्फ एक बार कहना ही है। कुवैत सरकार की तरफ से क्लिनिक खोलने का मेरे पास ओपेन आफर है जो मेरे लिए कमाई का यहाँ से ज्यादा बेहतर जगह हो सकती है। अगर मेरे साथ सिर्फ मुसलमान होने के कारण भेदभाव होता तो सारी संभावनाओं को नकारकर मैं यहाँ क्यों रहना चाहती?मैं दुनिया के कई देशों में रही हूँ और आती जाती रहूँ, लेकिन सिर्फ भारत में मुझे घर में रहने जैसा महसूस होता है। यही वह फर्क है जो एक भारतीय मुसलमान के लिए भारत को दुनिया के दूसरे देशों से अलग करता है।
मैं कुवैत में ही पली बढ़ी और चालीस साल से मेरा परिवार वहाँ रह रहा है लेकिन आज भी हम उनके लिए कुछ नहीं है। हमारे परिवार वाले आज भी बाहरी हैं और उन्हें वहाँ कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। हमें नियमित तौर पर अपना रेजिडेन्ट वीजा रेन्यू कराना पड़ता है। कानूनों में निरंतर बदलाव होता रहता है जिसके कारण जिन्दगी दिन ब दिन जटिल से जटिल होती जाती है। हमारे लिए यह जरूरी है कि उनके बनाये कानूनों का हम अनिवार्य रूप से पालन करें। ठीक है। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन उनके कानून बनाये ही जाते हैं भेदभाव के आधार पर। हमारे साथ खुलेआम भेदभाव होता है। अरब के लोग अपने आपको पहले दर्जे का नागरिक मानते हैं, गोरे लोगों को दूसरे दर्जे का और एशियाई लोगों को तीसरे दर्जे का नागरिक मानते हैं। हालांकि हम वहाँ रहकर नाखुश नहीं है लेकिन वहाँ रहते हुए कभी लगता ही नहीं कि हमारा यहाँ से कोई ताल्लुक है। मैं जब कुवैत में रहती थी या अब भी जब मैं कभी कभार आती जाती हूँ तो मुझे कभी वहाँ किसी प्रकार अपनापन महसूस नहीं होता है। हम मुसलमान हैं और एक मुसलमान देश में जाते हैं फिर भी हमे भारतीय समझा जाता है और किसी प्रकार की कोई अतिरिक्त सहूलियत नहीं दी जाती है। मैंने बहुत पहले यह महसूस कर लिया था कि सिर्फ भारत ऐसा देश है जहाँ रहने पर उसके साथ अपनेपन का अनुभव होता है। आप अमेरिका में हैं तो इंडियन अमेरिकन हैं, कनाडा में हैं तो इंडियन कनाडियन हैं, ब्रिटेन में हैं तो इंडियन ब्रिटिश हैं लेकिन सिर्फ भारत एकमात्र ऐसा देश हैं जहाँ आप हैं तो आप केवल भारतीय हैं। सिर्फ अपने घर में आप घर में होने जैसा अनुभव कर सकते हैं। मैं दुनिया के कई देशों में रही हूँ और आती जाती रहूँ लेकिन सिर्फ भारत में मुझे घर में रहने जैसा महसूस होता है। यही वह फर्क है जो एक भारतीय मुसलमान के लिए भारत को दुनिया के दूसरे देशों से अलग करता है।
तो, जो ये हीरो लोग असुरक्षित होने की बात बोल रहे हैं वे किस देश की बात कर रहे हैं? एक सामान्य नागरिक के रूप में मैं और मेरे पति ने आज तक किसी तरह का भेदभाव महसूस नहीं किया है तो फिर वह कौन सा भेदभाव है जो उनके साथ हो गया है? आमिर खान की पत्नी किरण राव किस बात से इतना डर गयी हैं? वे बड़े लोग हैं। मंहगे इलाकों में रहते हैं। उनके बच्चे बड़े से बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं और उनके पास अपना निजि सुरक्षा तंत्र है जो चौबीसों घण्टे उनकी रखवाली करता है। मैं हर वक्त अकेले यात्रा करती हूँ और मुझे आज तक कभी कहीं डर नहीं लगा। एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर मैं आमिर खान और शाहरुख खान से जानना चाहती हूँ कि आखिर उन्होंने इतना गैर जिम्मेदार बयान क्यों दिया जिसके कारण देश के 18 करोड़ मुसलमानों की इमेज को धक्का लगा है? उनको यह आजादी किसने दी है कि दुनिया में वे मेरे देश का नाम बदनाम करें कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं है? पाकिस्तान की हिम्मत कैसे हो गयी कि वह उन्हें अपने देश में बसने का न्यौता दे रहा है? ऐसे वक्त में जब मैं मुसलमानों के लिए अपने हिन्दू मित्रों की टिप्पणियाँ पढ़ रही हूँ तो मुझे बुरा लग रहा है। मुझे डर लग रहा है कि हिन्दुओं को उकसाया जा रहा है कि वे अपनी वह सहिष्णुता और स्वीकार्यता छोड़ दें जिसके कारण बीते बीस सालों में मुझे कभी किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। मुझे डर लग रहा है कि हमारे अपने मूर्ख और एहसान फरामोश लोगों की वजह से हमारी छवि इतनी खराब न हो जाए कि मैं अपने ही देश में बेगानी हो जाऊँ। आखिर कब तक इस देश के बहुसंख्यक हिन्दू यह बदतमीजी बर्दाश्त करेंगे? मुसलमानों के लिए यह वक्त है कि वे स्वतंत्रता और स्वीकार्यता की कीमत समझें। फिर भी अगर वे समझ नहीं पाते हैं तो मैं यही दुआ करूँगी कि मेरे हिन्दू भाइयों का धैर्य असीमित हो जाए और वह कभी भी खत्म न हो।
(सोफिया रंगवाला, स्किन रोग विशेषज्ञ हैं और बंगलौर में रहती हैं।)

गर्भपात करवाना गलत माना गया है, कृपया इस लेख कोअवश्य पढ़ेऔरअगर इसे पढ़ कर आपके दिल की धड़कने बढ़ जायेतो शेयरअवश्य करे |ग...
08/04/2015

गर्भपात करवाना गलत माना गया है, कृपया इस लेख को
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गर्भस्थ
बच्ची की हत्या का आँखोँ देखा विवरण :
अमेरिका में सन 1984 में एक सम्मेलन हुआ था - 'नेशनल
राइट्स
टू लाईफ
कन्वैन्शन'। इस सम्मेलन के एक प्रतिनिधि ने डॉ॰ बर्नार्ड
नेथेनसन के
द्वारा गर्भपात
की बनायी गयी एक
अल्ट्रासाउण्ड फिल्म 'साइलेण्ट
स्क्रीम' (गूँगी चीख)
का जो विवरण
दिया था, वह इस प्रकार है- 'गर्भ की वह मासूम
बच्ची अभी दस सप्ताह
की थी व काफी चुस्त
थी।
हम उसे अपनी माँ की कोख मेँ खेलते,
करवट बदलते
व अंगूठा चूसते हुए देख रहे थे। उसके दिल
की धड़कनों को भी हम देख पा रहे थे और
वह उस
समय 120 की साधारण गति से धड़क रहा था। सब कुछ
बिलकुल
सामान्य था; किन्तु जैसे ही पहले औजार (सक्सन
पम्प) ने
गर्भाशय की दीवार को छुआ, वह मासूम
बच्ची डर से एकदम घूमकर सिकुड़
गयी और उसके
दिल की धड़कन काफी बढ़
गयी।
हालांकि अभी तक किसी औजार ने
बच्ची को छुआ तक
भी नहीं था, लेकिन
उसे अनुभव हो गया था कि कोई चीज उसके आरामगाह,
उसके
सुरक्षित क्षेत्र पर हमला करने का प्रयत्न कर
रही है। हम
दहशत से भरे यह देख रहे थे कि किस तरह वह औजार उस
नन्हीं-मुन्नी मासूम गुड़िया-
सी बच्ची के टुकड़े-टुकड़े कर रहा था।
पहले कमर,
फिर पैर आदि के टुकड़े ऐसे काटे जा रहे थे जैसे वह
जीवित
प्राणी न होकर कोई गाजर-मूली हो और
वह
बच्ची दर्द से छटपटाती हुई, सिकुड़कर
घूम-घूमकर
तड़पती हुई इस हत्यारे औजार से बचने का प्रयत्न
कर
रही थी। वह इस बुरी तरह
डर
गयी थी कि एक समय उसके दिल
की धड़कन 200 तक पहुँच गयी! मैँने
स्वंय
अपनी आँखों से उसको अपना सिर पीछे
झटकते व
मुँह खोलकर चीखने का प्रयत्न करते हुए देखा, जिसे
डॉ॰
नेथेनसन ने उचित
ही 'गूँगी चीख'
या 'मूक पुकार' कहा है। अंत मेँ हमने वह नृशंस
वीभत्स दृश्य
भी देखा, जब
सँडसी उसकी खोपड़ी को तोड़ने
के लिए
तलाश रही थी और फिर दबाकर उस कठोर
खोपड़ी को तोड़
रही थी क्योँकि सिर
का वह भाग बगैर तोड़े सक्शन ट्यूब के माध्यम से बाहर
नहीं निकाला जा सकता था।' हत्या के इस
वीभत्स
खेल को सम्पन्न करने में करीब पन्द्रह मिनट
का समय
लगा और इसके दर्दनाक दृश्य का अनुमान इससे अधिक और
कैसे
लगाया जा सकता है कि जिस डॉक्टर ने यह गर्भपात किया
था और
जिसने मात्र
कौतूहलवश इसकी फिल्म
बनवा ली थी,
उसने जब स्वयं इस फिल्म को देखा तो वह
अपना क्लीनिक
छोड़कर चला गया और फिर वापस नहीं आया ! —
आपका एक शेयर
किसी अजन्मी बच्ची -
लडकी की जान बचा सकता है!
केसे खाओगे उनके हाथ की रोटीया जब पेदा ही नही होगी
बेटीया
betibachavo, Bharat bachavo,

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302001

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