अखण्ड ज्योति का प्रकाश

अखण्ड ज्योति का प्रकाश ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

व्यक्ति के कृत्यों के परिणाम से स्वयं तथा सम्पर्क क्षेत्र भी  प्रभावित होता है।********************     मनुष्य की समग्र ...
04/06/2026

व्यक्ति के कृत्यों के परिणाम से स्वयं तथा सम्पर्क क्षेत्र भी प्रभावित होता है।
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मनुष्य की समग्र संरचना शरीर और मन के सम्मिश्रण से होती है। इन दोनों का जो जितना सदुपयोग कर सकता है, वही अपने लिये सम्पदाएं और सफलताएँ अर्जित करता है, साथ ही अपने समय और जनसमुदाय के लिये कहने लायक सुख-सुविधाएँ उत्पन्न करता है। स्वयं प्रगति पथ पर चलता है और अन्य असंख्यों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है; किन्तु जो इन दोनों ईश्वर प्रदत्त विभूतियों को ऐसे ही उपेक्षित पड़ी रहने देता है, या उनका दुरुपयोग करता है, वह हानि भी कम नहीं उठाता है। उससे प्रभावित लोग भी कम हानि नहीं उठाते ।
समूचा मनुष्य समाज प्रकारान्तर से एक श्रृंखला में बँधा हुआ है। व्यक्ति के कृत्यों का वह स्वयं तो परिणाम भोगता ही है; पर सम्पर्क क्षेत्र भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। यह प्रक्रिया समय एवं स्थान पर सीमाबद्ध नहीं रहती, वरन् यदि वह महत्वपूर्ण हो, तो लम्बे समय तक अपना प्रभाव छोड़ती है। और सुविस्तृत परिधि को अपनी लपेट ले में लेती है।
शरीर की सार्थकता इसमें है कि जितनी उसमें क्षमता है, उसके अनुरूप उससे काम लिया जाय। उसे आलस्य में, अर्ध-मृतकों या अर्ध-मूच्छितों की तरह तंद्राग्रस्त स्थिति में न पड़े रहने दिया जाय। इस स्थिति को आलस्य कहते हैं। आलस्य को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। वह परोक्ष रूप से वह हानि पहुँचाता है, जो हाथ-पैर कसकर किसी को बन्दीगृह में डालने पर पहुँचायी जा सकती है ।
मन का कर्तव्य और उत्तरदायित्व यह है कि वह शरीर के साथ मिलकर अपने लिये सुनिश्चित कार्य पद्धति निर्धारित करे, फिर जो कुछ भी करना है, उसमें पूरी दिलचस्पी और एकाग्रता के साथ जुट पड़े। जिसका मन हवा में उड़ने वाले पत्ते की तरह जिधर तिघर, अस्त-व्यस्त मारा-मारा फिरता है, किसी उपयोगी काम पर जमता नहीं, समझना चाहिये कि वह जिस काम से सम्बन्ध जोड़ेगा, उसे बर्बाद करके रहेगा।
हर काम, सफलता की मंजिल तक पहुँचने के लिये समुचित शारीरिक श्रम चाहता है और साथ ही इसकी भी अनिवार्य आवश्यकता रहती है कि उसमें परिपूर्ण मनोयोग लगे । काम छोटा हो या बड़ा, उसकी सफलता के लिये शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता की आवश्यकता रहेगी। इन दोनों में जहाँ एक की भी कमी पड़ेगी, समझना चाहिये कि पैर असफलता की दिशा में उठ रहे हैं ।*
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
भव बंधनों से मुक्त हों, पुस्तक पृष्ठ 18

गृहस्थ एक तपोवन है।******************    एक व्यक्ति संत कबीर के पास पहुँचा और उनसे प्रश्न करने लगा -"सुखी दाम्पत्य जीवन ...
26/05/2026

गृहस्थ एक तपोवन है।
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एक व्यक्ति संत कबीर के पास पहुँचा और उनसे प्रश्न करने लगा -"सुखी दाम्पत्य जीवन का क्या रहस्य है?" कबीर बोले- "अभी थोड़े समय में समझाता हूँ।" कुछ समय पश्चात् कबीर ने अपनी पत्नी को आवाज लगाई - "यहाँ बड़ा अँधेरा है, जरा दीपक तो रख जाओ।" उनकी पत्नी आई और एक दीपक चौखट पर रख गई। उस आदमी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि कमरे में काफी प्रकाश होते हुए भी कबीर ने पत्नी को बुलाया और वो भी बिना प्रतिवाद के दीपक रखकर चली गई।
थोड़ी देर में उनकी पत्नी दोनों के लिए भोजन रख गई। जब दोनों ने खाना आरम्भ किया तो सन्त कबीर की पत्नी ने आकर पूछा- "खाने में कुछ कम तो नहीं है।" कबीर ने उत्तर दिया- "बिलकुल नहीं! खाना बेहद स्वादिष्ट बना है।" उस आदमी को अचरज हुआ कि सब्जी में नमक कम होते हुए भी कबीर ने भोजन की प्रशंसा की।
अब सन्त कबीर उस व्यक्ति को संबोधित करते हुए बोले - "अब समझ में आया कि सुखी दाम्पत्य जीवन का क्या रहस्य है ? इसको पाने का एक ही सरल मार्ग है कि हम एकदूसरे के साथ तालमेल बिठाना सीखें। एक दूसरे की कमियाँ निकालकर उनको नीचा दिखाने के बजाय यदि हम उनके गुणों को प्रश्रय दें तो गृहस्थ एक तपोवन बन जाए।"
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति अक्टूबर, 2014

शिष्टाचार और लोक-व्यवहार का यही अर्थ है कि हम समयानुकूल आचरण तथा व्यवहार करें।**************************      शिक्षित, स...
21/05/2026

शिष्टाचार और लोक-व्यवहार का यही अर्थ है कि हम समयानुकूल आचरण तथा व्यवहार करें।
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शिक्षित, सम्पन्न और सम्मानित होने के बावजूद भी कई बार व्यक्ति के सम्बन्ध में गलत धारणाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और यह समझा जाने लगता है कि योग्य होते हुए भी अमुक व्यक्ति के व्यक्तित्व में कमियाँ हैं। इसका कारण यह है कि शिक्षित और सम्पन्न होते हुए भी व्यक्ति के आचरण से, उसके व्यवहार से कहीं न कहीं ऐसी फूहड़ता टपकती है जो उसे सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी अशिष्ट कहलवाने लगती है।
विश्व स्तर पर एक बड़ी संख्या में लोग सम्पन्न और शिक्षित भले ही हों, किन्तु उनके व्यवहार में यदि शिष्टता और शालीनता नहीं है, तो उनका लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी विभूतियों की चर्चा सुनकर लोग भले ही प्रभावित हो जायें, परन्तु उनके सम्पर्क में आने पर अशिष्ट आचरण की छाप उस प्रभाव को धूमिल कर देती है। इसलिए शिक्षा, सम्पन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से कोई व्यक्ति ऊँचा हो और उसे हर्ष के अवसर पर हर्ष, शोक के अवसर पर शोक की बातें करना न आये, तो लोग उसका मुँह देखा सम्मान भले ही करें, परन्तु मन में उसके प्रति कोई अच्छी धारणाएँ नहीं रख सकेंगे।
शिष्टाचार और लोक-व्यवहार का यही अर्थ कि हमें समयानुकूल आचरण तथा बड़े छोटों से उचित बर्ताव करना आये। यह गुण किसी विद्यालय में प्रवेश लेकर अर्जित नहीं किया जा सकता। इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्पर्क और पारस्परिक व्यवहार का अध्ययन तथा क्रियात्मक अभ्यास ही किया जाना चाहिए। अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते कि किस अवसर पर, कैसे व्यक्ति से, कैसा व्यवहार करना चाहिए? कहाँ, किस प्रकार उठना-बैठना चाहिए और किस प्रकार चलना-रुकना चाहिए।
यदि खुशी के अवसर पर शोक और शोक के समय हर्ष की बातें की जाएँ, या बच्चों के सामने दर्शन और वैराग्य तथा वृद्धजनों की उपस्थिति में बालोचित या युवजनोचित्त शरारतें, हास्य विनोद भरी बातें की जायें अथवा गर्मी में चुस्त, गर्म, भडक़ीले वस्त्र और शीत ऋतु में हल्के कपड़े पहने जायें, तो देखने सुनने वालों के मन में आदर नहीं, उपेक्षा और तिरस्कार की भावनाएँ ही आयेंगी। कोई भी क्षेत्र क्यों न हों? हम घर में हों या बाहर कार्यालय में। दुकान पर और मित्रों-परिचितों के बीच हों अथवा अजनबियों के बीच।
हर पल व्यवहार करते समय शिष्टाचार ही जीवन का वह दर्पण है जिसमें हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप दिखाई देता है। इसके द्वारा मनुष्य का समाज से प्रथम परिचय होता है। यह न हो तो व्यक्ति समाज में रहते हुए भी समाज से कटा-कटा सा रहेगा और किसी प्रकार आधा-अधूरा जीवन जीने के लिए बाध्य होगा। जीवन साधना के साधक व उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को यह शोभा नहीं देता। उसे जीवन में पूर्णता लानी ही चाहिए। अस्तु, शिष्टाचार को भी जीवन में समुचित स्थान देना ही चाहिए।
शिष्टता मनुष्य के मानसिक विकास का भी परिचायक है। कहा जा चुका है कि कोई व्यक्ति कितना ही शिक्षित हो, किन्तु उसे शिष्टï और शालीन व्यवहार न करना आये, तो उसे अप्रतिष्ठा ही मिलेगी, क्योंकि पुस्तकीय ज्ञान अर्जित कर लेने से तो ही बौद्धिक विकास नहीं हो जाता। अलमारी में ढेरों पुस्तकें रखी होती हैं और पुस्तकों में ज्ञान संचित रहती हैं।इससे आलमारी ज्ञानी और विद्वान तो नहीं कही जाती। वह पुस्तकीय ज्ञान केवल मस्तिष्क में आया मस्तिष्क की तुलना आलमारी से ही की जायेगी। उस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से विकसित है।
मानसिक विकास अनिवार्य रूप से आचरण में भी प्रतिफलित होता है। व्यवहार की शिष्टïता और आचरण में शालीनता ही मानसिक विकास की परिचायक है।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
शिष्टाचार अपनाएँ- सम्मान पाएँ भाग 01 सफल जीवन की दिशा धारा,पुस्तक

ईश्वर भक्त की प्रत्येक गतिविधि संसारी लोगों से भिन्न होती है। **********************      ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा,...
20/04/2026

ईश्वर भक्त की प्रत्येक गतिविधि संसारी लोगों से भिन्न होती है।
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ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा, सत्कर्म न करते हुए भी विविध विधि सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करते रहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा, ऐसा सोचना नितान्त भूल है। उपासना का उद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नता के प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करे।
भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर भी सत्पथ से विचलिन न होने की दृढ़ता, यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिह्न है। जिनकी उपासना ईश्वर से इतना बड़ा वरदान उपलब्ध कर सकने में समर्थ हो गई, समझना चाहिए कि उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया। इससे बढ़कर सुख-सौभाग्य एवं गर्व-गौरव की बात और कुछ भी नहीं हो सकती कि यह कर्त्तव्य पथ पर पूरी तत्परता, ईमानदारी और प्रसन्नता के साथ संलग्न रह सके। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को तुच्छ समझकर उनकी दर-गुजर करता रह सके। सच्ची उपासना साधक को इसी गौरवपूर्ण स्थिति तक पहुँचाती है।
पापों से डर और पुण्य से प्रेम, यही तो भगवद्भक्त का प्रधान चिह्न है। कोई व्यक्ति आस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी के तिलक, जनेउ, कंठी, माला, पूजा-पाठ, स्नान, दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है।आस्तिकता एक प्रकार का दिव्य नशा है। उसे जो पी रहा होगा, उसकी गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश होना चाहिए। वह शराबी क्या जिसके पैर न लड़खड़ाएँ, आँखों में डोरे न पड़ें और आवाज भर्राई न हो। मुँह से बदबू आती है कि नहीं, यह देखकर किसी के शराब पिए हुए की जानकारी हो जाती है।
ईश्वर भक्त या उपासना प्रेमी की प्रत्येक गतिविधि वासना और तृष्णा के गुलाम संसारी लोगों से भिन्न होती है। वह उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की भाषा में बोलता और सोचता है, भले ही लोभ-मोह के फंदे में फँसे हुए लोग उसका उपहास उड़ावें या मूर्ख बतावें। हर महापुरुष को संसारियों ने उनके समय में सताया और बेवकूफ बनाया है।
ईसा, सुकरात, गाँधी, बुद्ध, कबीर, दयानंद, मीरा, तुलसी, ज्ञानेश्वर, हरिश्चंद्र, दधीचि आदि को क्या नहीं सहना पड़ा। उनकी महत्ता तो अडिग निष्ठा की परीक्षा हो जाने के बाद ही निखरी।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
( संकलित व सम्पादित)
हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें, पुस्तक पृष्ठ 11

मिले गुरु से अनुदान उदार ।*****************************      सद्गुरु के अनुदानों को कोई कृतज्ञ कैसे भुलाये? जिस मांँ का ...
18/04/2026

मिले गुरु से अनुदान उदार ।
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सद्गुरु के अनुदानों को कोई कृतज्ञ कैसे भुलाये? जिस मांँ का असीम प्यार पाया है, उसकी उपेक्षा कैसे करें?
जिस सद्गुरु ने हमें सुधारा, जिस मांँ ने हमें भावनापूर्वक दुलारा, उसके सन्देशों की अवहेलना नहीं करेंगे। देव परिवार रचने और धरती पर स्वर्ग उतारने की उनकी इच्छा पूरी करेंगे।
हमारे प्राणों में जिस मांँ की ममता का तेल है, जिसकी प्राण प्रेरणा पाकर हम अनायास ही यश पाते हैं, हम उस अनुदान को दीपक रूप में जलाकर घर-घर प्रकाश पहुंँचाएंँगे।
मांँ! तुम्हारी ललकार ने हमारा पौरुष जगाया, सद्भाव उभारा। इस अनुदान को सतयुग की वापसी में लगायेंगे। हम शपथपूर्वक कहते हैं कि पीड़ा पतन मिटाकर तुम्हारा कर्ज चुकाएंँगे।
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मिले गुरु से अनुदान उदार,
पिया जी भर कर मांँ का प्यार।
कि जीवन भर, जीवन भर इस एहसान को,
हम भुला ना पायेंगे।

सहकर कष्ट अनेक देव ने,
हममें किया सुधार।
धोए दोष प्रेम से माँ ने,
सबको दिया दुलार ।।
उठ रहे मन में यह उद्गार,
रचेंगे नया देव परिवार।
कि इस भू पर, इस भू पर फिर से,
स्वर्ग धाम का गौरव लायेंगे।।

ज्योति बने हैं प्राण हमारे,
मांँ की ममता तेल।
यश पाते लघु प्राण दीप हम,
धन्य प्रभु का खेल।।
जलेंगे मन में ले उल्लास,
भले ही जग कर ले उपहास।
कि हम घर-घर, हम घर घर जाकर,
प्रज्ञा का आलोक जगायेंगे।।

सोया पौरुष जाग उठा,
जब तुमने दी ललकार।
बिखरा था सद्भाव हमारा,
मांँ ने दिया संवार।
रहा है युग देवता पुकार,
बढ़ेंगे चीर मोह की धार।
कि इस युग को, इस युग को ही,
हम सतयुग का आधार बनाएंँगे।।

पीड़ा पतन मिटा देने की,
तुमने शपथ उठाई।
छूकर दर्द तुम्हारा हमको,
राह तुम्हारी भाई।।
रचेंगे हम नूतन अभियान,
भले ही हो जावें बलिदान।
कि बलि हो होकर, बलि हो होकर,
भी कर्ज तुम्हारा चुका न पाएंँगे।
( संकलित व सम्पादित)
प्रज्ञा गीत भाग 1

धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें। **********************      सब लोग चित्त का सन्तोष और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक...
14/04/2026

धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें।
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सब लोग चित्त का सन्तोष और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते हैं। किन्तु धर्म प्रवृत्ति को अपनाने से जो सुख मिलता है, वह और किसी प्रकार नहीं मिल सकता, जो ईश्वर के बँधे हुए नियमों के अनुसार सदा सत् कर्म करते है, उनको आत्म प्रसाद का सच्चा सुख मिलता है, उनका मन विकसित पुष्पों के समान सदा प्रफुल्लित रहता है।
जो लोग कह सकते हैं कि हम अपनी सामर्थ्य भर ईश्वर के नियमों का पालन करते हैं, यथा शक्ति परोपकार करते है, सब लोगों के साथ अनीति छोड़ कर नीति पूर्वक सुहृद-भाव रखते हैं, वही सच्चे सुखी हैं। वे अपने निर्मल चरित्रों को बारम्बार स्मरण करके परम सन्तोष पाते हैं। ऐसे धर्म-प्रवृत्त मनुष्य की ओर उसके शुभ कर्मों को चाहे, लोग न जानते हों, चाहें उसे अपनी प्रशंसा सुनने का अवसर कभी प्राप्त न होता हो, तथापि वह अपने कर्तव्य कर्मों से ही अपने को कृतार्थ करते हैं।
दु:खियों के दुख मिटाने तथा किसी अज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने की एक-एक बात बड़े से बड़े राज्य के मिलने पर भी दूसरे लोग नहीं पा सकते। हमें चाहिए कि धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें। यही प्रवृत्ति सुधार का सच्चा मार्ग है। क्योंकि मनुष्य से यदि कोई भूल हुई, तो वह तुरन्त ही सचेत कर देगी और हम अपनी भूल को अंगीकार करके उसे सुधारने को यत्न करेंगे, पर यदि निकृष्ट प्रवृत्ति प्रबल हुई तो छल से उसे छिपाना चाहेंगे या अपनी भूल दूसरों के शिर मढ़ना चाहेंगे और एक अपराध को छिपाने के लिए दूसरा अपराध करेंगे।
यह स्मरण रखना चाहिए कि धर्म-प्रवृत्ति से आत्म प्रसाद और निकृष्ट प्रवृत्ति से आत्म ग्लानि होना अवश्यम्भावी है और यही वस्तुयें सुख दु:ख का मूल हेतु है।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति फरवरी 1941 पृष्ठ 18

मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों संस्कार मौजूद हैं। ****************      पुराणों में देवासुर संग्राम का वर्णन पग-पग पर...
04/04/2026

मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों संस्कार मौजूद हैं।
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पुराणों में देवासुर संग्राम का वर्णन पग-पग पर किया गया है। प्रत्येक पुराण में किसी न किसी बहाने किन्हीं देवताओं और किन्हीं असुरों की लड़ाई के प्रसङ्ग बार-बार वर्णन किए गए हैं। सच तो यह है कि यह देवासुर-संग्राम अनादि काल से चल रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा।
गीता में जिस धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र का वर्णन है और जिस महाभारत में धर्म और अधर्म का पक्ष प्रतिपादन करने वाली कौरव-पाण्डव सेनाओं का वर्णन हुआ है, वह भी केवल उस शास्त्र के युद्ध तक सीमित नहीं है, वरन् हमारे अन्तःकरण में निरन्तर होते रहने वाले देवासुर-संग्राम का ही चित्रण है। मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों प्रकार से सबल संस्कार मौजूद हैं। दोनों की शक्ति प्रचण्ड है। दोनों ही उद्भट योद्धाओं के समान हैं।
दोनों एक दूसरे से प्रतिकूल प्रकृति के होने से परस्पर लड़ते भी रहते हैं और एकदूसरे को परास्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। यही देवासुर संग्राम है। हर मनुष्य के भीतर पाप और पतन के असुरता के कुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। चौरासी लाख निम्न योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण करने की अवधि में इसने उन्हें जमा किया होता है। पाशविक वृत्तियाँ उन पतित योनियों में उपयुक्त भले ही कही जाएँ पर मनुष्य के महान गौरव को देखते हुए वे हेय एवं त्याज्य ही होती हैं।
सुर-दुर्लभ मानव शरीर में देवत्व की छाया रहती है, क्योंकि यह योनि ईश्वर के सबसे निकट है। इस शरीर में आए हुए जीव के लिए ईश्वर तक पहुँचने में छोटी छलाँग लगानी मात्र शेष रह जाती है। इसलिए उनका महत्व एवं उत्तरदायित्व भी अधिक है। देवत्व मनुष्य को अपनी तरह ऊँचा उठने के लिए खींचता है और असुरता की पाशविक वृत्तियाँ अपनी और आकृष्ट किए रहना चाहती हैं। इसी खींचतान में हवा के सहारे उड़ने वाले तिनकों की तरह आमतौर से मनुष्य कभी इधर कभी उधर उड़ते हैं।
कोई व्यक्ति एक समय बुरे काम करता है, तो दूसरे समय में अच्छे काम करता हुआ दिखाई देता है और कोई इसके प्रतिकूल अच्छे कामों को छोड़कर बुराई में फैसता देखा जाता है। ऐसे उदाहरणों से मनुष्य की मानसिक दुर्बलता और शुभ-अशुभ प्रवृत्तियों की प्रबलता का प्रमाण उपलब्ध होता है।
अन्तःकरण में रहने वाली शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों में से जिसे भी अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है, वही पनपने और बढ़ने लगती है। जिसे पोषण नहीं मिलता, वह सूख जाती है। जो व्यक्ति आज बहुत बुरा दीखता है, वह उत्तम परिस्थितियों एवं विचारधारा के सान्निध्य में आने से कल बहुत ही उत्तम प्रकृति का बन सकता है और जिसे अब तक अच्छा समझा जाता है, वही कल बुरे वातावरण में फैसकर बुरा बन जाता है। यही देवासुर संग्राम है । कभी देवता जीतते हैं, कभी असुर । हम देवत्व की ओर खड़े हों ।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
युग निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण, पुस्तक पृष्ठ 22

गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं।*******************      आत्म कल्याण के लिये गायत्री से बढ़कर दू...
02/04/2026

गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं।
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आत्म कल्याण के लिये गायत्री से बढ़कर दूसरा साधन नहीं। योगी और तपस्वी दीर्घकाल तक कष्ट- साध्य साधनाएँ करके जो लाभ प्राप्त करते हैं, वह गायत्री द्वारा स्वल्प काल और स्वल्प श्रम में ही मिल जाता है। अनेक ऐसे महानुभाव देखे गये हैं जो ग्रहस्थ रहते हुए भी गायत्री की कृपा से योग की उच्च श्रेणी तक पहुँच गए।
साधारण व्यक्ति अपने अनेक दोषों से गायत्री माता का आसरा लेकर छुटकारा पा सकता है। कुविचार, कुकर्म, दुर्गुण एवं दुर्भाव ही जीवन को दुःखी, अस्त- व्यस्त एवं पतित बनाते हैं, उनके हट जाने पर साधारण परिस्थितियों में भी सुख-शान्ति का साक्षात्कार होता है और आनन्द उल्लास एवं प्रसन्नता से जीवन भर जाता है।
गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं। उन्हें अपनाने का तात्पर्य है आध्यात्मिकता, सात्विकता, पवित्रता एवं आस्तिकता को अपनाना। उसे अपनाने के बाद अन्य सभी सम्पदाएँ मनुष्य को स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं। गायत्री साधना द्वारा अनेक सांसारिक लाभ होते देखे गए हैं। पर सबसे प्रधान लाभ आध्यात्मिक हैं। (१) आत्म कल्याण, जीवन मुक्ति, ब्रह्म निर्वाण, (२) आत्मा का अन्तराल स्वच्छ हो जाने में उसमें छिपी हुई अनेक सिद्धियों का जागरण, (३) अपने दोष - दुर्गुणों के दूर हो जाने से प्रतिष्ठा, पुण्य एवं आनन्द की वृद्धि, यह तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण लाभ ऐसे हैं जिन्हें गायत्री की उपासना करने वाला प्राप्त करता है। उसकी श्रद्धा जितनी सुदृढ़ होती है उसकी अभिरुचि जितनी संलग्न होती है, उतनी ही गति से सफलता प्राप्त होती चलती है।
न्यून श्रद्धा वाला व्यक्ति भी थोड़ा बहुत आध्यात्मिक लाभ अवश्य प्राप्त करता है इतना निश्चित है। कम पढ़े और छोटी नौकरी पर काम करने वालों को ऊँचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी भौंड़ी और मन्द थी वे चतुर, तीक्ष्ण बुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढमति लोगों के स्वभावों में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उंगली दबाए रह गये। गायत्री साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते हैं। जिनके दाम्पत्य जीवन बड़ा कर्कश था, पति-पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम की निर्झरिणी बहते देखी गई, भाई-भाई भाई - भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ।
जो कुटुम्ब परिवार क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे, वहाँ शान्ति की वर्षा हुई। जहाँ फौजदारी, मुकदमा बाजी, कत्ल, चोरी, डकैती की आशंका से हर घड़ी भय रहता था, वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ। शत्रुओं के आक्रमण में जो लोग घिर रहे थे, राजदण्ड के कठोर चक्र में फँस जाने की जिनको पूरी सम्भावना जान पड़ती थी, वे इन आपत्तियों से बाल-बाल बच गये।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार, पुस्तक

भगवती गङ्गा सचमुच महान है।******************      एक बार ब्रह्म सरोवर ने शिकायत की- "भगवन! आप भगवती गङ्गा की इतनी सराहना...
20/03/2026

भगवती गङ्गा सचमुच महान है।
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एक बार ब्रह्म सरोवर ने शिकायत की- "भगवन! आप भगवती गङ्गा की इतनी सराहना करते हैं। हम भी तो लोगों को शीतलता और सद्गति प्रदान करते हैं। वह पुण्य हमें क्यों नहीं मिलता?" भगवान विष्णु ने गंभीर होकर उत्तर दिया- "भगवती गङ्गा स्थान-स्थान, घर-घर जाकर लोगों को की प्यास बुझाती और सद्गति प्रदान करती है, जबकि आप तो केवल उन्हें देते हैं, जो आपके पास आते हैं।" ब्रह्म सरोवर ने अनुभव किया- भगवती गङ्गा सचमुच महान है। उन्हें अपने भीतर कभी-कभी विकार पैदा होने का कारण भी ज्ञात हो गया।
परमार्थ की यह वृत्ति भारतीय संस्कृति की विशेषता है। इसी प्रयोजन से धर्म-धारणा के विस्तार का व्रत लेकर नैष्ठिक परिव्राजक निरन्तर भ्रमण करते रहते थे एवं जनमानस के परिष्कार का वह उद्देश्य पूरा करते थे, जिसके लिए वानप्रस्थ परंपरा, परिव्राजक धर्म तथा तीर्थ यात्रा का समावेश आर्षकालीन महामानवों द्वारा किया गया था। इस कार्य को लोकसेवी मनीषियों ने सदैव एक साधना माना है। यह साधना एक कठोर तप होते हुए भी उन्हें आह्लाद एवं आत्म संतोष देती है।
( संकलित व संपादित)
प्रज्ञा पुराण प्रथम खंड, प्रथम अध्याय

आपसी प्रेम, सौजन्य व  सद्भाव ही परिवार को एकजुट रखते हैं।*********************      घर-परिवार मनुष्य के जीवन का सबसे महत...
19/03/2026

आपसी प्रेम, सौजन्य व सद्भाव ही परिवार को एकजुट रखते हैं।
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घर-परिवार मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र है, जो परिस्थितियों से अधिक उसके सदस्यों के आचरण और विचारों पर निर्भर करता है। वही घर स्वर्ग बन सकता है, जहाँ प्रेम, सहयोग और सद्गुणों का वास हो और वही नरक बन जाता है, जहाँ अविश्वास, स्वार्थ और कठोरता का प्रभाव हो।
इसलिए परिवार का संचालन करने वालों का यह कर्तव्य है, कि वे केवल आर्थिक उन्नति पर ही ध्यान न दें, बल्कि घर के प्रत्येक सदस्य के चरित्र और संस्कारों के विकास को प्राथमिकता दें। परिवार में सुख और शान्ति तभी संभव है, जब सभी सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं, आवश्यकताओं और कठिनाइयों को समझते हुए सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करें। आपसी प्रेम, सौजन्य और सद्भाव ही वह सूत्र हैं, जो परिवार को एकजुट रखते हैं।
आर्थिक अभाव के बावजूद यदि आपसी संबंध मधुर हों, तो वही घर स्वर्ग जैसा सुखद अनुभव देता है। इसके विपरीत, संपन्नता होते हुए भी यदि परिवार में कलह, अहंकार और अविश्वास हो, तो वह जीवन को कष्टमय बना देता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित में सोचने की आदत डालनी चाहिए।
जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं, उसी भावना का विस्तार पूरे परिवार में होना चाहिए। अपने लिए कम, दूसरों के लिए अधिक का सिद्धान्त अपनाने से ही घर में प्रेम और समर्पण का वातावरण बनता है। यह भावना साधारण जीवन को भी आनन्दमय बना देती है।
सदाशयता का विकास केवल उपदेश से नहीं, बल्कि व्यवहारिक अभ्यास से होता है। परिवार के सदस्यों को आपस में खुलकर संवाद करना चाहिए, ताकि गलतफहमियाँ उत्पन्न न हों। मौन और उपेक्षा से दूरी बढ़ती है और मन में दुर्भावना जन्म लेती है, जो अन्ततः संबंधों को कमजोर कर देती है।परिश्रम, स्वच्छता, विनम्रता और मधुर वाणी जैसे गुण परिवार को सुदृढ़ बनाते हैं।
मतभेद स्वाभाविक हैं, परन्तु उन्हें शान्तिपूर्ण संवाद से सुलझाया जा सकता है। सादा जीवन, उच्च विचार का पालन करने वाले परिवार ही वास्तविक सुख और संतोष प्राप्त करते हैं। अतः प्रेम, सहकार, त्याग और सहिष्णुता से युक्त परिवार ही धरती पर स्वर्ग का निर्माण करते हैं, जहाँ से श्रेष्ठ और संस्कारी व्यक्तित्वों का निर्माण होता है।
(संकलित व सम्पादित)
युग निर्माण योजना, अप्रैल 2017

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