अखण्ड ज्योति का प्रकाश

अखण्ड ज्योति का प्रकाश ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ईश्वर भक्त की प्रत्येक गतिविधि संसारी लोगों से भिन्न होती है। **********************      ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा,...
20/04/2026

ईश्वर भक्त की प्रत्येक गतिविधि संसारी लोगों से भिन्न होती है।
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ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा, सत्कर्म न करते हुए भी विविध विधि सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करते रहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा, ऐसा सोचना नितान्त भूल है। उपासना का उद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नता के प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करे।
भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर भी सत्पथ से विचलिन न होने की दृढ़ता, यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिह्न है। जिनकी उपासना ईश्वर से इतना बड़ा वरदान उपलब्ध कर सकने में समर्थ हो गई, समझना चाहिए कि उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया। इससे बढ़कर सुख-सौभाग्य एवं गर्व-गौरव की बात और कुछ भी नहीं हो सकती कि यह कर्त्तव्य पथ पर पूरी तत्परता, ईमानदारी और प्रसन्नता के साथ संलग्न रह सके। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को तुच्छ समझकर उनकी दर-गुजर करता रह सके। सच्ची उपासना साधक को इसी गौरवपूर्ण स्थिति तक पहुँचाती है।
पापों से डर और पुण्य से प्रेम, यही तो भगवद्भक्त का प्रधान चिह्न है। कोई व्यक्ति आस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी के तिलक, जनेउ, कंठी, माला, पूजा-पाठ, स्नान, दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है।आस्तिकता एक प्रकार का दिव्य नशा है। उसे जो पी रहा होगा, उसकी गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश होना चाहिए। वह शराबी क्या जिसके पैर न लड़खड़ाएँ, आँखों में डोरे न पड़ें और आवाज भर्राई न हो। मुँह से बदबू आती है कि नहीं, यह देखकर किसी के शराब पिए हुए की जानकारी हो जाती है।
ईश्वर भक्त या उपासना प्रेमी की प्रत्येक गतिविधि वासना और तृष्णा के गुलाम संसारी लोगों से भिन्न होती है। वह उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की भाषा में बोलता और सोचता है, भले ही लोभ-मोह के फंदे में फँसे हुए लोग उसका उपहास उड़ावें या मूर्ख बतावें। हर महापुरुष को संसारियों ने उनके समय में सताया और बेवकूफ बनाया है।
ईसा, सुकरात, गाँधी, बुद्ध, कबीर, दयानंद, मीरा, तुलसी, ज्ञानेश्वर, हरिश्चंद्र, दधीचि आदि को क्या नहीं सहना पड़ा। उनकी महत्ता तो अडिग निष्ठा की परीक्षा हो जाने के बाद ही निखरी।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
( संकलित व सम्पादित)
हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें, पुस्तक पृष्ठ 11

मिले गुरु से अनुदान उदार ।*****************************      सद्गुरु के अनुदानों को कोई कृतज्ञ कैसे भुलाये? जिस मांँ का ...
18/04/2026

मिले गुरु से अनुदान उदार ।
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सद्गुरु के अनुदानों को कोई कृतज्ञ कैसे भुलाये? जिस मांँ का असीम प्यार पाया है, उसकी उपेक्षा कैसे करें?
जिस सद्गुरु ने हमें सुधारा, जिस मांँ ने हमें भावनापूर्वक दुलारा, उसके सन्देशों की अवहेलना नहीं करेंगे। देव परिवार रचने और धरती पर स्वर्ग उतारने की उनकी इच्छा पूरी करेंगे।
हमारे प्राणों में जिस मांँ की ममता का तेल है, जिसकी प्राण प्रेरणा पाकर हम अनायास ही यश पाते हैं, हम उस अनुदान को दीपक रूप में जलाकर घर-घर प्रकाश पहुंँचाएंँगे।
मांँ! तुम्हारी ललकार ने हमारा पौरुष जगाया, सद्भाव उभारा। इस अनुदान को सतयुग की वापसी में लगायेंगे। हम शपथपूर्वक कहते हैं कि पीड़ा पतन मिटाकर तुम्हारा कर्ज चुकाएंँगे।
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मिले गुरु से अनुदान उदार,
पिया जी भर कर मांँ का प्यार।
कि जीवन भर, जीवन भर इस एहसान को,
हम भुला ना पायेंगे।

सहकर कष्ट अनेक देव ने,
हममें किया सुधार।
धोए दोष प्रेम से माँ ने,
सबको दिया दुलार ।।
उठ रहे मन में यह उद्गार,
रचेंगे नया देव परिवार।
कि इस भू पर, इस भू पर फिर से,
स्वर्ग धाम का गौरव लायेंगे।।

ज्योति बने हैं प्राण हमारे,
मांँ की ममता तेल।
यश पाते लघु प्राण दीप हम,
धन्य प्रभु का खेल।।
जलेंगे मन में ले उल्लास,
भले ही जग कर ले उपहास।
कि हम घर-घर, हम घर घर जाकर,
प्रज्ञा का आलोक जगायेंगे।।

सोया पौरुष जाग उठा,
जब तुमने दी ललकार।
बिखरा था सद्भाव हमारा,
मांँ ने दिया संवार।
रहा है युग देवता पुकार,
बढ़ेंगे चीर मोह की धार।
कि इस युग को, इस युग को ही,
हम सतयुग का आधार बनाएंँगे।।

पीड़ा पतन मिटा देने की,
तुमने शपथ उठाई।
छूकर दर्द तुम्हारा हमको,
राह तुम्हारी भाई।।
रचेंगे हम नूतन अभियान,
भले ही हो जावें बलिदान।
कि बलि हो होकर, बलि हो होकर,
भी कर्ज तुम्हारा चुका न पाएंँगे।
( संकलित व सम्पादित)
प्रज्ञा गीत भाग 1

धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें। **********************      सब लोग चित्त का सन्तोष और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक...
14/04/2026

धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें।
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सब लोग चित्त का सन्तोष और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते हैं। किन्तु धर्म प्रवृत्ति को अपनाने से जो सुख मिलता है, वह और किसी प्रकार नहीं मिल सकता, जो ईश्वर के बँधे हुए नियमों के अनुसार सदा सत् कर्म करते है, उनको आत्म प्रसाद का सच्चा सुख मिलता है, उनका मन विकसित पुष्पों के समान सदा प्रफुल्लित रहता है।
जो लोग कह सकते हैं कि हम अपनी सामर्थ्य भर ईश्वर के नियमों का पालन करते हैं, यथा शक्ति परोपकार करते है, सब लोगों के साथ अनीति छोड़ कर नीति पूर्वक सुहृद-भाव रखते हैं, वही सच्चे सुखी हैं। वे अपने निर्मल चरित्रों को बारम्बार स्मरण करके परम सन्तोष पाते हैं। ऐसे धर्म-प्रवृत्त मनुष्य की ओर उसके शुभ कर्मों को चाहे, लोग न जानते हों, चाहें उसे अपनी प्रशंसा सुनने का अवसर कभी प्राप्त न होता हो, तथापि वह अपने कर्तव्य कर्मों से ही अपने को कृतार्थ करते हैं।
दु:खियों के दुख मिटाने तथा किसी अज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने की एक-एक बात बड़े से बड़े राज्य के मिलने पर भी दूसरे लोग नहीं पा सकते। हमें चाहिए कि धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें। यही प्रवृत्ति सुधार का सच्चा मार्ग है। क्योंकि मनुष्य से यदि कोई भूल हुई, तो वह तुरन्त ही सचेत कर देगी और हम अपनी भूल को अंगीकार करके उसे सुधारने को यत्न करेंगे, पर यदि निकृष्ट प्रवृत्ति प्रबल हुई तो छल से उसे छिपाना चाहेंगे या अपनी भूल दूसरों के शिर मढ़ना चाहेंगे और एक अपराध को छिपाने के लिए दूसरा अपराध करेंगे।
यह स्मरण रखना चाहिए कि धर्म-प्रवृत्ति से आत्म प्रसाद और निकृष्ट प्रवृत्ति से आत्म ग्लानि होना अवश्यम्भावी है और यही वस्तुयें सुख दु:ख का मूल हेतु है।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति फरवरी 1941 पृष्ठ 18

मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों संस्कार मौजूद हैं। ****************      पुराणों में देवासुर संग्राम का वर्णन पग-पग पर...
04/04/2026

मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों संस्कार मौजूद हैं।
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पुराणों में देवासुर संग्राम का वर्णन पग-पग पर किया गया है। प्रत्येक पुराण में किसी न किसी बहाने किन्हीं देवताओं और किन्हीं असुरों की लड़ाई के प्रसङ्ग बार-बार वर्णन किए गए हैं। सच तो यह है कि यह देवासुर-संग्राम अनादि काल से चल रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा।
गीता में जिस धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र का वर्णन है और जिस महाभारत में धर्म और अधर्म का पक्ष प्रतिपादन करने वाली कौरव-पाण्डव सेनाओं का वर्णन हुआ है, वह भी केवल उस शास्त्र के युद्ध तक सीमित नहीं है, वरन् हमारे अन्तःकरण में निरन्तर होते रहने वाले देवासुर-संग्राम का ही चित्रण है। मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य दोनों प्रकार से सबल संस्कार मौजूद हैं। दोनों की शक्ति प्रचण्ड है। दोनों ही उद्भट योद्धाओं के समान हैं।
दोनों एक दूसरे से प्रतिकूल प्रकृति के होने से परस्पर लड़ते भी रहते हैं और एकदूसरे को परास्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। यही देवासुर संग्राम है। हर मनुष्य के भीतर पाप और पतन के असुरता के कुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। चौरासी लाख निम्न योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण करने की अवधि में इसने उन्हें जमा किया होता है। पाशविक वृत्तियाँ उन पतित योनियों में उपयुक्त भले ही कही जाएँ पर मनुष्य के महान गौरव को देखते हुए वे हेय एवं त्याज्य ही होती हैं।
सुर-दुर्लभ मानव शरीर में देवत्व की छाया रहती है, क्योंकि यह योनि ईश्वर के सबसे निकट है। इस शरीर में आए हुए जीव के लिए ईश्वर तक पहुँचने में छोटी छलाँग लगानी मात्र शेष रह जाती है। इसलिए उनका महत्व एवं उत्तरदायित्व भी अधिक है। देवत्व मनुष्य को अपनी तरह ऊँचा उठने के लिए खींचता है और असुरता की पाशविक वृत्तियाँ अपनी और आकृष्ट किए रहना चाहती हैं। इसी खींचतान में हवा के सहारे उड़ने वाले तिनकों की तरह आमतौर से मनुष्य कभी इधर कभी उधर उड़ते हैं।
कोई व्यक्ति एक समय बुरे काम करता है, तो दूसरे समय में अच्छे काम करता हुआ दिखाई देता है और कोई इसके प्रतिकूल अच्छे कामों को छोड़कर बुराई में फैसता देखा जाता है। ऐसे उदाहरणों से मनुष्य की मानसिक दुर्बलता और शुभ-अशुभ प्रवृत्तियों की प्रबलता का प्रमाण उपलब्ध होता है।
अन्तःकरण में रहने वाली शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों में से जिसे भी अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है, वही पनपने और बढ़ने लगती है। जिसे पोषण नहीं मिलता, वह सूख जाती है। जो व्यक्ति आज बहुत बुरा दीखता है, वह उत्तम परिस्थितियों एवं विचारधारा के सान्निध्य में आने से कल बहुत ही उत्तम प्रकृति का बन सकता है और जिसे अब तक अच्छा समझा जाता है, वही कल बुरे वातावरण में फैसकर बुरा बन जाता है। यही देवासुर संग्राम है । कभी देवता जीतते हैं, कभी असुर । हम देवत्व की ओर खड़े हों ।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
युग निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण, पुस्तक पृष्ठ 22

गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं।*******************      आत्म कल्याण के लिये गायत्री से बढ़कर दू...
02/04/2026

गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं।
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आत्म कल्याण के लिये गायत्री से बढ़कर दूसरा साधन नहीं। योगी और तपस्वी दीर्घकाल तक कष्ट- साध्य साधनाएँ करके जो लाभ प्राप्त करते हैं, वह गायत्री द्वारा स्वल्प काल और स्वल्प श्रम में ही मिल जाता है। अनेक ऐसे महानुभाव देखे गये हैं जो ग्रहस्थ रहते हुए भी गायत्री की कृपा से योग की उच्च श्रेणी तक पहुँच गए।
साधारण व्यक्ति अपने अनेक दोषों से गायत्री माता का आसरा लेकर छुटकारा पा सकता है। कुविचार, कुकर्म, दुर्गुण एवं दुर्भाव ही जीवन को दुःखी, अस्त- व्यस्त एवं पतित बनाते हैं, उनके हट जाने पर साधारण परिस्थितियों में भी सुख-शान्ति का साक्षात्कार होता है और आनन्द उल्लास एवं प्रसन्नता से जीवन भर जाता है।
गायत्री की शिक्षायें सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र का सार हैं। उन्हें अपनाने का तात्पर्य है आध्यात्मिकता, सात्विकता, पवित्रता एवं आस्तिकता को अपनाना। उसे अपनाने के बाद अन्य सभी सम्पदाएँ मनुष्य को स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं। गायत्री साधना द्वारा अनेक सांसारिक लाभ होते देखे गए हैं। पर सबसे प्रधान लाभ आध्यात्मिक हैं। (१) आत्म कल्याण, जीवन मुक्ति, ब्रह्म निर्वाण, (२) आत्मा का अन्तराल स्वच्छ हो जाने में उसमें छिपी हुई अनेक सिद्धियों का जागरण, (३) अपने दोष - दुर्गुणों के दूर हो जाने से प्रतिष्ठा, पुण्य एवं आनन्द की वृद्धि, यह तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण लाभ ऐसे हैं जिन्हें गायत्री की उपासना करने वाला प्राप्त करता है। उसकी श्रद्धा जितनी सुदृढ़ होती है उसकी अभिरुचि जितनी संलग्न होती है, उतनी ही गति से सफलता प्राप्त होती चलती है।
न्यून श्रद्धा वाला व्यक्ति भी थोड़ा बहुत आध्यात्मिक लाभ अवश्य प्राप्त करता है इतना निश्चित है। कम पढ़े और छोटी नौकरी पर काम करने वालों को ऊँचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी भौंड़ी और मन्द थी वे चतुर, तीक्ष्ण बुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढमति लोगों के स्वभावों में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उंगली दबाए रह गये। गायत्री साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते हैं। जिनके दाम्पत्य जीवन बड़ा कर्कश था, पति-पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम की निर्झरिणी बहते देखी गई, भाई-भाई भाई - भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ।
जो कुटुम्ब परिवार क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे, वहाँ शान्ति की वर्षा हुई। जहाँ फौजदारी, मुकदमा बाजी, कत्ल, चोरी, डकैती की आशंका से हर घड़ी भय रहता था, वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ। शत्रुओं के आक्रमण में जो लोग घिर रहे थे, राजदण्ड के कठोर चक्र में फँस जाने की जिनको पूरी सम्भावना जान पड़ती थी, वे इन आपत्तियों से बाल-बाल बच गये।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार, पुस्तक

भगवती गङ्गा सचमुच महान है।******************      एक बार ब्रह्म सरोवर ने शिकायत की- "भगवन! आप भगवती गङ्गा की इतनी सराहना...
20/03/2026

भगवती गङ्गा सचमुच महान है।
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एक बार ब्रह्म सरोवर ने शिकायत की- "भगवन! आप भगवती गङ्गा की इतनी सराहना करते हैं। हम भी तो लोगों को शीतलता और सद्गति प्रदान करते हैं। वह पुण्य हमें क्यों नहीं मिलता?" भगवान विष्णु ने गंभीर होकर उत्तर दिया- "भगवती गङ्गा स्थान-स्थान, घर-घर जाकर लोगों को की प्यास बुझाती और सद्गति प्रदान करती है, जबकि आप तो केवल उन्हें देते हैं, जो आपके पास आते हैं।" ब्रह्म सरोवर ने अनुभव किया- भगवती गङ्गा सचमुच महान है। उन्हें अपने भीतर कभी-कभी विकार पैदा होने का कारण भी ज्ञात हो गया।
परमार्थ की यह वृत्ति भारतीय संस्कृति की विशेषता है। इसी प्रयोजन से धर्म-धारणा के विस्तार का व्रत लेकर नैष्ठिक परिव्राजक निरन्तर भ्रमण करते रहते थे एवं जनमानस के परिष्कार का वह उद्देश्य पूरा करते थे, जिसके लिए वानप्रस्थ परंपरा, परिव्राजक धर्म तथा तीर्थ यात्रा का समावेश आर्षकालीन महामानवों द्वारा किया गया था। इस कार्य को लोकसेवी मनीषियों ने सदैव एक साधना माना है। यह साधना एक कठोर तप होते हुए भी उन्हें आह्लाद एवं आत्म संतोष देती है।
( संकलित व संपादित)
प्रज्ञा पुराण प्रथम खंड, प्रथम अध्याय

आपसी प्रेम, सौजन्य व  सद्भाव ही परिवार को एकजुट रखते हैं।*********************      घर-परिवार मनुष्य के जीवन का सबसे महत...
19/03/2026

आपसी प्रेम, सौजन्य व सद्भाव ही परिवार को एकजुट रखते हैं।
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घर-परिवार मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र है, जो परिस्थितियों से अधिक उसके सदस्यों के आचरण और विचारों पर निर्भर करता है। वही घर स्वर्ग बन सकता है, जहाँ प्रेम, सहयोग और सद्गुणों का वास हो और वही नरक बन जाता है, जहाँ अविश्वास, स्वार्थ और कठोरता का प्रभाव हो।
इसलिए परिवार का संचालन करने वालों का यह कर्तव्य है, कि वे केवल आर्थिक उन्नति पर ही ध्यान न दें, बल्कि घर के प्रत्येक सदस्य के चरित्र और संस्कारों के विकास को प्राथमिकता दें। परिवार में सुख और शान्ति तभी संभव है, जब सभी सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं, आवश्यकताओं और कठिनाइयों को समझते हुए सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करें। आपसी प्रेम, सौजन्य और सद्भाव ही वह सूत्र हैं, जो परिवार को एकजुट रखते हैं।
आर्थिक अभाव के बावजूद यदि आपसी संबंध मधुर हों, तो वही घर स्वर्ग जैसा सुखद अनुभव देता है। इसके विपरीत, संपन्नता होते हुए भी यदि परिवार में कलह, अहंकार और अविश्वास हो, तो वह जीवन को कष्टमय बना देता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित में सोचने की आदत डालनी चाहिए।
जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं, उसी भावना का विस्तार पूरे परिवार में होना चाहिए। अपने लिए कम, दूसरों के लिए अधिक का सिद्धान्त अपनाने से ही घर में प्रेम और समर्पण का वातावरण बनता है। यह भावना साधारण जीवन को भी आनन्दमय बना देती है।
सदाशयता का विकास केवल उपदेश से नहीं, बल्कि व्यवहारिक अभ्यास से होता है। परिवार के सदस्यों को आपस में खुलकर संवाद करना चाहिए, ताकि गलतफहमियाँ उत्पन्न न हों। मौन और उपेक्षा से दूरी बढ़ती है और मन में दुर्भावना जन्म लेती है, जो अन्ततः संबंधों को कमजोर कर देती है।परिश्रम, स्वच्छता, विनम्रता और मधुर वाणी जैसे गुण परिवार को सुदृढ़ बनाते हैं।
मतभेद स्वाभाविक हैं, परन्तु उन्हें शान्तिपूर्ण संवाद से सुलझाया जा सकता है। सादा जीवन, उच्च विचार का पालन करने वाले परिवार ही वास्तविक सुख और संतोष प्राप्त करते हैं। अतः प्रेम, सहकार, त्याग और सहिष्णुता से युक्त परिवार ही धरती पर स्वर्ग का निर्माण करते हैं, जहाँ से श्रेष्ठ और संस्कारी व्यक्तित्वों का निर्माण होता है।
(संकलित व सम्पादित)
युग निर्माण योजना, अप्रैल 2017

सम्मान की परम्परा का प्रारम्भ आत्मविकास की मूल प्रेरणा को लेकर होता है।******************       बड़ों के प्रति सम्मान तथ...
16/03/2026

सम्मान की परम्परा का प्रारम्भ आत्मविकास की मूल प्रेरणा को लेकर होता है।
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बड़ों के प्रति सम्मान तथा अनुशासन होना पारिवारिक संगठन का मूल आधार है। यह संगठन प्रेममूलक होता है, वहाँ पारस्परिक आत्मीयता होती है। एक सदस्य दूसरे सदस्य का ध्यान रखता है और अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य को प्रधानता रहती है। इस स्थिति में सुख और अमन के लिए बाह्य साधनों पर नितान्त अवलम्बित नहीं होना पड़ता।
लोगों में पारस्परिक स्नेह और आत्मीयता हो, तो कोई कारण नहीं कि घरेलू वातावरण कष्टप्रद लगे। पारिवारिक अनुशासन सुख है और व्यवस्था का मेरुदण्ड है, उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि लोगों में बड़ों के प्रति आदर का भाव बना रहे। सम्मान के पीछे यह भावना जितनी पवित्र होगी उतना ही वह अधिक उपादेय होगा और जिसके प्रति सम्मान प्रकट किया गया है उसके हृदय से आशीर्वाद की बहुत सी मात्रा खींच लाने वाला होगा।
लोक व्यवहार और दिखावे के लिए प्रदर्शित सम्मान से आत्मिक अभिव्यक्ति नहीं होती और वह एक संकीर्ण विचार मात्र रहकर अपने आप में सिमटकर रह जाता है। सम्मान की परम्परा का प्रारंभ आत्मविकास की मूल प्रेरणा को लेकर होता है, इसलिए वह निष्काम तथा निर्लोभ होना चाहिए। वहाँ पर अहंकार, लोभ आदि आसुरी वृत्तियों का प्रादुर्भाव नहीं होना चाहिए। इसे एक रूढ़ि मात्र भी बनकर न रह जाना चाहिए, वरन् इस भावना को अन्तरात्मा के स्पर्श की सुखानूभूति होने देना चाहिए ताकि सम्मान आध्यात्मिक प्रशस्ति का ही साधक बना रह सके|
समय बीतने के साथ परम्परा अपने आप रूढ़ि का रूप ले लेती है। यदि उसकी मूल प्रेरणा में आत्मीयता और अनुशासन का भाव न रहे तो यह परंपरा भी वैसी ही निष्फल हो जाती है। बड़ों की समता और उनके अनुभवों का लाभ हम विनीत होकर ही पा सकते हैं। बनावटीपन के कारण तो अपने आप ही छले जाते हैं। हम जब बालक थे तो माता-पिता ने जिस तरह हमारी सेवा की थी, सुश्रूषा की थी हमें भी अपने माता- पिता की सेवा उसी आदर भावना से करनी चाहिए।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
सम्मान के पात्र हमारे वयोवृद्ध, पुस्तक

दुष्टों से निपटना ********************         दया, धर्म, सत्य, को स्थिर रखने के लिए जितनी शक्ति और तलवार की आवश्यकता है...
27/02/2026

दुष्टों से निपटना
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दया, धर्म, सत्य, को स्थिर रखने के लिए जितनी शक्ति और तलवार की आवश्यकता है, उतनी ही कौशल, बुद्धि चातुरी और कूटनीति की भी है। राजनीति में कूटनीति का प्रयोग विकसित होकर एक विज्ञान बन गया है। सत्य और अहिंसा की सर्वत्र स्थापना स्पष्ट और खुले तरीकों से प्रायः संभव नहीं होती।
संसार में कपटी, छली, चतुर, स्वार्थी, धोखेबाज, बगल में छुरी मुँह में राम-राम कहने वाले व्यक्ति हैं। इनसे व्यवहार करने में मनुष्य को कूटनीति की आवश्यकता है।
संसार के व्यक्ति नवीनता से घबराते हैं, पुरानी कही सुनी, बातों पर आरुढ़ रहते हैं। वह स्वयं अपने आप नहीं चलता, नाक पकड़ कर चलाया जाता है, जैसे हजारों भेड़ों को एक गड़रिया चराता है, उसी प्रकार संसार के मानव समाज को इने गिने पुरुषों पर भरोसा करना पड़ता है।
संसार में बाहुबल का मूल्य पीछे है, बुद्धिबल का पहले, उसमें छल, कपट, नीति, आदर्श की स्थापना के लिए झूठ, फरेब, प्रतिशोध आदि सभी कुछ आ जाता है। कूटनीति को जानने वाला साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का प्रयोग करता है। ऋषियों का वाक्य है-“शाठे शाठ्यं समाचरेत्”। संसार में जितने राज हैं उनमें अधिकतर छल मक्कारी की नींव पर खड़े हैं। जहाँ अहिंसा है, वहाँ हिंसा भी है; सत्य के साथ झूठ भी है।
वस्तु स्थिति को समझिये :- बुद्धिबल, कूटनीति, कौशल किसे कहते हैं? इसका उत्तर यही कि जो व्यक्ति वस्तु स्थिति, देश काल, निज शक्ति , सामर्थ्य इत्यादि को समझें, और तदनुकूल इस प्रकार व्यवहार करे कि किसी उच्च आदर्श की स्थापना हो; अधिक से अधिक व्यक्तियों का भला हो, संसार को अधिक सुख मिले, दुष्ट पापी अत्याचारी का नाश हो; “बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय” आपको कूटनीति से कार्य लेना उचित है।
जब कर्ण ने अपना कवच दान में दे डाला और अपने व्यक्तिगत जीवन की रक्षा का आखरी उपाय भी सत्य, अहिंसा और दानशीलता के जोश में नष्ट कर लिया तो वह असमर्थ और निरुपाय हो गया। कूटनीति की दृष्टि से इन्द्र ने उसका कवच लेकर अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया था, किन्तु कर्ण की यह भारी मूर्खता थी। शकुनि ने उसे समझाते हुए कहा—
“अरे मूर्ख कर्ण दया! धर्म सत्य को स्थिर रखने के हेतु जितनी तलवार की अपेक्षा है, उतनी ही छल चातुरी की भी आवश्यकता है। यही राजनैतिक कौशल है। यही चातुरी राजनीति का गुप्त रहस्य है।
सत्य बोलने के लिए कला और नीति की आवश्यकता है और तुम जिस सत्य अहिंसा की उपासना करते हो, वह तो एक कोरा आदर्शवाद है। वह व्यावहारिक नहीं है। कभी थके, माँदे, झुँझलाये हुए आदमी को शान्त करने के लिए उसे एक औषधि के रूप में अच्छा असर समझा गया है;पर उस मनुष्य के इतिहास को जब प्रारम्भ से अन्त तक फरेब, प्रेम के साथ क्रोध, अहिंसा के साथ साथ हिंसा, सजा, और खून का बदला खून, मनुष्य क्या चींटी से लेकर हाथी तक ने स्वीकार किया है। देखते हो एक बड़ी मछली रहती है।
बुद्धिमान मनुष्य भी ऐसा ही करता है। दुर्गम पर्वतों को खंड खंड कर धराशायी कर दिया है, दुर्गों का निमार्ण किया है, प्रकृति की असंख्य दुष्ट शक्तियों, हिंसक पशुओं, भयंकर व्याधियों से युद्ध किया हैं। विश्व को विजय करने में मनुष्य ने बुद्धि, छल, कूटनीति का प्रचुर प्रयोग किया है।
निश्चय ही तुमने कवच देकर नादानी का कार्य किया है। तुमने हमारी नींव पर कुल्हाड़ा मारा है। तुम्हें बुद्धि से कार्य लेना उचित था।”
उपरोक्त वक्तव्य में शकुनि ने जो बातें प्रकट की हैं, उनमें से बहुत सी सत्य हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य को अपने कार्य तथा फल का निर्णय करना चाहिये।
दुष्टों से सीधा संघर्ष मोल लेना, बहुधा उपयुक्त नहीं होता। उन्हें अवसर देखकर नीचा दिखाना चाहिए और सबक याद रखना चाहिए जिससे वे अपनी दुष्टता से बाज आवें, दुष्ट लोग बहुधा अशिष्ट होते हैं, न अपनी इज्जत प्यारी होती है न दूसरों की इसलिए उनसे प्रत्यक्ष संघर्ष तभी लेना चाहिये जब उनका मुँह भली प्रकार कुचल देने की स्थिति हो अन्यथा उनके दुर्व्यवहार को विष के घूँट की तरह पीने में सहनशीलता और धैर्य का परिचय देना चाहिए ताकि अपने को भी लोग उस दुष्ट की श्रेणी का ही अशिष्ट न समझें।
अपने धैर्य और तर्क द्वारा शिष्ट रहते हुए भी दुष्ट का विरोधी वातावरण तैयार कर अन्यों के सहयोग से उसकी दुष्टता का समुचित अतिकार किया जा सकता है।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति जनवरी 1968

छोटों से व्यवहार कैसे करें? ********************       आयु तथा अनुभव में आपसे छोटे व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवहार...
25/02/2026

छोटों से व्यवहार कैसे करें?
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आयु तथा अनुभव में आपसे छोटे व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवहार की आकाँक्षा रखते हैं। कुछ व्यक्ति आयु में बड़े होकर ज्ञान में आपसे छोटे हो सकते हैं। कुछ आपसे आयु तथा ज्ञान दोनों ही में छोटे रहते हैं।
जो आपसे उम्र में छोटे हैं, उनसे आप प्रेम तथा सहानुभूति का व्यवहार कीजिए। वे आपको एक आदर्श के रूप में देखते हैं। आपके चरित्र, व्यवहार, रीति-रिवाज, दैनिक कार्यक्रम—सभी में निरन्तर आपका अनुकरण किया करते हैं।
आप उनके सामने हर प्रकार से एक आदर्श बन रहे हैं। बोलचाल में उनसे पूर्ण शिष्टता का व्यवहार करें, उन्हें आयु ‘बाबू’ आदि से सम्बोधन करें। आपका यह मान प्रतिष्ठा पाकर वे चरित्र में आपके आदर्शों के अनुकूल उच्च स्तर पर आने का प्रयत्न करेंगे। आपके उत्तम भावों को कभी नष्ट न होने देंगे।प्रेम तथा सहानुभूति का सद्व्यवहार पाकर बच्चों की गुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। वे उसी उच्च स्तर पर आपके चरित्र का अनुकरण कर पहुँचने का उद्योग करते हैं।
आपके शब्द, बातचीत प्यार प्रकट करें किन्तु अति को न पहुँच जावें। अति का व्यवहार बच्चों को बिगाड़ने वाला, उनकी आदतों को नष्ट करने वाला, होता है। बच्चों की अच्छी आदतों का विकास देर से होता है। बच्चों की जिद प्रायः ऊँचा उठने की भावना से प्रेरित रहती है। उचित बात को प्रोत्साहन दीजिए।
अनुचित बात की ताड़ना भी न भूलिए। व्यवहार कुशल व्यक्ति बालक का क्रमिक विकास देख कर प्रोत्साहन तथा ताड़ना का सदुपयोग करता है। उनकी प्रत्येक अच्छी बात पर प्रशंसा करना न भूलिये। आपकी प्रशंसा के दो मीठे शब्द पाने के लिए बच्चा कठिन परिश्रम करता है।
स्त्रियों के साथ व्यवहार :- नारी जाति पूज्य है, प्रत्येक स्त्री में एक माता छिपी हुई है। इस मातृत्व के नाते वे पूजनीय हैं—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”
बिना पूर्व सूचना दिये, जहाँ स्त्रियाँ बैठी हों, वहाँ जाना अशिष्टता है। यदि किसी अपरिचित के घर में आपका आना जाना भी हो, तब भी घर में पदार्पण करने से पूर्व कुछ आवाज देकर, जाना ही उचित है।
स्त्रियाँ स्वभावतः लज्जाशील, शर्मीले स्वभाव की होती हैं। अतः उनसे बातें करते समय उनकी ओर टकटकी लगाये रखना या घूर घूर कर देखना, चार आँखें करने की अशिष्टता न कीजिये। किसी दूसरी ओर दृष्टि रखिए अथवा नीची दृष्टि रखिये। उनके लिए कुछ न कुछ पवित्र, शिष्ट आदर सूचक सम्बोधन—“बहिन जी;” बेटी, “माता जी, “चाची जी,” नानी; इत्यादि—आवश्यक प्रयोग में लाइये।
पराई स्त्री में पूज्य मातृत्व भाव ही देखो, परायी स्त्री के पास अकेले में भी मिलने, बातचीत करने, या अनुचित सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयत्न मत करो।
अपनी पत्नी से शिष्ट व्यवहार :- अपनी पत्नी से भी सभ्यता का व्यवहार रखिये। जो पुरुष कभी उन पर हाथ उठा बैठते हैं; अपनी समझ कर तिरस्कार करते हैं; वे उनकी बेइज्जती करते रहते हैं, वे अश्लील हैं। गुप्त मन में उनकी स्त्रियाँ उन्हें दुष्ट राक्षस-तुल्य समझती हैं। ऐसा प्रसंग ही मत आने दीजिए कि नारी को मारने पीटने का प्रसंग आये। उसे अपने आचार व्यवहार, प्रेम भरे सम्बोधन से पूर्ण संतुष्ट रखिए।
पत्नी की भावनाओं की रक्षा, उसके गुणों का आदर, उसके शील लज्जा, व्यवहार की प्रशंसा मधुर सम्बन्धों का मूल रहस्य है। पत्नी आपकी जीवन सहचरी है। अपने सद्व्यवहार से उसे तृप्त रखिए। पत्नी पति की प्राण है, पुरुष की अर्द्धांगिनी है, पत्नी से बढ़ कर दूसरा कोई मित्र नहीं, पत्नी तीनों फलों—धर्म, अर्थ, काम, को प्रदान करने वाली है और पत्नी संसार सागर को पार करने में सबसे बड़ी सहायिका है। फिर, किस मुँह से आप उसका तिरस्कार करते हैं?
उससे मधुर वाणी से बोलिए। अपने मुँह पर मधुर मुसकान हो; हृदय में सच्चा निष्कपट, प्रेम हो वचनों में नम्रता, मृदुता, सरलता, प्यार हो। स्मरण रखिये, स्त्रियों का “अहं” बड़ा तेज होता है; वे स्वाभिमानी, आत्माभिमानी होती हैं। तनिक सी अशिष्टता, या फूहड़पन से क्रुद्ध होकर आपसे सम्बन्ध में घृणित धारणाएं बना लेती हैं। उनकी छोटी मोटी माँगों या फरमायशों की अवहेलना या अवज्ञा न करें। इसमें बड़े सावधान रहें।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति जनवरी 1968

विलासिता और फिजूलखर्ची से बचने में बुद्धिमानी है।*************************     ज्यों-ज्यों आपकी आवश्यकता बढ़ेंगी, त्यों-...
20/02/2026

विलासिता और फिजूलखर्ची से बचने में बुद्धिमानी है।
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ज्यों-ज्यों आपकी आवश्यकता बढ़ेंगी, त्यों-त्यों आपको खर्च की तंगी का अनुभव होगा। आजकल कृत्रिम आवश्यकताएँ वृद्धि पर हैं। ऐश, आराम, दिखावट, मिथ्या गर्व, प्रदर्शन, विलासिता, शौक, मेले, तमाशे, फैशन, मादक द्रव्यों पर फिजूलखर्ची खूब की जा रही है। ये सब क्षणिक आनन्द की वस्तुएँ हैं।
कृत्रिम आवश्यकताएँ हमें गुलाम बनाती हैं। इन्हीं के कारण हम महंगाई और तंगी अनुभव करते हैं। चूँकि कृत्रिम आवश्यकताओं में हम अधिकांश आमदनी व्यय कर देते हैं, हमें जीवन रक्षक और आवश्यक पदार्थ खरीदते हुए महँगाई प्रतीत होती है। साधारण, सरल और स्वस्थ जीवन के लिए निपुणतादायक पदार्थ अपेक्षाकृत अब भी सस्ते हैं। जीवन रक्षा के पदार्थ-अन्न, वस्त्र, मकान इत्यादि साधारण दर्जे के भी हो सकते हैं।
मजे में आप निर्वाह कर सकते हैं। अतः जैसे-जैसे जीवन रक्षक पदार्थों का मूल्य बढ़ता जावे, वैसे-वैसे आपको विलासिता और ऐशोआराम की वस्तुएँ त्यागते रहना चाहिए। आप केवल आवश्यक पदार्थों पर दृष्टि रखिए, वे चाहे जिस मूल्य पर मिलें खरीदिए किन्तु विलासिता और फिजूलखर्ची से बचिए। बनावटी, अस्वाभाविक रूप से दूसरों को श्रम में डालने के लिए या आकर्षण में फँसाने के लिए जो मायाचार चल रहा है, उसे त्याग दीजिए।
भड़कीली पोशाक के दंभ से मुक्ति पाकर आप सज्जन कहलायेंगे। आप पूछेंगे कि आवश्यकताओं, आराम की वस्तुओं और विलासिता की चीजों में क्या अन्तर है ? मनुष्य के लिए सबसे मूल्यवान उसका शरीर है। शरीर में उसका सम्पूर्ण कुटुम्ब भी सम्मिलित है। वह अपना और अपने परिवार का शरीर (स्वास्थ्य और अधिकतम सुख) बनाये रखने की फिक्र में है। *उपभोग के आवश्यक पदार्थ वे हैं, जो शरीर और स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। ये ही मनुष्य के लिए महत्व के हैं।*
जीवन रक्षक पदार्थों के अन्तर्गत तीन चीजें प्रमुख हैं:- (१) भोजन (२) वस्त्र (३) मकान। भोजन मिले, शरीर ढकने के लिए वस्त्र हों और सर्दी-गर्मी-बरसात से रक्षा के निमित्त मकान हो। यह वस्तुएँ ठीक हैं, तो जीवन रक्षा और निर्वाह चलता रहता है। जीवन की रक्षा के लिए ये वस्तुएँ अनिवार्य हैं। यदि इन्हीं पदार्थों की किस्म अच्छी है तो शरीर रक्षा के साथ-साथ निपुणता भी प्राप्त होगी।
कार्य शक्ति, स्फूर्ति बल और उत्साह में वृद्धि होगी, शरीर निरोग रहेगा और मनुष्य दीर्घ जीवी रहेगा। ये निपुणतादायक पदार्थ क्या हैं ? अच्छा पौष्टिक भोजन, जिसमें अन्न, फल, दूध, तरकारियाँ, घृत इत्यादि प्रचुर मात्रा में हों, टिकाऊ वस्त्र, जो सर्दी से रक्षा कर सकें, हवादार स्वस्थ वातावरण में खड़ा हुआ मकान जो शरीर को धूप, हवा, जल इत्यादि प्रदान कर सके।
यदि आपकी आमदनी इतनी है कि निपुणतादायक चीज (अच्छा अन्न, घी, दूध, फल, हवादार मकान, स्वच्छ वस्त्र, कुछ मनोरंजन) खरीद सकते हैं, तो आराम की चीजों को अवश्य लीजिए। इनसे आपकी कार्य कुशलता तो बढ़ेगी, पर उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में आप खर्च करते हैं।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
धन का सदुपयोग, पुस्तक पृष्ठ 20

वस्तुएँ विलासिता के लिए जीवन रक्षा या कार्य कुशलता के लिए संग्रह करें।**************************        विलासिता में खर्...
19/02/2026

वस्तुएँ विलासिता के लिए जीवन रक्षा या कार्य कुशलता के लिए संग्रह करें।
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विलासिता में खर्च की अपेक्षा निपुणता और कार्य कुशलता कम प्राप्त होती है। कभी-कभी कार्य कुशलता का ह्रास तक हो जाता है। मनुष्य आलसी और विलासी बन जाता है, काम नहीं करना चाहता। रुपया बहुत खर्च होता है, लाभ न्यून मिलता है ।
इस श्रेणी में ये वस्तुएँ हैं- आलीशान कोठियाँ, रेशम या जरी के बढ़िया कीमती भड़कीले वस्त्र, मिष्ठान्न, मेवे, चाट-पकौड़ी, शराब, चाय, तरह-तरह के अचार-मुरब्बे, माँस भक्षण, फैशनेबिल चीजें, मोटर, तम्बाकू, पान, गहने, जन्मोत्सव और विवाह में अनाप-शनाप व्यय, रोज दिन में दो बार बदले जाने वाले कपड़े, साड़ियाँ, अत्यधिक सजावट, नौकर-चाकर, मनोरंजन के कीमती सामान, घोड़ा गाड़ी, सोने की घड़ियाँ, होटल रेस्टरां में खाना, सिनेमा, सिगरेट, पान, नाच-रंग, श्रृंगारिक पुस्तकें, भड़कीली पोशाक, क्रीम, पाउडर, इत्र आदि। यह वस्तुएँ जीवन रक्षा या कार्य कुशलता के लिए आवश्यक नहीं हैं किन्तु रुपये की अधिकता से आदत पड़ जाने से आदमी अनाप-शनाप व्यय करता है और इनकी भी जरूरत अनुभव करने लगता है।
इन्हीं वस्तुओं पर सबसे अधिक टैक्स लगते हैं, कीमत बढ़ती है। ये कृत्रिम आवश्यकताओं से पनपते हैं। इनसे सावधान रहिए। हम देखते हैं कि लोग विवाह, शादी, त्यौहार, उत्सव, प्रीतिभोज आदि के अवसर पर दूसरे लोगों के सामने अपनी हैसियत प्रकट करने के लिए अन्धाधुन्ध व्यय करते हैं। भूखों मरने वाले लोग भी कर्ज लेकर अपना प्रदर्शन इस धूमधाम से करते हैं मानो कोई बड़े भारी अमीर हों। इस धूमधाम में उन्हें अपनी नाक उठती हुई और न करने में कटती हुई दिखाई पड़ती है।
भारत में गरीबी है, पर गरीबी से कहीं अधिक मूढ़ता, अन्ध-विश्वास, रूढ़िवादिता, मिथ्या प्रदर्शन, घमण्ड, धर्म का तोड़-मरोड़ दिखावा और अशिक्षा है। हमारे देशवासियों की औसत आय अधिक नहीं है । इसी में हमें भोजन, वस्त्र, मकान तथा विवाह-शादियों के लिए बचत करनी होती है। पैसे की कमी के कारण हमारे देशवासी मुश्किल से दूध, घी, फल इत्यादि खा सकते हैं। अधिक संख्या में तो वे स्वच्छ मकानों में भी नहीं रह पाते, अच्छे वस्त्र प्राप्त नहीं कर पाते, बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते, बीमारी में उच्च प्रकार की चिकित्सा नहीं करा सकते, यात्रा, अध्ययन, मनोरंजन के साधनों से वंचित रह जाते हैं। फिर भी शोक का विषय है कि वे विवाह के अवसर पर सब कुछ भूल जाते हैं, मृतक भोज कर्ज लेकर करते हैं, मुकदमेबाजी में हजारों रुपया फूंक देते हैं।
इस उपक्रम के लिए उन्हें वर्षों पेट काटकर एक-एक कौड़ी जोड़नी पड़ती है, कर्ज लेना पड़ता है, या और कोई अनीति मूलक पेशा करना पड़ता है।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
( संकलित व सम्पादित)
धन का सदुपयोग, पुस्तक पृष्ठ 21

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