04/06/2026
व्यक्ति के कृत्यों के परिणाम से स्वयं तथा सम्पर्क क्षेत्र भी प्रभावित होता है।
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मनुष्य की समग्र संरचना शरीर और मन के सम्मिश्रण से होती है। इन दोनों का जो जितना सदुपयोग कर सकता है, वही अपने लिये सम्पदाएं और सफलताएँ अर्जित करता है, साथ ही अपने समय और जनसमुदाय के लिये कहने लायक सुख-सुविधाएँ उत्पन्न करता है। स्वयं प्रगति पथ पर चलता है और अन्य असंख्यों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है; किन्तु जो इन दोनों ईश्वर प्रदत्त विभूतियों को ऐसे ही उपेक्षित पड़ी रहने देता है, या उनका दुरुपयोग करता है, वह हानि भी कम नहीं उठाता है। उससे प्रभावित लोग भी कम हानि नहीं उठाते ।
समूचा मनुष्य समाज प्रकारान्तर से एक श्रृंखला में बँधा हुआ है। व्यक्ति के कृत्यों का वह स्वयं तो परिणाम भोगता ही है; पर सम्पर्क क्षेत्र भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। यह प्रक्रिया समय एवं स्थान पर सीमाबद्ध नहीं रहती, वरन् यदि वह महत्वपूर्ण हो, तो लम्बे समय तक अपना प्रभाव छोड़ती है। और सुविस्तृत परिधि को अपनी लपेट ले में लेती है।
शरीर की सार्थकता इसमें है कि जितनी उसमें क्षमता है, उसके अनुरूप उससे काम लिया जाय। उसे आलस्य में, अर्ध-मृतकों या अर्ध-मूच्छितों की तरह तंद्राग्रस्त स्थिति में न पड़े रहने दिया जाय। इस स्थिति को आलस्य कहते हैं। आलस्य को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। वह परोक्ष रूप से वह हानि पहुँचाता है, जो हाथ-पैर कसकर किसी को बन्दीगृह में डालने पर पहुँचायी जा सकती है ।
मन का कर्तव्य और उत्तरदायित्व यह है कि वह शरीर के साथ मिलकर अपने लिये सुनिश्चित कार्य पद्धति निर्धारित करे, फिर जो कुछ भी करना है, उसमें पूरी दिलचस्पी और एकाग्रता के साथ जुट पड़े। जिसका मन हवा में उड़ने वाले पत्ते की तरह जिधर तिघर, अस्त-व्यस्त मारा-मारा फिरता है, किसी उपयोगी काम पर जमता नहीं, समझना चाहिये कि वह जिस काम से सम्बन्ध जोड़ेगा, उसे बर्बाद करके रहेगा।
हर काम, सफलता की मंजिल तक पहुँचने के लिये समुचित शारीरिक श्रम चाहता है और साथ ही इसकी भी अनिवार्य आवश्यकता रहती है कि उसमें परिपूर्ण मनोयोग लगे । काम छोटा हो या बड़ा, उसकी सफलता के लिये शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता की आवश्यकता रहेगी। इन दोनों में जहाँ एक की भी कमी पड़ेगी, समझना चाहिये कि पैर असफलता की दिशा में उठ रहे हैं ।*
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
भव बंधनों से मुक्त हों, पुस्तक पृष्ठ 18