अदभुत् श्रीमद् भागवत Bhagwat katha

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अदभुत् श्रीमद् भागवत Bhagwat katha A unique spiritual book where very big stories have been presented in very simple words in the form His Divine Grace A. C.

Bhagvat is the spiritual and devotional epitome of the whole world, and this is my effort to present it in poetic form. Presenting this 12 Skandas (18 volume) Juggernautic literature in the form of this verse and poetry form of 500 pages is itself equivalent to the spiritual Journey of seven births. In the Adbhut Srimad Bhagvat, very big stories have been presented in very simple words in the form of jugalbandi in a fascinating way. It is such an indefinable force of devotion that, with its touch and control, definite salvation is possible. Srimad-Bhagavatam is an epic philosophical, devotional & literary classic which traditionally written in 12 skandas (18 volumes). The timeless wisdom of India is expressed in the Vedas, ancient Sanskrit texts that touches upon all fields of human knowledge and provides illuminating answers, concerning everything from the nature of the self to the origin of the universe. Originally preserved through oral tradition, the Vedas were first put into writing by Srila Vyasadeva, the "literary incarnation of God." Known as "the ripened fruit of the tree of Vedic literature," Srimad-Bhagavatam is the most complete and authoritative exposition of Vedic knowledge. Bhaktivedanta Swami Prabhupada written 18 books edition of Srimad Bhagavatam is the only complete Hindi translation. Our book is an attempt to translate the 12 skandas into 500 page easy to understand and read poetric form of Shrimad Bhagwat.

जीवन का चक्रव्यूह !आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जीवन सचमुच एक चक्रव्यूह बनता जा रहा है। हर इंसान अपने घर-परिवार और नौकरी...
04/10/2026

जीवन का चक्रव्यूह !

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जीवन सचमुच एक चक्रव्यूह बनता जा रहा है। हर इंसान अपने घर-परिवार और नौकरी-कारोबार के बीच उलझा हुआ है। सुबह से रात तक बस एक ही चिंता रहती है- कुछ और हासिल करना है, कुछ और जुटाना है, बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना है और जिंदगी को थोड़ा और आरामदायक बनाना है।इसी दौड़ में हम सोचते रहते हैं- कहाँ रहना है? अपना घर कब बनाना है? लोन कैसे चुकाना है? ईएमआई कैसे जाएगी? बच्चों की पढ़ाई और उनका करियर कैसे बनेगा? फिर कार, घर, सुविधाएँ और भविष्य के लिए पैसा जुटाने की चिंता शुरू हो जाती है। धीरे-धीरे जरूरतें बढ़ती जाती हैं और उनके साथ हमारी दौड़ भी।
लेकिन इस सबके बीच एक बात का पता ही नहीं चलता कि जिस जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए हम इतना भाग रहे हैं, वही जिंदगी धीरे-धीरे हमारे हाथ से निकलती जा रही है।हम सोचते हैं कि पहले सब कुछ ठीक कर लें, फिर आराम से जीएँगे। पहले घर बन जाए, फिर चैन मिलेगा। पहले पैसा जमा हो जाए, फिर घूमने जाएँगे। पहले बच्चों की जिम्मेदारी पूरी हो जाए, फिर अपने लिए समय निकालेंगे।
लेकिन जिंदगी किसी का इंतजार नहीं करती।कल कभी आता नहीं, वह हमेशा आज बनकर ही आता है। और इसी तरह भविष्य को बेहतर बनाने की तैयारी करते-करते कहीं ऐसा न हो कि जीने की तैयारी में ही जीवन जीना भूल जाएँ।मैंने कई लोगों को इसी तरह का जीवन जीते देखा है। फिर बाद में जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर जाकर इंसान पीछे मुड़कर देखता है तो समझ आता है कि जिन चीजों के लिए उसने अपना इतना समय और सुकून खो दिया, उनमें से बहुत-सी चीजें वास्तव में इतनी जरूरी थीं ही नहीं।
हमारे बड़े-बूढ़े हमेशा समझाते आए हैं कि जो हमारे पास है, उसका आनंद लेना सीखो। अपने लोगों को समय दो। रिश्तों को संभालो। अपनों से प्यार करो। क्योंकि अंत में याद यह नहीं रहता कि बैंक में कितना पैसा था, कितनी बड़ी गाड़ी थी या कितना बड़ा पद था। याद रहता है तो यह कि किसके साथ हँसे थे, किसके साथ बैठे थे और किसके जीवन में हमारे होने से थोड़ी खुशी बढ़ी थी। जीवन केवल आगे बढ़ने का नाम नहीं है। जीवन रास्ते में रुककर आसपास देखने का नाम भी है। किसी सुबह अपनों के साथ चाय की चुस्कियाँ,बच्चों की हँसी सुनना, परिवार के साथ बैठना, पुराने मित्र से बात करना, प्रकृति को देखना और कभी-कभी बिना किसी कारण मुस्कुरा देना भी जीवन है।
जीवन जीने के लिए है, केवल कमाने और जमा करने के लिए नहीं।हमें भविष्य की चिंता बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, ऐसा भी नहीं है। जिम्मेदारियाँ निभानी जरूरी हैं, भविष्य के लिए योजना बनाना भी जरूरी है। लेकिन भविष्य के लिए वर्तमान को पूरी तरह कुर्बान कर देना बिल्कुल भी समझदारी नहीं है, पर लोग ऐसा ही कर रहे हैं ।
जीवन का चक्रव्यूह शायद कभी पूरी तरह खत्म नहीं होगा। जिम्मेदारियाँ रहेंगी, परेशानियाँ रहेंगी, उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। लेकिन इस चक्रव्यूह के बीच भी हम अपने लिए एक छोटी-सी जगह बना सकते हैं-जहाँ चिंता कम हो और जीवन थोड़ा ज्यादा हो।इसलिए सब कुछ पाने की कोशिश में अपना आज मत खोइए। जो मिला है, उसे महसूस कीजिए। जो अपने हैं, उन्हें समय दीजिए। जो पल सामने है, उसे पूरी तरह जी लीजिए।तभी आप इस चक्रव्यूह को भेदने वाले अभिमन्यु कहलाएँगे।

श्राद्ध : केवल पितरों का नहीं, जीवित बुजुर्गों का भी सम्मान‘श्राद्ध’ शब्द की उत्पत्ति ‘श्रद्धा’ से हुई है। यह समय हमारे ...
27/09/2026

श्राद्ध : केवल पितरों का नहीं, जीवित बुजुर्गों का भी सम्मान

‘श्राद्ध’ शब्द की उत्पत्ति ‘श्रद्धा’ से हुई है। यह समय हमारे पूर्वजों एवं दिवंगत पितरों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मिक शांति अर्पित करने का पावन अवसर माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा अर्थात कल 26 सितंबर से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या, अर्थात् सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर तक चलेगा । सनातन परंपरा में मनुष्य पर तीन ऋण-देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण- माने गए हैं। श्राद्ध, तर्पण और स्मरण के माध्यम से पितृ ऋण का परिमार्जन होता है।
लेकिन इस परंपरा का एक गहरा और विचारणीय पक्ष भी है।हम पूर्वजों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करते हैं, जो इस संसार में नहीं हैं; उनके नाम पर तर्पण करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, दान देते हैं और उनकी आत्मिक शांति की कामना करते हैं। परंतु क्या हमने कभी यह सोचा है कि जो माता-पिता आज हमारे सामने जीवित हैं, उनके प्रति हमारी श्रद्धा कितनी है?
आज समाज में ऐसे अनेक बुजुर्ग दिखाई देते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार बनाने, बच्चों को पढ़ाने, उन्हें योग्य बनाने और उनके सुख के लिए स्वयं की इच्छाओं का त्याग करने में लगा दिया। उम्र के उस पड़ाव पर, जब उन्हें अपने बच्चों का साथ, सम्मान, प्रेम और कुछ समय चाहिए, तो कई बार वे अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का सामना करते हैं।विडंबना यह है कि हम पितरों के लिए वर्ष में कुछ दिन निकाल लेते हैं, लेकिन जीवित माता-पिता के लिए रोज कुछ मिनट निकालना भी कठिन लगता है।
श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं, श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। और श्रद्धा का सबसे सच्चा रूप केवल मृतकों के स्मरण में नहीं, बल्कि जीवित बुजुर्गों के सम्मान में दिखाई देना चाहिए। उनके साथ बैठना, उनकी बातें सुनना, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखना, समय पर दवा देना, उन्हें परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस कराना और सबसे बढ़कर उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे बोझ नहीं हैं- यही वास्तविक सेवा है।
जिस घर में बुजुर्ग सम्मानित होते हैं, वहां केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और परिवार की स्मृतियों का सम्मान होता है। उनकी झुर्रियों में बीते समय का अनुभव और उनकी कहानियों में परिवार की जड़ें छिपी होती हैं।इस श्राद्ध पक्ष में यदि हम अपने पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनके नाम पर तर्पण के साथ-साथ अपने जीवित माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति भी प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करें।
मृत पितरों के लिए किया गया श्राद्ध हमारी परंपरा है, लेकिन जीवित माता-पिता की सेवा हमारी जिम्मेदारी।
पितरों को तर्पण आत्मिक शांति दे सकता है, लेकिन हमारे बड़े-बुजुर्गों के चेहरे पर लाई गई मुस्कान हमारी श्रद्धा को सार्थक करती है ।और शायद यही ‘श्रद्धा’ से निकले ‘श्राद्ध’ का सबसे मानवीय अर्थ है।

मंत्र और मन !गणपति बप्पा विराजमान हैं, ऐसे समय में सवाल यह है कि “मंत्र” का जाप कैसे करें ? जाहिर सी बात है कि मंत्र का ...
20/09/2026

मंत्र और मन !

गणपति बप्पा विराजमान हैं, ऐसे समय में सवाल यह है कि “मंत्र” का जाप कैसे करें ? जाहिर सी बात है कि मंत्र का जाप तो मन में ही होता है । फिर दूसरा सवाल उठता है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मन को एकाग्र कैसे करें ? क्योंकि जैसे ही हम मंत्र जपने बैठते हैं-घर-परिवार, कामकाज, भविष्य की चिंता या बीती हुई कोई घटना मन को अपनी ओर खींचने लगती है। हम चाहकर भी मन को एक जगह टिका नहीं पाते। सोचने वाली बात है कि हम तीन घंटे की फिल्म बड़े ध्यान से देख लेते हैं, घंटों मोबाइल चला सकते हैं, पार्टी कर सकते हैं और दोस्तों के साथ घूमने-फिरने में समय बिता सकते हैं , लेकिन आधे घंटे भी सच्चे मन से मंत्र जाप नहीं कर पाते। आखिर ऐसा क्यों?
सीधी-सी बात है - जिस मन को हमने संसार की अनगिनत चीजों में बाँट रखा है, वह एक जगह स्थिर कैसे रहेगा?
मन जहाँ आसक्त होता है, बार-बार वहीं लौटकर जाता है। हमारी आसक्ति- धन, प्रतिष्ठा, रिश्तों, सुविधाओं, इच्छाओं और भविष्य की चिंताओं में बँधी हुई है। इसलिए जब हम मंत्र जपने बैठते हैं, तो मन हमें संसार की ओर खींच ले जाता है। जहाँ आसक्ति बहुत गहरी होती है, वहाँ सच्ची भक्ति के लिए जगह बनाना कठिन हो जाता है।
भक्ति का अर्थ केवल माला फेरना, मंदिर जाना या भगवान की तस्वीर के सामने दीपक जलाना नहीं है। भक्ति का वास्तविक अर्थ है- मन का धीरे-धीरे परमात्मा की ओर मुड़ना। इसके लिए हमें अपने भीतर थोड़ी-सी शांति और खाली जगह बनानी होगी।आजकल कुछ लोगों के लिए भक्ति भी प्रदर्शन का माध्यम बन गई है। मंदिर गए तो फोटो, पूजा की तो स्टेटस, कथा सुनी तो पोस्ट और माला जपी तो उसकी तस्वीर। ऐसा लगता है जैसे हमें भगवान से अधिक दुनिया को यह बताने की चिंता है कि हम कितने धार्मिक हैं।
लेकिन परमात्मा को हमारे स्टेटस या दिखावे की आवश्यकता नहीं है। वे तो हमारे मन में जगी सच्ची श्रद्धा को देखते हैं। हम घंटों पूजा कर लें, अनेक मंत्रों का जाप कर लें, लेकिन हमारे इष्ट के अनुरूप हमारा आचरण नहीं रहा तो भी वह भक्ति काम की नहीं है । जैसे कि यदि आप मॉं भगवती की आराधना करते हैं और घर पर खुद की जन्मदात्री मॉं की सेवा नहीं कर रहें हैं तो मॉं जगतजननी दुर्गा वह पूजा स्वीकार ही नहीं करेंगी ।साथ ही यदि मन में अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और स्वार्थ भरे हुए हैं, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारी पूजा वास्तव में किसके लिए है ? फिर जब हमारी मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं, तो हम भगवान से शिकायत करने लगते हैं- “मैंने इतनी पूजा की, इतना मंत्र जपा, फिर भी मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” लेकिन क्या हमने कभी यह विचार किया कि हमने मंत्र जाप भगवान के लिए किया था या अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए?
मंत्र कोई सौदा नहीं है कि हमने जाप किया और बदले में अपनी मनचाही वस्तु माँग ली। मंत्र तो मन को शुद्ध और बदलने का साधन है। शुरुआत में मन बार-बार भटकेगा। यह स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा मंत्र जाप व्यर्थ जा रहा है। जब भी मन भटके, उसे पूरी चेतना,प्रेम और धैर्य के साथ फिर मंत्र पर ले आएँ। आज पाँच मिनट सच्चे मन से जाप होगा, कल दस मिनट और धीरे-धीरे वही मंत्र हमारे भीतर उतरने लगेगा।एक समय ऐसा भी आएगा, जब हम मंत्र का जाप नहीं करेंगे, बल्कि मंत्र स्वयं हमारे भीतर गूँजने लगेगा।
जब मंत्र हमारे होंठों से उतरकर हृदय में बस जाता है, तब जीवन की परिस्थितियाँ भले ही तुरंत न बदलें, पर उन्हें देखने वाली हमारी दृष्टि अवश्य बदल जाती है। दुख में धैर्य, सुख में विनम्रता, कर्म में ईमानदारी और संबंधों में करुणा जन्म लेने लगती है। तब समझ आता है कि सच्चा मंत्र-जाप किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि अपने भीतर परमात्मा के प्रकाश को जगाने की साधना है। जिस दिन हमारा मन संसार के शोर में भी उस पवित्र नाम को सुनने लगेगा, उसी दिन जानिए कि मंत्र केवल जपा नहीं जा रहा, बल्कि वह हमारे जीवन को भीतर से पवित्र कर रहा है।

मिल बॉंट कर खाना- बैकुंठ में जाना !“मिल-बाँट कर खाना, बैकुंठ में जाना” केवल एक कहावत नहीं है, बल्कि जीवन को सार्थक और आन...
13/09/2026

मिल बॉंट कर खाना- बैकुंठ में जाना !

“मिल-बाँट कर खाना, बैकुंठ में जाना” केवल एक कहावत नहीं है, बल्कि जीवन को सार्थक और आनंदमय बनाने का एक सरल सूत्र है। यहाँ मिल-बाँट कर खाने का अर्थ केवल भोजन बाँटना नहीं, बल्कि अपनी खुशी, समय, ज्ञान, श्रम, प्रेम और संसाधनों को दूसरों के साथ साझा करना है।अक्सर मन में प्रश्न उठता है कि क्या दें, किसे दें, कब दें और कहाँ दें? इसका उत्तर बहुत आसान है। जब भी अवसर मिले और मन में सेवा की भावना जागे, तब किसी जरूरतमंद की सहायता कर दीजिए। यदि आपके पास धन, वस्त्र, भोजन या अन्य कोई वस्तु आवश्यकता से अधिक है, तो उसे किसी ऐसे व्यक्ति को दे दीजिए जिसके लिए वह वास्तव में उपयोगी हो। और यदि अतिरिक्त कुछ नहीं है, तब भी अपने हिस्से में से थोड़ा-सा बाँटना सीखिए। दान वस्तु का नहीं, भावना का होता है।
हर सहायता पैसे से नहीं होती। यदि आपके पास ज्ञान है तो किसी विद्यार्थी को पढ़ाइए। यदि कोई हुनर है तो किसी बेरोजगार को सिखाइए, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके। यदि आपके पास समय है तो किसी बुज़ुर्ग के पास बैठकर दो बातें कर लीजिए। कई बार किसी उदास व्यक्ति को दिया गया अपनापन और सांत्वना लाखों रुपये से भी अधिक मूल्यवान होता है।
आप किसी वृद्धाश्रम में जाकर बुज़ुर्गों का हाल-चाल पूछ सकते हैं, अस्पताल में किसी जरूरतमंद की दवा या इलाज में सहयोग कर सकते हैं, किसी गरीब परिवार की पढ़ाई, भोजन या रोज़मर्रा की ज़रूरतों में मदद कर सकते हैं। ऐसे कार्यों के बदले में जो सच्ची दुआएँ मिलती हैं, वे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाती हैं। दूसरों के चेहरे पर आई मुस्कान, हमारे अपने मन को भी गहरा संतोष देती है।
सेवा केवल इंसानों की ही नहीं, प्रकृति की भी हो सकती है। पेड़-पौधे लगाना, उन्हें पानी देना, उनकी देखभाल करना भी समाज और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। किसी मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, चर्च या अन्य सार्वजनिक स्थान पर साफ-सफाई और व्यवस्था बनाए रखने में श्रमदान करना भी सेवा का ही एक सुंदर रूप है।
त्योहारों और खुशियों के अवसर पर यदि हम किसी गरीब बस्ती के बच्चों को कपड़े, मिठाई, खिलौने या किताबें दें, तो उनकी मासूम मुस्कान हमारे जीवन की सबसे बड़ी खुशी बन सकती है। इसी तरह, किसी शादी या समारोह के बाद बचा हुआ भोजन फेंकने के बजाय जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाए, तो अन्न का सम्मान भी होगा और किसी भूखे का पेट भी भर जाएगा। सच्चाई यह है कि सेवा और दान करने के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं होती। आवश्यकता होती है केवल संवेदनशील हृदय और दूसरों के दुख को अपना समझने की भावना की। छोटी-छोटी मदद भी किसी के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
जीवन की सफलता केवल धन, पद, प्रतिष्ठा, सुंदर घर या सुख-सुविधाओं से नहीं मापी जाती। यदि हमारे कारण किसी की आँखों में आशा जगी, किसी का दुख कम हुआ, किसी बच्चे की पढ़ाई आगे बढ़ी, किसी भूखे को भोजन मिला या किसी निराश व्यक्ति को जीने का साहस मिला, तभी हमारा जीवन वास्तव में सफल माना जाएगा।
याद रखिए, संसार से जाते समय हम अपने साथ धन-दौलत नहीं ले जा सकते, लेकिन हमारे अच्छे कर्म, सेवा और प्रेम की सुगंध हमेशा हमारे पीछे रह जाती है। इसलिए जितना बन पड़े, उतना बाँटिए- अन्न बाँटिए, ज्ञान बाँटिए, समय बाँटिए, प्रेम बाँटिए और मुस्कान बाँटिए। यही मानवता का सबसे सुंदर धर्म है।
इसी लिए हमारे संतों ने कहा है- “मिल-बाँट कर खाना, बैकुंठ में जाना।” अर्थात जो व्यक्ति अपने सुख, संसाधन और प्रेम को दूसरों के साथ बाँटना सीख लेता है, वह इसी धरती पर स्वर्ग जैसे आनंद का अनुभव करता है। सेवा का प्रत्येक छोटा कार्य ईश्वर की पूजा है और यही जीवन को सच्चे अर्थों में सफल, सार्थक और धन्य बनाता है।

जियो बाहर पर रहो भीतर !पिछले शुक्रवार को ही श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का पर्व हम सभी ने मनाया। भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कोई...
06/09/2026

जियो बाहर पर रहो भीतर !

पिछले शुक्रवार को ही श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का पर्व हम सभी ने मनाया। भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कोई क्या ही लिख सकता है? माँ शारदा स्वयं सक्षम नहीं हैं उन पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर की महिमा को शब्दों में बाँधने में। श्रीकृष्ण का जीवन अपने आप में एक अद्भुत विरोधाभास है। कभी नटखट बालक, कभी ग्वालों के सखा, कभी राधा के प्रेम में डूबे कृष्ण, कभी मथुरा के उद्धारक, कभी द्वारका के राजा और अंततः कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी।उन्होंने जीवन की हर भूमिका निभाई, लेकिन किसी भूमिका में अटके नहीं।यही शायद श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है- वे बाहर से संसार में थे, लेकिन भीतर से संसार से परे थे।
हमारी समस्या ठीक इसके उलट है।हम बाहर की दुनिया में जितना जीते हैं, उससे कहीं अधिक उसे अपने भीतर बसा लेते हैं। किसी ने हमारी तारीफ कर दी तो मन सातवें आसमान पर पहुँच जाता है और किसी ने आलोचना कर दी तो पूरा दिन खराब हो जाता है। थोड़ी सफलता मिली तो अहंकार सिर उठाने लगता है और थोड़ी असफलता मिली तो हम स्वयं को ही असफल मान बैठते हैं।किसी वस्तु को पाने की इच्छा होती है तो लगता है- इसके बिना जीवन अधूरा है।और जब वह मिल जाती है तो डर लगता है- कहीं यह छिन न जाए।
यानी पाने से पहले बेचैनी और पाने के बाद उसे खोने का डर।
श्रीकृष्ण इससे मुक्त जीवन का रास्ता दिखाते हैं।वे कहते हैं-कर्म करो, लेकिन कर्म के फल के मोह में मत बंधो।इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में महत्वाकांक्षा मत रखो, सफलता मत चाहो या संसार छोड़ दो। इसका अर्थ केवल इतना है कि आपका कर्म आपके हाथ में रहे, लेकिन आपकी शांति किसी परिणाम की बंधक न बने।
श्रीकृष्ण की भी यही कला थी जीवन जीने की - बाहर पूरी सक्रियता, भीतर पूर्ण शांति। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में चारों ओर युद्ध था, लेकिन उसी युद्धभूमि में श्रीकृष्ण के मुख से गीता का जन्म हुआ। यह कितना अद्भुत है- बाहर शंख बज रहे हैं, अस्त्र उठ रहे हैं, मृत्यु सामने खड़ी है और भीतर से ज्ञान, शांति और समत्व की धारा बह रही है।शायद हमें भी अपने-अपने कुरुक्षेत्र की परिस्थितियों में यही सीखना है।हम संघर्ष, कठिनाइयों को आने से रोक नहीं सकते, लेकिन अपने भीतर उठने वाली हलचल को रोक सकते हैं।हम दुनिया को अपने अनुसार नहीं बदल सकते, लेकिन दुनिया के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदल सकते हैं।हम हर परिस्थिति को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन हर परिस्थिति में अपने भीतर की स्थिति को संभाल सकते हैं। क्योंकि जीवन में परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलेंगी।कभी धूप होगी, कभी छाँव।कभी प्रशंसा मिलेगी, कभी उपेक्षा।कभी लोग साथ चलेंगे, कभी बीच रास्ते छोड़ जाएंगे।कभी हमारी योजनाएँ सफल होंगी, कभी परिस्थितियाँ हमें बिल्कुल दूसरी दिशा में ले जाएँगी।लेकिन इन सबके बीच यदि भीतर का दीपक जलता रहे, तो बाहर का अंधेरा हमें निगल नहीं सकता।
इसलिए जीवन से भागिए मत।जीवन को पूरी तरह जिएँ- हँसिए, प्रेम कीजिए, सपने देखिए, मेहनत कीजिए, सफल होइए, असफल होइए, रिश्ते निभाइए, यात्राएँ कीजिए, उत्सव मनाइए। बाहर जीवन की पूरी हलचल हो,लेकिन भीतर कृष्ण की बाँसुरी बजती रहे।इस जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का यही मौन संदेश है-“जियो बाहर…पर रहो भीतर!”

सबसे बड़ा चमत्कार ?हमारे यहाँ लोग किसी चमत्कार के चक्कर में पड़कर ही लुट-पिट जाते हैं, जबकि जीवन में बिना मेहनत के कोई च...
30/08/2026

सबसे बड़ा चमत्कार ?

हमारे यहाँ लोग किसी चमत्कार के चक्कर में पड़कर ही लुट-पिट जाते हैं, जबकि जीवन में बिना मेहनत के कोई चमत्कार नहीं होता। अपने सोचे हुए को हासिल कर लेना, उसे घटित होते हुए देखना ही दुनिया में सबसे बड़ा चमत्कार है । ऐसे चमत्कारों तक पहुँचने में लंबा वक्त, अथक मेहनत और संघर्ष लगता है । इन चमत्कारों को घटित करने के लिए जरूरी है कि मनुष्य कोशिश करता रहे, न कि रूद्राक्ष बॉंटने वाले बाबा के यहॉं जाकर लाइन में लगे । हमें कोशिश कभी भी नहीं छोड़नी है, उस वक्त भी नहीं जब लगे कि हमसे अब कुछ नहीं होगा । जीवन के अंत तक अफसोस रखने से अच्छा है कि हम अंत तक प्रयास करें । प्रयास करते रहने से मनुष्य अपने सोचे हुए से भी अधिक परिणाम प्राप्त कर सकता है । शर्त बस यही है कि वह निरंतर कोशिश करता रहे।
कोशिश करते रहने से व्यक्ति अपनी अपेक्षाओं को ही नहीं अपितु इंसानी सीमाओं को भी पार करने में सफल हुआ है।जीवन में जीत कोई ऐसी स्थिर स्थिति नहीं है, जिसे एक बार हासिल करके छोड़ दिया जाए । इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जीतने वाले लोग अंत तक नायक नहीं रह जाते । इतिहास हमें सिखलाता है कि एक बार की जीत काफ़ी नहीं , जीवन में रोज कोशिश करनी पड़ती है ।जो हमने हासिल कर लिया है, अगर उसे बनाए रखने के लिये मेहनत नहीं करेंगे, तो वह बचा नहीं रहेगा । जिस तरह पराजय स्थायी नहीं उसी तरह कोई विजय भी स्थायी नहीं है । स्थायित्व सतत कर्मों की उस श्रंखला से बनता है, जिसके लिए रोज प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है ।
कोई कितना भी महान क्यों न हो जाए, उस व्यक्ति को भी रोज उठकर नई शुरुआत करनी ही पड़ती है । एक सीमा के बाद थोड़ा-थोड़ा जुड़कर भी बहुत कुछ होने लगता है, लेकिन इन सबके पीछे एक-एक दिन की मेहनत और लगन होती है । कोई भी व्यक्ति अपने काम में जुनून की हद तक प्रेम किए बिना अपने क्षेत्र में शिखर तक नहीं पहुँच सकता । जब तक सतत किए गए परिश्रम को हम देखना नहीं सीखेंगे, सफलताएं हमें चमत्कार ही लगेगी ।दरअसल ये बस निरंतर प्रयास होते हैं जो व्यक्ति को किसी भी मुकाम तक पहुँचा सकते हैं ।
सच्चाई यह है कि दुनिया में बहुत से चमत्कार मेहनत के रूप में छिपे होते हैं । कोई व्यक्ति अचानक सफल दिखाई देता है, लेकिन उस ‘अचानक’ के पीछे वर्षों की तैयारी या तपस्या होती है । आज का छोटा प्रयास कल की वही बड़ी उपलब्धि की नींव बनता है जिसे लोग चमत्कार समझ लेते हैं ।
इसिलिए परिणाम की चिंता से अधिक अपने प्रयास की ईमानदारी पर ध्यान दें ।क्योंकि जीवन में मंजिल से ज्यादा महत्वपूर्ण वह साहस है, जो हमें हर दिन एक कदम और आगे बढ़ाता है । और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार है- हार न मानना और अंत तक प्रयास करते रहना ।

किताबें - मन की सुनहरी मरम्मत !आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारा मन अक्सर परेशान और बेचैन हो जाता है। हम न चाहते हुए भी...
23/08/2026

किताबें - मन की सुनहरी मरम्मत !

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारा मन अक्सर परेशान और बेचैन हो जाता है। हम न चाहते हुए भी तरह-तरह के विचारों में उलझे रहते हैं। ऐसे समय में किताबें हमें शांति और सुकून देती हैं। वे हमें कुछ देर के लिए रोजमर्रा की चिंताओं से दूर ले जाकर एक ऐसी दुनिया में पहुंचाती हैं, जहां मन थोड़ा हल्का हो जाता है।
किताबें , केवल पढ़ने के लिए लिखे गए शब्द नहीं हैं। वे हमारे साथी हैं। वे हमें धीरे चलना, गहरी सांस लेना और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करना सिखाती हैं। जब मन थका हुआ हो, तब एक अच्छी किताब हमें संभाल सकती है। उसके पात्रों और कहानियों में हमें अपने जीवन की झलक दिखाई देती है। किताबों को पढ़कर हम समझते हैं कि हमारी परेशानियां केवल हमारी नहीं हैं। दूसरे लोग भी संघर्ष करते हैं, टूटते हैं और फिर संभलते हैं। यह एहसास हमें भीतर से मजबूत बनाता है।
कभी-कभी कोई किताब हमारे उस सवाल का जवाब दे देती है, जिसे हम लंबे समय से अपने भीतर लेकर घूम रहे होते हैं। कोई कहानी हमें उम्मीद देती है, कोई जीवनी संघर्ष करने की ताकत देती है और कोई विचार हमें अपने जीवन को एक नए नजरिए से देखने की समझ देता है। इस तरह किताबें धीरे-धीरे हमारे भीतर बदलाव लाती हैं।
यही बात जापान की एक सुंदर कला ‘किंत्सुगी’ से भी जुड़ती है।किंत्सुगी का अर्थ है- टूटी हुई चीज को सोने से जोड़कर उसे फिर से सुंदर बनाना। जापान में टूटे हुए बर्तनों को फेंकने के बजाय उनकी दरारों को सोने, चांदी या दूसरे कीमती पदार्थों से भरकर उन्हें नया रूप दिया जाता है। टूटा हुआ बर्तन अपनी पुरानी स्थिति में वापस नहीं आता, बल्कि उसकी दरारें ही उसकी नई खूबसूरती बन जाती हैं। किंत्सुगी केवल बर्तन जोड़ने की कला नहीं है, बल्कि जीवन को देखने का एक सुंदर तरीका भी है। यह हमें सिखाती है कि टूटना जीवन का अंत नहीं है। जीवन में दुख आएंगे, असफलताएं मिलेंगी, रिश्तों में दरारें आएंगी और कभी-कभी हम खुद भी भीतर से बिखर जाएंगे। लेकिन इन टूटनों के बाद भी जीवन को फिर से संवारा जा सकता है।
जिस तरह किंत्सुगी टूटे हुए बर्तन की दरारों को सोने की लकीरों में बदल देती है, उसी तरह किताबें हमारे मन की दरारों को शब्दों और विचारों से भर देती हैं।
जब मन उदास होता है, तो किसी कहानी का कोई पात्र हमें अपना-सा लगता है। जब हम असफल होते हैं, तो किसी सफल व्यक्ति की जीवनी हमें फिर से खड़े होने की प्रेरणा देती है। जब हम अकेले महसूस करते हैं, तो कोई किताब हमें यह एहसास दिलाती है कि दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्होंने हमारी तरह संघर्ष किया है।
किताबें हमारे भीतर की टूटन को तुरंत नहीं मिटातीं, लेकिन वे धीरे-धीरे उसे समझने की ताकत जरूर देती हैं। कभी वे हमें उम्मीद देती हैं, कभी आत्मविश्वास और कभी खुद को स्वीकार करने की समझ। हर अच्छी किताब हमारे भीतर कुछ न कुछ छोड़ जाती है- एक विचार, एक सीख, एक उम्मीद या जीवन को देखने का नया नजरिया। इसलिए जब मन थका हुआ हो, जब जीवन बोझिल लगे या जब भीतर बहुत कुछ बिखरा हुआ महसूस हो, तो किसी अच्छी किताब के साथ कुछ समय जरूर बिताइए। शायद वह आपकी सारी परेशानियां खत्म न करे, लेकिन आपको उन्हें देखने और उनसे लड़ने की नई ताकत जरूर देगी।
किताबें हमारे मन की वही सुनहरी मरम्मत हैं, जैसी किंत्सुगी टूटे हुए बर्तन की करती है। वे हमारी दरारों को छिपाती नहीं, बल्कि उनमें से निकलती रोशनी को पहचानना सिखाती हैं। इसलिए किताबों को केवल ज्ञान का साधन न समझें, उन्हें जीवन का साथी बनाएं। पढ़िए, सोचिए और अपने अनुभवों को शब्दों की रोशनी से संवारते रहिए। शायद किसी दिन आपको एहसास होगा कि आपकी सबसे बड़ी टूटन ही आपकी सबसे सुंदर ताकत बन गई है।

कौन सा दर्द चुनेंगे आप ?आपको लगेगा कि भाई मैं क्यों दर्द चुनने लगा ? कौन दर्द, संघर्ष और कठिनाई चुनना चाहेगा ? सभी आनंद,...
16/08/2026

कौन सा दर्द चुनेंगे आप ?

आपको लगेगा कि भाई मैं क्यों दर्द चुनने लगा ? कौन दर्द, संघर्ष और कठिनाई चुनना चाहेगा ? सभी आनंद, आराम , सुख और खुशी चुनना चाहेंगे। मैं भी यही समझता था जब तक कि मैंने मशहूर साइकोलॉजिस्ट जॉर्डन पीटरसन की किताब “ 12 रूल्स फॉर लाइफ- एंटीडोट ऑफ केयोस “ नहीं पढ़ी थी । वैसे तो इस किताब की हर एक लाइन अपने आप में एक सबक है । इसमें दर्शन से लेकर भगवद्गीता, कबीर और बुद्ध तक की झलक मिलती है लेकिन पढ़ते-पढ़ते एक लाइन इतनी जबरदस्त लगी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया । उसमें लिखा था कि “जिंदगी में आप जो भी करते हैं उसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है और आप जो नहीं भी करते उसकी भी एक कीमत चुकानी पड़ती है”।
कीमत से बचने का विकल्प हमारे पास नहीं है, केवल यह तय करने का अधिकार है कि हम कौन-सी कीमत चुकाएँगे ? सुबह उठकर व्यायाम करना, पढ़ाई करना, पैसे बचाना या अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना कठिन हो सकता है, लेकिन इनका दर्द हमें भविष्य में मजबूत बनाता है। इसके विपरीत, आज का आराम और लापरवाही कल की बीमारी, तनाव, आर्थिक परेशानी या पछतावे का कारण बन सकती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि दर्द होगा या नहीं, बल्कि यह है कि हम कौन-सा दर्द चुनेंगे ? आज का अनुशासन या कल की कठिनाई?
हम अक्सर आराम को सुख समझ लेते हैं। काम कल पर टालना, व्यायाम न करना, अनावश्यक खर्च करना, कठिन निर्णय से बचना या अपनी गलत आदतों को जारी रखना उस समय आसान लगता है, लेकिन टाली हुई छोटी परेशानी भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती है। जीवन में “कुछ न चुनना” भी वास्तव में एक चुनाव है। यदि हम स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते, रिश्तों को समय नहीं देते, भविष्य के लिए तैयारी नहीं करते या अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते, तो हम अनजाने में एक कीमत तय कर रहे होते हैं। समझदार व्यक्ति कठिनाई से बचने के बजाय यह पूछता है- “यह कठिनाई मुझे कहाँ ले जाएगी?” व्यायाम का दर्द स्वास्थ्य दे सकता है, अध्ययन का संघर्ष ज्ञान दे सकता है, बचत आर्थिक सुरक्षा दे सकती है और ईमानदारी आत्मसम्मान दे सकती है। हर असुविधा बुरी नहीं होती, कुछ असुविधाएँ हमें तोड़ती हैं, जबकि कुछ हमें गढ़ती हैं।
हर लक्ष्य की अपनी कीमत होती है। स्वस्थ शरीर चाहिए तो व्यायाम करना और भोजन में संयम चाहिए, सफलता चाहिए तो मेहनत और असफलताओं का सामना करना होगा, अच्छे रिश्ते चाहिए तो समय देना,धैर्य और समझ रखनी होगी , आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए तो बचत और फिजूलखर्ची से बचना होगा,ज्ञान चाहिए तो पढ़ना और लगातार सीखना होगा। इसलिए किसी लक्ष्य को चुनने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए- “क्या मैं इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ?” हम अक्सर किसी सफल व्यक्ति की उपलब्धि देखते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपा वर्षों का संघर्ष, असफलता, त्याग और अनुशासन नहीं देखते। सफलता केवल मंजिल नहीं, एक सौदा भी है। भारतीय दर्शन भी जीवन की कठिन वास्तविकताओं से भागने के बजाय उनका सामना करने की बात करता है। गीता में कर्म और कर्तव्य का संदेश है, बुद्ध ने दुःख को समझने और उससे मुक्ति का मार्ग खोजने की बात की, जबकि कबीर भीतर देखने और सत्य का सामना करने की प्रेरणा देते हैं। इन सबमें जीवन को जैसा है, वैसा देखने का साहस दिखाई देता है।
सच्ची स्वतंत्रता शायद यह नहीं कि “मेरा मन जो कहे, मैं वही करूँ”, बल्कि यह है कि आवश्यकता पड़ने पर हम वह भी कर सकें जो हमारा मन नहीं करना चाहता। यदि इच्छाएँ और आदतें हमें नियंत्रित करती हैं, तो हम स्वतंत्र नहीं हैं। अनुशासन हमें अपनी इच्छाओं का स्वामी बनाता है। इसलिए कभी-कभी अपने जीवन से पूछना चाहिए- “मैं अभी किस चीज की कीमत चुका रहा हूँ? मेरी कौन-सी आदत भविष्य में मुझे नुकसान पहुँचा सकती है? मैं आज किस कठिनाई से भाग रहा हूँ और उससे भागने की कीमत क्या होगी? क्या मैं जिस जिंदगी के लिए कीमत चुका रहा हूँ, वही जिंदगी मुझे चाहिए?” जीवन में दर्द, संघर्ष और कीमत से पूरी तरह बचना संभव नहीं है। हम केवल यह चुन सकते हैं कि वह कीमत हमें कमजोर बनाएगी या मजबूत। इसलिए आज अनुशासन का दर्द चुनना बेहतर है या कल पछतावे का, आज मेहनत चुनना बेहतर है या कल कमजोरी की कीमत चुकाना। जिंदगी एक सौदा है- कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। इसलिए बेहतर है कि सौदा हम स्वयं तय करें और ऐसा दर्द चुनें जो हमें हमारी बेहतर जिंदगी की ओर ले जाए।

सच्ची दोस्ती-साथ होने का सबसे सुंदर अहसास !पिछले रविवार को पूरे देश में फ्रेंडशिप डे मनाया गया। सोशल मीडिया पर बधाइयों औ...
09/08/2026

सच्ची दोस्ती-साथ होने का सबसे सुंदर अहसास !

पिछले रविवार को पूरे देश में फ्रेंडशिप डे मनाया गया। सोशल मीडिया पर बधाइयों और तस्वीरों की भरमार थी। लेकिन अगले दिन मेरे मित्र डॉ. मुकेश दुबे जी ने मुझे एक ऐसी सच्ची घटना सुनाई, जिसने मित्रता का वास्तविक अर्थ फिर से याद दिला दिया। उन्होंने बताया कि उनके कॉलेज के एक वरिष्ठ एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉक्टर साहब आज भूलने की बीमारी से जूझ रहे हैं। उनके एक घनिष्ठ मित्र, जो स्वयं भी चिकित्सक हैं, रोज़ अपने व्यस्त जीवन से लगभग एक घंटा निकालते हैं। वे उन्हें कार में बैठाकर उन पुराने रास्तों और परिचित स्थानों पर ले जाते हैं, जहाँ वे कभी साथ जाया करते थे। रास्ते भर उन्हें याद दिलाते हैं- “याद है, यहाँ हम चाय पीते थे… यहाँ बैठकर घंटों बातें करते थे… इस रास्ते से अस्पताल जाते थे…”
शायद यादें पूरी तरह लौटकर न आती हों, लेकिन दोस्त का साथ हर दिन उन्हें यह एहसास ज़रूर कराता है कि जीवन की सबसे सुंदर स्मृतियाँ अभी भी किसी के हृदय में सुरक्षित हैं। यह घटना सुनकर मन देर तक शांत नहीं हो पाया। आज जब लोग, अपनों के लिए भी समय निकालने में कठिनाई महसूस करते हैं, तब कोई व्यक्ति रोज़ अपने मित्र के लिए समय निकालता है। यह केवल मित्रता नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, करुणा और जीवनभर निभाए गए विश्वास का प्रमाण है।
दोस्ती एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन उसके भीतर जीवन का बहुत बड़ा अर्थ छिपा है। परिवार हमें जन्म से मिलता है, लेकिन मित्र हम स्वयं चुनते हैं। शायद इसलिए मित्रता का रिश्ता स्वतंत्र भी होता है और सबसे आत्मीय भी। यह किसी औपचारिकता से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और अपनत्व से बनता है।मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि अच्छे रिश्ते मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाते हैं। जिन लोगों के जीवन में सच्चे मित्र होते हैं, वे तनाव का सामना बेहतर ढंग से कर पाते हैं, मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ रहते हैं और जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण अधिक सकारात्मक होता है। कभी-कभी मित्र के साथ बिताए गए कुछ पल, घंटों की सलाह से अधिक प्रभाव छोड़ जाते हैं।
लेकिन दोस्ती केवल साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने की कला भी है। दो मित्र कभी एक जैसे नहीं होते। उनके विचार अलग हो सकते हैं, आदतें अलग हो सकती हैं और जीवन की परिस्थितियाँ भी अलग हो सकती हैं। फिर भी वे एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। यही मित्रता की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
हर व्यक्ति का अपना एक निजी संसार होता है। सच्चा मित्र वही है जो उस संसार का सम्मान करे। वह अपने विचार थोपने के बजाय सामने वाले की बात सुने, उसकी भावनाओं को समझे और आवश्यकता पड़ने पर बिना शर्त उसके साथ खड़ा हो जाए। सच्ची दोस्ती अधिकार नहीं, विश्वास माँगती है। वह किसी को बदलने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसे उसी रूप में स्वीकार करती है जैसा वह है। जहाँ अपेक्षाएँ कम और अपनापन अधिक होता है, वहाँ रिश्ते समय के साथ और गहरे होते जाते हैं।
आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है और रिश्ते भी कई बार औपचारिक होते जा रहे हैं, तब ऐसे उदाहरण हमें विश्वास दिलाते हैं कि इंसानियत अभी भी जीवित है। कुछ रिश्ते कैलेंडर में दर्ज किसी एक दिन के मोहताज नहीं होते। वे हर दिन निभाए जाते हैं- बिना शोर, बिना प्रदर्शन और बिना किसी स्वार्थ के।
जीवन में यदि एक भी ऐसा मित्र हो, जो आपके सुख में दिल से मुस्कुराए, आपके दुख में आपका हाथ थाम ले और कठिन समय में केवल इतना कह दे- “मैं हूँ न”, तो समझिए आपने जीवन की सबसे अनमोल संपत्ति पा ली है। क्योंकि सच्ची दोस्ती यादों से नहीं, निभाने से जीवित रहती है; और जो मित्र समय के सबसे कठिन मोड़ पर साथ खड़ा रहे, वही जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य होता है।

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