12/05/2026
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु!
भाइयों और बहनों,
आज हम बरेलवी अकीदे के मुस्लिम लोगों के मुहल्लों, गांवों और शहरों में एक गहरी बीमारी देख रहे हैं।
जब कोई मुसलमान परेशान होता है — बीमारी, बेरोजगारी, घरेलू कलह, संतान न होना, शादी में रुकावट, या कोई भी मुसीबत — तो सबसे पहले वह कहाँ दौड़ता है?
मौहल्ले के मौलवी साहब या पीर-फकीर के पास।
वहाँ जाकर वह तावीज़ लेता है, “अमल” करवाता है — “फलां सूरह इतनी बार पढ़ो, फलां रात को ये चढ़ाओ, फलां दिन चुपचाप ये करो, वो करो, किसी को मत बताना...”
लेकिन अफसोस की बात यह है कि बहुत कम मौलवी ऐसे मिलेंगे जो सीधे-सीधे कहें:
“भाई, पहले अपनी नमाजें ठीक करो। अल्लाह से रो-रोकर दुआ मांगो। गुनाहों से तौबा करो। कुरान समझकर पढ़ो। सिर्फ अल्लाह पर भरोसा करो।”
यह दुखद हकीकत है और इस्लाम की असली रूह से बहुत बड़ी दूरी है।
अल्लाह तआला कुरान में बार-बार फरमाते हैं कि मदद मांगने, दुआ करने और भरोसा करने का हक सिर्फ अल्लाह का है।
“और तुम्हारा रब कहता है: मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी दुआ कबूल करूंगा। जो मेरी इबादत से घमंड करते हैं, वे जल्द ही जहन्नम में धकेल दिए जाएंगे।” (सूरह गाफिर: 60)
“और जो अल्लाह को छोड़कर दूसरों को पुकारते हैं, वे न उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं और न फायदा।” (सूरह यूनुस: 18)
रसूल ﷺ ने फरमाया:
“दुआ ही इबादत है।” (सुनन अबू दाऊद, तिर्मिज़ी — सही)
नबी ﷺ ने बीमार साहबियों को दुआ पढ़कर फूंक मारी, हाथ फेरा, लेकिन कभी तावीज़ नहीं लिखा, न किसी “खास अमल” का ठेका दिया। उन्होंने हमेशा तौहीद, नमाज, तौबा और सब्र पर जोर दिया।
जब हम मुसीबत में तावीज़, अमल, गंडे-तावीज़, पीरों की “कुदरत”, या “बाबा” की दरगाह पर भरोसा करते हैं, तो यह शिर्क अकबर (बड़ा शिर्क) की तरफ खुला रास्ता बन जाता है। क्योंकि हम अल्लाह की जगह किसी और को “कारगर” मान लेते हैं। अल्लाह ने साफ चेतावनी दी है:
“और अगर तुम अल्लाह के साथ किसी को शरीक बनाओगे तो तुम्हारा सारा अमल अकारथ हो जाएगा।” (सूरह अज-जुमर: 65)
यह प्रथा न सिर्फ शिर्क है, बल्कि बिदअत (नई ईजाद) भी है। कुरान और सुन्नत में इस तरह के “तावीज़-अमल” का कोई मशरू तरीका नहीं मिलता जो आम मुसलमानों के लिए मुसीबत के वक्त बताया गया हो। यह बाद की संस्कृतियों, हिंदू-बौद्ध प्रभावों और सूफियाना अतिरेक से घुल-मिलकर इस्लाम में घुस आए हैं।
मौलवियों की जिम्मेदारी
सबसे बड़ी गलती मौलवी साहबान की है।
वे लोगों की कमजोरी, डर और अंधविश्वास का फायदा उठाकर रोजगार चला रहे हैं।
असली इल्म (कुरान-हदीस) सिखाने की बजाय तावीज़ का कारोबार चलाते हैं।
अगर कोई सच्चा आलिम कहे कि “सिर्फ अल्लाह से मांगो”, तो लोग कम आते हैं — इसलिए वे चुप रहते हैं या खुद ही यह सब जारी रखते हैं।
यह उम्मत के साथ धोखा है। रसूल ﷺ ने फरमाया:
“जो व्यक्ति किसी मुसलमान को गुमराह करने वाला रास्ता दिखाए, उसके लिए लानत है।”
सही इस्लामी तरीका क्या है?
पांच वक्त नमाज की पाबंदी।
गुनाहों से तौबा और इस्तिग़फार।
कुरान की तिलावत समझकर करना (खासकर सूरह बक़रा, यासीन, अल-फलक, अन-नास)।
अल्लाह से दुआ — रात के आखिरी तिहाई हिस्से में, सजदे में, नमाज के बाद।
सब्र और यकीन-ए-कामिल रखना कि मुसीबत अल्लाह की तरफ से है और वही best इलाज भी भेजेगा।
हलाल कमाई, हलाल खाना और सुन्नत पर अमल।
जब मुसलमान इन पर लौट आएगा, तभी अल्लाह उसकी मदद फरमाएगा। तावीज़ से नहीं।
ऐ मेरे बरेलवी भाइयो! आप अहले सुन्नत वल जमात के दावेदार हैं। तो फिर कुरान और सुन्नत की असली अहले सुन्नत वाली राह पर आ जाइए। तावीज़, अमल, मजार पूजा, उर्स, चादर चढ़ाना — ये सब बाद में आए चीजें हैं। असली इस्लाम तो तौहीद, रिसालत और आखिरत पर है।
मौलवियों से भी अपील
अल्लाह का डर रखो। लोगों को अल्लाह की तरफ मोड़ो, अपनी तरफ नहीं। वरना आखिरत में जवाबदेही बहुत सख्त होगी।
“अल्लाह हम सबको शिर्क और बिदअत से बचाए, कुरान और सुन्नत की सच्ची समझ अता फरमाए और हमें सच्चे मुसलमान बनाए।”
आमीन या रब्बल आलमीन।
जो दिल से मानते हैं, इस पोस्ट को शेयर करें। इल्म फैलाना सदका-ए-जारिया है।