10/06/2026
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातuhu।
देखो, देवबंदी और बरेलवी – सूफी बाप के दो बेटे, एक ही घर के दो भाई। एक कहता है कब्र से मत मांगो, दूसरा कहता है हम कब्र से ही मांगेंगे। दोनों पीर-मुर्शिद के चक्कर में घूमते हैं। एक जिंदा पीर को मानता है, दूसरा मरने के बाद भी उसी की दरगाह पर सजदे और मन्नतें।
दोनों एक दूसरे को काफिर कहते है, जबकि रसूल ﷺ ने साफ फरमाया कि किसी मुसलमान को काफिर कहना उसकी कुफ्र की तरफ वापसी है।
इतिहास गवाह है – इनके बीच खूनी झगड़े भी हुए। बरेलवी देवबंदी को गस्ताख-ए-रसूल कहता है, देवबंदी बरेलवी को मुशरिक। दोनों के पास अपने-अपने किस्से-कहानियां, करामातें, और गालियां। एक की नानी की करामत, दूसरे के बाबा की उंगली वाली कहानी।
वो नजासत वाली कहानी? हां, ये दोनों फिर्कों के बीच की गंदी जंग का हिस्सा है। बरेलवी देवबंदी उलमा की किताबों से वो फतवा निकालकर ताना मारते हैं कि "नजासत लगी उंगली चाट लो तो पाक हो जाएगी"। देवबंदी भी आला हजरत के मुरीद से नजासत चाटवा लिया दोनों एक दूसरे के रिवायतों पर हमला करते हैं।
सच या झूठ अल्लाह जाने, लेकिन ये तथ्य है कि दोनों तरफ से ऐसी घटिया बहसें चलती हैं जो इस्लाम की इज्जत गिराती हैं। ये सब बिदअत, तशद्दुद और फिर्कापरस्ती का नतीजा है।
सच्चा इस्लामी नजरिया:
कुरान और सुन्नत की रोशनी में दोनों फिर्के अहल-ए-बिदअत की श्रेणी में आते हैं।
बरेलवी फिर्का: कब्र पूजा, मुशरिकाना तवस्सुल, नबी ﷺ को इल्म-ए-गैब का मालिक बताना, मिलाद, उर्स, सूफी करामातों का चक्कर – ये सब शिर्क और बिदअत हैं।
रसूल ﷺ ने फरमाया: "हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही आग की तरफ ले जाती है।" (मुस्लिम)।
कब्र पर मांगना, मन्नत मानना, मजार पर सजदा – ये सब उन सहीह अहादिस के खिलाफ है जिनमें नबी ﷺ ने कब्र पूजा से सख्त मना किया।
देवबंदी फिर्का: ये थोड़े "सुधारवादी" नजर आते हैं, लेकिन खुद सूफी तसव्वुफ, खानकाह, पीर-मुर्शिद, और तक्लीद-ए-शख्सी के चंगुल में फंसे हैं। उनकी कुछ रिवायतें और बयानात जो तौहीद के खिलाफ माने जाते हैं, उन पर भी सलफ सालेहीन की नजर में सवाल हैं। वे भी बिदअत से पूरी तरह पाक नहीं।
दोनों सलफुस सालेह (सहाबा, ताबईन, ताबे-ताबईन) की राह छोड़कर अपनी-अपनी "मसलक" बना बैठे। दोनों ने ताकतवर सूफी सिलसिलों (चिश्ती, नक्शबंदी आदि) को अपनाया, जबकि पैगंबर ﷺ और सहाबा किराम की ज़िंदगी में ऐसी बिदअतें नहीं थीं।
इन दोनो से सवाल हैं
भाई, अल्लाह की बारगाह में जाकर देखो – क्या नबी ﷺ ने कभी कब्र पर मुराद मांगी? क्या सहाबा ने मजार बनाकर उर्स मनाए? क्या उन्होंने पीर की उंगली चाटने या नजासत वाली बहसें कीं? नहीं! उन्होंने तो सिर्फ अल्लाह को पुकारा, तौहीद पर चले, और बिदअत से बचें।
इन फिर्कों की आलोचना करो, वापस कुरान और सहीह हदीस की तरफ आओ।
इस्लामिक अकीदा यही है किताबुल्लाह, सुन्नते रसूल, इजमा-ए-उम्मत और कियास पर अमल, बिना किसी पीर, मजार या सूफी बाप के चक्कर के।
"मुसलमान वो नहीं जो देवबंदी या बरेलवी कहलाए, बल्कि वो जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का सच्चा अनुयायी हो।"
अल्लाह हम सबको सिरात-ए-मुस्तकीम पर रखे, फिर्कापरस्ती से बचाए। आमीन।
तौहीद पर लौटो, बिदअत छोड़ो!
(शेयर करो अगर हक की बात लगे।)