गोगा मेडी धाम हसनपुर

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🙏जय गुरु गोरक्षनाथ जी की🙏
🙏जय गोगा जाहरवीर जी की🙏
आपका हमारे पेज गोगा मेडी धाम हसनपुर पर हार्दिक स्वागत है। हमारा पेज उन लोगों के लिए है जो गोगा जी महाराज , पीर महाराज, गुरु गोरक्षनाथ महाराज और सभी 33 कोटि देवी देवताओं पर विश्वास करते है या मानते है।

एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर ...
01/08/2026

एक बुढ़िया के के सात बेटे थे। छः बेटे कमाते थे और सातवां बेटा नहीं कमाता था। बूढ़ी माँ कमाने वाले बेटों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाती और बची हुई झूठन सातवें बेटे को दे दिया करती थी। बेटे को यह पता नहीं था। उसकी पत्नी ने उसे यह बात बताई।
उसे विश्वास नहीं हुआ। छुपकर देखा तो उसे पता चला की यह सच था। उसे बड़ा दुःख हुआ। माँ के खाना खाने बुलाने पर वह बोला – मैं यह खाना नहीं खाऊंगा। परदेस जाकर कमाई करूँगा। माँ बोली – कल जाता हो तो आज ही चला जा। यह सुनकर वह तुरंत घर से निकल गया।
रास्ते में पत्नी से मिला। वह गोबर से कंडे बना रही थी। बोला – मैं परदेस जा रहा हूँ कुछ समय बाद लौटूंगा। तुम अपना धर्म का पालन करते हुए ध्यान से रहना। वह बोली आप मेरी चिंता ना करें। मुझे भूलना मत और मुझे अपनी कुछ निशानी दे दो। उसे देखकर मैं समय बिता लूँगी। उसने उसे अपनी अंगूठी दे दी और चल पड़ा।
एक बड़े शहर में बड़ी दुकान देखकर उसने काम माँगा। वहां जरुरत थी इसलिए सेठ ने उसे काम पर रख लिया। उसने दिन रात मेहनत की। सेठ उसे तरक्की देता गया। कुछ ही समय में अपनी मेहनत और लगन से उसने सेठ का विश्वास इतना जीत लिया की सेठ ने उसे अपना पार्टनर बना लिया। कुछ समय बाद सारा काम उसे सौंप कर सेठ यात्रा पर निकल गया। अब वह खुद बड़ा सेठ बन चुका था।
उधर उसकी पत्नी पर बड़े जुल्म हो रहे थे। घर के सभी लोग उससे दिन भर काम करवाते। जंगल में लकड़ी लाने भेजते। भूसे की रोटी खाने को देते। नारियल के कटोरे में पानी पिलाते। एक दिन जंगल जाते समय उसने रास्ते में कुछ औरतों को संतोषी माता का व्रत करते देखा।
कथा कहते हुए सुना। उसने पूछा की यह व्रत कैसे करते है , और इसे करने से क्या होता है। उनमे से एक औरत ने बताया कि यह संतोषी माता का व्रत है। इसे करने से दरिद्रता मिटती है , मन की चिंता दूर होती है , कुंवारों को मनपसंद जीवन साथी मिलता है , रोग दूर होते है , हर प्रकार का सुख प्राप्त होता है। इसे करने के लिए अपनी सुविधा और शक्ति के अनुसार गुड़ चना खरीद लेना। हर शुक्रवार व्रत करना और कथा कहना या सुनना।
जब तक कार्य सिद्ध नहीं हो जाता बिना क्रम तोड़े व्रत करना। कथा सुनने वाला कोई ना मिले तो दीपक को सामने रखकर कथा कहना। कार्य सिद्ध होने पर उद्यापन करना। उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा , उतनी ही खीर और उतना ही चने का साग बनाना। आठ लड़कों को भोजन कराना। लड़के परिवार के ही हो तो अच्छा नहीं तो पड़ोस से भी बुला सकते हैं। भोजन कराकर व केला आदि फल देकर विदा करना। खट्टे फल नहीं देना। उस दिन घर में कोई खटाई ना खाये।
सारी विधि जानकर उसने गुड़ चने खरीद लिए। रास्ते में संतोषी माता के मंदिर में भोग लगाकर याचना करने लगी – माँ मुझे व्रत के नियम कायदे नहीं पता। मैं शुक्रवार का व्रत निष्ठां से करुँगी , मेरा दुःख दूर करना। एक शुक्रवार बीता ,दूसरे शुक्रवार को पति का पत्र आया ,तीसरे शुक्रवार पति के भेजे रूपये आ गए। परन्तु सब घर वाले ताना मारने से नहीं चूकते। दुखी होकर माता के मंदिर में प्रार्थना करने लगी – माँ मुझे पैसा नहीं चाहिए। मुझे अपने स्वामी के दर्शन करने हैं। माता ने उसे आशीर्वाद देकर कहा – तेरा पति जल्दी ही आएगा। वह बहुत खुश हुई।
परदेस में उसके पति के पास बिल्कुल समय नहीं था। दिनभर व्यस्त रहता था। माँ संतोषी ने उसके सपने में आकर उसे बताया कि उसकी पत्नी बहुत दुखी है। उसे उसके पास जाना चाहिए। उसे पत्नी की बहुत चिंता होने लगी। दुकान बेचकर पत्नी के लिए कपड़े , गहने और ढ़ेर सारा पैसा लेकर रवाना हो गया।
बहु जंगल से लकड़ी काटकर लौट रही थी तब उसने धूल का गुबार उठते देखा। माता ने उसे बताया की उसका पति आ रहा है। वह घर माँ के पास जा रहा है। इसलिए वह भी घर जाये और चौक में लकड़ी का गट्ठर डाल कर आवाज लगाये – लो सासुजी लकड़ी का गट्ठर , भूसी की रोटी दो , नारियल के खोखे में पानी दो ,आज कौन मेहमान आया है। उसने ऐसा ही किया।
आवाज सुनकर उसका पति बाहर आया और अंगूठी देखकर व्याकुलता के साथ माँ से पूछा की ये कौन है ? माँ बोली ये तेरी बहु है। दिन भर घूमती रहती है। भूख लगे तो यहाँ आकर खाना खा लेती है। काम कुछ करती नहीं है। तुझे दिखाने के लिए नाटक कर रही है। उसे विश्वास नहीं हुआ और माँ से चाबी लेकर ऊपर वाली मंजिल के कमरे में अपनी पत्नी के साथ चला गया। कमरे को महंगे सामान से सजा कर महल जैसा बना दिया। दोनों सुख से रहने लगे।
बहु में अपने पति से कहा – मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने स्वीकृति दे दी। ख़ुशी से माता के उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठानी के बच्चों को खाने का न्योता दिया। उसका उद्यापन बिगड़ने के लिए जेठानी ने बच्चों से कहा की तुम खटाई मांगना। बच्चों ने वैसा ही किया पर उसने खटाई देने से मना कर दिया तो बच्चों ने पैसे मांगे जो उसने दे दिए। बच्चों ने खटाई खरीद कर खा ली। माता क्रुद्ध हो गई। सिपाही आये और उसके पति को अपने साथ ले गए। जेठानी बोली चोरी करके पैसे इकट्ठे किये है। इसलिए सिपाही पकड़कर ले गए।
बहु रोती बिलखती माता के मंदिर गई। माँ ने कहा तुमसे भूल हुई यह उसी का परिणाम है। बहु क्षमा मांग कर बोली में फिर से उद्यापन करुँगी और अब ऐसी भूल नहीं होगी। मेरे पति को वापस बुलाओ। माता ने कहा वह रास्ते में आता हुआ मिल जायेगा। उसका पति रास्ते में मिला और कहने लगा इतना धन कमाया है उसका टेक्स भरने गया था। सिपाही इसी कारण आये थे। बहु ने चैन की साँस ली।
शुक्रवार आने पर फिर से उद्यापन की तैयारी कर ली। इस बार जेठानी के बच्चों को नहीं बुलाया। पंडित के बच्चों को बुलाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया और केले देकर विदा किया। माता बहुत प्रसन्न हुई। कुछ समय बाद उसे बहुत सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर रोजाना माता के मंदिर जाती थी। एक दिन माता ने सोचा आज मैं इसके घर जाकर देखती हूँ।
माता ने भयानक रूप अपनाया। गुड़ और चने से सना मुख , सूंड जैसे होंठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी। दहलीज पर पांव रखते ही उसकी सास चिल्लाने लगी। अरे देखो कोई चुड़ैल आ गई है। इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। घर के सब लोग डर गए और चिल्लाने लगे। घर के खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। छोटी बहु देखते ही पहचान गई। प्रसन्न होकर बोली – आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं। सास से बोली माँ जी डरो मत ये वही संतोषी माता जी हैं जिनकी मैं पूजा करती हूँ और जिनका व्रत रखती हूँ। यह कह कर उसने घर के सब खिड़की दरवाजे खोल दिए ।
सभी लोग माँ के चरणों में गिर गए । कहते हैं – माँ , हम अज्ञानी हैं। आपका व्रत भंग करके हमने जो अपराध किया है उसके लिए हमें क्षमा करो। माँ ने सभी को क्षमा करके कुशल मंगल का आशीर्वाद दिया और प्रेम पूर्वक रहने की सीख दी। सब आनंद से रहने लगे।
बहु को जैसा फल दिया संतोषी माँ सबको वैसा ही दे। जो यह कहानी पढ़े ,उसका मनोरथ पूर्ण हो।

बोलो संतोषी माता की जय !!!

एक गाँव में शिवराम नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह कट्टर नास्तिक था। भगवान का नाम सुनते ही उसका रक्त खौल उठता था। आस्तिकों...
01/08/2026

एक गाँव में शिवराम नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह कट्टर नास्तिक था। भगवान का नाम सुनते ही उसका रक्त खौल उठता था। आस्तिकों से बातचीत करना भी वह अपने लिए अपमान समझता था।
एक बार उसी गाँव में एक संत-महात्मा पधारे। उन्होंने कई दिनों तक प्रवचन दिए। पूरा गाँव श्रद्धा से उनका प्रवचन सुनने उमड़ पड़ा, किंतु शिवराम ने उधर झाँककर देखना भी उचित न समझा।
एक संध्या वह खेत से लौट रहा था, तभी हवा में तैरती महात्मा जी की वाणी उसके कानों से टकराई—
“यदि जीवन में सफल होना चाहते हो, तो मन में कोई दृढ़ संकल्प करो और पूरी निष्ठा से उसे पूर्ण करने में लग जाओ। एक न एक दिन उसका फल अवश्य मिलेगा।”
वह इस वाक्य को अनसुना करना चाहता था, परंतु रात भर वही शब्द उसके मन में गूँजते रहे। लाख चाहने पर भी वह उन्हें भूल न सका।
अंततः उसने निश्चय किया—“मैं इस कथन को झूठा सिद्ध करके रहूँगा!”
पर वह कौन-सा संकल्प करे जिसका कोई फल ही न मिले?
काफी सोच-विचार के बाद उसकी दृष्टि अपने घर के सामने रहने वाले कुम्हार पर पड़ी। उसने निश्चय किया—
“मैं प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करूँगा।”
अपने इस विचार पर वह मन ही मन हँस पड़ा। उसे विश्वास था कि इस संकल्प से कोई लाभ नहीं मिलने वाला।
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अगले दिन से वह अँधेरे में ही उठकर चबूतरे पर बैठ जाता। जैसे ही कुम्हार बाहर आता, वह उसका मुँह देख लेता और फिर अपने काम में लग जाता। कई बार कुम्हार बाहर चला जाता, तब उसे एक-दो दिन उपवास भी करना पड़ता, किंतु वह अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
छह महीने बीत गए। कोई लाभ नहीं दिखा, फिर भी वह अडिग रहा—क्योंकि उसका उद्देश्य लाभ पाना नहीं, बल्कि महात्मा जी के वचनों को झूठा सिद्ध करना था।
एक दिन उसकी नींद देर से खुली। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने खदान जा चुका था। वह उसे देखने खदान की ओर चल पड़ा। दूर से उसने कुम्हार को मिट्टी खोदते देखा और चुपचाप लौटने लगा।
उधर खुदाई करते समय कुम्हार के सामने अचानक सोने की चार ईंटें निकल आईं। वह घबरा गया और इधर-उधर देखने लगा। तभी उसकी नजर कुछ दूर जाते शिवराम पर पड़ी।
कुम्हार ने उसे पुकारा—
“अरे भाई शिवराम! किधर से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो?”
शिवराम बोला—
“बस, जो देखना था देख लिया, अब घर जा रहा हूँ।”
कुम्हार समझ गया कि उसने सोना देख लिया है। डर के मारे वह काँप उठा। यदि राजा तक बात पहुँच गई तो सारा धन हाथ से निकल जाएगा। उसने तुरंत निर्णय लिया और बोला—
“भाई, आधा सोना तुम ले जाओ, पर राजा से कुछ मत कहना।”
शिवराम को लगा वह मजाक कर रहा है और वह आगे बढ़ गया। अब तो कुम्हार और घबरा गया। दौड़कर उसे पकड़ा और हाथ जोड़कर बोला—
“भाई, आधा ले जाने में तुम्हारा क्या जाता है?”
वह हैरान हुआ। कुम्हार उसे खदान में ले गया। सोने की ईंटें देखकर उसे सारा रहस्य समझ में आ गया। उसने चुपचाप दो ईंटें उठा लीं।
उन ईंटों को हाथ में लेते समय महात्मा जी के वचन उसके हृदय में गूँज उठे—
“दृढ़ संकल्प का फल अवश्य मिलता है।”
उस दिन शिवराम का जीवन बदल गया। उसने वह सोना गाँव के कल्याण में लगा दिया और शेष जीवन तप, सेवा और भगवद्भक्ति में समर्पित कर दिया।
अब वही शिवराम, जिसे लोग कभी नास्तिक कहते थे, गाँव का सबसे बड़ा भक्त और सेवक कहलाने लगा।

गोगाजी दरबार का महात्व, जय बाबा जाहरवीर महाराज
18/07/2026

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जय श्री गोगाजी महाराज 🙏🙏🙏 बाबा जी का सुंदर दरबार
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काशी के कोतवाल बाबा काल भैरवनाथ संपूर्ण जग का मंगल करने वाले नाथों के नाथ अद्भुत दर्शन🙏🙏🙏🙏🙏
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जय जगन्नाथ महाराज की🙏🙏🙏💐💐💐🙏🙏🙏
11/07/2026

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जय बाबा जाहरवीर गोगाजी महाराज 🙏🙏🙏 हसनपुर गद्दी पलवल मंदिर
11/07/2026

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जय श्री शनिदेव जी महाराज 🙏🙏🙏🙏
11/07/2026

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आज का पंचांग, जय श्री लक्ष्मी नारायण जी 🙏🙏 🙏🙏
11/07/2026

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बागड़ यात्रा की मंगलमय तस्वीर दो भाइयों की🙏🙏🙏💐💐💐💐🙏🙏🙏🙏
10/07/2026

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