Gauri kund Mandir,Bilwakeshwar Mahadev

Gauri kund Mandir,Bilwakeshwar Mahadev Bhagawati ki Tapasthali

10/05/2021

किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था। तालाब के पास एक बागीचा था, जिसमे अनेक प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे। दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते।

गुलाब के पेड़ पे लगा *पत्ता* हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है *एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे।* पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा। उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे—” सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर *मुझे कोई देखता तक नहीं, शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं*, कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं,” और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा।

दिन यूँही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया। बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे, देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए, *पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा।*

*पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी।*

*चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी* कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, ” घबराओ नहीं, आओ, मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ ।”, और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया। आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली,” आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है, सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !“

यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला,” *धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ,* जिससे मैं आज तक अनजान था। आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ।

ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नही है। खुद की काबिलियत को पहचान कर आप वह काम कर सकते हैं, जो आज तक किसी ने नही किया है!

*क्या पता आप टूटे भी हो तो किसी को बचाने के लिए...?*

कई बार ऐसा भी होता है.. सुगंध, सौंदर्य और आकर्षण बढ़ाने वाले पुष्प भी जीवन नहीं बचा पाता... *साथी - संगी, इष्ट - मित्र, रिस्तेदार कोई काम नहीं आया... तब एक टूटा पत्ता काम आया*

दृष्टान्त चींटी की ही हो सीख यहि है कि... योग्यता किसी की कुछ भी हो सकती है.. कब कौन कहाँ काम आए कोई नहीं जानता... इसीलिए हरेक की कदर करना सिखों...

10/05/2021

एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था। वह कुछ काम-धाम नहीं करता था। बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये।

एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे। रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया। लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा। बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।

भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा। वह बुरी तरह से थक गया था।

इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा. तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी। उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी। लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ? जिज्ञासा में वह एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?

कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा। जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे। लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी। वह वहीं खड़ी रही। शेर लोमड़ी के पास आने लगा। आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा। लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था।

शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया। उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया। लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी। थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया।

यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि *भगवान सच में सर्वेसर्वा है।* उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का प्रबंध कर रखा है। वह अपने घर लौट आया।

घर आकर वह 2-3 दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था। वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा।

घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है। लेकिन इंसानों के लिए नहीं ?

बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है। भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी। लेकिन बात यह है कि *भगवान तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं।*


हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है। बस अपनी कभी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं। स्वयं की क्षमता पहचानिए। *दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए, इतने सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें।*

🙏 🙏 🙏

10/05/2021

एक व्यापारी एक बार राजा के पास अपने घोड़े को बेचने के लिए गया।

राजा ने पूछा— *इसकी क्या कीमत है?*

व्यापारी ने जवाब दिया— *सिर्फ पाँच हजार रुपए, श्रीमान!*

राजा ने कहा— *मित्र, इसकी कीमत पाँच सौ रुपए से अधिक नहीं है।* परंतु व्यापारी ने पाँच हजार रुपए से कम में घोड़ा बेचने के लिए स्वीकृति न दी।

*राजा को घोड़ा अच्छा लगा। और इसीलिए उसने पाँच हजार रुपए देकर घोड़ा खरीद भी लिया और साथ ही यह भी कहा कि दोस्त, तुम मुझे ठग रहे हो।*

व्यापारी कुछ नहीं बोला और *चुपचाप रुपए अपनी जेब में रख लिए* और इसके बाद वह पलटकर गजब की तेजी से *उसी घोड़े पर चढ़ा और तीर की तरह राजमहल से बाहर निकल गया।* राजा ने अपने बीस घुड़सवारों को व्यापारी को पकड़ने के लिए भेजा। दिन—भर पीछा करने के बाद भी वह व्यापारी पकड़ा न जा सका।

दूसरे दिन वही व्यापारी राजा के दरबार में हाजिर हुआ। उसने पाँच हजार रुपए राजा के सामने रख दिए और कहा कि आपको रुपए रखने हों रुपए रख लें, घोड़ा रखना हो घोड़ा रख लें।
*सबूत दे दिया उसने घोड़े की ताकत का।* और क्या सबूत चाहिए, तुम्हारे बीस घुड़सवार दिन—भर पीछा करके भी धूल ही खाते रहे, घोड़े के पास भी न पहुँच सके। और क्या सबूत चाहिए?

राजा ने सिर झुका लिया। *पाँच हजार रुपए घोड़े के दाम दिए और पाँच हजार पुरस्कार भी।* पुरस्कार उसके साबित करने के तरीके के लिए..

*यदि व्यापारी ने प्रमाण ना दिया होता तो राजा को सदैव ये लगता कि व्यापारी ने उसे ठगा है.. और उसके प्रति हीन भावना से ही देखता।*

कई बार कीमत अप्रत्याशित लगता हो तो प्रमाण जरूर देना चाहिए.. हो सकता है प्रमाण देने का तरीका असहज हो.. पर बुद्धिमान लोग सामने हो तो अवश्य ही समझ जाएंगे... और आप को कीमत के साथ इनाम भी देंगे.. उस राजा की तरह.. और अगर *वही राजा मुर्ख होता तो उस व्यापारी को सजा भी दे सकता था कि कल हमारा घोड़ा लेकर भागा था बोल कर* सजा मिले या इनाम आप को ये तो अवश्य समझ आ ही जाएगा कि आप के सामने का राजा समझदार है या मूर्ख....

10/05/2021

*मगीध नाम का एक फकीर जंगल में भटक गया*--कहानी है। कहानी बड़ी मीठी है। शैतान ने उसे भटका दिया। क्योंकि *मगीध से शैतान बड़ा परेशान था।* यह उसकी सुनता ही नहीं था। और हजार उपाय करता था, सब असफल हो जाते थे। तो मगीध और उसके एक शिष्य जो जंगल से गुजर रहे थे, उनको शैतान ने रास्ता भटका दिया। जंगल में भटक रहे हैं, रास्ता मिलता नहीं है। और बड़ा हैरान हुआ मगीध,कि उसकी स्मृति खोती जा रही है। वह जो भी जानता था, वह भूलता जा रहा है।
उसने अपने शिष्य को कहा कि *'यह तो बड़ी मुश्किल मालूम होती है। यह शैतान का हाथ मालूम होता है। मैं जो भी जानता था, वह भूल रहा है। सब शास्त्र खो गए, सब प्रक्रियाएं खो गईं, मेरी शक्ति छिनती जा रही है। तू कुछ कर! तूने मुझे इतना सुना है, कुछ तो तुझे याद होगा! उसमें से कुछ बोल। कोई प्रार्थना, जो मैं रोज करता था।'*

उस शिष्य ने कहा, *'अगर मेरे पास कान होते, तो मैं तुम्हारी प्रार्थना भी सुनता। मैंने सुनी हैं प्रार्थनाएं, लेकिन वह मैंने मेरी तरह से सुनी हैं।* वह ठीक नहीं हो सकतीं। और जब तुम्हारी ठीक प्रार्थनाएं भटक गईं, *(मै बोलूंगा तो आप की कि गयी प्रार्थना की copy ही होगा.. और फिर उसे आप कहोगे तो copy की भी copy)* तो मेरी गैर-ठीक प्रार्थनाएं क्या काम आएंगी? मैं भी भूलता जा रहा हूं, मैं भी घबड़ा गया हूं।'
मगीध ने कहा, *'तुझे कुछ तो याद होगा मेरे सुने हुए में से'।*

उसने कहा, *'तुम जोर ही देते हो तो सिर्फ अल्फाबेट--ए, बी, सी,डी:, वही मुझे याद है।* बस वही मुझे याद है। और तो सब मुझे भूल गया है।'तो मगीध ने कहा, 'कोई हर्जा नहीं। देर मत कर! इसके पहले कि वह भी भूल जाए, तू जोर से पाठ शुरू कर। वर्णमाला का पाठ शुरू कर।'

*शिष्य ने आज्ञा मानी। उसने ए, बी,सी, डी का पाठ जोर से शुरू किया। मगीध उसके पीछे पाठ को दोहराने लगा। मगीध दोहराने में ऐसा तल्लीन हो गया,समाधिस्थ हो गया।*

शैतान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। क्योंकि ऐसे *तन्मय चित्त के पास शैतान नहीं टिक सकता।*

परमात्मा के फूलों की वर्षा होने लगी। सब ज्ञान वापिस लौट आया। मगीध के शिष्य ने पूछा, 'यह तो चमत्कार कर दिया! सिर्फ वर्णमाला के पाठ से!'

मगीध ने कहा, 'सभी शास्त्रों में जो है, वह वर्णमाला से ज्यादा नहीं। वर्णमाला में सभी कुछ आ जाता है, कुछ बचता नहीं। और फिर *मैंने जब पूरी वर्णमाला दोहरा दी, तो मैंने परमात्मा से कहा कि अब तू ठीक से जमा ले। प्रार्थना तो मेरी तुझे पता ही है। यह वर्णमाला यह रही, तू जमा ले। और उसने जमा दिया। और प्रार्थना पूरी हो गई।'*

*अगर भाव हो तो वर्णमाला वेद हो जाती है। अगर भाव न हो तो वेद भी वर्णमाला से ज्यादा नहीं है।* अगर निर्विचार चित्त हो तो मंत्रों की जरूरत नहीं। निर्विचार चित्त में अ,आ, इ, ई का पाठ भी कर लिया जाए, तो मंत्र हो जाते हैं। और *विचार से भरे चित्त में तुम कितने ही मंत्र दोहराओगे, सब व्यर्थ हो जाते हैं।*

जैसे रंगों का समायोजन ही तो तस्वीर बनती है.. कलाकार की भाव सही रहा तो देव तस्वीर बन सकता है...... नहीं तो कोई प्राकृतिक दृश्य या फिर नग्न तस्विर भी..
वही नियम मूर्तियों भी..
और वही मंत्रों मे...

*शब्द समायोजन सही रहा.. भाव में डूबा हुआ रहा तो.. मंत्र... प्रार्थना.....* नहीं तो उन्हीं शब्दों से गाली भी बनती है..

*हर स्थिति में भाव ही प्रधान है.... और फिर वही भाव स्थिति बदल भी देता है...*

तुम कितना ही ओंकार का पाठ करो, ओम-ओम
दोहराओ, यह सब ऊपर-ऊपर है, भीतर तुम्हारी वासनाएं दौड़ रही हैं। और तुम्हारी वासनाएं, कामनाएँ, कल्पनाएं तुम्हारे ओम को विकृत कर रही हैं। उनका धुआं घना है। वहां ओम की ज्योति जल नहीं सकती।

11/08/2020
18/01/2020

एक आदमी को एक सम्राट ने कारागृह में बंद कर दिया। लेकिन उस आदमी ने सम्राट की बड़ी सेवाएं की थीं और सम्राट दुखी था कि उसे बंद करना पड़ा, क्योंकि उसने कुछ दगाबाजी की थी। मगर हजारों उसने सम्राट के उपकार भी किए थे, तो उसे एक विशेष तरह की सजा दी गई।

सम्राट का एक महल था, जिसमें एक हजार दरवाजे थे। उस आदमी की आंख पर पट्टी बांध दी गई और उससे कहा गया कि तू महल में घूम, *नौ सौ निन्यानबे दरवाजे बंद कर दिए हैं और एक दरवाजा खुला है, अगर तू वह दरवाजा खोज लेगा और बाहर निकल आएगा, तो तू मुक्त है।*

वह आदमी आंख पर पट्टी बांधे टटोलता-टटोलता महल में भटकता है। नौ सौ निन्यानबे दरवाजे बंद हैं। सोच सकते हो तुम उसकी हालत, थक जाता है, परेशान हो जाता है। मालूम है कि एक दरवाजा खुला है, और मालूम है कि हर घड़ी वह दरवाजा करीब आ रहा है, क्योंकि जितने दरवाजे बंद छूट गए पीछे उतने कम हो गए।

जब वह दरवाजा उसके करीब आया तो उसके सिर पर एक मक्खी आ बैठी, *वह उस मक्खी को उड़ाने में दरवाजा पार कर गया.. आगे निकल बिना टटोले।*

फिर नौ सौ निन्यानबे दरवाजे! फिर लंबी यात्रा! बस आया-आया और चूक गया।

ऐसी ही हालत मनुष्य की है। मनुष्य-जीवन एक खुला दरवाजा है। और *कितने बंद दरवाजों को टटोल-टटोल कर तुम मनुष्य हो पाए!* कहीं छोटी-मोटी बातों में मत चूक जाना।

सिर पर मक्खी बैठ गई और चूक गए! और ऐसी ही बातों में लोग चूक कर रहे हैं। कोई *धन* में अटक गया है; वह कोई सिर पर बैठी मक्खी से ज्यादा नहीं है मामला। कम भला हो ज्यादा तो नहीं है। कोई *पद* में चूका जा रहा है। कोई *गरुर* में अकड़ा हुआ है। छोटी-छोटी बातें, दो कौड़ी की बातें, जिनका कोई मूल्य नहीं।

समझो कि यह आदमी आ गया फिर नौ सौ निन्यानबे चक्कर लगा कर और कोई आदमी गाली दे दे उसको जब दरवाजा खुला उसके करीब आता हो; बस, क्रोध में भन्ना गया; उसी भन्नाने में निकल गया। फिर नौ सौ निन्यानबे दरवाजे, फिर लंबी यात्रा है।

और कई तरह की अड़चनें आ सकती हैं। और लोग ऐसे मूढ़ हैं कि उनके लिए चूकना आसान, चूकने का अभ्यास पुराना है। इसलिए चूकना उनका स्वभाव हो गया है।

फिर सुबह आ गई। मनुष्य का जन्म भोर का क्षण है। अभी चाहो और जाग जाओ, तो सूरज से मिलन हो जाए। कहीं दिन को भी सोने में मत गंवा देना। *रात सोने में गई, क्षमा किया जा सकता है। लेकिन दिन भी सोने में चला जाए तो अक्षम्य है।*

17/04/2019

लाओत्से एक बार एक वृक्ष के निचे बैठा था!
अचानक हवाएं चलने लगी.. उसकी नजर एक सूखे पत्ते पर पड़ी
हवाओ के झोखे से वह पत्ता कभी एकदम ऊपर उड़ जाता, फिर अचानक जमीन पर आ पड़ता था!

कभी वह दाये ओर कभी वह बाये ओर
कभी ऊपर कभी निचे !
उसने देखा वह पत्ता बिल्कुल राजी था उसे ऊपर उड़ने मे कोई अहंकार नहीं था और नहीं निचे गिरने की शिकायत नहीं थी.....

दाये बाये पूरब पक्षिम किसी भी दिशा मे जाने पर कोई विरोध नहीं....
बस वह चुपचाप वह पत्ता हवाओं के साथ मस्त था..

लाओत्से वहा से उठ गये एक अद्भुत आनंद के साथ एक नए अनुभव के साथ........ !!
ये क्षण उसके जीवन मे एक नई क्रंति उत्पन्न कर गया !

*जहाँ शिकवा शिकायत है वहाँ प्रथना नहीं और जहाँ प्रथना है वहा कोई शिकवा नहीं...... !*

बस एक अहोभव.

एक अद्भुत शांति... पूर्ण धन्यवाद आभार से आभार से भरी हुयी !....

03/07/2018

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