प्रभु नाम की महिमा

प्रभु नाम की महिमा कलयुग केवल नाम अधारा सुमिर सुमिर सब उतरही पारा

︵︷︵︷︵︷︵︷︵︷︵       •❁  सर्वोच्च की लालसा   ❁•      ︶︸︶︸︶︸︶︸︶︸︶     एक युवक ने एक संत से कहा ~         महाराज ! मैं जीवन म...
04/02/2025

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•❁ सर्वोच्च की लालसा ❁•
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एक युवक ने एक संत से कहा ~
महाराज ! मैं जीवन में
सर्वोच्च शिखर पाना चाहता हूँ, लेकिन ...
इसके लिए मैं निम्न स्तर से
शुरुआत नहीं करना चाहता.

क्या आप मुझे कोई ऐसा रास्ता
बता सकते हैं , जो मुझे सीधा
सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दे.

संत बोले ~ अवश्य बताऊँगा.
पहले तुम आश्रम के बगीचे से
सबसे सुंदर गुलाब का फूल लाकर
🌹 मुझे दो, लेकिन ... एक शर्त है.
जिस गुलाब को तुम पीछे छोड़ जाओगे,
👉 उसे पलटकर नहीं तोड़ोगे.

युवक यह आसान सी शर्त मानकर
🌷 बगीचे में चला गया. 🌷
वहाँ एक से एक सुंदर गुलाब खिले थे.
जब भी वह एक गुलाब तोड़ने के लिए
आगे बढ़ता, उसे कुछ दूर पर उससे भी
अधिक सुंदर गुलाब नजर आते , और
वह उसे छोड़ आगे बढ़ जाता.

ऐसा करते-करते वह ...
बगीचे के मुहाने पर आ पहुँचा,
❗ लेकिन ❗
यहाँ उसे जो फूल नजर आए
वे एकदम मुरझाए हुए थे.
आखिरकार वह फूल लिए बिना ही
वापस आ गया.

उसे खाली हाथ देखकर संत ने पूछा ~
क्या हुआ बेटा ! गुलाब नहीं लाए ?

युवक बोला ~ बाबा ! मैं बगीचे के
सुंदर और ताजा फूलों को छोड़कर
आगे और आगे बढ़ता रहा, मगर ...
अंत में केवल मुरझाए फूल ही बचे थे.

आपने मुझे पलटकर फूल तोड़ने से
मना किया था, इसलिए ... मैं गुलाब के
ताजा और सुंदर फूल नहीं तोड़ पाया.

उस पर संत मुस्करा कर बोले ~
जीवन भी इसी तरह से है, इसमें ...
शुरुआत से ही कर्म करते रहना चाहिए.

कई बार अच्छाई और सफलता प्रारंभ के
कामों और अवसरों में ही छिपी रहती है.
जो अधिक और सर्वोच्च की लालसा में
आगे बढ़ते रहते हैं, अंत में उन्हें ...
👉 खाली हाथ ही लौटना पड़ता है.

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࿐༆༒राधे राधे༒༆࿐

17/01/2025
17/01/2025

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*༒श्री गणेशाय नमः༒*
संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत

संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो हर महीने की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को रखा जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, और यदि यह संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जो विशेष फलदायी मानी जाती है।
संकष्टी चतुर्थी का महत्व
"संकष्टी" का अर्थ है संकटों का नाश करने वाला, और "चतुर्थी" भगवान गणेश का प्रिय दिन है।

इस व्रत को करने से सभी प्रकार के कष्ट, बाधाएं और कर्ज से मुक्ति मिलती है।

भगवान गणेश की कृपा से बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए भी यह व्रत बहुत शुभ माना जाता है।

व्रत विधि

1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान गणेश की मूर्ति/चित्र की स्थापना करें।
2. निर्जला या फलाहार व्रत रखें (व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार जल या फल ग्रहण कर सकता है)।
3. भगवान गणेश का पंचोपचार या षोडषोपचार पूजन करें –
लाल फूल, दूर्वा (तीन पत्तियों वाली घास), मोदक, अक्षत, चंदन आदि अर्पित करें।
4. गणेश मंत्रों का जाप करें, जैसे –
“ॐ गण गणपतये नमः"
“ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥"
5. गणेश चालीसा और व्रत कथा पढ़ें/सुनें।
6. चंद्रमा को अर्घ्य दें और फिर व्रत का पारण करें।

चंद्र दर्शन और अर्घ्य विधि

संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा देखने के बाद ही व्रत खोला जाता है।
चंद्र दर्शन के समय जल, दूध, शक्कर और चावल मिलाकर अर्घ्य अर्पित करें और "ॐ सोमाय नमः" मंत्र का जाप करें।

विशेष संकष्टी चतुर्थी

हर महीने संकष्टी चतुर्थी अलग-अलग नामों से जानी जाती है। जैसे:

माघ मास – तिलकुटा संकष्टी

फाल्गुन मास – विजय संकष्टी

चैत्र मास – लक्ष्मी गणेश संकष्टी

वैशाख मास – वक्रतुण्ड संकष्टी

इस व्रत के लाभ
✔ जीवन में आने वाली बाधाओं का नाश होता है।
✔ मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
✔ घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
✔ संतान सुख और विद्या-बुद्धि में वृद्धि होती है।

यदि आप नियमित रूप से संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत रखते हैं, तो भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
🌼🌼🌼🌼🌼🌼
सनातन धर्म की जय हो
परमात्मा सर्वस्व है

16/01/2025

🚩*राम तत्त्व की महिमा*🚩

*ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे।*

*क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।*

*रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।*
*'जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम'।'*

*एक राम घट-घट में बोले,दूजो राम दशरथ घर डोले।*
*तीसर राम का सकल पसारा,ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।*

शिष्य ने कहाः "गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?"

गुरूः "थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।" साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

*जीव राम घट-घट में बोले।*
*ईश राम दशरथ घर डोले।*
*बिंदु राम का सकल पसारा।*
*ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।*

शिष्य बोलाः "गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?"

गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि "वत्स ! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः

*वही राम घट-घट में बोले।*
*वही राम दशरथ घर डोले।*
*उसी राम का सकल पसारा।*
*वही राम है सबसे न्यारा।।*

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम",वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे।

आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके।

कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः 'अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।' कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी।

सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।' किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती !

जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः "जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?"

यह सुनकर रावण बोलाः "मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।"

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है।

आज के पावन दिवस पर उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम-तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर अग्रसर हो, यही अभ्यर्थना... यही शुभ कामना....

हे राम ! हे हरि ! हे अच्युत ! गोविंद ! दीनदयाल ! हम सभी को सदबुद्धि दे। हम संयमी, सदाचारी बनकर आत्मदेव को पा लें।

हे अंतरात्मा ! हे परमात्मा ! हे दीनबंधु ! हे भक्तवत्सल ! ॐ ॐ ॐ प्रभु जी ॐ...ॐ...ॐ. प्यारे जी ॐ....ॐ...ॐ मेरे जी ॐ....' ऐसा पुकारते, प्रार्थना करते डूब जायें। वे कृपालु अवश्य कृपा करते हैं, सदबुद्धि देते हैं।
*।।जय जय श्री राम।।*
*।।हर हर महादेव।।*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

● तीन दोस्त भंडारे में भोजन कर रहे थे। उनमें से...● पहला बोला- "काश.. हम भी ऐसे भंडारा कर पाते!"● दूसरा बोला- "हाँ.. यार...
03/01/2025

● तीन दोस्त भंडारे में भोजन कर रहे थे। उनमें से...
● पहला बोला- "काश.. हम भी ऐसे भंडारा कर पाते!"
● दूसरा बोला- "हाँ.. यार सैलरी तो आने से पहले ही
जाने के रास्ते बना लेती है!"
● तीसरा बोला-
"खर्चे.. इतने सारे होते हैं तो कहाँ से करें भंडारा..!!"
● उनके पास बैठे एक महात्मा भंडारे का आनंद ले रहे
थे और वो उन तीनों दोस्तों की बातें भी सुन रहे थे,
महात्मा उन तीनों से बोले- "बेटा भंडारा करने के लिए
ीं_केवल_अच्छे_मन_की जरूरत होती है!"

● वह तीनों आश्चर्यचकित होकर महात्मा की ओर देखने
लगे। महात्मा ने सभी की उत्सुकता को देखकर हंसते
हुए। कहा --- बच्चो तुम..

रोज़ 5-10 ग्राम आटा लो और उसे चीटियों के स्थान पर खाने के लिए रख दो, देखना अनेकों चींटियां-मकौड़े उसे खुश होकर खाएँगे। ो_गया_भंडारा।

चावल-दाल के कुछ दाने लो, उसे अपनी छत पर बिखेर दो और एक कटोरे में पानी भर कर रख दो, चिड़िया-कबूतर आकर खाएंगे। ो_गया_भंडारा।

गाय और कुत्ते को रोज़ एक-एक रोटी खिलाओ और घर के बाहर उनके पीने के लिये पानी भर कर रख दो।
ो_गया_भंडारा।

● ईश्वर ने सभी के लिए अन्न का प्रबंध किया है। ये जो
तुम और मैं यहां बैठकर पूड़ी-सब्जी का आनंद ले रहे
हैं ना, इस अन्न पर ईश्वर ने हमारा नाम लिखा हुआ है।

● बच्चो..!! तुम भी जीव-जन्तुओं के भोजन का प्रबन्ध
करने के लिए जो भी व्यवस्था करोगे, वह भी उस
ऊपर वाले की इच्छा से ही होगा,
#यही_तो_है_भंडारा।

● महात्मा बोले- बच्चो जाने कौन कहाँ से आ रहा है
और कौन कहाँ जा रहा है, किसी को भी पता नहीं
होता और ना ही किसको कहाँ से क्या मिलेगा या नहीं
मिलेगा यह पता होता, ्वर_की_माया_है।

● तीनों युवकों के चेहरे पर एक अच्छी सुकून देने वाली
खुशी छा गई। उन्हें भंडारा खाने के साथ-साथ,
#भंडारा_करने_का_रास्ता भी मिल चुका था।

● ईश्वर के बनाये प्रत्येक जीव-जंतु को भोजन देने के
ईश्वरीय कार्य को जनकल्याण भाव से निस्वार्थ करने का संस्कार हमें बाल्यकाल से ही मिल जाता है।
गर्व_है_हमें_अपनी_संस्कृति_पर !
जय श्री कृष्ण

29/08/2024

एक अति आवश्यक सुझाव....

भंडारे में भोजन खाने वालों को तिलक लगाएं

जब कभी भी भण्डारे का आयोजन करें तो कृपया उसमें एक ऐसा व्यक्ति जरूर रखें जो भण्डारे में प्रसाद ग्रहण करने आने वालों को पहले तिलक लगाए। इस प्रकार से भंडारे में आने वाला हर आदमी आदर पाकर बहुत गर्वित होगा एवं हिन्दू धर्म की मर्यादा के अनुसार तिलक लगाने की परम्परा फैलेगी।

यदि तिलक लगाने की परंपरा की शुरुआत कर दी जाए और तिलक लगने के बाद भंडारा प्रसाद दिया जाए तो

कुछ अच्छी बातें होंगी :-*

1. कुपात्र भंडारे से प्रसाद लेने के लिए तिलक लगवाने से दूर भागेगा, इससे पवित्र प्रसाद का अपमान नहीं होगा।

2. दुबारा लाइन में लग कर बैग भरकर लेकर जाने वाले तिलक लगा रहने से पहचान में आ जाएंगे।

3 प्रसाद उन सभी तक पहुचेगा जो आदर सत्कार से ग्रहण करेगा ।*

4 हिन्दू समाज में धीरे धीरे जागृति का भाव भी जागेगा।

हिंदुत्व की रक्षा व पहचान के लिए एक बहुत ही सामान्य तिलक लगाने और चोटी रखने की परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए धार्मिक जागरूकता पैदा करें। एक दूसरे की मदद करें। हिन्दू धर्म का किसी भी कीमत पर अपमान नहीं होना चाहिए।🚩

🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏

‼️🙏जय श्री हरि 🙏‼️                 🙏🏻🌹आचरण🌹🙏🏻एक बार की बात है। एक राज्य के राजा अपने राज्य के राजा पुरोहित का बहुत सम्मा...
20/05/2024

‼️🙏जय श्री हरि 🙏‼️

🙏🏻🌹आचरण🌹🙏🏻

एक बार की बात है। एक राज्य के राजा अपने राज्य के राजा पुरोहित का बहुत सम्मान करते थे। जब भी वह आते राजा स्वयं अपने सिंहासन से उठकर उनका सम्मान करते थे। एक दिन राजा कहने लगे कि मेरे मन में एक प्रश्न है गुरु देव मुझे बताएं कि किसी व्यक्ति का आचरण बड़ा होता है या फिर उसका ज्ञान बड़ा होता है।

राज पुरोहित कहने लगे कि राजन् मुझे कुछ दिनों का समय दे फिर मैं आपको इस प्रश्न का उत्तर दूंगा। राजा बोला गुरुदेव ठीक है।

राज पुरोहित अगले दिन राजा के कोषागार में गए और वहां से कुछ सोने की मोहरें उठा कर अपनी पोटली में रख ली। कोषाध्यक्ष चुपचाप सब कुछ देख रहा था लेकिन वह राजा के पुरोहित है ऐसा सोच मौन रहे। राज पुरोहित कुछ दिन तक लगातार ऐसा करते रहे। कोषागार में जाते सोने की मोहरें पोटली में रखते और वापिस आ जाते।

कोषाध्यक्ष ने सारा वृत्तांत राजा को सुना दिया। राज पुरोहित एक दिन राजा महल में पहुंचे आज ना तो राजा स्वयं उन्हें लेने गया और ना ही सम्मान में सिंहासन से उठा। राज पुरोहित समझ गए कि मेरी स्वर्ण मुद्राएं चोरी करने की बात राजा तक पहुंच गई है।

राजा ने भौंहें तान कर पूछा क्या आपने कोषागार से स्वर्ण मुद्राएं चोरी की है ? राज पुरोहित ने कहा कि हां राजन् यह बात सत्य है। राजा ने क्रोधित होकर पूछा आपने ऐसा क्यों किया?

राज पुरोहित कहने लगे कि मैंने जानबूझ कर स्वर्ण मुद्राएं चुराई थी क्योंकि मैं आप को प्रत्यक्ष दिखाना चाहता था कि किसी व्यक्ति का आचरण बड़ा होता है या फिर ज्ञान।

राजन् जब आपको पता चला कि मैंने स्वर्ण मुद्राएं चोरी की है आप मेरे सम्मान में खड़े नहीं हुए उल्टा क्रोध से आपकी भौंहें मुझ पर तन गई। मेरा ज्ञान तो स्वर्ण मुद्राएं उठाने से पहले भी मेरे पास था और उठाने के बाद भी मेरे साथ ही था। लेकिन जैसे ही मेरे चोर होने की बात आपको ज्ञात हुई मेरे प्रति आपका जो सम्मान था वह लगभग समाप्त हो गया।

राजन् अब शायद आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा। मेरा जो आप सम्मान करते हैं वो मेरे आचरण के कारण करते थे जैसे ही मेरा आचरण बदला आपने मेरा सम्मान नहीं किया।

इसलिए हमें सदैव अपना आचरण अच्छा रखना चाहिए। क्योंकि अगर हमारा आचरण अच्छा नहीं है तो हमारी शिक्षा,पद और धन भी हमें सम्मान नहीं दिला सकती है।

बिल्वपत्र (बेलपत्र) की उत्पत्ति कैसे हुईएक बार देवर्षि नारद कैलाश पहुँचे, वहाँ उन्हें भगवान शंकर और माता पार्वती के दर्श...
20/05/2024

बिल्वपत्र (बेलपत्र) की उत्पत्ति कैसे हुई

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पहुँचे, वहाँ उन्हें भगवान शंकर और माता पार्वती के दर्शन हुए। दोनों को प्रणाम करने के पश्चात देवर्षि ने महादेव से पूछा कि "हे प्रभु! पृथ्वी पर मनुष्य अत्यंत दुखी है और उनके दुखों का निवारण आपके द्वारा ही संभव है। अतः आप मुझे वो विधि बताइये जिससे मनुष्य आपको शीघ्र और सरलता से प्रसन्न कर सके। इसे जानकार मानव जाति का कल्याण होगा।" नारद का प्रश्न सुनकर महादेव बोले - "देवर्षि! मुझे प्रसन्न करने के लिए किसी पूजा विधि की आवश्यकता नहीं है। मैं तो अपने भक्त भक्तिभाव से ही प्रसन्न हो जाता हूँ।

किन्तु आपने पूछा है तो मैं बताता हूँ। मुझे बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय है अतः जो मनुष्य भक्तिभाव से मुझे केवल जल और बिल्वपत्र अर्पण करता है, मैं उससे ही प्रसन्न हो जाता हूँ।" नारद उनकी बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी की ओर चले। उनके जाने के पश्चात देवी पार्वती ने पूछा कि क्या कारण है कि उन्हें बिल्वपत्र इतना प्रिय है। तब भगवान शिव ने कहा "हे देवी! बिल्वपत्र स्वयं देवी लक्ष्मी का ही रूप है और उन्होंने इसी से मेरी पूजा की थी इसी कारण ये मुझे अत्यंत प्रिय है।" ये सुनकर देवी पार्वती ने वो कथा सुनाने का आग्रह किया कि क्यों देवी लक्ष्मी ने उनकी पूजा की थी।

उनका प्रश्न सुन कर महादेव ने कहा - "हे देवी! एक बार भगवान ब्रह्मा ने नारायण और अन्य देवताओं के साथ मेरे रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की पूजा की। उस पूजा में वाग्देवी (देवी सरस्वती) ने मेरी स्तुति इतने मधुर स्वर में की कि सभी के साथ भगवान विष्णु भी मंत्रमुग्ध हो गए। वाग्देवी का स्वर और प्रभाव देख कर श्रीहरि का मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया और उन्होंने उनके सम्मान में कई छंदों की रचना कर दी।

वाग्देवी के प्रति इतना प्रेम देख कर देवी लक्ष्मी ईर्ष्या से भर उठी और रूठ कर वे पृथ्वीलोक चली आयी। वहाँ उनके अश्रुओं से बिल्बवृक्ष की उत्पत्ति हुई और उसी स्थान पर देवी लक्ष्मी ने १००० वर्षों तक उसके पत्रों से मेरी तपस्या की। बिल्वपत्रों द्वारा की गयी उनकी तपस्या से मैं अतिप्रसन्न हुआ और उन्हें दर्शन देकर वर माँगने को कहा। तब उन्होंने मुझसे कहा - "हे भगवन! मेरे स्वामी के लिए अब मैं प्रिय नहीं रही और उन्हें वाग्देवी से अनुराग हो गया है। अब आप ही श्रीहरि के हृदय में पुनः मेरा वास करवा सकते हैं। अतः हे सर्वेश्वर आप मुझे यही वरदान दीजिये कि मेरे स्वामी का मन वाग्देवी से हट कर पुनः मुझमे लग जाये।" उनकी ऐसी बात सुनकर मैंने हँसते हुए कहा - "देवी! नारायण को वाग्देवी से कोई अनुराग नहीं हुआ है अपितु उनके प्रति नारायण के मन में केवल श्रद्धा का भाव है।

श्रीहरि के ह्रदय में आपके अतिरिक्त और कोई नहीं है अतः आप निश्चिंत होकर वैकुण्ठ अपने स्वामी के पास जाइये।" मेरे इस प्रकार सांत्वना देने पर देवी लक्ष्मी संतुष्ट हुई और प्रसन्न मन से वापस नारायण के पास लौटी। उन्होंने सहस्त्र वर्षों तक बिल्वपत्र द्वारा मेरी पूजा की थी इसी कारण ये मुझे अत्यंत प्रिय है।

बिल्वपत्र को स्वयं महादेव का स्वरुप माना गया है और इसे त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास माना गया है।

इसके तीन पत्ते भगवान शंकर के तीन नेत्रों के सामान माने गए हैं।

बिल्वपत्र के तीन पत्ते ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसके तीन पत्ते मनुष्य के तीन मूल गुण - सतगुण, रजगुण और तमगुण के भी द्योतक हैं।

स्कंदपुराण के अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति देवी पार्वती के स्वेद से हुई मानी गई है। वे इस पेड़ की जड़ में गिरिजा, तने में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षिणयिनी और पत्तों में पार्वती के रूप में वास करती हैं।

ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति तीर्थ नहीं जा सकते हैं, वे अगर केवल बिल्वपत्र और जल से भगवान शिव की पूजा कर दें तो उन्हें समस्त तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

स्वयं महालक्षी ने इसे महादेव की पूजा की थी अतः इससे महादेव की पूजा करने वालों पर लक्ष्मी की सदा कृपा दृष्टि रहती है।

सप्तर्षियों ने कहा है कि बिल्वपत्र द्वारा शिवपूजन करने से १ करोड़ कन्यादान का फल प्राप्त होता है।

कम से कम तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र ही भगवान को अर्पण करना चाहिए। दो या एक पत्तिओं वाला बेलपत्र भगवान को चढाने योग्य नहीं होता है। साथ ही विषम संख्या वाला (३, ५, ७) बेलपत्र ही चढ़ाना चाहिए।

छिद्र वाला बेलपत्र भगवान को नहीं चढ़ाना चाहिए और चढाने से पहले उसकी गांठ हो भी तोड़ देना चाहिए।

लिंगपुराण में बिल्वपत्र को तोड़ने के लिए चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति काल एवं सोमवार को निषिद्ध माना गया है। सोमवार और दोपहर के बाद भी इसे तोडना निषिद्ध माना गया है। जिस दिन तोड़ना निषिद्ध है उस दिन चढ़ाने के लिए साधक को बेलपत्र एक दिन पूर्व ही तोड़ लेना चाहिए।

बेलपत्र कभी अशुद्ध नहीं होते इसीलिए एक बार उपयोग हुए बिल्वपत्र को पुनः धोकर उपयोग में लाया जा सकता है।

पुराणों में कहा गया है कि १० स्वर्णमुद्राओं के दान का फल भगवान शिव को एक आक का पुष्प चढाने से, १००० आक के पुष्प का फल १ कनेर का पुष्प चढाने से और १००० कनेर के पुष्प चढाने का फल केवल एक बेलपत्र चढाने से प्राप्त हो जाता है।

बेलपत्र को कभी काटना या उखाड़ना नहीं चाहिए। कहा गया है कि उसे काटने से लगने वाले पाप से केवल परमपिता ब्रह्मा ही आपकी रक्षा कर सकते हैं।

भगवान शिव को बिल्वपत्र हमेशा उल्टा ही चढ़ाना चाहिए। अर्थात पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहना चाहिए। साथ ही बेलपत्र में चक्र या वज्र का निशान नहीं होना चाहिए।

रविवार और द्वादशी तिथि को बेलपत्र द्वारा की गयी पूजा का विशेष महत्त्व है। इस दिन किये गए पूजन से मनुष्य ब्रह्महत्या जैसे पाप से भी मुक्त हो जाता है।

वैसे तो बिल्वपत्र कभी भी और किसी भी जल के साथ महादेव को अर्पित किया जा सकता है किन्तु श्रावण मास में गंगाजल के साथ चढ़ाये गए बेलपत्र से मनुष्य को निश्चय ही शिवलोक की प्राप्ति होती है।

जिस प्रकार रुद्राक्ष कई प्रकार के होते हैं उसी प्रकार बेलपत्र में पत्तिओं के संख्या भी कई होती हैं। ३ से लेकर ११ पत्तों वाले बेलपत्र आपको साधारणतयः मिल जाते हैं। १३ और उसे अधिक पत्तों वाले बेलपत्र दुर्लभ होते हैं। बेलपत्र की संख्या (विषम संख्या में) जितनी अधिक होगी, उसका फल उतना ही बड़ा होता है।

बेलपत्र में चन्दन से पञ्चाक्षरी मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) लिखकर चढाने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।।

⛳🌷🌿 ॐ नमः शिवाय 🌿🌷⛳
⛳🌷🌿 हर हर महादेव 🌿🌷⛳
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08/03/2024
सुंदरकांड पाठ रामायण के छठे कांड को सुंदरकांड कहा जाता है। इसमें भगवान राम और देवी सीता के वनवास का वर्णन है। इसमें देवी...
25/01/2024

सुंदरकांड पाठ

रामायण के छठे कांड को सुंदरकांड कहा जाता है। इसमें भगवान राम और देवी सीता के वनवास का वर्णन है। इसमें देवी सीता के हरण के बाद भगवान राम और लक्ष्मण जी की लंका यात्रा का भी वर्णन है।

सुंदरकांड में कई रोमांचक और प्रेरणादायक प्रसंग हैं। इसमें देवी सीता के हरण के बाद भगवान राम और लक्ष्मण की वनवास यात्रा का वर्णन है। इस यात्रा में दोनों भाइयों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन वे अपने धैर्य और साहस से इन कठिनाइयों को पार कर जाते हैं।

सुंदरकांड में भगवान राम और हनुमान की भक्ति का भी वर्णन है। हनुमान भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हैं। वे भगवान राम की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। सुंदरकांड में हनुमान का लंका जाकर देवी सीता को खोजने का प्रसंग बहुत ही प्रसिद्ध है।

सुंदरकांड हमें नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाता है। इसमें हमें सीख मिलती है कि हमें कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। हमें हमेशा अपने धर्म और कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

सुंदरकांड से कुछ सीख:

हमें कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए।
हमें हमेशा अपने धर्म और कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
हमें दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।
हमें अपने जीवन में हनुमान जी की भक्ति को अपनाना चाहिए।

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🚩 गीता जयन्ती शुक्रवार, दिसम्बर 22, 2023🚩जब श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया था गीता ज्ञान, समझाया था जीवन का...
22/12/2023

🚩 गीता जयन्ती शुक्रवार, दिसम्बर 22, 2023🚩

जब श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया था गीता ज्ञान, समझाया था जीवन का सार

गीता जयंती भगवद गीता के प्रति सम्मान अर्पित करने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पर्व भागवत पुराण के महाभारत के श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए धर्मयुद्ध के समय भगवद गीता का सार्थक पाठ के क्षण को याद करने के रूप में मनाया जाता है। गीता जयंती हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है।

गीता जयंती के दिन लोग भगवद गीता के पाठ का आयोजन करते हैं। इस दिन धार्मिक कार्यक्रम, सत्संग, और ध्यान साधना की जाती है। मंदिरों में भगवद गीता के पाठ का आयोजन होता है और लोग भगवान के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।

भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने, कर्म करने, और आत्मा के विषय में उपदेश दिया। इसलिए गीता जयंती एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार है जो लोगों को जीवन में कर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इस लेख के माध्यम से जानते हैं गीता जयंती के इतिहास, महत्व, और उत्सव के बारे में।

गीता जयंती का इतिहास:

गीता जयंती का संबंध महाभारत युद्ध के समय से है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर भगवद गीता का उपदेश दिया था। यह उपदेश सच्चे धर्म, कर्म, और आत्मा के महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित था और अर्जुन को युद्ध में अपने कर्तव्य को समझाने के लिए कहा गया था। अर्जुन अपने ही परिवार के खिलाफ युद लड़ने के प्रति असमंजस की स्थिति में थे उनकी दुविधा को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अद्भुत और बहुमूल्य गीता ज्ञान देकर उनका मार्गदर्शन किया। साथ ही उन्होंने सही मायनों में सारथी की भूमिका निभाई।

गीता जयंती का महत्व

गीता जयंती का महत्व विशेष रूप से भगवद गीता के उपदेशों की महत्वपूर्णता को समर्पित करता है। यह त्योहार हमें यह याद दिलाता है कि धर्म और आध्यात्मिकता के माध्यम से ही सच्चा आत्मज्ञान और शांति प्राप्त हो सकती है। गीता जयंती के दिन, लोग गीता के पाठ, स्वाध्याय (स्वयं अध्ययन करना), और उसके महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने के लिए समर्पित होते हैं। इस दिन गीता का पाठ करके उसे जीवन में आत्मसात करने का प्रयास किया जाता है।

गीता जयंती का उत्सव

गीता जयंती के दिन, मंदिरों में विशेष पूजा आयोजित की जाती हैं जहां भक्तगण भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं। भगवद गीता के पाठ का आयोजन, सत्संग, और अन्य धार्मिक उत्सव किये जाते हैं।

इसके अलावा, लोग गीता के शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं और उनके मार्गदर्शन में चलते हैं। धार्मिक ग्रंथों के पाठ, सत्कर्म, और सत्संग के माध्यम से लोग गीता जयंती के दिन आत्मा के उद्दीपन का संकल्प लेते हैं। गीता जयंती का उत्सव हमें यह याद दिलाता है कि धर्म, श्रद्धा, और आत्मज्ञान से जुड़ा हुआ जीवन संतुलन और सुख का कारण बन सकता है।

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