Jai Ma Tarkulaha Devi

Jai Ma Tarkulaha Devi एक धार्मिक स्थल जिसका नाम तरकुल्हा देवी का मंदिर Tarkulha Devi Temple

मातारानी के दर्शनार्थ भीड़ में श्रद्धालु लोग, बीते शुक्रवार लाखों की संख्या में श्रद्धालु।
20/06/2022

मातारानी के दर्शनार्थ भीड़ में श्रद्धालु लोग, बीते शुक्रवार लाखों की संख्या में श्रद्धालु।

"नवरात्रि पाँचवा दिन माँ स्कन्दमाता की पूजा"माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता हैस्कन्दमाता की मंत्र...
06/04/2022

"नवरात्रि पाँचवा दिन माँ स्कन्दमाता की पूजा"

माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है
स्कन्दमाता की मंत्र :-
सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द कुमार (कार्तिकेय) की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवे स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। भगवान स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में अवस्थित होता है। स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है|

माँ स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं| इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है | यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है| एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है|
https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-5thday-maa-skandmata/

"नवरात्रि चौथा दिन माँ कूष्मांडा की पूजा"भगवती माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्मांडा है !भगवती माँ दुर्गा जी के ...
05/04/2022

"नवरात्रि चौथा दिन माँ कूष्मांडा की पूजा"

भगवती माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्मांडा है !
भगवती माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्मांडा है ! अपनी मंद हल्की हसीं द्वारा अंड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कुष्मांडा देवी के नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , चारों ओर अन्धकार ही अंधकार व्याप्त था, तब माँ कुष्मांडा ने ही अपनी हास्य से ब्रह्माण्ड कि रचना की थी। अतः यही सृष्टि की आदि – स्वरूपा आदि शक्ति है।

इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। सूर्य लोक में निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्ही में है। इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दीप्तिमान और भास्कर है। इनके तेज की तुलना इन्ही से की जा सकती है। अन्य कोई भी देवी – देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते। इन्ही के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही है। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्ही की छाया है। इनकी आठ भुजाएं है। अतः ये अष्ट भुजी देवी के नाम से भी विख्यात है। इनके सात हाथो में क्रमशः कमण्डलु , धनुष – बाण , कमल पुष्प , अमृत पूर्ण कलश , चक्र , तथा गदा है ! आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। इस कारण से भी कुष्मांडा कही जाती है।

नवरात्री – पूजन के चौथे दिन कुष्मांडा देवी के स्वरुप की ही पूजा उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचल मन से कुष्मांडा देवी के स्वरुप को ध्यान में रख कर पूजा उपासना के कार्य में लगना चाहिए। माँ कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग – शोक विनष्ट हो जाते है ! इनकी भक्ति से आयु , यश , बल , और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कुष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से भी प्रसन्न होने वाली है। यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

हमे चाहिए की हम वेद पुराणों में वर्णित विधि – विधान पूर्वक माँ दुर्गा की पूजा – उपासना और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो। माँ के भक्ति मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सुक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरुप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम व् श्रेयस्कर मार्ग है। माता की उपासना मनुष्य को आँधियों – व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख – समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। माँ कुष्मांडा देवी के श्री चरणों में सत सत नमन।

https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-4thday-maa-kushmanda/

"नवरात्रि तीसरा दिन माँ चन्द्रघंटा की पूजा"मां दुर्गा की 9 शक्तियों की तीसरी स्वरूपा भगवती चंद्रघंटा की पूजा नवरात्र के ...
04/04/2022

"नवरात्रि तीसरा दिन माँ चन्द्रघंटा की पूजा"

मां दुर्गा की 9 शक्तियों की तीसरी स्वरूपा भगवती चंद्रघंटा की पूजा नवरात्र के तीसरे दिन की जाती है
पिण्डज प्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्त्र कैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता ||

मां दुर्गा की 9 शक्तियों की तीसरी स्वरूपा भगवती चंद्रघंटा की पूजा नवरात्र के तीसरे दिन की जाती है। माता के माथे पर घंटे आकार का अर्धचन्द्र है, जिस कारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। इनका रूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। माता का शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है। इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथ हैं जो की विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित रहते हैं। सिंह पर सवार मां चंद्रघंटा का रूप युद्ध के लिए उद्धत दिखता है और उनके घंटे की प्रचंड ध्वनि से असुर और राक्षस भयभीत करते हैं।

भगवती चंद्रघंटा की उपासना करने से उपासक आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्राप्त करता है और जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक दुर्गा सप्तसती का पाठ करता है, वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान को प्राप्त करता है। माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना भक्तो को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्त कर इसलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है और भगवती अपने दोनों हाथो से साधकों को चिरायु, सुख सम्पदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान देती हैं।

मनुष्य को निरंतर माता चंद्रघंटा के पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए और इस दिन महिलाओं को घर पर बुलाकर आदर सम्मान पूर्वक उन्हें भोजन कराना चाहिए और कलश या मंदिर की घंटी उन्हें भेंट स्वरुप प्रदान करना चाहिए। इससे भक्त पर सदा भगवती की कृपा दृष्टि बनी रहती है।

https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-3rdday-maa-chandraghanta/

"नवरात्रि प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा"नवरात्रि के नौं दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना, आराधना व उपास...
02/04/2022

"नवरात्रि प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा"
नवरात्रि के नौं दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना, आराधना व उपासना की जाती है और प्रत्‍येक दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की उपासना का प्रावधान है। नवरात्रि के पहले तीन तीन मां पार्वती, अगले तीन दिन माता लक्ष्‍मी व नवरात्रि के अन्तिम तीन दिन माता सरस्‍वती के लिए समर्पित हैं, जबकि प्रत्‍येक दिन माता दुर्गा के किसी एक अलग रूप की उपासना होती है, जिनका वर्णन निम्‍नानुसार है-

“नवरात्रि प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा”
वंदे वाद्द्रिछतलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम |
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ||
नवरात्र के पहले दिन मां के जिस रूप की उपासना की जाती है, उसे शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस रूप का नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा था।

शास्‍त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरुप अति दिव्य है। मां के दाहिने हाथ में भगवान शिव द्वारा दिया गया त्रिशूल है जबकि मां के बाएं हाथ में भगवान विष्‍णु द्वारा प्रदत्‍त कमल का फूल सुशोभित है। मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं और इन्‍हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है।

नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के शैलपुत्री वाले रूप की आराधना करने से आकस्मिक आपदाओं से मुक्ति मिलती है। इसीलिए दुर्गम स्थानों पर बस्तियां बनाने से पहले मां शैलपुत्री की स्थापना की जाती है माना जाता है कि इनकी स्थापना से वह स्थान सुरक्षित हो जाता है और मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, व्‍याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता तथा जीव निश्चिंत होकर उस स्‍थान पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में दक्ष-प्रजापति की पुत्री सती थीं, जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था।

कथा इस प्रकार है
एकबार प्रजापति दक्ष ने एक महायज्ञ किया || इस महायज्ञ उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया गया किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया । जब सती को ज्ञात हुआ कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल महायज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं और तभी वहाँ जाने के लिए उनका मन बना लिया । जब सतीदेवी ने अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी से कही ।

तब शंकरजी ने कहा, प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं || महायज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को निमंत्रित किया है । उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किया हैं, परन्तु मुझे अपमानित करने के कारण मुझे और तुमको भी नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी उचित नहीं होगा सतीदेवी । शंकरजी के इस बात से सती का ज्ञान न हिने के कारण पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी । उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी ।

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है । केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया । परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है । अपने पिता दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे । यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा । उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी भूल की है ।

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न पाने के कारण सतिदेवी अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योग विद्या अपने प्राणों का त्याग कर दिया ।
इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया ।
तदोपरान्त अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया । इस बार वे शैलपुत्री नाम से विख्यात हुर्ईं । पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम है ।

धार्मिक मान्‍यतानुसार मां दुर्गा के इस शैलपुत्री के रूप की उपासना करते समय निम्‍न मंत्र का उच्‍चारण करने से मां जल्‍दी प्रसन्‍न होती हैं, तथा वांछित फल प्रदान करने में सहायता करती हैं-

|| ॐ शैलपुत्र्यै नमः ||
https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-1stday-maa-shailputri/

नहीं जानते होंगे, छठ पर्व की शुरुआत आखिर कैसे हुई?कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि, यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित...
10/11/2021

नहीं जानते होंगे, छठ पर्व की शुरुआत आखिर कैसे हुई?

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि, यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित है। बिहार और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते।

यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।

इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इसे पर्व को हठयोग भी माना जाता है। इस कठिन पर्व की शुरुआत कैसे हुई और किसने इस पर्व को शुरु किया इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं हैं।

क्या भगवान राम और सीता ने किया सबसे पहले छठ?

https://jaimatarkulahadevi.com/story-behind-chhat-puja/

https://jaimatarkulahadevi.com/why-laxmi-ganesh-puja-together-on-diwali-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0...
03/11/2021

https://jaimatarkulahadevi.com/why-laxmi-ganesh-puja-together-on-diwali-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/

क्‍यों पूजे जाते हैं दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश एकसाथ? दीवाली भारत का अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक पर्व है। इस दिन हम धन .....

अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक राजाधिराज योगिराज परब्रह्म श्री सचिनानन्द सद्गुरु साई नाथ महाराज की जय l
14/10/2021

अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक राजाधिराज योगिराज परब्रह्म श्री सचिनानन्द सद्गुरु साई नाथ महाराज की जय l

"नवरात्रि आठवां दिन माँ महागौरी की पूजा "मां दुर्गा की 9 शक्तियों की आठवीं स्वरूपा महागौरी की पूजा नवरात्र के अष्टमी तिथ...
13/10/2021

"नवरात्रि आठवां दिन माँ महागौरी की पूजा "

मां दुर्गा की 9 शक्तियों की आठवीं स्वरूपा महागौरी की पूजा नवरात्र के अष्टमी तिथि को किया जाता है
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्त्र महादेव प्रमोददा ||

दुर्गा पूजा के अष्टमी तिथि को माता महागौरी की पूजा इस मंत्र से करना चाहिए।

भक्तों के सारे पापों को जला देनेवाली और आदिशक्ति मां दुर्गा की 9 शक्तियों की आठवीं स्वरूपा महागौरी की पूजा नवरात्र के अष्टमी तिथि को किया जाता है। पौराणिक कथानुसार मां महागौरी ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिसके कारण इनके शरीर का रंग एकदम काला पड़ गया था। तब मां की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं शिवजी ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से धोया, जिससे इनका वर्ण विद्युत-प्रभा की तरह कान्तिमान और गौर वर्ण का हो गया और उसी कारणवश माता का नाम महागौरी पड़ा।

माता महागौरी की आयु आठ वर्ष मानी गई है. इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें एक हाथ में त्रिशूल है, दूसरे हाथ से अभय मुद्रा में हैं, तीसरे हाथ में डमरू सुशोभित है और चौथा हाथ वर मुद्रा में है. इनका वाहन वृष है। नवरात्र की अष्टमी तिथि को मां महागौरी की पूजा का बड़ा महात्म्य है। मान्यता है कि भक्ति और श्रद्धा पूर्वक माता की पूजा करने से भक्त के घर में सुख-शांति बनी रहती है और उसके यहां माता अन्नपूर्णा स्वरुप होती है. इस दिन माता की पूजा में कन्या पूजन और उनके सम्मान का विधान है।

https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-8thday-maa-mahagauori/

"नवरात्रि छठा दिन माँ कात्यायनी की पूजा "एवं"नवरात्रि सातवां दिन माँ कालरात्रि की पूजा"नवरात्र के छठे दिन इस मंत्र से मा...
12/10/2021

"नवरात्रि छठा दिन माँ कात्यायनी की पूजा "
एवं

"नवरात्रि सातवां दिन माँ कालरात्रि की पूजा"
नवरात्र के छठे दिन इस मंत्र से माता कात्यायनी की पूजा वंदना करना चाहिए।
चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना |
कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि ||

नवरात्र के छठे दिन इस मंत्र से माता कात्यायनी की पूजा वंदना करना चाहिए। नवरात्री के छठे दिन आदिशक्ति मां दुर्गा की षष्ठम रूप और असुरों तथा दुष्टों का नाश करनेवाली भगवती कात्यायनी की पूजा की जाती है। मार्कण्डये पुराण के अनुसार जब राक्षसराज महिषासुर का अत्याचार बढ़ गया, तब देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिए देवी मां ने महर्षि कात्यान के तपस्या से प्रसन्न होकर उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया।

चूँकि महर्षि कात्यान ने सर्वप्रथम अपने पुत्री रुपी चतुर्भुजी देवी का पूजन किया, जिस कारण माता का नाम कात्यायिनी पड़ा। मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धा भाव से नवरात्री के छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा आराधना करता है तो उसे आज्ञा चक्र की प्राप्ति होती है। वह भूलोक में रहते हुए भी अलौकिक तेज़ से युक्त होता है और उसके सारे रोग, शोक, संताप, भय हमेशा के लिए विनष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए रुक्मिणी ने इनकी ही आराधना की थी, जिस कारण मां कात्यायनी को मन की शक्ति कहा गया है।
====
मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि कहा जाता है
मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि कहा जाता है, दुर्गा-पूजा के सातवें दिन माँ काल रात्रि की उपासना का विधान है। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, इनका वर्ण अंधकार की भाँति काला है, केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है, माँ कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से बिजली की भाँति किरणें निकलती रहती हैं, इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं. माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए।

माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली होती हैं इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है।

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्र्च दारूणा. त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा..

मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से जीवन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी मंत्र से मां की स्तुति की थी। यह देवी काल रात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं। इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है। देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है।

मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं। देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं।

बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं। देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है।

https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-6thday-maa-katyayani/

https://jaimatarkulahadevi.com/navratri-7thday-maa-kalaratri/

Address

Gorakhpur

Opening Hours

Monday 4am - 10pm
Tuesday 4am - 10pm
Wednesday 4am - 10pm
Thursday 4am - 10pm
Friday 4am - 10pm
Saturday 4am - 10pm
Sunday 4am - 10pm

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Jai Ma Tarkulaha Devi posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Jai Ma Tarkulaha Devi:

Share