08/06/2022
भगवान् राम धनुष को उठाते हैं । यह भी तौलने की एक प्रक्रिया है । पर तराजू की विशेषता की परीक्षा केवल तौलने मात्र से ही नहीं हो जाती । तौलने से पूर्व तराजू के दोनों पलड़ों को सम होना चाहिये और तौलने के बाद भी। भगवान् राम तो धनुष तोड़ने से पूर्व और तोड़ने के बाद दोनों स्थितियों में सम हैं । उनमें हर्ष , विषाद या अभिमान न पहले है और न ही बाद में ।
भगवान् राम और रावण दोनों ही तौलते हैं , पर रावण तौलने के बाद कहता है कि भगवान् शंकर हल्के हैं और मैं भारी हूँ । पर भगवान् राम गुरु को ' गुरु ' ( भारी ) की ही दृष्टि से देखते हैं । और यही कहते हैं कि धनुष तो गुरुजी की कृपा से ही टूटा , मैं तोड़ने वाला नहीं हूँ । इसीलिये परशुरामजी ने जब यह पूछा कि ' वाणी से तो तुम विनम्र हो , पर धनुष तोड़ने के बाद तुम्हें अभिमान तो अवश्य ही हुआ होगा ? "
*भंजेहु चापु दापु बड़ बाढ़ा ।* १ / २८२/६
इस पर भगवान् राम ने कहा कि ' बिलकुल नहीं ! यदि मैंने धनुष तोड़ा होता , तब तो अभिमान आने की सम्भावना थी , पर जब मैंने तोड़ा ही नहीं , तो फिर अभिमान किस बात का ? '
" जब तुमने नहीं तोड़ा तो फिर धनुष टूट कैसे गया ? " परशुरामजी ने पूछा ।
भगवान् राम ने कहा " गुरुदेव की आज्ञा पाकर मैंने सोचा धनुष के पास चलकर उसे देखना चाहिये । और उसे उठाने से पूर्व जब मैंने गुरुजी को प्रणाम किया
*गुरहिं प्रनामु मनहिं मन कीन्हा।*
तो उनकी कृपा से धनुष हल्का हो गया और मेरे हाथ लगते ही ऊपर उठ गया और अपने आप टूट गया
*अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।।*
और जब
*छुअतहिं टूट पिनाक पुराना ।*
*मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ।।* १ / २८२ / ८
छूने भर से टूट गया तो इसमें अभिमान करने लायक बात कहाँ है ? " भगवान् राम का यह वाक्य बड़ा सांकेतिक है ।
भगवान् शंकर का धनुष अहंकार है । अब , यदि उसे तोड़ने के बाद तोड़ने वाला यह कहे कि मैंने अहंकार को तोड़ दिया , तो फिर अहंकार टूटा कहाँ ? वह तो तोड़ने वाले के सिर पर सवार हो गया । जहाँ कर्तृत्व बचा हुआ है , ' मैंने किया ' यह भाव शेष है , वहाँ अहंकार कहाँ मिटा ? वह तो वहाँ पूरी तरह से विद्यमान है ।
भगवान् राम मानो बताना चाहते हैं कि अहंकार से रहित होकर , गुरु का आश्रय लेकर ही व्यक्ति परम कल्याण की प्राप्ति कर सकता है । परशुरामजी भी बाद में इस बात को समझ जाते हैं कि भगवान् राम ही ऐसे सच्चे गुरुभक्त हैं जिनमें अभिमान का लेश नहीं है । भगवान् राम अपने चरित्र से गुरु की महिमा और गुरुता को प्रकट करते हैं । वे बताना चाहते हैं कि गुरु की कृपा के द्वारा ताड़का का वध हुआ , अहल्या का उद्धार हुआ और शिवजी का धनुष टूटा । इसका तात्पर्य है कि गुरु ही ब्रह्म को निष्क्रिय से सक्रिय बनाते हैं । इस दृष्टि से प्रभु तीसरी भक्ति के रूप में ' अमान होकर गुरु सेवा ' का जो उपदेश देते हैं , वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है ।