Manokamana Mandir, Binod Nagar,Dhanbad

Manokamana Mandir, Binod Nagar,Dhanbad MAA Manokamana Mandir is at Binod Nagar, Chiragora, Dhanbad

29/09/2021

जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले दो व्यक्ति कौन थे । जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो...
भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल !
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।
शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि
शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं
लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी।
शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया।
सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है।
आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।
खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त
दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की।
खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था।
बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।
हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं,
और...
बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं
आज़ादी के दीवानों क विरुद्ध और भी गवाह थे ।
1. शोभा सिंह
2. शादी राम
3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
4. जीवन लाल
5. नवीन जिंदल की
बहन के पति का दादा
6. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा
Sir Chotu Ram !
दीवान चन्द फोर्गाट DLF कम्पनी का Founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में काटी थी
इसकी इकलौती बेटी थी जो कि K.P.Singh को ब्याही और वो मालिक बन गया DLF का ।
अब K.P.Singh की
भी इकलौती बेटी है जो कि कांग्रेस के नेता और गुज्जर से मुस्लिम Converted गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है । अब वह DLF का मालिक बनेगा ।
जीवन लाल मशहूर एटलस साईकल कम्पनी का मालिक था।
बाकि मशहूर हस्तियों को तो आप जानते ही होंगे ।
ये सन्देश देश को लूटने वाले सभी लोगों तक भी पहुँचना चाहिए, फिर चाहे वो "आप" के हों या पराए...??

17/09/2021

एक प्रश्न में उलझा हूँ।

"सत्यमेव जयते नामृताम"

इस वाक्य को तोडकर "सत्यमेव जयते"के बाद पूर्ण विराम चिन्ह लगा देने से वाक्य और अर्थ क्या वही रह जाता हैं,जो मूल संदर्भ में हैं?

अगर हां, तो क्या मूल वाक्य में 'नामृताम' शब्द मात्र वाग्विलास के लिये हैं?

16/08/2021

एक तरफ तो तालिबानी इस्लामी जिहाद अफगानिस्तान को निगलते जा रहे हैं, तो दूसरी ओर अपने कब्जे में आए गांवों शहरों में मध्ययुगीन सोच और बर्बरता को लौटा रहे हैं। तालिबान के द्वारा पिछले दिनों कब्जाए कुछ इलाकों से आई रिपोर्ट चिंता और आक्रोश पैदा करने वाला है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अफगानिस्तान में उनके कब्जाए इलाकों के नेताओं को कुछ दिन पहले वहां की 12 साल की लड़कियों से लेकर 45 साल तक की महिलाओं की सूची देने का दबाव डाला गया था। इधर तालिबानी जिहादी इलाकों पर कब्जे करना जारी रखे हैं और इधर महिलाओं और लड़कियों में खौफ बढ़ता जा रहा है।
12 साल से ऊपर की बच्चियों को उनके घरों में घुसकर उनके माता—पिता के सामने जबरन ले जाया जा रहा है। दैनिक द सन की मानें तो तालिबानी घर-घर जाकर लड़कियों को इसलिए उठा रहे हैं ताकि वे उनके बर्बर लड़ाकों की 'सेक्स गुलाम' बनकर रहें।
अफगानिस्तान में अपने कब्जाए इलाकों में तालिबानी इस्लामी जिहादी महिलाओं को अगवा करके उनसे जबरन निकाह रचा रहे हैं। यह इलाकों में शरिया लागू होने के संकेत देता है और वहां बन रही डरावनी परिस्थिति की झलक देता है। इतना ही नहीं, महिलाएं बिना पुरुष को साथ लिए घरों से नहीं निकल सकतीं। उनका हिजाब पहने रहना जरूरी कर दिया गया है।
सूत्रों के हवाले से खबर है कि अफगानिस्तान में अपने कब्जाए इलाकों में तालिबानी जिहादी महिलाओं को अगवा करके उनसे जबरन निकाह रचा रहे हैं। ब्लूमबर्ग की खबर है कि ऐसा होना कब्जाए इलाकों में शरिया लागू होने के संकेत देता है और वहां बन रही डरावनी परिस्थिति की झलक देता है। इतना ही नहीं, महिलाएं बिना पुरुष को साथ लिए घरों से नहीं निकल सकतीं। उनका हिजाब पहने रहना जरूरी कर दिया गया है।
कब्जाए इलाकों में ज्यादातर स्कूलों और कारोबारों को तहस-नहस कर दिया गया है। फरमान है कि जिन स्कूलों में पढ़ाने वाली महिला हों उन्हीं स्कूलों में लड़कियों को भेजा जाए। तालिबानी जिहादियों ने आगाह किया है कि जो भी इन कायदों को नहीं मानेगा उसका बुरा हाल किया जाएगा। जो महिलाएं वहां से भाग निकलने में काबिल हैं वे उन इलाकों से जा रही हैं। लड़कियों के पिता डरे-सहमे हैं कि न जाने कब कोई तालिबानी आकर उनकी बेटी को उठा ले जाए।

10/08/2021

जफर महमूद जकात फाउंडेशन, सच्चर कमेटी, और नौकरी को लड़ते हिन्दू
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बहराइच में जन्मे इस फ़ितने ने अकेले ही भारत के हिंदुत्व को हरा दिया जिसको भरपूर शह मौनमोहन सिंह से मिली ।
सच्चर_कमेटी के क्रियान्वयन समिति का हेड बनाकर #मनमोहन ने इस शातिर को फ्रंटफुट पर खेलने का मौका दे दिया,जो आज तक बदस्तूर जारी है ।
1989 में इसने जकात_फाउंडेशन का गठन किया और उसके बाद तो मानों कुबेर का खजाना भर भर के पैसा इस फाउंडेशन में आया ।
कहते हैं अगर ढंग से जांच की जाए तो इसके फाउंडेशन में अब तक भारत की एक साल की जीडीपी के बराबर पैसा अज्ञात स्रोतों से आ चुका है,खासकर 2004 से 2016 तक जब तक #नरेंद्रमोदी नोटबन्दी नहीं ले आये थे ।
फाउंडेशन के पैसे से इसने भारत मांस_उद्योग, स्क्रैप कब्जे में करके भारत की मूल कारिंदा जातियों से वो सारे धन्धे छीन लिए जो प्राचीन काल से ही हमारी पहचान थे ।
आज आप एक हिन्दू नाई ढूंढने के लिये दस किमी की यात्रा करने को मजबूर हैं !
भारत का केला विपणन बस मुस्लिमों के रहमोकरम पर निर्भर है !
10 रुपए दर्जन वाला केला आप 40 से 60 रुपए दर्जन खरीदने को मजबूर हैं !
भारत के प्रत्येक शहर में मुस्लिमों के कम से कम सौ केले के गोदाम हैं,आप के पास कुछ नहीं !
आप तो बस केले खाइए !
प्याज,आम,अमरूद,सेब,लहसुन का विपणन अब हिंदुओं के लिये दूर का सपना केवल इस आदमी के चलते सम्भव हुआ !
खरबों के स्क्रैप को आप मुस्लिमों के हाथ मे देकर रोते रहिये !
जफर इतना शातिर है कि लोगों का ध्यान भटकाने के लिये जकात फाउंडेशन के अलावा शांति के लिए इंटरफेथ गठबंधन और गॉड्स ग्रेस फाउंडेशन भी चलाता है !
साथ ही इतना बेखौफ भी की 29 जून 2013 को इसने मोदी जी के आमंत्रण पर आयोजित एक कॉन्क्लेव में भाषण देते हुए उन्हीं को मुसलमानों का सबसे बड़ा विरोधी करार दिया !

10/08/2021

भारत की प्रथम जासूस कैप्टन नीरा आर्या की सम्पूर्ण गाथा- 26 जुलाई #पुण्यतिथि
अगर आपने पूरी पोस्ट पढ़ ली तो आपकी आंखों से आंसू बहने लगेंगे-
जन्म एवं बचपन -
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नीरा आर्य का जन्म 5 मार्च 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में खेकड़ा गांव के एक सम्पन्न व कुलीन जाट परिवार में हुआ था। लेकिन अचानक से उनके माता-पिता बीमार हो गए। कोई कमाने वाला न होने के कारण एवं इलाज पर खूब पैसा लगने होने के कारण उनके घर के हालात बिगड़ गए। उन्हें कर्ज उठाना पड़ा। लेकिन कुछ समय पश्चात ही उनके माता पिता चल बसे। नीरा एवं उनका छोटा भाई बसंत कुमार अनाथ हो गए। नीरा के पिता की हवेली व जमीन साहूकारों द्वारा कर्ज की वसूली लिए कुर्क कर ली गयी। दोनो बच्चे दर दर भटकते रहे।
भटकते हुए ये बच्चे एक दिन हरियाणा के चौधरी सेठ छाजूराम(छज्जुमल) जी को मिले। जिनका कलकत्ता में बहुत बड़ा व्यापार था। चौधरी साहब के साथ सेठ लगे होने के कारण कुछ लोग उन्हें वैश्य समाज का समझ लेते हैं और नीरा को भी। चौधरी साहब एक बहुत बड़े व्यापारी जरूर थे लेकिन वे हरियाणा के जाट क्षत्रिय समाज से थे।
छज्जुराम जी बहुत बडे दयालु, दानवीर एवं देशभक्त व्यक्ति थे। जब उन्हें बच्चो की हालत पता चली तो उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे। सेठ जी ने दोनो बच्चो को लालन पालन व शिक्षा के लिए गोद ले लिया। बच्चों ने उन्हें अपना धर्मपिता स्वीकार कर लिया।
नीरा को सेठजी कलकत्ता ले गए और उन्हें वहां खूब पढ़ाया लिखाया। पिता के प्रभाव से नीरा व बसंत भी आर्य समाजी बन गए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भगत सिंह भी एक बार अंग्रेज पुलिस से बचने के लिए महीने भर सेठ जी के पास रहे थे और उनके साथ उनकी क्रांतिकारी साथी सुशीला भाभी भी थी। सुशीला भाभी ने नीरा को पढ़ाने का काम किया। भगत सिंह के विचारों की छाया भी नीरा पर पड़ी। सेठ जी के घर क्रांतिकारियों एवं देशभक्त नेताओ का आना जाना लगा रहता था जिसका प्रभाव नीरा पर खूब पड़ा।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से प्रथम मुलाकात और उनकी धर्मबहन बनी-
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एक बार नीरा अपने साथी बच्चों के साथ पिकनिक पर गयी हुई थी। नीरा को तैरना आता था लेकिन वह कभी बड़े तालाब या बड़ी नदी या समुद्र में नहीं तैरी थी। उस दिन नीरा को समुद्र में तैराकी का मन किया और वह कूद पड़ी। नीरा तब बहुत छोटी थी। समुद्र की लहरों के सामना न कर पाई और डूबने लगी। यह देखकर उनके साथी चिल्लाने लगे। तभी एक नौजवान युवक समुद्र में कूद गया और उसने नीरा की जान बचाई। नीरा ने उसका धन्यवाद किया और कहा कि भाई आप कौन हो। तो नेताजी ने अपना नाम बताया। नेताजी ने कहा कि बहन तुंम्हे अकेले तैराकी न करनी चाहिए तुम्हारे पिता कहां है। तो नीरा ने बताया कि वे बहुत बड़े कारोबारी है आज किसी पार्टी से डील करने मीटिंग में गए हुए हैं जिसकी वजह से आज वो साथ नहीं आ पाए। नीरा ने कहा कि भाई आपने मेरी जान बचाई है मैं आपको कैसे धन्यवाद करूँ। तो नेताजी ने कहा कि आज राखी का दिन है मुझे राखी बांध दो और अपना धर्म भाई स्वीकार करो। इस तरह पहली मुलाकात में ही नेताजी व नीरा घुल मिल गए।
नीरा की शादी-
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नीरा की जिम्मेदारी सेठ चौधरी छज्जुराम जी ने ली थी। नीरा व सेठजी आर्य समाजी थे वे जात पात में ज्यादा विसवास न रखते थे। सेठजी ने नीरा की शादी के लिए एक धनवान व शिक्षित वर ढूंढा। उन्होंने श्रीकांत जयरंजन दास से उनकी शादी करवा दी और शादी में खूब पैसा लगाया। श्रीकांत जयरंजन दास ब्रिटिश पुलिस के खुफिया विभाग में एक अफसर थे। उनके अफसर होने की बात सेठजी को पता थी लेकिन खुफिया विभाग में होने की जानकारी नहीं थी।
नीरा को बाद में पता चला कि जयरंजन दास एक देशद्रोही है और अंग्रेजों का तलवेचाट गुलाम है। उसे अंग्रेजों ने पहले राजा महेंद्र प्रताप की जासूसी में लगा रखा था और अब सुभाष चन्द्र बोस की जासूसी में लगा दिया था। नीरा ने अपने बंगाली अफसर पति से कहा कि देश के क्रांतिकारियों के विरुद्ध लड़ना छोड़ दें। पर उसने कहा कि इससे खूब पैसा मिलता है हमारी आने वाली पीढियां बिना कमाएं ही खाएगी। पर नीरा ने कहा कि देश से बढ़कर कुछ न होता तुम या तो ये रास्ता छोड़ दो या फिर मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। उसके अफसर पति ने कहा कि पैसा होगा तो पत्नियां और बहुत मिल जाएगी। नीरा को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया और वह अपने पिता चौधरी सेठ छज्जुराम जी के घर लौट आई।
आजाद हिंद फौज में भर्ती और देश की प्रथम महिला जासूस बनने का गौरव-
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नीरा के बहुत से रिश्तेदार व साथी आजाद हिंद फौज में शामिल हो रहे थे। तो नीरा ने भी सुना कि नेताजी ने झांसी रेजिमेंट बनाई है। यह सुनकर नीरा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। नीरा ने अपने एक मुंह बोले भाई रामसिंह को अपनी इच्छा बताई जो स्वयं नेताजी को सेना में शामिल होने जा रहे थे। उसने भी हामी भर दी। और उसके बाद नीरा नेताजी से मिली। नेताजी ने उन्हें झांसी रेजिमेंट में शामिल कर लिया। नेताजी ने उन्हें साथ में अंग्रेजों की जासूसी का कार्य दिया। नीरा व उनकी साथी भेष बदलकर अंग्रेजों की छावनी में जाती व जासूसी करती थी। नेताजी के उन्हें विशेष आदेश था कि पकड़े जाने पर स्वयं को गोली मार लेना, अंग्रेजों के हाथ जीवित मत लगना। लेकिन एक बार ऐसी ही एक घटना घटी अंग्रेजों को उनके बारे में पता चल गया वहां से नीरा व उनके सब साथी भागने में कामयाब हो गए लेकिन उनकी एक साथी जीवित ही अंग्रेजों के हाथ लग गयी। बाद में नीरा व उनके साथियों ने उसे छुड़ाने के लिए अंग्रेज छावनी में घुसपैठ व हमला किया। उन्होंने अपने साथी को बचा लिया लेकिन उनकी एक वीर साथी राजमणि देवी के पैर में गोली लग गयी जिससे वह जीवनभर के लिए लंगड़ी हो गयी थी। इस तरह नीरा ने देश की प्रथम महिला जासूस होने का गौरव प्राप्त किया।
नेताजी को बचाने के लिए अपने पति की हत्या कर नागिनी कहलाई-
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एक दिन नेताजी रात्रि के समय अपने टेंट में सोए हुए थे, नीरा व उनके साथियों की जिम्मेदारी रात्रि के पहरे की थी। नीरा टेंट के पीछे की ओर अपनी बंदूक लिए निडर खड़ी थी। तभी नीरा को कुछ आवाज सुनाई दी व एक साया नजर आया, नीरा ने गौर से देखा तो वह उसका पति श्रीकांत जयरंजनदास था जो अंग्रेजों का जासूस अफसर था, वह नेताजी को मारकर 2 लाख का इनाम पाना चाहता था। नीरा ने उसे पहचान लिया और उससे कहा कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तो उसने कहा कि मैं आज नेताजी को मार दूंगा और हम फिर इनाम पाकर खूब मजे करेंगे। लेकिन नीरा ने कहा कि नेताजी मेरे भाई है और इस देश के क्रांतिकारी है नेताजी से गद्दारी मतलब देश से गद्दारी और यह कुकर्म मैं कभी न होने दूंगी। बेहतर होगा कि तुम लौट जाओ वरना मैं तुंम्हे यही ढेर कर दूंगी। यह सुनकर श्रीकांत हंसने लगा कि तुम एक भारतीय नारी हो अपने पति के साथ ऐसा नहीं कर सकती। लेकिन जैसे ही श्रीकांत सोए हुए नेताजी की ओर बढ़ने लगा तो नीरा ने उस पर अपनी बंदूक की नोक पर लगी संगीन(छुर्रा) उसके पेट में दे मारा। श्रीकांत को गुस्सा आया उसने नीरा पर गोली चला दी। लेकिन नीरा किस्मत वाली थी एक गोली उसके कान के पास से व दूसरी गोली गर्दन के नजदीक से छूकर गुजर गई। नीरा बेहोश हो गयी। घायल श्रीकांत नीचे गिर गया। गोली के आवाज सुनके उनके साथी भागकर वहां आये और श्रीकांत को ढेर कर दिया। बेहोश नीरा को गोद में उठाकर स्वयं नेताजी गाड़ी में ले गए और डॉक्टर से कहा कि नीरा को किसी भी कीमत पर बचाओ इस निडर सिपाही की देश को बहुत जरूरत है। नीरा को जब होश आया तो नेताजी ने कहा कि तुमने तो आज नागिनी बनकर मेरे लिए अपने पति की हत्या कर दी। तुम्हारी देशभक्ति पर मैं विभोर हूँ।
देश की आजादी के बाद जब लाल किले पर शहीदों का नाम लिखा जाएगा तो तुम्हारा नाम सबसे ऊपर होगा।
इसके बाद नीरा को नेताजी ने झांसी रेजिमेंट में कैप्टन बना दिया। और नेताजी नीरा को प्यार से नागिनी ही खवे लग गए थे।
नीरा ने आजाद हिन्द फौज में अपनी वीरता का प्रदर्शन कई बार किया। अंडमान निकोबार असम आदि में आजाद हिंद फौज ने झंडे गाड़ दिए और अंग्रेजी शासन को हिला दिया। लेकिन बाद में जापान के सैनिकों ने धोखा दे दिया और दूसरी ओर अमेरिका ने जापान पर हमला कर दिया जिससे फौज कमजोर पड़ गयी।
सब क्रांतिकारी सिपाहियों को पकड़ लिया गया और जेल में डालकर उन पर मुकदमा चलाया। लेकिन देश भर में विद्रोह के कारण लगभग सब फौजियों से केस वापिस ले लिए गए। लेकिन नीरा को अंग्रेजों ने नहीं छोड़ा उसे बंगाल जेल से अंडमान निकोबार की ओर ले गए और काला पानी की सजा दी।
काला पानी की सजा के दौरान सल्युलर जेल में नीरा ने अंग्रेजों की निर्दनीय यातनाएं सही-
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नीरा को सेंट्रल जेल अंडमान में ले जाया गया। वहां नीरा को हर तरह की सजा दी गयी। उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। उससे अंग्रेजो ने पूछा कि बताओ नेताजी कहां है तो नीरा ने कहा कि वे विमान दुर्घटना में चल बसे। लेकिन उन्होंने कहा कि तुम झूठ बोल रही हो नेताजी जिंदा है बताओ कहां है? तो नीरा हंसने लगी और बोली हां वे जिंदा है... तो उन्होंने कहा कि कहाँ? तो नीरा ने कहा...वे मेरे दिल में है। यह सुनकर ब्रिटिश अफसर को गुस्सा आ गया उसने नीरा का आँचल फाड़ा और लुहार के पलास से नीरा के स्तनों को नोचते हुए कहा कि हम सुभाष को तुम्हारे दिल से निकाल देंगे। पर नीरा की आंखों से आंसू बहे लेकिन मुंह पर मुस्कान थी। अंग्रेज झल्लाकर चला गया। नीरा को एक अंधेरी व तंग कोठरी में बन्द किया गया वहां पर ही नीरा को मल व पेशाब करने पड़ता दुर्गंध से कोठरी सड़ने लगी थी। नीरा को सबसे कठोर कार्य करवाये गए। नीरा को एक हाथ बांधकर ऊंचा तब तक लटकाया गया जब तक वह बेहोश न हो गयी। पीने का पानी भी नीरा को कम और दूषित दिया जाता था। नीरा शाकाहारी व आर्य समाजी थी अंग्रेजों ने उसे मुसलमानों के हाथ का पका हुआ सड़ा हुआ मांस जबरदस्ती खिलाया। अंग्रेजों ने नीरा को पानी में बार बार डुबोया। नीरा के नँगे बदन पर कोड़े मारे जाते थे। दुष्ट अंग्रेजों द्वारा उनके जिस्म के साथ भी जबरदस्ती खिलवाड़ किये गए। लेकिन नीरा ने हजारों यातनाओं के बाद भी कोई भी खुफिया जानकारी अंग्रेजों से सांझा नहीं की। अंत में गुस्सा होकर अंग्रेजों ने नीरा को गोल चक्कर की एक चरखी पर चढ़ाया और घुमाया। इससे नीरा का पूरा बदन टूट गया नीरा बेहोश हो गयी। बेहोश नीरा को अंग्रेजों ने एक खतरनाक टापू पर ले जाकर फेंक दिया।
जब नीरा को होश आया तो उसने स्वयं को आदिवासियों के बीच पाया। आदिवासी नीरा को अजीब नजर से देख रहे थे और देखने पर वे खतरनाक लग रहे थे। नीरा को उनकी भाषा भी समझ न आ रही थी तो नीरा ने भगवान को याद करने के लिए ॐ शब्द का उच्चारण किया। ॐ सुनकर आदिवासियों ने नीरा को देवी समझ लिया। वे ॐ का उच्चारण होम के रूप में कर रहे थे। नीरा ने भी समझ लिया किसी भी भाषा व क्षेत्र के ह्यो लेकिन है तो अपने ही लोग। कुछ दिनों में नीरा को उनकी भाषा समझ मे आ गयी तब नीरा ने उन्हें अपनी आप बीती सुनाई। आदिवासी भी अंग्रेजों से चिढ़ते थे उन्होंने नीरा को प्रणाम किया और नीरा को वहां से निकलने के लिए एक मजबूत नाव बनाकर दी व रास्ते में खाने के लिए सब इंतजाम नाव में किये। जैसे तैसे नीरा हैदराबाद पहुंची तब तक देश आजाद ह्यो चुका था।
आजादी के बाद नीरा का असहाय जीवन
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नीरा का शरीर दुर्बल हो चुका था। नीरा ने हैदराबाद में एक झोपड़ी बनजे ली व फूल बेचकर गुजारा करने लगी।हैदराबाद में निजाम का राज था और इस्लामी कटरपंथ चरम पर था। नीरा माथे पर तिलक लगाती थी जिसे देखकर जिहादियों ने उनकी पिटाई कर दी व उनकी फूलों की टोकरी बिखेर दी। परन्तु नीरा ने अपने माथे से तिलक नहीं हटाया। नीरा ने हैदराबाद की आजादी के लिए आर्य समाज का सत्याग्रह अपनी आंखों से देखा। नीरा बूढ़ी हो चुकी थी। वह इस दौरान एक बार अपने गांव भी आई लेकिन किसी ने भी उसे नहीं पहचाना और किसी ने मदद न की। केवल उनके पास के गांव के एक क्रांतिकारी चौधरी करणसिंह तोमर ने ही उन्हें पहचाना और उनकी मदद करने की बात की और सरकार से उन्हें मदद दिलाने के लिए संघर्ष की बात की लेकिन नीरा ने मना कर दिया और कहा कि उन्होंने यह संघर्ष किसी सरकारी मदद के लिए नहीं किया। कर्णसिंह ने उन्हें यही रुकने की सलाह दी लेकिन नीरा ने यह कहकर मना कर दिया कि वह उन पर बोझ नहीं बनना चाहती व हैदराबाद लौट आई। एक दिन नीरा की सरकारी जमीन पर बनी झोपड़ी भी तोड़ दी गयी। नीरा बिल्कुल बुढ़ी हो चुकी थी। एक दिन उन्हें तेज बुखार हुआ और वह बेहोश होकर गिर गयी। तब एक वर्तमान के एक लेखक व हिंदी दैनिक वार्ता के पत्रकार तेजपाल सिंह धामा ने उन्हें देखा। ये वही लेखक है जिन्होंने MF हुसैन द्वारा बनाई गई भारत माता की आपत्तिजनक फोटो पर उससे टक्कर ली थी। उन्होंने नीरा को अपनी पत्नी मधु धामा के साथ मिलकर अस्पताल में भर्ती करवाया। नीरा के दस्तावेज देखकर व आत्मकथा पर लिखे पन्ने देखककर अंदाजा लगा लिया कि ये कोई मामूली औरत नहीं है। जब नीरा होश में आई तो धामा जी के कहने पर नीरा ने अपनी आधी अधूरी वीरता व संघर्षों से भरी कहानी धामा जी को बताई। नीरा की आप बीती सुनकर धामा जी भाव विभोर हो गए। कुछ समय बाद नीरा ने 26 जुलाई 1998 को अस्पताल में ही धामा जी के पास अंतिम सांस ली। धामा जी उनके शव को ले जाने के लिए गाड़ी लाने गए इतने में अस्पताल में भीड़ की वजह से उन्होंने नीरा के शव को अस्पताल से बाहर कर दिया। धामा जी आये तब उनकी पत्नी नीरा के पार्थिव शव को गोद मे लिए अस्पताल के बाहर खड़ी थी। धामा जी ने जैसे तैसे तिरंगे का प्रबंध किया और ससम्मान उनका अंतिम संस्कार किया।
उनका अस्थिकलश, डायरी, पुराने फोटोज व अन्य सामान आज भी हैदराबाद के एक मन्दिर में सुरक्षित रखे हुए हैं व स्मारक के लिए आज भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इस तरह देश की प्रथम महिला जासूस, आजाद हिन्द फौज की महान क्रांतिकारी कैप्टन, नेताजी की धर्मबहन, चौधरी सेठ छज्जुराम की धर्मपुत्री, काला पानी की सजा भोगने वाली नीरा आर्य की संघर्ष भरी जिंदगी का अंत हो गया।
ऐसी महान क्रांतिकारी को हम जीवित रहते तो कुछ न दे पाए कम से कम अब उनकी मृत्यु के बाद तो हमें उनके नाम को फिर से जीवित करना चाहिए, उनकी वीरगाथा हर जन तक पहुंचानी चाहिए, उनके लिए स्मारकों का निर्माण करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिल सके।
लेखन व प्रस्तुति- जयदीप सिंह नैन

04/08/2021

एक #पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख एक #फकीर अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि..
"मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।"
पंडित जी के पूछने पर उस फकीर ने कहा कि...
जब आपके चढ़ाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा।
इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।"
यह मनगढ़ंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि -
"सब पाखण्ड है जी..!"
शायद मैं कुछ ज्यादा ही सहिष्णु हूँ...
इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा सोचते नहीं है क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ... उसके बाद उसे जबाब देता हूँ।
खैर... मैने कुछ कहा नहीं ....
बस, सामने मेज पर से 'कैलकुलेटर' उठाकर एक नंबर डायल किया...
और, अपने कान से लगा लिया।
बात न हो सकी... तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की।
इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए।
और, बोले- " ये क्या मज़ाक है...??? 'कैलकुलेटर' में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???"
तब मैंने कहा.... तुमने सही कहा...
वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि.... स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ???
इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे-
"ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है... तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए"
इस पर मैने कहा.... ये सब छोड़िए
और, ये बताइए कि न्युक्लियर पर न्युट्रॉन के बम्बार्डिंग करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?
वो बोले - " बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।"
फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लियर्स भी हैं और न्युट्रॉन्स भी...!
अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए...!!
साहब समझ गए और थोड़े संकोच से बोले-
"जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं "
कहने का मतलब है कि..... यदि, हम किसी तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन या अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है।
इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.
क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..
फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???
अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो... इसका मतलब ये थोड़े न घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है।
हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं।
इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें...!
और हाँ...
जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो....
क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे बीज बोकर लगाए हैं...या, किसी को ऐसा करते हुए देखा है?
क्या पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?
इसका जवाब है नहीं....।
ऐसा इसीलिए है क्योंकि... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी।
इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है।
जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं।
उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां-वहां पर ये दोनों वृक्ष उगते हैं।
और... किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन देता है और वहीं बरगद के औषधीय
गुण अपरम्पार है।
साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है।
तो, कौवे की इस नयी पीढ़ी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है...
शायद, इसीलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के इन नवजात बच्चों के लिए ही हर छत पर श्राद्ध पक्ष में पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी।
जिससे कि कौवों की नई पीढ़ी का पालन पोषण हो जाये......
इसीलिए.... श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।
साथ ही... जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध पक्ष का प्रावधान दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं।
अतः.... सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि....
जब दुनिया में तुम्हारे ईसा-मूसा-और कथित विद्वानों आदि का नामोनिशान नहीं था...
उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं।
साथ ही... हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है...
कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं...?

देश की आजादी के बाद 70 वर्षों में इन्हीं बातों को सत्ता के संरक्षण में वामपंथी बकैतों द्वारा अंधविश्वास और पाखंड साबित करने का काम हुआ है।

30/07/2021

एक दिन टाँगों ने चलने से साफ इन्कार कर दिया... एवं, कहा....
"मैं अन्याय बर्दाश्त नहीं कर सकता.
बहुत हो गया...
अब, मैं सारे शरीर का बोझ नहीं उठाऊँगा ।"
आँखें... टाँगों के इस अनपेक्षित व्यवहार पर चकित रह गईं ,
तो टाँग बिफर पड़ा -
"तुम्हारा क्या है ?
तुम तो आराम से बैठी रहती हो ।"
आंखों ने समझाते हुए कहा...
"मैं बैठी रहती हूँ ?
जब तुम चलते हो तो मैं एकटक रास्ता देखती रहती हूँ...
ताकि तुम गिर न जाओ ।"
टांगो ने चिल्लाते हुए कहा.... "फिर मुझे ठेस क्यों लग जाती है ?
यह क्यों नहीं कहती कि बैठी-बैठी पलकें झपकाती रहती हो ।"
हाथों ने भी टाँगों को कुछ समझाना चाहा...
तो टाँगें फुफकार उठीं -
"दो-चार दिन तुम चलकर देख लो , घावों की पीड़ा सहन नहीं कर पाओगे ।"
हाथों ने भी समझाया...
"ऐसा न कहो मित्र !
यह ठीक है कि हम चल नहीं सकते...
पर जब तुम थक जाते हो तो हम तुम्हारी सेवा किया करते हैं ।"
बहुत देर से चुप मस्तिष्क ने इनसे आपस में लड़ने का कारण पूछा तो क्रोधित टाँगें बोल उठी..
"इस सबका कारण तुम हो.
खुद तो सोते रहते हो और दूसरों से काम करवाते हो.
कभी कुछ काम करके तो देखो."
मस्तिष्क ने विस्मित भाव से पूछा...
"मैं सोता रहता हूँ ?
मुझसे अधिक तनाव भला कौन लेता है ?
तुम्हारी पीड़ा तो सबको दिखती है और तुम्हारी सेवा भी होती है.
लेकिन, मेरी सेवा कौन करता है ?
कोई मेरी ओर देखता भी नहीं ।"
इस पर टाँगों ने जैसे अपना फैसला सुनाया कि....
"मैं तुम्हारी इन भोली-भाली बातों में नहीं आने वाला.
और, तुम्हारी तरह मैं भी इसी शरीर का अंग हूँ.
मेरा अधिकार तुमसे कम नहीं है.
यदि तुम इतना ही विचारवान हो तो मुझसे अपना काम बदल लो."
इस तरह...... किसी एक अंग के विद्रोह ने विष-बीज बो दिया और एक-एक कर शरीर के सभी अंगों ने एक-दूसरे की सहायता करना बन्द कर दिया एवं एक-दूसरे से सम्बन्ध बिगाड़ लिये तथा एक-दूसरे के शत्रु बन बैठे
और, अन्ततः अपने सभी अंगों सहित वह शरीर नष्ट हो गया.
👉 आज हमारा हिन्दू समाज भी उसी स्थिति से गुजर रहा है.
जहाँ समाज के सभी वर्ण एक दूसरे से परस्पर सहयोग के बजाए खुद के वर्ण को समाज का पिलर साबित करने में लगा है.
जहाँ ब्राह्मणों का कहना है कि.... हमारे दादा परदादा ज्ञानी रहे हैं...
और, हमने ही सबको ज्ञान दिया है.
इसीलिए हम सर्वोच्च है और हमारा आदर करो.
जबकि, क्षत्रिय का कहना है कि... हम आदर क्यों करें ?
अगर हम तुम्हे नहीं बचाते तो तुम ज्ञान कहाँ से देते ?
हमने अपना खून बहाकर तुम्हारी और हिन्दू धर्म की रक्षा की है इसीलिए हम ज्यादा सुपीरियर हैं.
वहीं वैश्य का कहना होता है कि.... अगर हम धन नहीं देते तो ना तुम शिक्षा दे पाते, ना यज्ञ होते , ना मंदिर बनते और न ही देश की रक्षा हो पाती.
हम समाज के कुबेर हैं... इसीलिए , हमसे बेहतर कोई नहीं.
जबकि, शूद्र समाज का कहना है कि.... अगर हम अपनी सेवा नहीं देते तो.... ना मंदिर का निर्माण होता, ना तलवार बनते, ना रथ चलते और न ही कोई काम हो पाता.
इसीलिए, हमसे बेहतर भला कौन है ?
साबित करो इस बात को...
इस तरह... आपस में ही तनातनी हो रही है और समझा कर सबको एकजुट करने वालों का अकाल पड़ा हुआ है.
👉👉👉 असल में हमारा हिन्दू समाज आजतक ये समझ ही नहीं पाया है कि.... शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए शरीर का हर अंग महत्वपूर्ण है.
चलने वाले टांग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि रक्षा करने वाले हाथ.
अगर पैर नहीं होंगे तो अकेले हाथ से युद्ध में क्या कर पाएंगे ?
उसी तरह... दिमाग खूब काम करे लेकिन आंख से दिखे ही न... तो क्या उपयोग है ?
और.... हाथ , पैर , आंख सब कुछ अच्छा रहे और आदमी भी हट्टा कट्टा रहे ..
लेकिन, उसका दिमाग ही सुन्न रहे तो फिर वो किस काम का ?
इसीलिए, जिस तरह से शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए शरीर के सभी अंगों का स्वस्थ रहना जरूर है....
और, सभी अंगों का सम्मान जरूरी है.
उसी तरह हिन्दू समाज को भी सुचारू रूप से चलाने के लिए एवं हिन्दू समाज को मजबूती प्रदान करने के लिए...
हिन्दू समाज के हर वर्ग का स्वस्थ रहना एवं सबमें सामंजस्य रहना जरूरी है.
नहीं तो.... ऊपर की कहानी में जिस तरह ...
किसी एक अंग के विद्रोह ने विष-बीज बो दिया
और, अन्ततः अपने सभी अंगों सहित वह शरीर नष्ट हो गया.
उसी तरह हमारा हिन्दू समाज भी अपने सभी वर्णों समेत नष्ट हो जाएगा.
और, रह जाएगी सिर्फ बकरे जैसी दाढ़ी, चेक वाली लुंगी और माथे पर जालीदार टोपी.
जय महाकाल...!!!

30/07/2021

एक व्यक्ति की बीवी के साथ कोई बदसलुकी कर रहा था
तो वो भागकर अंदर गया और चरखा उठा लाया
और चलाने लगा
बीवी को गुस्सा आया और वो चिल्लाई :
तुम पागल हो क्या ये गुंडा मेरे साथ गलत कर रहा है
और तुम चरखा चला रहे हो ?? व्यक्ति : चरखे से तो अंग्रेज भाग गए फिर ये किस खेत की मूली है
ये भी भाग जाएगा!
ये कहकर व्यक्ति चरखा और जोर से चलाने लगा
जब तक वो गुंडा उस नारी के साथ और ज्यादा बदतमीजी करता रहा!
बीवी रोती हुई गुस्से में पति से बोली
छोडो ये चरखा और pls मुझे बचाओ!
ये सुनकर व्यक्ति ने चरखा side में पटका
और उठकर उस बदमाश के निकट गया
और पूरी विनम्रता से बोला मेरी पत्नी को छोड़ दीजिये!
इतना सुनते ही उस गुंडे ने व्यक्ति के एक खेंचके झाँपट मार दिया!
तो पति ने दूसरा गाल आगे कर दिया
और फिर बोला pls मेरी बीवी को छोड़
दीजिये उस गुंडे ने दूसरे गाल पे भी एक कसके झाँपड़ मार दिया
व्यक्ति बेहोश हो गया!
इतने में एक भगत सिंह नाम का वीर वहाँ से गुजरा,
उसने जब चीख पुकार सुनी तो वो अंदर गया
और उस महिला को बचाने के लिए गुंडे से भिड़ गया
और आखिर में उस गुंडे को भगा दिया!
उस औरत ने भगत सिंह को धन्यवाद दिया,
तभी पुलिस वहाँ पहुंच गयी
तो पत्नी ने सारा क्रेडिट अपने पति को दे दिया
और दोनों लाल गाल दिखा कर पति ने बहादुरी के सबूत दिखा दिए,
पुलिस ने उस पति को
"वीरता चक्र दिया और भगत सिंह को पकड़ के
गुंडा गर्दी करने के आरोप में जेल में डाल दिया !"

27/07/2021

कफन नहीं उसे कात्रो या कात्रा कहते हैं
मृत्यु पश्चात जो कपड़ा मृत शरीर को ओढ़ाया जाता है, उसे #कात्रो या #कात्र कहा जाता है।
लेकिन अधिकांशतः लोग कहते हैं कि कफन ले आओ। जबकि "कफन" उर्दू का शब्द है और "दफन" करने पर डाला जाता है।
हमारे #सनातनधर्म में दाह-संस्कार होता है इसलिए मृतात्मा को #कात्रन (दो गज कपड़ा) मान सम्मान से ओढ़ाया जाता है।

13/07/2021

देश के सभी मंदिरों को सुरक्षा की जरूर होती है जबकि मस्जिदों को नही. इसका सीधा मतलब है कि हिंदू अच्छे और मुसलमान आतंकी और आतंकवादियों का मूक समर्थक होते हैं

01/07/2021

प्रिय बापू गांधी, आप आज ज़िंदा होते तो शायद मेरे इन प्रश्नो के उत्तर दे पाते।
1. आप एक काले आदमी लंदन में रहकर बिना किसी परेशानी के गोरो के साथ पढ़ते, होस्टल के एक कमरे में रहते हैं, एक मेस में खाते है फिर अचानक ट्रेन में एक साथ सफर करने में फेंक दिए जाते है? क्यूँ? ये बात कतई हजम नही हुई। 😊
2. फिर आप वही काले भारतीय उन्हीं गोरों की सेना में सार्जेंट मेजर बनते हैं और दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश बोर वार में आपकी तैनाती एम्बुलेंस यूनिट में होती है जहां आप लड़ाई में गोरों का कालों के विर्रुध साथ देते हैं। मिलिट्री यूनिफॉर्म में आपकी की फोटो पूरे इंटरनेट उपलब्ध है। सार्जेंट मेजर गांधी लिखकर सर्च कर लीजिए। 😠
3. फिर आप में अचानक 46 वर्ष की उम्र में 1915 में देशप्रेम जागा और मिलिट्री यूनिफार्म उतारकर आपको बैरिस्टर घोषित कर दिया गया। (रानी लक्ष्मी बाई, खुदीराम बोस, बिस्मिल, भगतसिंह और आजाद जैसे अनेकों देशभक्तों की 25 की उम्र आते आते तक शहादत हो गई थी।) 😥
4. फिर आपको महात्मा बुद्ध की तरह शांति अहिंसा का दूत बनाकर दक्षिण अफ्रीका से सीधे चंपारण भेज दिया जाता है जहाँ नील उगाने वाले किसानों के आंदोलन को आप हैक कर लेते हैं। हिंसक होते आंदोलन को अहिंसा शांति के फुस्स आंदोलन में बदल देते हैं। क्यूँ?
5. आप महात्मा बुद्ध की तरह दिन में एक धोती लपेट कर शांति अहिंसा के नाम पर भारतीयों के आजादी के लिये होनेवाले हर उग्र आंदोलन की हवा निकाल कर उसे बिना किसी परिणाम के अचानक समाप्त कर देते हैं और अंग्रेज चैन की सांस लेते रहते हैं। क्यूँ?
6. नंगा फकीर बनकर अपने साथ अपनी बेटी भतीजी के अलावा अनेक औरतों के साथ खुद पर परीक्षण करने के लिये नंगे सोते हैं और अपने सेल्फ़-कंट्रोल को टेस्ट करते हैं। कौनसा महात्मा ऐसा करता है?(यह अपनी पुस्तक "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" में उन्होंने खुद स्वीकार किया है।)😠
7. आप अहिंसा के पुजारी, प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का खुला साथ देते हैं और अपने अहिंसा के सिध्दांतों को दरकिनार करके भारतीयों को कहते हैं सेना में भर्ती हो जाओ और युद्ध करो ताकि ब्रिटिश राज बचा रहे। तब अहिंसा आड़े नहीं आयी?
8. इसी अहिंसा की ख़ातिर नेताजी का कांग्रिस से इस्तीफ़ा दिला दिया? जब अंग्रेजों की तरफ से लड़ना अहिंसा है तो अपने देश के लिये लड़ना क्यों बुरा था?
9. दिल्ली के मंदिर में कुरान पढ़ने की जिद पूरी करने के लिए पुलिस बुला लेते हैं पर कभी मस्जिद में गीता या रामायण नहीं पढ़ने की हिम्मत जुटा पाते। पाकिस्तान को 55 करोड़ और आज के बांग्लादेश जाने 120 KM चौड़ा कॉरिडोर जिसके दोनों तरफ 10 KM तक केवल मुस्लिम ही जमीन खरीद सके उसकी जिद पकड़कर अनशन करने की धमकी देकर ब्लैकमेल करते हैं। यही अनशन आपने पाकिस्तान ना बनने के लिए क्यूँ नहीं किया?
बापूजी सत्य यह है आपके अहिंसा के पाठ सिर्फ़ हिंदुओ के ही लिए थे जिन्होंने हिंदुओ को नपुंसक बना दिया। वहाँ पंजाब, सिंध, केरल में हिंदू मरते रहे, भगत सिंह सूली चड़ गया मगर आपने अनशन नहीं दिए।

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