Ekadashi Stories

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💐पुत्रदा एकादशी/PUTRDA EKADASHI💐🚩🌸🚩🌸🚩🌸🚩🌸🚩🌸🚩🚩इस एकादशी के व्रत से पूरी होती है संतान प्राप्ति की इच्छा🚩🔱श्रावण मास शुक्ल ...
23/08/2026

💐पुत्रदा एकादशी/PUTRDA EKADASHI💐

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🚩इस एकादशी के व्रत से पूरी होती है संतान प्राप्ति की इच्छा🚩

🔱श्रावण मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जानते हैं। सावन महीने के खास त्योहारों की तरह इस एकादशी का भी विशेष महत्व है। यह एकादशी अपने नाम के अनुरूप ही मनुष्य को संतान सुख प्रदान करती है।🔱

⚜️कुछ कथाओं में कहा गया है कि इस एकादशी के व्रत का लाभ स्त्री और पुरुष दोनों सामान रूप से ले सकते हैं। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु की उपासना में किया जाता है और इस व्रत के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने की इच्छा से किया जाता है।⚜️

🔔माना जाता है कि भगवान विष्णु का ध्यान रखकर एकादशी का उपवास करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।🔔

💐एकदशी व्रत कथा💐

🌷प्राचीन समय में एक नगर में महिजीत नाम के राजा राज करते थे। उनके कोई संतान न थी इसके कारण एक दिन वह बहुत दुखी हुए। मंत्रियों और दरबारियों को राजा का यह दुख देखा न गया तो तो उन्होंने आपस में विचार विमर्श कर राजा को लोमश ऋषि के पास लेकर गए। यहां मंत्रियों ने ऋषि से राजा के निःसंतान होने का कारण और उसका उपाय पूछा🌷

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🍂महाज्ञानी लोमश ऋषि ने बताया कि पूर्व जन्म में राजा को एक बार एकादशी के दिन भूखा प्यासा रहना पड़ा था। राजा जब जंगल भटक रहे थे 🍂

🍁तभी उन्हें जोर की प्यास लगी। पानी की तलाश में एक सरोवर पर पहुंचे तो एक ब्यायी गाय वहां पानी पीने आ गई। लेकिन राजा ने गाय को भगा दिया और स्‍वयं की प्यास बुझाई। इस प्रकार राजा अनजाने में एकादशी का व्रत हो गया और गाय को प्यासा भगाने के कारण इस जन्म में उसे निःसंतान रहना पड़ रहा है।मंत्रियों ने ऋषि से हाथ जोड़कर प्रार्थना की वह इसका कोई उपाय बताएं।🍁

🌺लोमश ऋषि ने मंत्रियों से कहा कि अगर आप लोग चाहते हैं कि राजा को संतान की प्राप्ति हो तो वे लोग श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत रखें और द्वादशी के दिन अपना व्रत राजा को दान कर दें। इसके बाद मंत्रियों ने ऋषि के बताए उपाय के अनुसार, एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को राजा को व्रत दान किया।🌺

🌹इससे राजा को एक सुंदर संतान की प्राप्ति हुई। तभी इसे इस एकदशी का नाम पुत्रदा एकदशी पड़ गया।🌹

🌼व्रत विधि-🌼

🌝 सावन महीने की शुक्ल पक्ष की एकदशी यानी पुत्रदा एकदशी को सुबह नहाकर भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराएं और भोग लगाएं। पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण करते रहें और पूरे दिन कुछ न खाएं।🌝

🐚इस व्रत में अन्न किसी भी समय नहीं लेना चाहिए। अगर आप निराहार नहीं रह सकते तो बिना तला हुआ आहार, फल आदि ले सकते हैं। इस दिन पूरे समय भगवान विष्णु जाप करते रहें।🐚

🪷व्रत के अगले दिन वेद पाठ करने वाले ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें। ऐसा करने से घर में सुख, शांति, ऐश्वर्य में वृद्धि होती है और निश्चित रूप से संतान सुख की प्राप्ति होती होगी।🪷

निर्जला एकादशी व्रत कथा /Nirjala Ekadashi Vrat Katha 🌹💐🌹💐🌹💐🌹💐🌹🚩क्या निर्जला एकादशी में बिल्कुल नहीं पीना चाहिए पानी?💐निर...
25/06/2026

निर्जला एकादशी व्रत कथा /Nirjala Ekadashi Vrat Katha
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🚩क्या निर्जला एकादशी में बिल्कुल नहीं पीना चाहिए पानी?

💐निर्जला एकादशी में जल पीना मना है। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हैं। इसके अलावा जल पीने से व्रत टूट जाता है। सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक जल का त्याग करना चाहिए।

🌺ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस बार यह 25 जून को है। भीम ने केवल यही एकादशी करके सारी एकादशियों का फल प्राप्त किया था। सनातन धर्म में श्री हरि को सर्वाधिक प्रिय एकादशी व्रत है।

🌼कथा है- एक बार महर्षि व्यास से भीम ने कहा,‘भगवन! युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुन्ती और द्रौपदी, सभी एकादशी व्रत करते हैं। मुझसे भी व्रत रखने को कहते हैं, परन्तु मैं तो बिना खाए रह नहीं सकता। मुझे तो कोई ऐसा व्रत बताइए, जिसे मैं कर सकूं और जिससे स्वर्ग की प्राप्ति भी हो।

🌸तब व्यास जी ने कहा- ‘कुंतीनंदन, धर्म की यही विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता, बल्कि सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है।

🌹जयेष्ठ मास में सूर्य के वृष या मिथुन राशि में रहने पर शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को तुम व्रत करो।

💐श्री कृष्ण ने मुझे इस बारे में बताया था। इसे करने से तुम्हें वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होगा और सुख, यश प्राप्त करने के बाद स्वर्ग भी मिलेगा।'

🚩निर्जला एकादशी के व्रत रखने से मिलता है पुण्य

🔱भीम ने बडे़ साहस के साथ निर्जला एकादशी का व्रत किया, लेकिन इस कठिन व्रत के कारण सुबह होने तक वह बेहोश हो गए। तब गंगाजल, तुलसी चरणामृत, प्रसाद देकर अन्य पांडव उन्हें होश में लाए। भीम ने द्वादशी को स्नान आदि कर भगवान केशव की पूजा कर व्रत सम्पन्न किया।

🌸इसी कारण इसे भीमसेन एकादशी भी कहा जाता है। निर्जल रह कर ब्राह्मण या जरूरतमंद आदमी को हर हाल में शुद्ध पानी से भरा घड़ा इस मंत्र के साथ दान करना चाहिए-

देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम् ।।
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🚩अर्थात संसार सागर से तारने वाले देवदेव हृषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइए।.🚩

💐व्रती को ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप दिन-रात करते रहना चाहिए। साथ ही सामर्थ्य हो तो गर्मी में काम आने वाली वस्तुओं- वस्त्र, छाता, जूता, फल आदि का दान भी दक्षिणा सहित जरूर करना चाहिए।
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परमा एकादशी | व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व / Parma Ekadashi 💞💞💞💞💞💞💞💞💞💞💞💞💐अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी ...
10/06/2026

परमा एकादशी | व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व / Parma Ekadashi
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💐अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं।

🚩जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है, अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती हैं।

🔱 काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का एक अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री अत्यंत पवित्र तथा पतिव्रता थी। किसी पूर्व पाप के कारण वह दंपती अत्यंत दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

🌼 ब्राह्मण को भिक्षा मांगने पर भी भिक्षा नहीं मिलती थी। उस ब्राह्मण की पत्नी वस्त्रों से रहित होते हुए भी अपने पति की सेवा करती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी और पति से कभी किसी वस्तु की मांग नहीं करती थी। दोनों पति-पत्नी घोर निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

🌸 एक दिन ब्राह्मण अपनी स्त्री से बोला- ‘हे प्रिय! जब मैं धनवानों से धन की याचना करता हूँ तो वह मुझे मना कर देते हैं। गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती, इसलिए यदि तुम्हारी सहमति हो तो मैं परदेस जाकर कुछ काम करूं, क्योंकि विद्वानों ने कर्म की प्रशंसा की है।’

🌹 ब्राह्मण की पत्नी ने विनीत भाव से कहा- ‘हे स्वामी! मैं आपकी दासी हूं। पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए। मनुष्य को पूर्व जन्म में किए कर्मों का फल मिलता है। सुमेरु पर्वत पर रहते हुए भी मनुष्य को बिना भाग्य के स्वर्ण नहीं मिलता।

🌺 पूर्व जन्म में जो मनुष्य विद्या और भूमि दान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में विद्या और भूमि की प्राप्ति होती है। ईश्वर ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, उसे टाला नहीं जा सकता।

🌸 यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते हैं, इसलिए आपको इसी स्थान पर रहना चाहिए, क्योंकि मैं आपका विछोह नहीं सह सकती। पति बिना स्त्री की माता, पिता, भाई, श्वसुर तथा सम्बंधी आदि सभी निंदा करते हैं, हसलिए हे स्वामी! कृपा कर आप कहीं न जाएं, जो भाग्य में बदा होगा, वह यहीं प्राप्त हो जाएगा।’

🌺 स्त्री की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। इसी प्रकार समय बीतता रहा। एक बार कौण्डिन्य ऋषि वहां आए।

🎊 ऋषि को देखकर ब्राह्मण सुमेधा और उसकी स्त्री ने उन्हें प्रणाम किया और बोले- ‘आज हम धन्य हुए। आपके दर्शन से आज हमारा जीवन सफल हुआ।’ ऋषि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया। भोजन देने के बाद पतिव्रता ब्राह्मणी ने कहा- ‘हे ऋषिवर! कृपा कर आप मुझे दरिद्रता का नाश करने की विधि बतलाइए। मैंने अपने पति को परदेश में जाकर धन कमाने से रोका है। मेरे भाग्य से आप आ गए हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट हो जाएगी, अतः आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए कोई उपाय बताएं।

🔱 ब्राह्मणी की बात सुन कौण्डिन्य ऋषि बोले- ‘हे ब्राह्मणी! मल मास की कृष्ण पक्ष की परम एकादशी के व्रत से सभी पाप, दुख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है। इस व्रत में नृत्य, गायन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए।

💐 भगवान शंकर ने कुबेरजी को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया था। इसी व्रत के प्रभाव से सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को पुत्र, स्त्री और राज्य की प्राप्ति हुई थी।’

🌸 तदुपरांत कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें एकादशी के व्रत का समस्त विधान कह सुनाया। ऋषि ने कहा- ‘हे ब्राह्मणी! पंचरात्रि व्रत इससे भी ज्यादा उत्तम है। परम एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधानपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए।

🚩जो मनुष्य पांच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने मा-पिता और स्त्री सहित स्वर्ग लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक संध्या को भोजन करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। जो मनुष्य स्नान करके पांच दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे समस्त संसार को भोजन कराने का फल पाते हैं।

🌼 जो मनुष्य इस व्रत में अश्व दान करते हैं, उन्हें तीनों लोकों को दान करने का फल मिलता है। जो मनुष्य उत्तम ब्राह्मण को तिल दान करते हैं, वे तिल की संख्या के बराबर वर्षो तक विष्णुलोक में वास करते हैं। जो मनुष्य घी का पात्र दान करते हैं, वह सूर्य लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हैं, वे देवांगनाओं के साथ स्वर्ग को जाते हैं। हे

🎊 ब्राह्मणी! तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को धारण करो। इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🚩 कौण्डिन्य ऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण और उसकी स्त्री ने परम एकादशी का पांच दिन तक व्रत किया। व्रत पूर्ण होने पर ब्राह्मण की स्त्री ने एक राजकुमार को अपने यहां आते देखा।

🌹 राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, उन्हें रहने के लिए दिया। तदुपरांत राजकुमार ने आजीविका के लिए एक गांव दिया। इस प्रकार ब्राह्मण और उसकी स्त्री इस व्रत के प्रभाव से इहलोक में अनंत सुख भोगकर अंत में स्वर्गलोक को गए।

परमा एकादशी व्रत विधि | Parma Ekadashi Vrat Vidhi In Hindi
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💐 एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को एकाद्शी के दिन प्रात: उठना चाहिए । प्रात:काल की सभी क्रियाओं से मुक्त होने के बाद मिट्टी, तिल, कुश और आंवले के लेप के साथ स्नान करना चाहिए । इस स्नान को किसी पवित्र नदी, तीर्थ या सरोवर अथवा तालाब पर करना चाहिए । स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए ।

🌺 व्रत करने वाले को घी का दीपक जलाकर फल, फूल, तिल, चंदन एवं धूप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए । इस व्रत में विष्णु सहस्रनाम एवं भगवान विष्णु के अन्य स्तोत्रों का पाठ करने का बड़ा महत्व होता है । व्रत करने वाले को जब भी समय मिले इनका पाठ अवश्य करना चाहिए । सात्विक भोजन करना चाहिए, भोजन में मसूर, चना, शहद, शाक और मांगा हुआ भोजन नहीं करना चाहिए ।

परमा एकादशी व्रत महत्व | Importance Of Parama Ekadashi Vrat
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🔱 जो मनुष्य परम एकादशी का व्रत करता है, उसे सभी तीर्थों व यज्ञों आदि का फल प्राप्त होता है। जिस प्रकार संसार में दो पैरों वालों में ब्राह्मण, चार पैरों वालों में गौ, देवताओं में देवेंद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मासों में अधिक (लौंद) मास उत्तम है। इस माह में पंचरात्रि अत्यंत पुण्य देने वाली होती है। इस माह में पद्मिनी और परम एकादशी भी श्रेष्ठ है। इनके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः दरिद्र मनुष्य को एक व्रत जरूर करना चाहिए। जो मनुष्य अधिक मास में स्नान तथा एकादशी व्रत नहीं करते, उन्हें आत्महत्या करने का पाप लगता है। यह मनुष्य योनि बड़े पुण्यों से मिलती है, इसलिए मनुष्य को एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
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🚩पद्मिनी एकादशी /Padmini Ekadashi 2026🚩💐🌹💐🌹💐🌹💐🌹💐🌹💐💐साल 2026 में पद्मिनी एकादशी ज्येष्ठ के महीने में आया है, जब मलमास लगा...
26/05/2026

🚩पद्मिनी एकादशी /Padmini Ekadashi 2026🚩

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💐साल 2026 में पद्मिनी एकादशी ज्येष्ठ के महीने में आया है, जब मलमास लगा हुआ है.

🌹मलमास के महीने को अधिक मास भी कहते हैं. जो एकादशी, अधिकमास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है उसे पद्मिनी एकादशी कहते हैं.

🔱 इसे कमला एकादशी भी कहते हैं. यानी यह एकादशी हर साल नहीं आती. बल्कि यह अधिकमास के साथ ही आती है. यानी जिस साल अधिकमास लगता है, पद्मिनी एकादशी भी उसी साल आती है.

❤️ यही वजह है कि इस एकादशी को ज्येष्ठ अधिकमास एकादशी भी कहा जाता है. इस साल यह एकादशी 26 मार्च को है. कमला या पद्मिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा तो होती है, साथ में भगवान शंकर और पार्वती पूजा भी होती है.

🌺इस साल पद्मिनी एकादशी पर खास संयोग बन रहा है, इसलिए इस बार यदि आप पद्मिनी एकादशी करते हैं तो अपार लाभ प्राप्त होता है. धन और स्वास्थ्य का आर्शीवाद मिलता है और शत्रुओं का नाश होता है.

🌸भगवान विष्णु ने पद्मिनी को पुत्र का वरदान दिया था. ऐसे में जिन्हें कोई संतान नहीं है, वह यदि पद्मिनी एकादशी व्रत रखें तो उन्हेें संतान सुख की प्राप्ति जरूर होती है.

💐क्यों है खास मलमास के महीने को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित है. इस महीने में भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से ना केवल मनचाही इच्छाएं पूरी होती हैं, बल्कि जाने-अनजाने में किए गए पाप भी नष्ट हो जाते हैं. इसी महीने में पद्मिनी एकादशी का आना इसे और भी शुभ बना देता है.

अपरा एकादशी व्रत कथा / Apara Ekadashi Vrat Katha       🌷🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸🔱 युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से इस व्रत के माहात्म्य के बार...
13/05/2026

अपरा एकादशी व्रत कथा / Apara Ekadashi Vrat Katha

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🔱 युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से इस व्रत के माहात्म्य के बारे में विस्तार से बताने को कहा. युधिष्ठिर ने कहा कि हे प्रभु ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है, कृपा कर कहिए?

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❤️ युधिष्ठिर के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण बताने लगे. हे राजन! यह एकादशी अचला और अपरा एकादशी के नाम से जानी जाती है. पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है. जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं.

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🙏🏻 अपरा एकादशी के दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है. अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं. इस व्रत को करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं. जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं, वे अवश्य नरक में पड़ते हैं. मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं.

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🚩जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा अर्द्ध प्रसूता गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है

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♥️ यह व्रत एक ऐसी कुल्हाड़ी है जो पापरूपी वृक्ष को काट देती है. पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है. इसलिए मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए. अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है.

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🌺इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था. उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था. वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था. उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया. इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा.

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🌼 एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे. उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया. अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा. ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया.

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🔱 दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया. इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई. वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया.

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🚩 हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है. इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है.

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मोहिनी एकादशी नाम का महत्त्व🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩मोहिनी एकादशी के विषय में कहा गया है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश पाने के लिए द...
27/04/2026

मोहिनी एकादशी नाम का महत्त्व

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मोहिनी एकादशी के विषय में कहा गया है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश पाने के लिए दानवों एवं देवताओं के मध्य जब विवाद हो गया तब भगवान् विष्णु ने अति सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर दानवों को मोहित कर दिए थे और अमृत कलश लेकर देवताओं को सारा अमृत पीला दिया था और सभी देवता अमृत पीकर अमर हो गये। कहा जाता है कि जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण किये थे उस दिन वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि थी इसी कारण भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के रूप में की जाती है। यही जो भक्त यह व्रत करता है वह अपने समस्त परेशानियों को मोहिनी रूप धारण कर समाधान करने का सामर्थ्य रखेगा।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा | Story of Mohini Ekadashi Vrat

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प्रचलित मोहिनी एकादशी व्रत कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी। वहां चन्द्रवंश में उत्पन धृतिमान नामक राजा राज करते थे। उसी नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य भी रहता था जो धनधान्य से परिपूर्ण और सुखी जीवन यापन कर रहा था। वह सदा पुन्यकर्म में ही लगा रहता था। भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। उसके पाँच पुत्र थे। सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्ट्बुद्धि। धृष्ट्बुद्धि पांचवा पुत्र था। वह हमसह अकृत्य कामो ( जुआ, चोरी इत्यादि ) में लगा रहता था। वह वेश्याओं के ऊपर अपने पिता का धन बरबाद किया करता था । एक दिन उसके पिता से यह सब सहन नहीं हो सका और परेशान होकर उसे उसे अपने घर से निकाल दिया इसके बाद इधर-उधर भटकने लगा। इसी क्रम में भूख-प्यास से व्याकुल वह महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा और वह मुनिवर कौँन्डिन्य के पास जाकर करबद्ध होकर बोला : भगवन मेरे ऊपर दया करे मुझे कोई ऐसा मार्ग बताये जिससे मुझे मुक्ति मिल जाए।

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कौँन्डिन्य ऋषि बोले – वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्द एकादशी का व्रत करो। ‘मोहिनी’ एकादशी के दिन उपवास करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।’ मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट्बुद्धि का प्रसन्न हो गया और उन्होंने कौँन्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया और इस व्रत के करने से उसके सभी पाप कर्म करना बंद कर दिया तथा भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पाप मुक्त हो गया और स्वर्गलोक में प्रस्थान कर गया। इसलिए यह व्रत अत्यन्त श्रेष्ठ व्रत माना गया है इस व्रत को करने से व्यक्ति का कल्याण होता है।

मोहिनी एकादशी व्रत विधि | Method of Mohini Ekadashi Vrat

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जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करता है उसे एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। उस दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्य क्रिया से निवृत्य होकर स्नान कर लेना चाहिए। यदि सम्बव हो तो गंगाजल को पानी में डालकर नहाना चाहिए।स्नान करने के लिए कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण कर विधिवत भगवान श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

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भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप जलाएं तथा पुनः व्रत का संकल्प ले, कलश की स्थापना कर लाल वस्त्र बांध कर कलश की पूजन करें। इसके बाद उसके ऊपर भगवान की प्रतिमा रखें, प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध करके नव वस्त्र पहनाए। उसके बाद पुनः धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए और नैवेध तथा फलों का भोग लगाना चाहिए। फिर प्रसाद का वितरण करे तथा ब्राह्मणों को भोजन तथा दान-दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए। रात्रि में भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। दूसरे दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान के पश्चात ही भोजन ग्रहण करना अच्छा होता है।

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एकादशी का व्रत शुद्ध मन से करना चाहिए। मन में किसी प्रकार का पाप विचार नहीं लाना चाहिए। झूठ तो अंजान में भी नहीं बोले तो अच्छा रहेगा। रखने वाले को अपना मन साफ रखना चाहिए। व्रती को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए तथा शाम में पूजा के बाद फलाहार करना चाहिए।

🚩*पापमोचनी एकादशी 2026 – अपने सभी पापों से मुक्ति पाने का दिन*🚩🌺🪷🌺🪷🌺🪷🌺🪷🌺🪷🌺🌹होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के बीच पड़ने वाल...
14/03/2026

🚩*पापमोचनी एकादशी 2026 – अपने सभी पापों से मुक्ति पाने का दिन*🚩

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🌹होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के बीच पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहते हैं। यह एकादशी साल की 24 एकादशियों में से आखिरी मानी जाती है। उत्तर भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र महीने में ढलते चंद्रमा के 11 वें दिन पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है।🌹

🌺यह दक्षिण भारतीय कैलेंडर के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है, लेकिन यह दोनों कैलेंडर में एक ही दिन पड़ता है। पाप और मोचनी दो शब्द पापमोचनी शब्द का निर्माण करते हैं, पूर्व का अर्थ ‘पाप’ और बाद का अर्थ पाप का ‘निकालने वाला’ है।🌺

💐पापमोचनी एकादशी का व्रत करना बहुत शुभ माना जाता है और इसका पालन करने वाले भक्तों के सभी पाप क्षमा हो जाते हैं। इस एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।💐

🌷पापमोचनी एकादशी तिथि और समय🌷

🍂पापमोचनी एकादशी: रविवार, 15 मार्च 2026

16 मार्च को पारण का समय – प्रातः 06:40 बजे से प्रातः 09:10 बजे तक

🍂पारण दिवस द्वादशी समाप्ति क्षण – प्रातः 09:30 बजे

एकादशी तिथि प्रारंभ – 14 मार्च 2026 को प्रातः 08:15 बजे से

एकादशी तिथि समाप्त – 15 मार्च 2026 को सुबह 09:20 बजे

🍁पापमोचनी एकादशी के लिए उपवास अनुष्ठान पापमोचनी एकादशी के दिन भक्त पूरे दिन का उपवास रखते हैं। वे भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और भगवान विष्णु की स्तुति के लिए गीत या भजन गाते हैं। मंदिरों में, सभाएं आयोजित की जाती हैं जहां भगवत गीता पर उपदेश दिए जाते हैं।🍁

🪷ऐसा माना जाता है कि व्रत के दौरान जप करने से भक्त के शरीर के चारों ओर एक ढाल बन जाती है। अपने जीवन में स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु की पूजा करें।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा :🪷

🍂यह पापमोचनी एकादशी कथा भविष्य उत्तर पुराण में भगवान कृष्ण और राजा युधिष्ठिर के बीच संवाद के रूप में उल्लिखित है। कथा के अनुसार मेधावी नाम का एक ऋषि था जो भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। यह ऋषि चैत्ररथ के जंगल में तपस्या (ध्यान) किया करते थे, जो सुंदर और सुगंधित फूलों से भरा था। भगवान इंद्र और अप्सराएं अक्सर जंगल का दौरा करती थीं। अप्सराओं ने युवा मेधावी का ध्यान भटकाने की कई बार कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए। मंजुघोष नामक अप्सराओं में से एक ने इस ऋषि को विचलित करने के लिए कई तरह की कोशिश की, लेकिन वह अपनी तपस्या की शक्ति के कारण उनके करीब भी नहीं आ सकी।🍂

🌹आखिरकार मंजुघोसा ने ऋषि से कुछ मील दूर एक तम्बू बनाने का फैसला किया और फिर गाना शुरू कर दिया, जिससे कामदेव (कामदेव) भी उत्साहित हो गए। मंजुघोषा ने जब भी ऋषि के युवा और आकर्षक शरीर को देखा, वह काम से व्याकुल हो उठी। अंत में, मनुघोष मेधावी के करीब पहुंचने में कामयाब रहा और उसे गले लगा लिया, जिससे ऋषि की तपस्या टूट गई। उसके बाद, ऋषि खुद को पूरी तरह से मंजुघोष के आकर्षण में खो गया और फंस गया।

💐उसने तुरंत अपनी पवित्रता खो दी। वह दिन और रात का फर्क भी भूल गया। मेधावी ने ऋषि को 57 साल तक अपने आकर्षण में फंसाए रखा, जिसके बाद उन्होंने उसमें रुचि खो दी और छोड़ने का फैसला किया। जब उसने मेधावी को जाने की इच्छा के बारे में बताया, तो ऋषि होश में आए और महसूस किया कि कैसे अप्सरा ने उन्हें 57 साल तक फंसा रखा था।💐

🌼इसने मेधावी को क्रोधित कर दिया और मंजुघोषा को सबसे बदसूरत महिला में बदलने का शाप दिया। क्रोधित होकर ऋषि ने अप्सरा को कुरूप डायन बनने का श्राप दे दिया। बहुत दुखी होकर, मेधावी अपने पिता, ऋषि च्यवन के आश्रम में वापस गई और पूरी पापमोचनी एकादशी कथा सुनाई। ऋषि च्यवन ने मेधावी और मंजुघोष दोनों को पापमोचनी एकादशी व्रत का पालन करने और पूरी भक्ति के साथ भगवान विष्णु से प्रार्थना करने के लिए कहा। परिणामस्वरूप, वे अपने पापों से मुक्त हो गए।🌼

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🚩🍁🚩🍁🚩🍁🚩🍁🚩🍁🚩🍁🚩🍁🚩🌺माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। इस एकादशी के उपवास से मनुष्य भूत, प्रेत, पिशाच आ...
29/01/2026

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🌺माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। इस एकादशी के उपवास से मनुष्य भूत, प्रेत, पिशाच आदि की योनि से छूट जाता है, अतः इस एकादशी के उपवास को विधि अनुसार करना चाहिए।

जया एकादशी व्रत कथा | Jaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi
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🌹एक बार देवताओं के राजा इंद्र नंदन वन में भ्रमण कर रहे थे। चारों तरफ किसी उत्सव का-सा माहौल था। गांधर्व गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं। वहीं पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और उस पर आसक्त होकर अपने हाव-भाव से उसे रिझाने का प्रयास करने लगी। माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर आसक्त होकर अपने गायन का सुर-ताल भूल गया। इससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया।

💐सभा में उपस्थित देवगणों को यह बहुत बुरा लगा। यह देखकर देवेंद्र भी रूष्ट हो गए। संगीत एक पवित्र साधना है। इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है, अतः क्रोधवश इंद्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप दे दिया- ‘संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती! तुमने देवी सरस्वती का घोर अपमान किया है, अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा।

🌻गुरुजनों की सभा में असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का भी अपमान किया है, इसलिए इंद्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है, अब तुम अधम पिशाच असंयमी का-सा जीवन बिताओगे।’

🍂देवेंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और हिमालय पर्वत पर पिशाच योनि में दुःखपूर्वक जीवनयापन करने लगे। उन्हें गंध, रस, स्पर्श आदि का तनिक भी बोध नहीं था। वहीं उन्हें असहनीय दुःख सहने पड़ रहे थे। रात-दिन में उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी। उस स्थान का वातावरण अत्यंत शीतल था, जिसके कारण उनके रोएं खड़े हो जाते थे, हाथ-पैर सुन्न पड़ जाते थे, दांत बजने लगते थे।

🍁एक दिन उस पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा- ‘न मालूम हमने पिछले जन्म में कौन-से पाप किए हैं, जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी यह पिशाच योनि प्राप्त हुई है? पिशाच योनि से नरक के दुःख सहना कहीं ज्यादा उत्तम है।’ इसी प्रकार के अनेक विचारों को कहते हुए अपने दिन व्यतीत करने लगे।

🌺भगवान की कृपा से एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया। उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और महान दुःख के साथ पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे। वह रात इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी।

🌼दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए।

🪷उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे। इंद्रलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया।

🌼देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा- ‘तुम्हें पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्ति मिली, उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ।’

🌷देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा- ‘हे देवताओं के राजा इंद्र! श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।’

🌹इंद्र ने कहा- ‘हे माल्यवान! एकादशी व्रत करने से तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच योनि को छोड़कर पवित्र हो गए हो, इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो, क्योंकि शिव तथा विष्णु-भक्त हम देवताओं के वंदना करने योग्य हैं,

💐अतः आप दोनों धन्य हैं। अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवास कर सकते हैं।’

🚩जया एकादशी व्रत विधि | Jaya Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi🚩
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🌺जया एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु के अवतार ‘श्रीकृष्ण जी’ की पूजा का विधान है। जो व्यक्ति जया एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहता है, उसे व्रत के एक दिन पहले यानि दशमी के दिन एक बार ही भोजन करना चाहिए।

🍁इसके बाद एकादशी के दिन व्रत संकल्प लेकर धूप, फल, दीप, पंचामृत आदि से भगवान की पूजा करनी चाहिए। जया एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए, बल्कि भगवान का भजन- कीर्तन व सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।

🪷द्वादशी अथवा पारण के दिन स्नानादि के बाद पुनः भगवान का पूजन करने का विधान है। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर प्रसाद वितरण करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। अंत में भोजन ग्रहण कर उपवास खोलना चाहिए।

🚩जया एकादशी व्रत का महत्त्व | Importance of Jaya Ekadashi Vrat in Hindi🚩
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जया एकादशी के दिन व्रत करने से समस्त वेदों का ज्ञान, यज्ञों तथा अनुष्ठानों का पुण्य मिलता है। जया एकादशी व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है। यह व्रत व्यक्ति को भोग तथा मोक्ष प्रदान करता है। इस पुण्य व्रत को करने से मनुष्य को कभी भी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता।
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