Ann Nikah Min Sunnati

Ann Nikah Min Sunnati उन का जो फ़र्ज़ है, वो अहल-ए-सियासत जानें !
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे !!

 #आसान  #निकाह —  #मुस्लिम  #समाज  #की  #नयी  #सुबह  #का  #पैग़ाम"जब दीन की रौशनी दिलों में उतरती है, तब समाज में सच्चा ...
20/07/2025

#आसान #निकाह — #मुस्लिम #समाज #की #नयी #सुबह #का #पैग़ाम"

जब दीन की रौशनी दिलों में उतरती है, तब समाज में सच्चा इंकलाब आता है। आज यही इंकलाब डॉ. इसरार देवबंद और उनके साथी हाजी सलीम उल्धन हाजी मेहरबान कुरैशी अलकार चौधरी मुस्तफा कुरैशी फैसल मेहरबान, मास्टर आशिक इलाही हाजी सलाउद्दीन, हाजी नवाब मुफ्ती खुर्शीद साहब हाजी इरशाद देहली उलेमा हजरात की कोशिशों से परवान चढ़ रहा है।
उनकी रहनुमाई में "निकाह को आसान बनाओ" मुहिम अब सिर्फ एक सोच नहीं, बल्कि एक तहरीक बन चुकी है — ऐसी तहरीक जो मुस्लिम समाज को बोझ से निजात और बरकत की राह दिखा रही है।

💔 क्या हम भूल गए हैं कि हमारी बेटियाँ निकाह के नाम पर भारी दहेज और दिखावे के बोझ तले दबती जा रही हैं?
💔 क्या हम नहीं देख रहे कि मां-बाप करज़ में डूबकर अपनी बेटी की शादी कर रहे हैं — सिर्फ़ इसलिए कि समाज क्या कहेगा?
💔 क्या हमें इस बात की फिक्र नहीं कि निकाह की देरी और बोझ उन्हें मुरतद होने जैसे खतरनाक रास्तों की तरफ़ ढकेल रही है?

अब और नहीं!
अब वक़्त आ गया है कि हम इस बोझ को उतार फेंकें।
अब वक़्त है रस्मों को मिटाने और सुन्नतों को ज़िंदा करने का।

🌿 हमारा मक़सद क्या है?

निकाह को आसान बनाना

दिखावे, बारात, फिजूलखर्ची, वीडियोग्राफ़ी और दहेज जैसी बेबुनियाद रस्मों को अलविदा कहना

बेटी वालों को राहत देना

माँ-बाप को करज़ से बचाना

समाज के माल को तालीम, कारोबार और बेहतरी में लगाना

और सबसे बढ़कर — सुन्नतों को अपनाकर अल्लाह की रज़ा पाना

याद रखिए:
✨ "जब हम सुन्नतों को ज़िंदा करेंगे, अल्लाह हमारी ज़िन्दगियों में बरकतें उतारेगा।"
✨ "जब निकाह आसान होगा, गुनाह मुश्किल हो जाएगा।"
✨ "जब हम दिखावे को छोड़ेंगे, तब हमारी बेटियाँ असल इज़्ज़त पाएँगी।"

आइए, इस मुहिम का हिस्सा बनें।
✊ आइए, अपनी बेटियों को मुरतद होने से बचाएँ
✊ आइए, माँ-बाप को करज़ से निजात दिलाएँ
✊ आइए, अपने समाज को रस्मों से आज़ाद कराकर सुन्नतों से रोशन करें

यही है असली दीन की राह — और यही है तरक़्क़ी का रास्ता।
अब खामोश रहना गुनाह है। अब बोलना और चलना फ़र्ज़ है।

🚩 आओ... इस मुहिम को आगे बढ़ाएँ।
ताकि हमारी आने वाली नस्लें कहें:
"हमें निकाह नहीं डराता, बल्कि राहत देता है। हमें इस्लाम ने सादगी सिखाई है, बोझ नहीं!"

– एक इंकलाबी पैग़ाम, हर मुसलमान के दिल तक पहुँचे –

 #दिलों  #का  #इलाज"( #अल्लाह  #की  #मोहब्बत )एक दिन मैं बाज़ार से गुज़र रहा था कि अचानक मेरी नज़र एक अजीबो-ग़रीब इश्तेहार प...
22/06/2025

#दिलों #का #इलाज"
( #अल्लाह #की #मोहब्बत )

एक दिन मैं बाज़ार से गुज़र रहा था कि अचानक मेरी नज़र एक अजीबो-ग़रीब इश्तेहार पर पड़ी। एक छोटी सी दुकान के बाहर लिखा था:
"यहाँ दिलों की मरम्मत और इलाज किया जाता है।"

ताज्जुब हुआ, दिल खींचा चला गया। जैसे ही अंदर गया, सामने एक बुज़ुर्ग मुस्कुराते हुए खड़े थे। शायद उन्होंने मेरी आँखों में सवाल पढ़ लिया था।
वो बोले,
"हाँ बेटे, मैं दिलों का इलाज करता हूँ... यहाँ वो आते हैं जिनके दिल अब उनके अपने काबू में नहीं रहते।"

फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और धीरे से अपना कान मेरे दिल पर रखा, जैसे कुछ सुन रहे हों। कुछ पल बाद आँखें खोलीं और मुस्कुरा कर बोले:
"तुम्हारे दिल की धड़कनों में हल्का सा उलझाव है... मगर घबराओ मत, तुम्हारा इलाज आसान है।"

मैंने झट से पूछा, "क्या दिलों की भी अलग-अलग किस्में होती हैं?"
वो बोले, "बिलकुल! ये इल्म हमें विरासत में मिला है।"

उन्होंने बताया कि दुनिया में बहुत तरह के दिल होते हैं:

एक सादा और कोमल दिल

एक टूटा और ग़मज़दा दिल

एक जलता हुआ, डूबता हुआ या फिर बेहोश दिल

एक ज़ख़्मी, मगर मजबूत दिल

एक घमंडी दिल

एक दिल जो मोहब्बत से भरपूर हो

और एक जो रिया और नफरत से सख्त पड़ चुका हो

फिर उन्होंने कहा:
"बेटा, इलाज सिर्फ दवा से नहीं होता... दिलों का इलाज अल्लाह की मोहब्बत से होता है।"

और फिर उन्होंने एक नुस्खा लिखा, जो मुझे आज भी याद है:

🔹 तीन चीज़ें अपने दिल से निकाल दो:

1. नफ़रत

2. कीना और बुग़ज़

3. रिया (दिखावे)

🔸 तीन चीज़ें अपने दिल में बसा लो:

1. ईमानदारी

2. तक़वा

3. इख़लास (ख़ालिस नीयत)

🕊️ तीन बातों को कभी मत भूलो:

1. अपने रब के सामने अदब और तस्लीम

2. रहमतुल्लिल-आलमीन ﷺ से सच्ची मोहब्बत

3. हर हाल में शुक्र अदा करना – चाहे ख़ुशहाली हो या तंगी

👂 तीन चीज़ें सीख लो:

ज़बान जो अल्लाह को हर वक़्त याद रखे

बदन जो सब्र कर सके

अक़्ल जो बात को समझ सके

🚫 तीन बुराइयों से बचो:

1. लोगों की बुराइयों पर गुफ्तगू

2. बेकार मजलिसें जहां सिर्फ दूसरों की बुराइयां हों

3. दूसरों के मामलात में बेजा दख़ल

फिर उन्होंने आख़िर में कहा:
"अपने दिल को अल्लाह की मोहब्बत से भर लो... वही – दिलों को फेरने वाला। अगर मोहब्बत अल्लाह से हो जाए तो हर दुख, हर उलझन खुद-ब-खुद आसान हो जाती है।"

---

सच में,
जिसने उस नुस्खे पर अमल किया, उसके दिल को सुकून मिला, उसकी रूह को राहत मिली, और उसकी ज़िंदगी में अल्लाह की मोहब्बत की रौशनी उतर आई।

(या अल्लाह! हमारे दिलों को पाक कर दे, अपने ज़िक्र और अपनी मोहब्बत से रोशन कर दे। आमीन.)

✨हल्दी और मेहंदी की रस्म: तहज़ीब या फुज़ूलखर्ची...?✨“जिन रस्मों को हम तहज़ीब समझ बैठे हैं, क्या वाक़ई वो हमारी हैसियत और...
21/06/2025

✨हल्दी और मेहंदी की रस्म: तहज़ीब या फुज़ूलखर्ची...?✨

“जिन रस्मों को हम तहज़ीब समझ बैठे हैं, क्या वाक़ई वो हमारी हैसियत और शरीअत के दायरे में हैं?”

आज के दौर में शादी सिर्फ दो दिलों का नहीं, बल्कि दिखावे की एक बड़ी ‘इंडस्ट्री’ बन चुकी है। गांव हो या शहर, अब हर जगह शादियों को इंस्टाग्राम और फेसबुक की ज़रूरत के हिसाब से प्लान किया जाने लगा है। ख़ासकर “हल्दी और मेहंदी” की रस्म, जो कभी घरेलू और तर्क पर आधारित हुआ करती थी, अब एक रंग-बिरंगे खर्चीले ड्रामे का रूप ले चुकी है।

🔶 पहले क्या था...?

पहले हल्दी की रस्म का मकसद था —
सादगी, साफ़-सुथरापन, और तेयारी।
साबुन, शैम्पू और पार्लर नहीं थे, इसलिए घर की महिलाएं हल्दी, चंदन, आटा, दही या दूध का उबटन बनाकर दूल्हा-दुल्हन को नहलाती थीं ताकि उनकी त्वचा निखरे और वो अपने सबसे अच्छे रूप में शादी में शामिल हों।
ना कोई फ़ोटोग्राफर, ना म्यूज़िक सिस्टम, ना कोई डेकोरेशन — सिर्फ महकती हल्दी और हँसी-खुशी का माहौल।

🔶 अब क्या हो गया...?

आज हर शहर गांव में हजारों रुपये खर्च कर पीले कपड़े, बैकड्रॉप, लाइटिंग, डी.जे., महंगी डेकोरेशन और रील बनाने के लिए लोग “पीले ड्रामे” में डूबे हैं।
दूल्हा-दुल्हन के कपड़े से लेकर हर मेहमान की ड्रेस तक ब्रांडेड होनी चाहिए, क्योंकि वो रील्स में दिखेगी।
बेटा रील बनाता है और बाप कर्ज़ के नीचे दब जाता है।
अफसोस की बात तो ये है कि ये सब कुछ वो लोग भी कर रहे हैं, जिनके घर में महीने की दाल-चावल की भी तंगी होती है।

🔶 इस्लाम क्या कहता है?

इस्लाम ने निकाह को सादगी और आसानी से करने का हुक्म दिया है।
आप ﷺ ने फ़रमाया:

> “सबसे बरकत वाला निकाह वो है जिसमें खर्च कम हो।”
(हदीस – सहीह)

क़ुरान में अल्लाह फ़रमाता है:

> “बेशक फुज़ूलखर्च लोग शैतान के भाई हैं।”
(सूरह बनी इसराईल: 27)

इसका मतलब साफ़ है दुल्हन के निखार के लिए हल्दी, मेहंदी जैसी रस्मों को इस हद तक ले जाना कि वो फुज़ूलखर्ची बन जाए — इस्लाम की नज़रों में ना सिर्फ ग़लत, बल्कि गुनाह है।

🔶 समाज को क्या चाहिए...?

आज जरूरत इस बात की है कि हम खुद अपने घरों से शुरुआत करें।
बच्चों को समझाएं कि:

शादी दिखावे का नाम नहीं,

शरीअत की पैरवी का नाम है,

खुशी सादगी में है,

बर्बादी शान नहीं।

🔶 ख़त्म करते हुए एक सवाल...

> हम दूसरों को दिखाने के लिए क्या वाकई अपनी मां-बाप की खून-पसीने की कमाई को यूँ ही बहा दें...?

आज जो गैर-मुस्लिम भी इसे फुज़ूलखर्ची समझते हैं, हमें तो और भी ज़्यादा एहतियात करने की ज़रूरत है, क्योंकि हमारे लिए ये महज़ बर्बादी नहीं — बल्कि शरई गुनाह है।

💬 दुआ करें...

अल्लाह तआ़ला हमें इस्लाम की रौशनी में सोचने, समझने और अमल करने की तौफीक़ अता फरमाए।
आमीन।
डॉ इसरार देवबंद

*पर्दे का सफ़र*  और इस्लाम (एक ख़ातून की ज़बानी)۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔मेरे पर्दे का अब तक का सफ़र —मेरा पहला मरहला वो था...
08/06/2025

*पर्दे का सफ़र*
और इस्लाम
(एक ख़ातून की ज़बानी)
۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔

मेरे पर्दे का अब तक का सफ़र —
मेरा पहला मरहला वो था जिसे मैं दौर-ए-जाहिलियत कहती हूँ। उस वक़्त पर्दा सिर्फ़ एक लफ़्ज़ था, मानी व मफ़हूम से बिल्कुल ना-आशना।
हया का नाम तो सुना था, मगर मफ़हूम तो दूर की बात, उस के लुग़वी मतलब से भी ग़ाफ़िल थी।

फिर ज़िन्दगी ने एक हल्की सी करवट ली। हिदायत की एक नर्म सी किरण नुमुदार हुई। मैंने अबाया पहनना शुरू किया, मगर ये अबाया भी अलमारी में अपनी मर्ज़ी से सुकूनत पज़ीर था। जब दिल चाहा पहना, जब ना चाहा छोड़ दिया।

लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि इस तरह पर्दे का कोई मक़सद पूरा नहीं होता।

फिर वक़्त ने क़दम बढ़ाया, और मैंने नक़ाब ओढ़ लिया। मगर ये नक़ाब भी مشروط था। बाज़ार की गहमागहमी में मौजूद, लेकिन तफ़रीही मक़ामात पर ख़ुद ही सरक जाता।
तस्वीर के वक़्त तो जैसे नक़ाब का वजूद ही ज़ेहन से महव हो जाता।

फिर एक दिन अल्लाह ने दिल पर वो नूर उतारा जो बसीरत बख़्शा करता है।
मैंने पर्दे के मफ़हूम को, किसी हद तक सही, मगर जानना शुरू किया। अब अबाया मेरी पहचान बन गया, और नक़ाब का उतारना तरक़ कर दिया।

लेकिन तब भी महसूस किया कि लोगों की निगाहें मुझ पर ठहरती हैं।
क्लास के लड़के बात-चीत की राह ढूंढते थे। कुछ मेरे संजीदा लहजे से दबक जाते, कुछ हिम्मत कर ही लेते।

तब मैंने सोचा — शायद अभी पर्दा मुकम्मल नहीं हुआ।

तब एक नया मरहला आया।
मैंने रंगीन अबाये अलमारी से हमेशा के लिए निकाल दिए, और सियाह अबाया ज़िन्दगी का लिबास बन गया।
ढाई गज़ का दुपट्टा, डबल नक़ाब, दस्ताने और मोज़े मेरी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए।

घराने में कुछ लोगों ने मज़ाक़ उड़ाया, किसी ने निंजा कह कर पुकारा।

मगर सच ये है कि सियाह चादर में भी कभी-कभी मैं ख़ुद को पुरकशिश महसूस करती।
कंधे पर बैग, चलती हुई मैं, आइने में देखती तो दिल कहता:
"मैं मुकम्मल हूँ, मैं ख़ूबसूरत हूँ।"

फिर ख़याल आता, जब मैं ख़ुद को इतनी दिलकश लग रही हूँ, तो बाहर की निगाहों में मेरा अक्स कितने गुना ज़्यादा होगा?
लिहाज़ा सवाल उठता था: क्या इस से ज़्यादा छुपने का कोई और रास्ता है?

और फिर वो दिन आया, जो एक नई मंज़िल की तरफ़ पहला क़दम था।
मैंने एक लड़की को पठानी बुरक़े में देखा। पहला तास्सुर यही आया कि कोई उम्र-रसिदा खातून होंगी,
मगर जब बुरक़ा ज़रा सा सरका — तो वो मेरी हमउम्र निकली।
बस, दिल ने फ़ैसला कर लिया — यही मेरा आइंदा लिबास होगा।

मैंने वो टोप़ी वाला पठानी बुरक़ा पहनना शुरू कर दिया।
एक अजीब सा सुकून तारी हुआ — जैसे मैं "नाज़िर" तो हूँ, मगर "मंज़र" नहीं।
मैं सबको देख सकती थी, मगर कोई मुझे नहीं देख रहा था।

ये एहसास ना-क़ाबिल-ए-बयान था — जैसे हुजूम में गुम हो कर अस्ल ख़ुदी से मुलाक़ात हो गई हो।

मगर फिर एक और नुक्ता समझ आया:
ये जो मैं देख रही हूँ, ये जो निगाहों की आज़ादी है — यही गुमराही का ज़रिया भी बन सकती है।
देखने से ही दिल मुतअस्सिर होता है, और दिल की ख़राबी से किरदार बिगड़ते हैं।

तब अल्लाह की आयत दिल में उतरी:
"وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ"
(अपने घरों में ठहरी रहो, और पहली जाहिल औरतों की तरह अपनी ज़ीनत न दिखाओ।)

इसका मफ़हूम वाज़ेह हुआ — औरत का अस्ल पर्दा यही है कि वो घर में रहे।
और अगर ज़रूरतन निकले भी, तो इस तरह कि देखने वाले की निगाह उस पर ठहरने की ख़्वाहिश न करे।

यही दर्जा — यानी घरेलू ज़िन्दगी का क़रार — इसने मेरे दिल को सबसे ज़्यादा इत्मीनान बख़्शा।

और उस इत्मीनान का सबसे बड़ा सहारा मेरे शौहर बने —
जिन्होंने मेरी हर ज़रूरत, मेरे मिज़ाज और मर्ज़ी के मुताबिक़ मेरे दरवाज़े पर मोहैया की, ताकि मुझे बग़ैर ज़रूरत के बाहर न जाना पड़े।

और जहाँ तक सैर व तफ़रीह का ताल्लुक़ है — वो भी तभी होती है जब शौहर साथ हों।
पब्लिक मक़ामात पर उनके पहलू में चलती हूँ तो नज़र कहीं जाती ही नहीं,
क्योंकि राहत-ए-निगाह जो पहलू में होते हैं।

यानी —
ना मैं किसी को दिखाई देती हूँ, ना किसी को देखती हूँ।

यही है पर्दे का वो आख़िरी और हक़ीकी दर्जा —
जो रूह को क़रार, और ईमान को हिफ़ाज़त बख़्शता है।

(मंक़ूल)

*M.A.I ®*
(*मजलिस अहले इस्लाम*)

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