08/05/2026
कुंजन निकुंजन बिच बिराजत, श्याम-श्यामा छबि भारी।
लतानि लपटि तमाल तरु, रच्यो रहस्य निकुंज सुखकारी॥
फूला-फलन थार सजे, सुरभि सुधा रस बरसै।
कमल-कमलिनी अरु बनमाल, अति मनमोहन दरसै॥
अष्ट आचारज सेवत ठाढ़े, प्रेम नयन निहारैं।
आरति दीप धरत कर कमल, रसिक रीति सँवारैं॥
बैठे हरिदास रसिक, वीणा मधुर झनकारैं।
राग-रागिनी उमगि उठी, सखियन हिय हरषारैं॥