01/08/2026
हमारे पूजनीय शंकराचार्य जी को मेरा सादर प्रणाम। 🙏
लेकिन एक बात मन में बार-बार उठती है। आजकल आपके अनेक वक्तव्य ऐसे सुनने को मिल रहे हैं, जिन्हें सुनकर करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों के मन में प्रश्न पैदा हो रहे हैं।
आदरणीय शंकराचार्य जी, आप सनातन परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक पर विराजमान हैं। इस पद की गरिमा केवल अधिकार नहीं, बल्कि पूरे समाज को जोड़ने और सही दिशा दिखाने की जिम्मेदारी भी देती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं आप समाज की भावनाओं से दूर होते जा रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो आपके वक्तव्यों से बार-बार विवाद क्यों उत्पन्न हो रहे हैं? समाज मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है, भ्रम और कटुता की नहीं।
हम सबने सदैव शंकराचार्य पीठ का सम्मान किया है और आगे भी करेंगे। किंतु सम्मान का अर्थ यह नहीं कि प्रश्न भी न पूछे जाएँ। जब करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में जिज्ञासा हो, तो उसका उत्तर भी मिलना चाहिए।
यदि किसी कारणवश मन अशांत है, निर्णयों में असंतुलन आ रहा है, या समय अनुकूल नहीं चल रहा है, तो आत्मचिंतन करना भी संत परंपरा की ही शिक्षा है। संत का सबसे बड़ा आभूषण विनम्रता, धैर्य और समस्त समाज को साथ लेकर चलने की भावना होती है।
हमारी कामना केवल इतनी है कि आप पुनः उसी भूमिका में दिखाई दें, जहाँ आपके शब्द समाज को जोड़ें, सनातन धर्म को सशक्त करें और करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास को और अधिक दृढ़ बनाएं।
सनातन समाज अपने संतों का सम्मान करता है, लेकिन उनसे आदर्श नेतृत्व की अपेक्षा भी रखता है।
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